धनुर्वेद संहिता
चर्चा
अध्याय

दीक्षा से लक्ष्य तक — धनुर्धर की आधारशिला

सदाशिव–परशुराम–वसिष्ठ परम्परा का उपक्रम; अधिकारी, आचार्य, मुहूर्त, दीक्षा और अङ्गन्यास; फिर धनुष, गुण, बाण, फल की परख; अन्त में मुष्टि, स्थान और लक्ष्य के भेद।

धनुर्वेद-परिचय एवं परम्परा

एक बार विजिगीषु राजर्षि विश्वामित्र गुरु वसिष्ठ के पास जाकर, प्रणाम करके बोले — "भगवन्! श्रोत्रिय, दृढ़चित्त और योग्य शिष्य को, तथा दुष्ट शत्रुओं के नाश के लिए, मुझे धनुर्विद्या कहिए।" तब महर्षियों में श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि वसिष्ठ बोले — "हे राजन् विश्वामित्र! सुनो। जिस रहस्यसहित धनुर्विद्या को भगवान् सदाशिव ने परशुराम से कहा था, वही रहस्यसहित संहिता मैं तुम्हारे हित के लिए, तथा गौ-ब्राह्मण-साधु-वेद की रक्षा के लिए कहता हूँ — यह संहिता यजुर्वेद और अथर्ववेद से सम्मत है।"

अथोवाच महादेवो भार्गवाय च धीमते । तत्तेऽहं संप्रवक्ष्यामि यथातथ्येन संशृणु ॥ १ ॥
हिंदी अर्थ

जैसा महादेव ने बुद्धिमान् भार्गव (परशुराम) से कहा था, वही मैं तुम्हें यथार्थ रूप में कहता हूँ — भली भाँति सुनो।

टीका

व्याख्या — ‘अथ’ और गुरु-परम्परा: ग्रन्थ का आरम्भ अथ से है। ‘अथ’ स्वयं मङ्गलवाचक है और ॐ के समान शुभ आरम्भ कराता है। साथ ही इसका अर्थ है — अब, पूर्व अधिकार प्राप्त हो जाने के अनन्तर, इस विशिष्ट विद्या का अध्ययन आरम्भ हो। जैसे ब्रह्मसूत्र ‘अथातो ब्रह्मजिज्ञासा’ से आरम्भ होता है, वैसे ही यहाँ धर्म और नीतिशास्त्र के बृहत् क्षेत्र को जानने के पश्चात् धनुर्वेद पर विशेष विचार आरम्भ होता है। ‘धनु’ यहाँ केवल धनुष का नाम नहीं; समस्त आयुध और युद्धविद्या इसके विषय में आते हैं। धनुर्वेद यजुर्वेद का उपवेद तथा दण्डनीति का प्रधान अङ्ग है।

इस आरम्भ में वक्ता और श्रोता भी स्पष्ट हैं। भगवान् सदाशिव ने सरहस्य धनुर्विद्या भगवान् परशुराम को दी; महर्षि वसिष्ठ उसी विद्या को राजर्षि विश्वामित्र के हित और गो-ब्राह्मण-साधु-वेद की रक्षा के लिए कहते हैं। यही गुरु-शिष्य-परम्परा ग्रन्थ का माहात्म्य और प्रमाण स्थापित करती है। यह किसी एक व्यक्ति की मनमानी कल्पना नहीं, आदिगुरु से बहती हुई समय-सिद्ध विद्या है। इसलिए प्रथम आदेश है — संशृणु, भली भाँति सुनो। श्रद्धापूर्वक श्रवण ही आगे के अभ्यास का द्वार है।

तत्र चतुष्टयपादात्मको धनुर्वेदः । यस्य प्रथमे पादे दीक्षाप्रकारः । द्वितीये संग्रहः तृतीये सिद्धप्रयोगाः चतुर्थे प्रयोगविधयः ॥ २ ॥
हिंदी अर्थ

यह धनुर्वेद चार पादों वाला है — पहले पाद में दीक्षा की विधि, दूसरे में संग्रह (गुरु से प्राप्त ज्ञान और अभ्यास का धारण-सञ्चय), तीसरे में सिद्ध प्रयोग, और चौथे में प्रयोग की विधियाँ।

