दीक्षा से लक्ष्य तक — धनुर्धर की आधारशिला
सदाशिव–परशुराम–वसिष्ठ परम्परा का उपक्रम; अधिकारी, आचार्य, मुहूर्त, दीक्षा और अङ्गन्यास; फिर धनुष, गुण, बाण, फल की परख; अन्त में मुष्टि, स्थान और लक्ष्य के भेद।
धनुर्वेद-परिचय एवं परम्परा
एक बार विजिगीषु राजर्षि विश्वामित्र गुरु वसिष्ठ के पास जाकर, प्रणाम करके बोले — "भगवन्! श्रोत्रिय, दृढ़चित्त और योग्य शिष्य को, तथा दुष्ट शत्रुओं के नाश के लिए, मुझे धनुर्विद्या कहिए।" तब महर्षियों में श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि वसिष्ठ बोले — "हे राजन् विश्वामित्र! सुनो। जिस रहस्यसहित धनुर्विद्या को भगवान् सदाशिव ने परशुराम से कहा था, वही रहस्यसहित संहिता मैं तुम्हारे हित के लिए, तथा गौ-ब्राह्मण-साधु-वेद की रक्षा के लिए कहता हूँ — यह संहिता यजुर्वेद और अथर्ववेद से सम्मत है।"
जैसा महादेव ने बुद्धिमान् भार्गव (परशुराम) से कहा था, वही मैं तुम्हें यथार्थ रूप में कहता हूँ — भली भाँति सुनो।
व्याख्या — ‘अथ’ और गुरु-परम्परा: ग्रन्थ का आरम्भ अथ से है। ‘अथ’ स्वयं मङ्गलवाचक है और ॐ के समान शुभ आरम्भ क राता है। साथ ही इसका अर्थ है — अब, पूर्व अधिकार प्राप्त हो जाने के अनन्तर, इस विशिष्ट विद्या का अध्ययन आरम्भ हो। जैसे ब्रह्मसूत्र ‘अथातो ब्रह्मजिज्ञासा’ से आरम्भ होता है, वैसे ही यहाँ धर्म और नीतिशास्त्र के बृहत् क्षेत्र को जानने के पश्चात् धनुर्वेद पर विशेष विचार आरम्भ होता है। ‘धनु’ यहाँ केवल धनुष का नाम नहीं; समस्त आयुध और युद्धविद्या इसके विषय में आते हैं। धनुर्वेद यजुर्वेद का उपवेद तथा दण्डनीति का प्रधान अङ्ग है।
इस आरम्भ में वक्ता और श्रोता भी स्पष्ट हैं। भगवान् सदाशिव ने सरहस्य धनुर्विद्या भगवान् परशुराम को दी; महर्षि वसिष्ठ उसी विद्या को राजर्षि विश्वामित्र के हित और गो-ब्राह्मण-साधु-वेद की रक्षा के लिए कहते हैं। यही गुरु-शिष्य-परम्परा ग्रन्थ का माहात्म्य और प्रमाण स्थापित करती है। यह किसी एक व्यक्ति की मनमानी कल्पना नहीं, आदिगुरु से बहत ी हुई समय-सिद्ध विद्या है। इसलिए प्रथम आदेश है — संशृणु, भली भाँति सुनो। श्रद्धापूर्वक श्रवण ही आगे के अभ्यास का द्वार है।
यह धनुर्वेद चार पादों वाला है — पहले पाद में दीक्षा की विधि, दूसरे में संग्रह (गुरु से प्राप्त ज्ञान और अभ्यास का धारण-सञ्चय), तीसरे में सिद्ध प्रयोग, और चौथे में प्रयोग की विधियाँ।
व्याख्या — विद्या के चार पाद: यह सूत्र पूरे ग्रन्थ का नक्शा ही नहीं, विद्या ग्रहण करने की क्रमबद्ध पद्धति भी है — दीक्षा → संग्रह → सिद्धप्रयोग → प्रयोगविधि।
