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धर्मार्थं यस्त्यजेत् प्राणान् किं तीर्थे च जपे च किम् । मुक्तिभागी भवेत् सोऽपि निरयं नाधिगच्छति ॥
धनुष केवल एक शस्त्र नहीं — वह साधना का यन्त्र है। बाण छूटने से पहले जो स्थिरता, जो श्वास, जो एकाग्र दृष्टि साधक के भीतर जागती है, वही धनुर्वेद का वास्तविक विषय है। हमारे अखाड़े में हम जिस सिलम्बम्, कुथु-वरिसै और पारम्परिक आयुधों का अभ्यास करते हैं, उन सबकी जड़ें इसी विद्या-परम्परा में हैं — शरीर को साधना, अस्त्र को साधना, और मन को लक्ष्य पर टिकाना।
धनुर्वेद यजुर्वेद का उपवेद है। चार वेदों के चार उपवेद माने गए हैं — ऋग्वेद का आयुर्वेद, सामवेद का गान्धर्ववेद, अथर्ववेद का अर्थवेद (या शिल्पवेद), और यजुर्वेद का धनुर्वेद। यजुर्वेद क्रि या और यज्ञ का वेद है; उसी क्रिया-शक्ति का सांगोपांग रूप धनुर्वेद में युद्ध, आत्मरक्षा और प्रजापालन के विज्ञान के रूप में प्रकट होता है। इसीलिए यह संहिता स्वयं को "यजुर्वेदाथर्वसम्मिता संहिता" कहती है — यजुर्वेद और अथर्ववेद दोनों से अनुमोदित।
धनुर्वेद का प्रयोजन इस ग्रन्थ में स्पष्ट है — "दुष्टदस्युचोरादिभ्यः साधुसंरक्षणं धर्मतः, प्रजापालनं धनुर्वेदस्य प्रयोजनम्।" अर्थात् दुष्टों से सज्जनों की रक्षा और प्रजा का पालन — यही इस विद्या का धर्म है। यह आक्रमण की नहीं, रक्षण की विद्या है।
इस संहिता की गुरु-परम्परा स्वयं भगवान् सदाशिव से आरम्भ होती है। सदाशिव ने यह सरहस्य धनुर्विद्या भार्गव परशुराम को दी; उसी को महर्षि वसिष्ठ ने ग्रहण किया और राजर्षि विश्वामित्र के प्रश्न पर प्रकट किया। इस प्रकार यह ग्रन्थ एक संवाद है — व िजिगीषु विश्वामित्र पूछते हैं, ब्रह्मर्षि वसिष्ठ उत्तर देते हैं। ग्रन्थ के अन्त में यही मुहर लगती है — "इति श्रीमहर्षि- वसिष्ठ-प्रणीता धनुर्वेद संहिता।"
ग्रन्थ स्वयं अपनी योजना बताता है (अध्याय १, श्लोक २) — धनुर्वेद चतुष्पादात्मक है, उसके चार पाद हैं:
हमारे पास उपलब्ध पाठ (माहेश्वरी वैदिक-साहित्य-संग्रह की वाचना) इन विषयों को तीन अध्यायों में क्रमबद्ध करता है, प्रत्येक अध्याय की श्लोक-संख्या स्वतन्त्र रूप से आरम्भ होती है:
करला कुतूहल अखाड़ा समय-सिद्ध भारतीय शरीर-साधना, बल और योद्धा-धनुर्वेद कलाओं का अभ्यास कराता है। धनुर्वेद उन सबका मूल-शास्त्र है। इस संहिता में जो बात बार-बार लौटती है — श्रम, अर्थात् गुरु के सामने किया गया निरन्तर अभ्यास — वही हमारे अखाड़े की आत्मा है। "श्रमेण चित्रयोधित्वं श्रमेण प्राप्यते जयः, तस्माद् गुरुसमक्षं हि श्रमः कार्यो विजानता" — यह पंक्ति सिलम्बम् के कम्बु-अभ्यास पर, कुथु-वरिसै के जोड़ी-अभ्यास पर, और कर्लाकट्टै के प्रत्येक चक्र पर उतनी ही खरी उतरती है जितनी बाण-मोक्षण पर।
स्थान (स्टान्स), मुष्टि (पकड़), दृष्टि और श्वास — धनुर्धर के ये चार आधार वही हैं जो हर आयुध-कला के हैं। इसीलिए यह ग्रन्थ किसी एक हथियार का मैनुअल नहीं, समस्त योद्धा-कला की व्याकरण है।
## शीर्षकों से बँटे हैं — पहली बार पढ़ते समय
इन्हीं शीर्षकों के सहारे चलें।SOURCES.md में उसका उल्लेख है।समय-सिद् ध · प्रामाणिक · सबके लिए खुला।
🚩 हर हर महादेव!
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