टीका

व्याख्या — विद्या के चार पाद: यह सूत्र पूरे ग्रन्थ का नक्शा ही नहीं, विद्या ग्रहण करने की क्रमबद्ध पद्धति भी है — दीक्षा → संग्रह → सिद्धप्रयोग → प्रयोगविधि

दीक्षा में शिष्य श्रद्धा से गुरु के सामने उपस्थित होता है और सरल क्रियाओं को देखकर दोहराता है। आरम्भ में प्रत्येक गति की शब्दों से चीर-फाड़ नहीं की जाती। बालक जैसे देखकर सीखता है, वैसे शिष्य गुरु की देह-गति, दृष्टि, श्वास और लय को ग्रहण करता है। हमारे अखाड़े के आरम्भिक मेइ-पडम्, काल-पाडम् और कम्बु-चक्रों में भी यही होता है। गुरु के शरीर में सहस्रों आवृत्तियों से संचित विद्या शिष्य के शरीर में गति के माध्यम से उतरती है।

संग्रह केवल आयुध-सामग्री जुटाना नहीं; गुरु से मिले उपदेश और गति को स्मृति में धारण करना है। बार-बार की आवृत्ति बुद्धि तक सीमित न रहकर चित्त पर संस्कार बनाती है। फिर श्रवण, पठन और मनन से उसका बोध पुष्ट होता है। सजगता मन को स्वचालित ढंग से भटकने नहीं देती और बुद्धि प्रत्येक क्रिया को धर्म तथा प्रयोजन से जोड़ती है।

सिद्धप्रयोग में वही गति शुद्ध, स्थिर, तीव्र और परिस्थिति-अनुकूल बनती है। प्रयोगविधि में उसका जोड़ी-अभ्यास, प्रतिकार, मर्म-बोध और संग्राम में यथायोग्य प्रयोग खुलता है। सिलम्बम् में पहले पृथक् पाठ, फिर दीर्घ क्रम, उसके बाद युद्ध-समीप सिद्धता और अन्त में उन्हीं पाठों के अनेक प्रयोग खुलते हैं। सीधे अन्तिम प्रयोग पर कूदने से शरीर में न आधार बनता है, न चित्त में विद्या ठहरती है।

अधिकारी एवं आयुध

धनुर्वेदे गुरुर्विप्रः प्रोक्तो वर्णद्वयस्य च । युद्धाधिकारः शूद्रस्य स्वयं व्यापादि शिक्षया ॥ ३ ॥
हिंदी अर्थ

धनुर्वेद में विप्र दो वर्णों (क्षत्रिय और वैश्य) का गुरु कहा गया है। शूद्र को भी अपनी व्यावहारिक शिक्षा द्वारा युद्ध का अधिकार प्राप्त है।

टीका

व्याख्या — गुरु और अधिकारी: किसी शास्त्र में प्रवेश से पहले उसके अधिकारी, विषय, सम्बन्ध और प्रयोजन को समझना आवश्यक है। यहाँ विषय धनुर्वेद है, प्रयोजन आगे साधु-संरक्षण और प्रजापालन कहा जाएगा, और इस श्लोक में गुरु तथा अधिकारी का विधान आता है। गुरु वह हो जो विद्या को जानता ही नहीं, स्वयं उसे जीता और यथास्थान प्रयोग भी करता हो। शिष्य में श्रद्धा के साथ अभ्यास की तत्परता, समय देने की क्षमता और अनुशासन होना चाहिए।

वर्ण के अनुसार कही गई व्यवस्था विद्या के द्वार बन्द नहीं करती; वह बताती है कि गुण, कर्म, स्वभाव और उपलब्ध शिक्षा के अनुसार मार्ग भिन्न हो सकता है। विप्र गुरु क्षत्रिय और वैश्य को विधिपूर्वक शिक्षा देता है; शूद्र भी व्यावहारिक प्रशिक्षण से युद्धाधिकार प्राप्त करता है। अतः इस ग्रन्थ में शिक्षा का सम्बन्ध जन्म-मात्र से नहीं, पात्रता और साधना से भी प्रत्यक्ष रूप में जुड़ा है।