दीक्षा में शिष्य श्रद्धा से गुरु के सामने उपस्थित होता है और सरल क्रियाओं को देखकर दोहराता है। आरम्भ में प्रत्येक गति की शब्दों से चीर-फाड़ नहीं की जाती। बालक जैसे देखकर सीखता है, वैसे शिष्य गुरु की देह-गति, दृष्टि, श्वास और लय को ग्रहण करता है। हमारे अखाड़े के आरम्भिक मेइ-पडम्, काल-पाडम् और कम्बु-चक्रों में भी यही होता है। गुरु के शरीर में सहस्रों आवृत्तियों से संचित विद्या शिष्य के शरीर में गति के माध्यम से उतरती है।
संग्रह केवल आयुध-सामग्री जुटाना नहीं; गुरु से मिले उपदेश और गति को स्मृति में धारण करना है। बार-बार की आवृत्ति बुद्धि तक सीमित न रहकर चित्त पर संस्कार बनाती है। फिर श्रवण, पठन और मनन से उसका बोध पुष्ट होता है। सजगता मन को स्वचालित ढंग से भटकने नहीं देती और बुद्धि प्रत्येक क्रिया को धर्म तथा प्रयोजन से जोड़ती है।
सिद्धप्रयोग में वही गति शुद्ध, स्थिर, तीव्र और परिस्थिति-अनुकूल बनती है। प्रयोगविधि में उसका जोड़ी-अभ्यास, प्रतिकार, मर्म-बोध और संग्राम में यथायोग्य प्रयोग खुलता है। सिलम्बम् में पहले पृथक् पाठ, फिर दीर्घ क्रम, उसके बाद युद्ध-समीप सिद्धता और अन्त में उन्हीं पाठों के अनेक प्रयोग खुलते हैं। सीधे अन्तिम प्रयोग पर कूदने से शरीर में न आधार बनता है, न चित्त में विद्या ठहरती है।
अधिकारी एवं आयु ध
धनुर्वेद में विप्र दो वर्णों (क्षत्रिय और वैश्य) का गुरु कहा गया है। शूद्र को भी अपनी व्यावहारिक शिक्षा द्वारा युद्ध का अधिकार प्राप्त है।
व्याख्या — गुरु और अधिकारी: किसी शास्त्र में प्रवेश से पहले उसके अधिकारी, विषय, स म्बन्ध और प्रयोजन को समझना आवश्यक है। यहाँ विषय धनुर्वेद है, प्रयोजन आगे साधु-संरक्षण और प्रजापालन कहा जाएगा, और इस श्लोक में गुरु तथा अधिकारी का विधान आता है। गुरु वह हो जो विद्या को जानता ही नहीं, स्वयं उसे जीता और यथास्थान प्रयोग भी करता हो। शिष्य में श्रद्धा के साथ अभ्यास की तत्परता, समय देने की क्षमता और अनुशासन होना चाहिए।
वर्ण के अनुसार कही गई व्यवस्था विद्या के द्वार बन्द नहीं करती; वह बताती है कि गुण, कर्म, स्वभाव और उपलब्ध शिक्षा के अनुसार मार्ग भिन्न हो सकता है। विप्र गुरु क्षत्रिय और वैश्य को विधिपूर्वक शिक्षा देता है; शूद्र भी व्यावहारिक प्रशिक्षण से युद्धाधिकार प्राप्त करता है। अतः इस ग्रन्थ में शिक्षा का सम्बन्ध जन्म-मात्र से नहीं, पात्रता और साधना से भी प्रत्यक्ष रूप में जुड़ा है।
आयुध चार प्रकार का है — मुक्त (हाथ से छोड़ा जाने वाला, जैसे चक्र या तोमर), अमुक्त (हाथ में रहने वाला, जैसे खड्ग), मुक्तामुक्त (छोड़कर भी अपने नियन्त्रण में रखा अथवा पुनः खींचा जाने वाला, जैसे पाश), और यन्त्रमुक्त (यन्त्र से छूटने वाला, जैसे धनुष से बाण)।