चतुर्विधमायुधम् — मुक्तममुक्तं मुक्तामुक्तं यन्त्रमुक्तं चेति ॥ ४ ॥
हिंदी अर्थ

आयुध चार प्रकार का है — मुक्त (हाथ से छोड़ा जाने वाला, जैसे चक्र या तोमर), अमुक्त (हाथ में रहने वाला, जैसे खड्ग), मुक्तामुक्त (छोड़कर भी अपने नियन्त्रण में रखा अथवा पुनः खींचा जाने वाला, जैसे पाश), और यन्त्रमुक्त (यन्त्र से छूटने वाला, जैसे धनुष से बाण)।

टीका

व्याख्या — वर्गीकरण की दृष्टि: वैशेषिक दर्शन में किसी वस्तु को उसके सामान्य और विशेष गुणों से जाना जाता है। एक जाति की वस्तुओं में कोई समान धर्म होता है और दूसरी जाति से उनका विशेष भेद होता है। यहाँ आयुधों का विशेष भेद उनके चलाए जाने के ढंग से किया गया है। चक्र और तोमर मुक्त, खड्ग और कम्बु अमुक्त, पाश मुक्तामुक्त, और धनुष से छूटता बाण यन्त्रमुक्त प्रयोग का उदाहरण देता है। एक ही आयुध का नाम जान लेना पर्याप्त नहीं; वह हाथ में रहता है, हाथ से फेंका जाता है, छोड़कर भी साधक से जुड़ा रहता है अथवा किसी यन्त्र से छूटता है — इससे उसकी दूरी, पकड़, पुनःप्राप्ति, लक्ष्य और अभ्यास सब बदल जाते हैं।

इसलिए मुक्त, अमुक्त, मुक्तामुक्त और यन्त्रमुक्त परस्पर बदल देने योग्य शब्द नहीं हैं। शास्त्रीय परिभाषा वस्तु के विशिष्ट धर्म को सुरक्षित रखती है; अस्पष्ट नामकरण अभ्यास में भी अस्पष्टता लाता है।

दुष्टदस्युचोरादिभ्यः साधुसंरक्षणं धर्मतः । प्रजापालनं धनुर्वेदस्य प्रयोजनम् ॥ ५ ॥
हिंदी अर्थ

दुष्टों, दस्युओं और चोरों से सज्जनों की धर्मपूर्वक रक्षा तथा प्रजा का पालन — यही धनुर्वेद का प्रयोजन है।

टीका

व्याख्या — धनुर्वेद का धर्म: यह विद्या हिंसा या प्रदर्शन के लिए नहीं, धर्मतः साधु-संरक्षण और प्रजापालन के लिए है। यहाँ ‘धर्मतः’ आयुध-प्रयोग की सीमा भी बाँधता है और उसका बल भी देता है। धर्म का बोध न हो तो कौशल दुष्ट के हाथ में उपद्रव बन सकता है; धर्म में स्थित योद्धा के हाथ में वही कौशल निर्बल का आश्रय बनता है।

मनु महाराज मानवधर्म के दस लक्षण कहते हैं —

धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः । धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥

धृति, क्षमा, दम, अस्तेय, शौच, इन्द्रियनिग्रह, धी, विद्या, सत्य और अक्रोध — ये सभी मनुष्यों के लिए आधार हैं। इनके साथ कुलधर्म, वर्णधर्म और परिस्थिति-विशेष का कर्तव्य जुड़ता है। धृति साधक को कठिनाई में अपने धर्म पर स्थिर रखती है; दम और इन्द्रियनिग्रह इन्द्रियों को इच्छाओं के पीछे अनियन्त्रित दौड़ने से रोकते हैं; धी अर्थात् धर्मानुसार निर्णय करने वाली बुद्धि; विद्या हमें गुरु और पूर्वजों की जीवित ज्ञानधारा से जोड़ती है। सत्य और अक्रोध के बिना आयुध पर अधिकार स्वयं पर अधिकार नहीं बनता। अस्तेय दूसरे का धन, श्रेय अथवा ज्ञान हड़पने से रोकता है और शौच देह तथा मन दोनों की निर्मलता है। जीवात्मा इस देह-रथ का स्वामी, बुद्धि सारथि, मन लगाम और पाँचों इन्द्रियाँ विषयों की ओर दौड़ने वाले अश्व हैं। लगाम सजग रहे और सारथि धर्म जानता हो, तभी रथ लक्ष्य तक पहुँचता है।

धर्म चारों पुरुषार्थों की नींव है। धर्मरक्षा के लिए मृत्यु से भी निर्भय क्षत्रिय मोक्ष के अत्यन्त समीप खड़ा होता है। कुरुक्षेत्र में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध में स्थिर होने की नीति सिखाई; वही उपदेश मोक्षशास्त्र और वेदान्त का हृदय भी है। धनुर्वेद का प्रयोजन इसी एकता को साधता है — उत्तम युद्ध-कौशल और आत्मोन्नति दो अलग मार्ग नहीं हैं, जब युद्ध धर्म के लिए हो।

एकापि यत्र नगरे प्रसिद्धः स्याद्धनुर्धरः । ततो यान्त्यरयो दूरान्मृगाः सिंहगृहादिव ॥ ६ ॥
हिंदी अर्थ

जिस नगर में एक भी प्रसिद्ध धनुर्धर हो, वहाँ से शत्रु वैसे ही दूर भाग जाते हैं जैसे सिंह के घर से मृग।

टीका

रक्षण का प्रभाव: सिद्ध योद्धा को हर बार शस्त्र उठाना नहीं पड़ता। उसका यश ही शत्रु को दूर रखता है। एक अनुशासित धनुर्धर पूरे नगर के लिए रक्षा-कवच बन जाता है। अतः व्यक्तिगत साधना का फल केवल साधक का बल नहीं, परिवार, गुरुकुल, देवालय और समस्त समुदाय की निर्भयता है।

आचार्येण धनुर्देयं ब्राह्मणे सुपरीक्षिते । लुब्धे धूर्ते कृतघ्ने च मन्दबुद्धौ न दापयेत् ॥ ७ ॥
हिंदी अर्थ

आचार्य भली भाँति परखे हुए पात्र को ही धनुर्विद्या दे; लोभी, धूर्त, कृतघ्न और मन्दबुद्धि को न दे।

टीका

अधिकारी की परीक्षा: आयुधविद्या का दान सामान्य सूचना देना नहीं है। गुरु शिष्य की बुद्धि, निष्ठा, कृतज्ञता, संयम और प्रयोजन को परखता है, क्योंकि यही ज्ञान रक्षा भी कर सकता है और दुरुपयोग होने पर विनाश भी। लोभ विद्या को व्यापार बना देता है, धूर्तता गुरु-वचन को अपने स्वार्थ के लिए मोड़ती है, कृतघ्नता परम्परा को काटती है और मन्दबुद्धि यहाँ केवल कम बौद्धिक क्षमता नहीं, उचित-अनुचित का विचार न कर सकने की अवस्था है।

परीक्षा केवल प्रवेश के दिन समाप्त नहीं होती। गुरु और शिष्य दोनों को अपने आचरण, अनुशासन और प्रयोजन को निरन्तर शुद्ध रखना होता है। विद्या अहंकार से अपनी बताने की वस्तु नहीं; वह पूर्वजों से प्राप्त उत्तरदायित्व है। आचार्य उसे निःस्वार्थ भाव से योग्य शिष्य में प्रतिष्ठित करता है और शिष्य सेवा, अभ्यास तथा धर्माचरण से उसका ऋण चुकाता है।

ब्राह्मणाय धनुर्देयं खड्गं वै क्षत्रियाय च । वैश्याय दापयेत् कुन्तं गदां शूद्राय दापयेत् ॥ ८ ॥
हिंदी अर्थ

ब्राह्मण को धनुष, क्षत्रिय को खड्ग, वैश्य को कुन्त (भाला) और शूद्र को गदा देनी चाहिए।

टीका

व्याख्या — स्वभावानुसार विशेषज्ञता: यह श्लोक ऊँच-नीच का क्रम नहीं बनाता; आचार्य को बताता है कि भिन्न गुण, स्वभाव और युद्ध-प्रवृत्ति वाले शिष्यों की प्रमुख विशेषज्ञता किस दिशा में विकसित की जाए। धनुष के लिए सूक्ष्म बुद्धि, दीर्घ एकाग्रता और दूरी का विचार प्रधान है; खड्ग में तत्काल निर्णय, अग्रगमन और निकट युद्ध; कुन्त में दूरी, पंक्ति और भूमि का व्यवहार; गदा में अपार देहबल, प्रचण्डता और निकट संग्राम की सहनशक्ति चाहिए। हमारे अभ्यास में कर्लाकट्टै, मल्लयुद्ध और मुष्टियुद्ध गदा के इसी बल-प्रधान परिवार से जुड़ते हैं।