व्याख्या — वर्गीकरण की दृष्टि: वैशेषिक दर्शन में किसी वस्तु को उसके सामान्य और विशेष गुणों से जाना जाता है। एक जाति की वस्तुओं में कोई समान धर्म होता है और दूसरी जाति से उनका विशेष भेद होता है। यहाँ आयुधों का विशेष भेद उनके चलाए जाने के ढंग से किया गया है। चक्र और तोमर मुक्त, खड्ग और कम्बु अमुक्त, पाश मुक्तामुक्त, और धनुष से छूटता बाण यन्त्रमुक्त प्रयोग का उदाहरण देता है। एक ही आयुध का नाम जान लेना पर्याप्त नहीं; वह हाथ में रहता है, हाथ से फेंका जाता है, छोड़कर भी साधक से जुड़ा रहता है अथवा किसी यन्त्र से छूटता है — इससे उसकी दूरी, पकड़, पुनःप्राप्ति, लक्ष्य और अभ्यास सब बदल जाते हैं।
इसलिए मुक्त, अमुक्त, मुक्तामुक्त और यन्त्रमुक्त परस्पर बदल देने योग्य शब्द नहीं हैं। शास्त्रीय परिभाषा वस्तु के विशिष्ट धर्म को सुरक्षित रखती है; अस्पष्ट नामकरण अभ्यास में भी अस्पष्टता लाता है।
दुष्टों, दस्युओं और चोरों से सज्जनों की धर्मपूर्वक रक्षा तथा प्रजा का पालन — यही धनुर्वेद का प्रयोजन है।
व्याख्या — धनुर्वेद का धर्म: यह विद्या हिंसा या प्रदर्शन के लिए नहीं, धर्मतः साधु-संरक्षण और प्रजापालन के लिए है। यहाँ ‘धर्मतः’ आयुध-प्रयोग की सीमा भी बाँधता है और उसका बल भी देता है। धर्म का बोध न हो तो कौशल दुष्ट के हाथ में उपद्रव बन सकता है; धर्म में स्थित योद्धा के हाथ में वही कौशल निर्बल का आश्रय बनता है।
मनु महाराज मानवधर्म के दस लक्षण कहते हैं —
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः । धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥
धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, धी, विद्या, सत्य और अक्रोध — ये सभी मनुष्यों के लिए आधार हैं। इनके साथ कुलधर्म, वर्णधर्म और परिस्थिति-विशेष का कर्तव्य जुड़ता है। धृति साधक को कठिनाई में अपने धर्म पर स्थिर रखती है; दम और इन्द्रियनिग्रह इन्द्रियों को इच्छाओं के पीछे अनियन्त्रित दौड़ने से रोकते हैं; धी अर्थात् धर्मानुसार निर्णय करने वाली बुद्धि; विद्या हमें गुरु और पूर्वजों की जीवित ज्ञानधारा से जोड़ती है। सत्य और अक्रोध के बिना आयुध पर अधिकार स्वयं पर अधिकार नहीं बनता। अस्तेय दूसरे का धन, श्रेय अथवा ज्ञान हड़पने से रोकता है और शौच देह तथा मन दोनों की निर्मलता है। जीवात्मा इस देह-रथ का स्वामी, बुद्धि सारथि, मन लगाम और पाँचों इन्द्रियाँ विषयों की ओर दौड़ने वाले अश्व हैं। लगाम सजग रहे और सारथि धर्म जानता हो, तभी रथ लक्ष्य तक पहुँचता है।
धर्म चारों पुरुषार्थों की नींव है। धर्मरक्षा के लिए मृत्यु से भी निर्भय क्षत्रिय मोक्ष के अत्यन्त समीप खड़ा होता है। कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध में स्थिर होने की नीति सिखाई; वही उपदेश मोक्षशास्त्र और वेदान्त का हृदय भी है। धनुर्वेद का प्रयोजन इसी एकता को साधता है — उत्तम युद्ध-कौशल और आत्मोन्नति दो अलग मार्ग नहीं हैं, जब युद्ध धर्म के लिए हो।