विशेषज्ञता का अर्थ यह नहीं कि योद्धा अन्य आयुध नहीं जानता। श्रीराम और अर्जुन धनुष के परम विशेषज्ञ हैं, फिर भी उनके युद्ध में आवश्यक उग्रता पूर्ण रूप से जागती है। जनस्थान में श्रीराम ने अकेले खर-दूषण की विशाल सेना का संहार किया — युद्ध आरम्भ होते ही उनकी दृष्टि और देह का प्रचण्ड रूप क्षत्रिय के रूपान्तरण को दिखाता है। भीमसेन गदा के अनुपम विशेषज्ञ हैं, इसका अर्थ यह नहीं कि वे धनुष नहीं चला सकते। हनुमान जी परम दयालु भक्त हैं और धर्मयुद्ध में वानर-वीर की अपरिमित शक्ति भी धारण करते हैं। नकुल की खड्गविद्या भी इसी स्वभावानुकूल विशेषज्ञता को समझाती है।

आचार्य प्रत्येक शिष्य को उसके गुण और तत्परता के अनुसार पथ देता है। पथ भिन्न हैं, लक्ष्य वही चार पुरुषार्थ — धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — हैं; कोई पथ अथवा वर्ण अपने आप में छोटा-बड़ा नहीं।

धनुश्चक्रञ्च कुन्तञ्च खड्गञ्च चुरिका गदा । सप्तमं बाहुयुद्धं स्यादेवं युद्धानि सप्तधा ॥ ९ ॥
हिंदी अर्थ

धनुष, चक्र, कुन्त, खड्ग, चुरिका (कटार) और गदा — तथा सातवाँ बाहुयुद्ध (निःशस्त्र मल्लयुद्ध); इस प्रकार युद्ध सात प्रकार के हैं।

टीका

व्याख्या: पिछले श्लोक में वर्गीकरण आयुध के चलने के ढंग से था; यहाँ युद्ध को प्रधान आयुध-परिवारों के आधार पर सात भागों में रखा है। वर्गीकरण का आधार बदलने से सूची बदलती है, पर विरोध नहीं होता। शास्त्र किसी विषय को पूर्ण रूप से देखने के लिए अलग-अलग विशेष धर्मों के अनुसार ऐसे अनेक विभाग करता है।

सातवाँ बाहुयुद्ध अखाड़े का आधार है — निःशस्त्र देहबल, सन्तुलन, प्रहार-सहन, ग्रहण और मोचन के बिना कोई आयुध पूर्णतः नहीं सधता। कुथु-वरिसै और मल्लयुद्ध इसी सातवें युद्ध की जीवित धाराएँ हैं। आयुध छिन जाए अथवा दूरी टूट जाए, तब योद्धा का अपना शरीर ही उसका शस्त्र रहता है।

आचार्य-लक्षण एवं मुहूर्त

आचार्यः सप्तयुद्धः स्याच्चतुर्भिर्भार्गवः स्मृतः । द्वाभ्यां चैव भवेद्योधः एकेन गणको भवेत् ॥ १० ॥
हिंदी अर्थ

जो सातों युद्धों में निपुण हो वही आचार्य; चार में निपुण भार्गव; दो में योद्धा; और एक में निपुण मात्र गणक (गिनती का) कहलाता है।

टीका

आचार्य का मान: आचार्य-पद नाम, आयु या व्यवसाय से नहीं, सातों युद्धों की सिद्धि और उन्हें योग्य शिष्य तक पहुँचाने की क्षमता से प्राप्त होता है। चार युद्धों का ज्ञाता भार्गव, दो का ज्ञाता योद्धा और एक का ज्ञाता गणक कहा गया है। ‘गणक’ भी उस एक विद्या का जानकार है, किन्तु सम्पूर्ण धनुर्वेद का आचार्य नहीं। यह सीमा जानना विनय है।

जो स्वयं थोड़ी क्रिया जानकर अपने को आचार्य घोषित कर दे, वह शिष्य की प्रकृति के अनुसार आयुध और मार्ग नहीं चुन सकता। सच्चा आचार्य व्यापक ज्ञान, प्रत्यक्ष अभ्यास और निःस्वार्थ अध्यापन — तीनों को धारण करता है।

हस्तः पुनर्वसुः पुष्यो रोहिणी चोत्तरात्रयम् । अनुराधाश्विनी चैव रेवती दशमी तथा ॥ ११ ॥
हिंदी अर्थ

हस्त, पुनर्वसु, पुष्य, रोहिणी, तीनों उत्तरा, अनुराधा, अश्विनी और रेवती — ये (शुभ) नक्षत्र हैं (शस्त्रारम्भ के लिए)।

जन्मस्थे च तृतीये च षष्ठे वै सप्तमे तथा । दशमैकादशे चन्द्रे सर्वकार्याणि कारयेत् ॥ १२ ॥
हिंदी अर्थ

जन्मराशि से चन्द्रमा के प्रथम, तृतीय, षष्ठ, सप्तम, दशम और एकादश स्थान में रहने पर सब कार्य करने चाहिए।

तृतीया पञ्चमी चैव सप्तमी दशमी तथा । त्रयोदशी द्वादशी च तिथयस्तु शुभामताः ॥ १३ ॥
हिंदी अर्थ

तृतीया, पञ्चमी, सप्तमी, दशमी, त्रयोदशी और द्वादशी — ये तिथियाँ शुभ मानी गई हैं।

रविवारः शुक्रवारो गुरुवारस्तथैव च । एतद्वारं त्रयं धन्यं प्रारम्भे शस्त्रकर्मणाम् ॥ १४ ॥
हिंदी अर्थ

रविवार, शुक्रवार और गुरुवार — ये तीन वार शस्त्र-कर्म के आरम्भ में शुभ हैं।

टीका

काल का संस्कार: दीक्षा केवल सही गुरु और पात्र शिष्य का मिलन नहीं; नक्षत्र, चन्द्रबल, तिथि और वार को अनुकूल करके आरम्भ किया जाता है। शस्त्र-साधना को काल के पवित्र क्रम में प्रतिष्ठित करने से शिष्य समझता है कि यह मनमाने समय उठाया हुआ उपकरण नहीं, देवताओं और गुरु की साक्षी में लिया गया व्रत है। शुभ मुहूर्त उस प्रथम संस्कार को चित्त में गहरा करता है, जिससे आगे का दीर्घ अभ्यास उसी सङ्कल्प पर टिका रहे।

दीक्षा एवं अङ्गन्यास

एभिर्दिनैस्तु शिष्याय गुरुः शास्त्राणि दापयेत् । सन्तर्प्य दानहोमाभ्यां सुरान् स्वाहा विधानतः ॥ १५ ॥
हिंदी अर्थ

इन शुभ दिनों में गुरु शिष्य को शास्त्र (शस्त्रविद्या) दे — विधिपूर्वक दान और होम से देवताओं को "स्वाहा" कहकर तृप्त करके।

ब्राह्मणान् भोजयेत् तत्र कुमारीश्चाप्यनेकशः । तापसानर्च्चयेद्भक्त्या ये चान्ये शिवयोगिनः ॥ १६ ॥
हिंदी अर्थ

उस अवसर पर ब्राह्मणों और अनेक कुमारियों को भोजन कराए, तथा तपस्वियों और शिवयोगियों की भक्ति से पूजा करे।

अन्नपानादिभिश्चैव वस्त्रालङ्कारभूषणैः । गन्धमाल्यैर्विचित्रैश्च गुरुं तत्र प्रपूजयेत् ॥ १७ ॥
हिंदी अर्थ

अन्न-पान, वस्त्र-अलंकार-आभूषण तथा विविध गन्ध-मालाओं से वहाँ गुरु की पूजा करे।

कृतोपवासः शिष्यस्तु धृताजिन परिग्रहः । बद्धाञ्जलिपुटस्तत्र याचयेद् गुरुतो धनुः ॥ १८ ॥
हिंदी अर्थ

उपवास किया हुआ, मृगचर्म धारण किए, हाथ जोड़े शिष्य वहाँ गुरु से धनुष की याचना करे।