जिस नगर में एक भी प्रसिद्ध धनुर्धर हो, वहाँ से शत्रु वैसे ही दूर भाग जाते हैं जैसे सिंह के घर से मृग।
रक्षण का प्रभाव: सिद्ध योद्धा को हर बार शस्त्र उठाना नहीं पड़ता। उसका यश ही शत्रु को दूर रखता है। एक अनुशासित धनुर्धर पूरे नगर के लिए रक्षा-कवच बन ज ाता है। अतः व्यक्तिगत साधना का फल केवल साधक का बल नहीं, परिवार, गुरुकुल, देवालय और समस्त समुदाय की निर्भयता है।
आचार्य भली भाँति परखे हुए पात्र को ही धनुर्विद्या दे; लोभी, धूर्त, कृतघ्न और मन्दबुद्धि को न दे।
अधिकारी की परीक्षा: आयुधविद्या का दान सामान्य सूचना देना नहीं है। गुरु शिष्य की बुद्धि, निष्ठा, कृतज्ञता, संयम और प्रयोजन को परखता है, क्योंकि यही ज्ञ ान रक्षा भी कर सकता है और दुरुपयोग होने पर विनाश भी। लोभ विद्या को व्यापार बना देता है, धूर्तता गुरु-वचन को अपने स्वार्थ के लिए मोड़ती है, कृतघ्नता परम्परा को काटती है और मन्दबुद्धि यहाँ केवल कम बौद्धिक क्षमता नहीं, उचित-अनुचित का विचार न कर सकने की अवस्था है।
परीक्षा केवल प्रवेश के दिन समाप्त नहीं होती। गुरु और शिष्य दोनों को अपने आचरण, अनुशासन और प्रयोजन को निरन्तर शुद्ध रखना होता है। विद्या अहंकार से अपनी बताने की वस्तु नहीं; वह पूर्वजों से प्राप्त उत्तरदायित्व है। आचार्य उसे निःस्वार्थ भाव से योग्य शिष्य में प्रतिष्ठित करता है और शिष्य सेवा, अभ्यास तथा धर्माचरण से उसका ऋण चुकाता है।
ब्राह्मण को धनुष, क्षत्रिय को खड्ग, वैश्य को कुन्त (भाला) और शूद्र को गदा देनी चाहिए।
व्याख्या — स्वभावानुसार विशेषज्ञता: यह श्लोक ऊँच-नीच का क्रम नहीं बनाता; आचार्य को बताता है कि भिन्न गुण, स्वभाव और युद्ध-प्रवृत्ति वाले शिष्यों की प्रमुख विशेषज्ञता किस दिशा में विकसित की जाए। धनुष के लिए सूक्ष्म बुद्धि, दीर्घ एकाग्रता और दूरी का विचार प्रधान है; खड्ग में तत्काल निर्णय, अग्रगमन और निकट युद्ध; कुन्त में दूरी, पंक्ति और भूमि का व्यवहार; गदा में अपार देहबल, प्रचण्डता और निकट संग्राम की सहनशक्ति चाहिए। हमारे अभ्यास में कर्लाकट्टै, मल्लयुद्ध और मुष्टियुद्ध गदा के इसी बल-प्रधान परिवार से जुड़ते हैं।
विशेषज्ञता का अर्थ यह नहीं कि योद्धा अन्य आयुध नहीं जानता। श्रीराम और अर्जुन धनुष के परम विशेषज्ञ हैं, फिर भी उनके युद्ध में आवश्यक उग्रता पूर्ण रूप से जागती है। जनस्थान में श्रीराम ने अकेले खर-दूषण की विशाल सेना का संहार किया — युद्ध आरम्भ होते ही उनकी दृष्टि और देह का प्रचण्ड रूप क्षत्रिय के रूपान्तरण को दिखाता है। भीमसेन गदा के अनुपम विशेषज्ञ हैं, इसका अर्थ यह नहीं कि वे धनुष नहीं चला सकते। हनुमान जी परम दयालु भक्त हैं और धर्मयुद्ध में वानर-वीर की अपरिमित शक्ति भी धारण करते हैं। नकुल की खड्गविद्या भी इसी स्वभावानुकूल विशेषज्ञता को समझाती है।