टीका

व्याख्या — दीक्षा का पूर्ण विधान: दान और होम से देवताओं को तृप्त करना, ब्राह्मणों तथा कुमारियों को भोजन कराना, तपस्वियों और शिवयोगियों का पूजन, और अन्न, वस्त्र, गन्ध तथा माला से गुरु का सत्कार — इन सबके बाद शिष्य उपवास करके, मृगचर्म धारण कर, बद्धाञ्जलि गुरु से धनुष माँगता है। इस क्रम में पहले अहंकार रिक्त होता है, फिर आयुध हाथ में आता है। धनुर्विद्या खरीदी हुई वस्तु नहीं; गुरु की प्रसन्नता और परम्परा के आशीर्वाद से मिला दायित्व है।

‘बद्धाञ्जलि होकर धनुष की याचना’ दीक्षा का मर्म है। अखाड़े में पहला कम्बु शिष्य स्वयं अधिकारपूर्वक नहीं उठा लेता; वह गुरु के हाथ से, प्रणाम के साथ मिलता है। फिर शिष्य सरल गतियों को श्रद्धा से बार-बार दोहराकर गुरु की देह में स्थित विद्या को अपने शरीर में उतारता है। व्याख्या बाद में विस्तृत होती है; पहले आज्ञापालन, दर्शन और आवृत्ति से चित्त तैयार होता है। शरणागति ही सामर्थ्य का द्वार है।

अङ्गन्यासं ततः कार्यं शिवोक्तं सिद्धिमिच्छता । आचार्येण च शिष्यस्य पापघ्नं विघ्ननाशनम् ॥ १९ ॥
हिंदी अर्थ

सिद्धि चाहने वाले को फिर शिवोक्त अङ्गन्यास करना चाहिए; आचार्य शिष्य के शरीर पर यह न्यास करे, जो पाप और विघ्न का नाश करता है।

शिखास्थाने न्यसेदीशं बाहुयुग्मे च केशवम् । ब्रह्माणं नाभिमध्ये तु जङ्घयोश्च गणाधिपम् ॥ २० ॥
हिंदी अर्थ

शिखा-स्थान पर ईश (शिव) का, दोनों भुजाओं पर केशव का, नाभि के मध्य में ब्रह्मा का और दोनों जङ्घाओं पर गणाधिप (गणेश) का न्यास करे।

टीका

व्याख्या — देह में देवता का न्यास: धनुर्वेद शरीर को केवल मांसपेशियों का यन्त्र नहीं मानता। अङ्गन्यास से शिष्य की देह देवमय साधना-भूमि बनती है — शिखा पर ईश, भुजाओं में केशव, नाभि में ब्रह्मा और जङ्घाओं में गणपति प्रतिष्ठित होते हैं। ईश सङ्कल्प और ऊर्ध्वबोध को, केशव भुजाओं के धर्मयुक्त पराक्रम को, ब्रह्मा नाभिस्थ प्राण-केन्द्र और सृजनशक्ति को, तथा गणपति जङ्घाओं की स्थिरता, गति और विघ्ननाश को समर्थ करते हैं।

साधक का स्थूल शरीर, प्राण, मन, बुद्धि और चित्त परस्पर कटे हुए नहीं हैं। मन्त्र के साथ अङ्ग-स्पर्श मन को देह पर टिकाता है; पुनरावृत्ति चित्त में देवता और कर्तव्य का संस्कार बैठाती है; फिर वही संस्कार आयुध उठाते समय बुद्धि को स्मरण कराता है कि इन भुजाओं का बल किसके लिए है। इसीलिए अङ्गन्यास को पापघ्न और विघ्ननाशक कहा गया — पहले योद्धा की देह और अन्तःकरण शुद्ध तथा एकाग्र होते हैं, तब शस्त्र-साधना आरम्भ होती है।

ॐ ह्रीं शिखास्थाने शङ्कराय नमः । ॐ ह्रीं बाह्वोः केशवाय नमः । ॐ ह्रीं नाभिमध्ये ब्रह्मणे नमः । ॐ ह्रीं जङ्घयोर्गणपतये नमः ॥ २१ ॥
हिंदी अर्थ

(न्यास-मन्त्र) — शिखा पर शङ्कर को, भुजाओं पर केशव को, नाभि में ब्रह्मा को, और जङ्घाओं पर गणपति को नमस्कार।