आचार्य प्रत्येक शिष्य को उसके गुण और तत्परता के अनुसार पथ देता है। पथ भिन्न हैं, लक्ष्य वही चार पुरुषार्थ — धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — हैं; कोई पथ अथवा वर्ण अपने आप में छोटा-बड़ा नहीं।
धनुष, चक्र, कुन्त, खड्ग, चुरिका (कटार) और गदा — तथा सातवाँ बाहुयुद्ध (निःशस्त्र मल्लयुद्ध); इस प्रकार युद्ध सात प्रकार के हैं।
व्याख्या: पिछले श्लोक में वर्गीकरण आयुध के चलने के ढंग से था; यहाँ युद्ध को प्रधान आयुध-परिवारों के आधार पर सात भागों में रखा है। वर्गीकरण का आधार बदलने से सूची बदलती है, पर विरोध नहीं होता। शास्त्र किसी विषय को पूर्ण रूप से देखने के लिए अलग-अलग विशेष धर्मों के अनुसार ऐसे अनेक विभाग करता है।
सातवाँ बाहुयुद्ध अखाड़े का आधार है — निःशस्त्र देहबल, सन्तुलन, प्रहार-सहन, ग्रहण और मोचन के बिना कोई आयुध पूर्णतः नहीं सधता। कुथु-वरिसै और मल्लयुद्ध इसी सातवें युद्ध की जीवित धाराएँ हैं। आयुध छिन जाए अथवा दूरी टूट जाए, तब योद्धा का अपना शरीर ही उसका शस्त्र रहता है।
आचार्य-लक्षण एवं मुहूर्त
जो सातों युद्धों में निपुण हो वही आचार्य; चार में निपुण भार्गव; दो में योद्धा; और एक में निपुण मात्र गणक (गिनती का) कहलाता है।
आचार्य का मान: आचार्य-पद नाम, आयु या व्यवसाय से नहीं, सातों युद्धों की सिद्धि और उन्हें योग्य शिष्य तक पहुँचाने की क्षमता से प्राप्त होता है। चार युद्धों का ज्ञाता भार्गव, दो का ज्ञाता योद्धा और एक का ज्ञाता गणक कहा गया है। ‘गणक’ भी उस एक विद्या का जानकार है, किन्तु सम्पूर्ण धनुर्वेद का आचार्य नहीं। यह सीमा जानना विनय है।
जो स्वयं थोड़ी क्रिया जानकर अपने को आचार्य घोषित कर दे, वह शिष्य की प्रकृति के अनुसार आयुध और मार्ग नहीं चुन सकता। सच्चा आचार्य व्यापक ज्ञान, प्रत्यक्ष अभ्यास और निःस्वार्थ अध्यापन — तीनों को धारण करता है।
हस्त, पुनर्वसु, पुष्य, रोहिणी, तीनों उत्तरा, अनुराधा, अश्विनी और रेवती — ये (शुभ) नक्षत्र हैं (शस्त्रारम्भ के लिए)।
जन्मराशि से चन्द्रमा के प्रथम, तृतीय, षष्ठ, सप्तम, दशम और एकादश स्थान में रहने पर सब कार्य करने चाहिए।
तृतीया, पञ्चमी, सप्तमी, दशमी, त्रयोदशी और द्वादशी — ये तिथियाँ शुभ मानी गई हैं।
रविवार, शुक्रवार और गुरुवार — ये तीन वार शस्त्र-कर्म के आरम्भ में शुभ हैं।
काल का संस्कार: दीक्षा केवल सही गुरु और पात्र शिष्य का मिलन नहीं; नक्षत्र, चन्द्रबल, तिथि और वार को अनुकूल करके आरम्भ किया जाता है। शस्त्र-साधना को काल के पवित्र क्रम में प्रतिष्ठित करने से शिष्य समझता है कि यह मनमाने समय उठाया हुआ उपकरण नहीं, देवताओं और गुरु की साक्षी में लिया गया व्रत है। शुभ मुहूर्त उस प्रथम संस्कार को चित्त में गहरा करता है, जिससे आगे का दीर्घ अभ्यास उसी सङ्कल्प पर टिका रहे।
दीक्षा एवं अङ्गन्यास
इन शुभ दिनों में गुरु शिष्य को शास्त्र (शस्त्रविद्या) दे — विधिपूर्वक दान और होम से देवताओं को "स्वाहा" कहकर तृप्त करके।
उस अवसर पर ब्राह्मणों और अनेक कुमारियों को भोजन कराए, तथा तपस्वियों और शिवयोगियों की भक्ति से पूजा करे।
अन्न-पान, वस्त्र-अलंकार-आभूषण तथा विविध गन्ध-मालाओं से वहाँ गुरु की पूजा करे।
उपवास किया हुआ, मृगचर्म धारण किए, हाथ जोड़े शिष्य वहाँ गुरु से धनुष की याचना करे।
व्याख्या — दीक्षा का पूर्ण विधान: दान और होम से देवताओं को तृप्त करना, ब्राह्मणों तथा कुमारियों को भोजन कराना, तपस्वियों और शिवयोगियों का पूजन, और अन्न, वस्त्र, गन्ध तथा माला से गुरु का सत्कार — इन सबके बाद शिष्य उपवास करके, मृगचर्म धारण कर, बद्धाञ्जलि गुरु से धनुष माँगता है। इस क्रम में पहले अहंकार रिक्त होता है, फिर आयुध हाथ में आता है। धनुर्विद्या खरीदी हुई वस्तु नहीं; गुरु की प्रसन्नता और परम्परा के आशीर्वाद से मिला दायित्व है।
‘बद्धाञ्जलि होकर धनुष की याचना’ दीक्षा का मर्म है। अखाड़े में पहला कम्बु शिष्य स्वयं अधिकारपूर्वक नहीं उठा लेता; वह गुरु के हाथ से, प्रणाम के साथ मिलता है। फिर शिष्य सरल गतियों को श्रद्धा से बार-बार दोहराकर गुरु की देह में स्थित विद्या को अपने शरीर में उतारता है। व्याख्या बाद में विस्तृत होती है; पहले आज्ञापालन, दर्शन और आवृत्ति से चित्त तैयार होता है। शरणागति ही सामर्थ्य का द्वार है।
सिद्धि चाहने वाले को फिर शिवोक्त अङ्गन्यास करना चाहिए; आचार्य शिष्य के शरीर पर यह न्यास करे, जो पाप और विघ्न का नाश करता है।
शिखा-स्थान पर ईश (शिव) का, दोनों भुजाओं पर केशव का, नाभि के मध्य में ब्रह्मा का और दोनों जङ्घाओं पर गणाधिप (गणेश) का न्यास करे।
व्याख्या — देह में देवता का न्यास: धनुर्वेद शरीर को केवल मांसपेशियों का यन्त्र नहीं मानता। अङ्गन्यास से शिष्य की देह देव मय साधना-भूमि बनती है — शिखा पर ईश, भुजाओं में केशव, नाभि में ब्रह्मा और जङ्घाओं में गणपति प्रतिष्ठित होते हैं। ईश सङ्कल्प और ऊर्ध्वबोध को, केशव भुजाओं के धर्मयुक्त पराक्रम को, ब्रह्मा नाभिस्थ प्राण-केन्द्र और सृजनशक्ति को, तथा गणपति जङ्घाओं की स्थिरता, गति और विघ्ननाश को समर्थ करते हैं।
साधक का स्थूल शरीर, प्राण, मन, बुद्धि और चित्त परस्पर कटे हुए नहीं हैं। मन्त्र के साथ अङ्ग-स्पर्श मन को देह पर टिकाता है; पुनरावृत्ति चित्त में देवता और कर्तव्य का संस्कार बैठाती है; फिर वही संस्कार आयुध उठाते समय बुद्धि को स्मरण कराता है कि इन भुजाओं का बल किसके लिए है। इसीलिए अङ्गन्यास को पापघ्न और विघ्ननाशक कहा गया — पहले योद्धा की देह और अन्तःकरण शुद्ध तथा एकाग्र होते हैं, तब शस्त्र-साधना आरम्भ होती है।
(न्यास-मन्त्र) — शिखा पर शङ्कर को, भुजाओं पर केशव को, नाभि में ब्रह्मा को, और जङ्घाओं पर गणपति को नमस्कार।
ऐसा न्यास कराए जिससे कल्याण हो; तब दूसरे लोग दुष्ट मन्त्र से भी कभी हिंसा नहीं कर पाते।
धनुर्मन्त्र से अभिमन्त्रित मानव धनुष शिष्य को दे — वेदविधि से, प्रत्येक काण्ड (पर्व) पर मन्त्र पढ़ते हुए।
वेध-विधि — प्रथम अभ्यास
अब वेधविधि — पहले बिना नोक (फल) वाले बाण से पुष्पवेध कराए, फिर नोकदार बाण से ही मत्स्यवेध कराए।
आरम्भ कुन्द (blunt) बाण से पुष्प-लक्ष्य पर — चोट का भय हटाकर पहले मुद्रा और छूट सधती है; फिर नुकीले बाण से चलता (मत्स्य) लक्ष्य। यही क्रम अखाड़े में कम्बु के म ृदु अभ्यास से कठोर जोड़ी-अभ्यास तक चलता है।
इन वेधों के अभ्यास से पुरुषों के बाण सब कार्य सिद्ध करने वाले हो जाते हैं।
मांस-लक्ष्य के वेध में जब बाण पूर्व दिशा की ओर गिरे, तब साधक विजयी और सुखी होता है।
दक्षिण में गिरने पर घोर कलह और विदेशगमन, पश्चिम में धन-धान्य, और उत्तर में सर्वत्र शुभ (फल) होता है।
ईशान में गिरना दुष्ट (अशुभ) है; शेष विदिशाएँ शुभ, हर्ष-पुष्टिकारक और सब कार्यों में सिद्धिदायक हैं।
इस प्रकार दुन्दुभि के मङ्गल-नाद के साथ तीन वेध शुभतापूर्वक करे; फिर गुरु को प्रणाम करके धनुष-बाण समर्पित करे।
चाप-प्रमाण — धनुष का माप
अब धनुष का माप — पहला योग(अभ्यास)-चाप, दूसरा युद्ध-चाप। अपने बाहुबल के माप से कुछ कम (खिंचाव वाला) धनुष शुभ होता है।
"अपने बल से किंचित् कम" — यह अत्यन्त व्यावहारिक सूत्र है। जो धनुष (या कम्बु/कट्टै) आपके बल से भारी है वह आपको साधता है, आप उसे नहीं। अगला श्लोक इसी को खोलता है।
धनुर्धर धनुष से बढ़कर (बलवान्) हो — यही अच्छा; धनुष धनुर्धर से बढ़कर न हो। धनुष से पीड़ित होता धन्वी लक्ष्य ही नहीं देख पाता।
इसलिए अपने बल के अनुरूप धनुष ही शुभ है। देवताओं का धनुष उत्तम (सबसे बड़ा), और उससे कम मानव का।
साढ़े चार हाथ का धनुष श्रेष्ठ कहा गया है; उसे दिव्य धनुष जानो, जिसे पूर्वकाल में शङ्कर ने धारण किया था।
चौबीस अङ्गुल का एक हाथ; चार हाथ का धनुष कहा गया है — ऐसा सर्वलक्षण- युक्त मानव-चाप होता है।
शुभ-चाप-लक्षण
अब शुभ धनुष के लक्षण — तीन, पाँच, सात अथवा नौ पर्व (गाँठ/खण्ड) वाला कोदण्ड सदा शुभकारक होता है।