ईदृशं कारयेद् न्यासं येन श्रेयो भविष्यति । अन्येऽपि दुष्टमन्त्रेण न हिंसन्ति कदाचन ॥ २२ ॥
हिंदी अर्थ

ऐसा न्यास कराए जिससे कल्याण हो; तब दूसरे लोग दुष्ट मन्त्र से भी कभी हिंसा नहीं कर पाते।

शिष्याय मानुषं चापं धनुर्मन्त्राभिमन्त्रितम् । काण्डात् काण्डाति मन्त्रेण दद्याद्वेदविधानतः ॥ २३ ॥
हिंदी अर्थ

धनुर्मन्त्र से अभिमन्त्रित मानव धनुष शिष्य को दे — वेदविधि से, प्रत्येक काण्ड (पर्व) पर मन्त्र पढ़ते हुए।

वेध-विधि — प्रथम अभ्यास

अथ वेधविधिः — प्रथमं पुष्पवेधं च फलहीनेन पत्रिणा । ततः फलयुतेनैव मत्स्यवेधं च कारयेत् ॥ २४ ॥
हिंदी अर्थ

अब वेधविधि — पहले बिना नोक (फल) वाले बाण से पुष्पवेध कराए, फिर नोकदार बाण से ही मत्स्यवेध कराए।

टीका

आरम्भ कुन्द (blunt) बाण से पुष्प-लक्ष्य पर — चोट का भय हटाकर पहले मुद्रा और छूट सधती है; फिर नुकीले बाण से चलता (मत्स्य) लक्ष्य। यही क्रम अखाड़े में कम्बु के मृदु अभ्यास से कठोर जोड़ी-अभ्यास तक चलता है।

एतैर्वेधैः कृतैः पुंसां शराः स्युः सर्वसाधकाः ॥ २५ ॥
हिंदी अर्थ

इन वेधों के अभ्यास से पुरुषों के बाण सब कार्य सिद्ध करने वाले हो जाते हैं।

वेधने चैव मांसस्य शरपातो यदा भवेत् । पूर्वदिग्भागमाश्रित्य तदास्याद्विजयी सुखी ॥ २६ ॥
हिंदी अर्थ

मांस-लक्ष्य के वेध में जब बाण पूर्व दिशा की ओर गिरे, तब साधक विजयी और सुखी होता है।

दक्षिणे कलहो घोरो विदेशगमनं पुनः । पश्चिमे धनधान्यञ्च सर्वञ्चैवोत्तरे शुभम् ॥ २७ ॥
हिंदी अर्थ

दक्षिण में गिरने पर घोर कलह और विदेशगमन, पश्चिम में धन-धान्य, और उत्तर में सर्वत्र शुभ (फल) होता है।

ऐशान्यां पवनं दुष्टं विदिशोऽन्यांश्च शोभनाः । हर्षपुष्टिकराश्चैव सिद्धिदाः सर्वकर्मणि ॥ २८ ॥
हिंदी अर्थ

ईशान में गिरना दुष्ट (अशुभ) है; शेष विदिशाएँ शुभ, हर्ष-पुष्टिकारक और सब कार्यों में सिद्धिदायक हैं।

एवं वेधत्रयं कुर्याच्छुभं दुन्दुभिनिःस्वनैः । ततः प्रणम्य गुरवे धनुर्बाणान्निवेदयेत् ॥ २९ ॥
हिंदी अर्थ

इस प्रकार दुन्दुभि के मङ्गल-नाद के साथ तीन वेध शुभतापूर्वक करे; फिर गुरु को प्रणाम करके धनुष-बाण समर्पित करे।

चाप-प्रमाण — धनुष का माप

अथ चापप्रमाणम् — प्रथमं यौगिकं चापं युद्धचापं द्वितीयकम् । निजबाहुबलोन्मानात् किञ्चिदूनं शुभं धनुः ॥ ३० ॥
हिंदी अर्थ

अब धनुष का माप — पहला योग(अभ्यास)-चाप, दूसरा युद्ध-चाप। अपने बाहुबल के माप से कुछ कम (खिंचाव वाला) धनुष शुभ होता है।

टीका

"अपने बल से किंचित् कम" — यह अत्यन्त व्यावहारिक सूत्र है। जो धनुष (या कम्बु/कट्टै) आपके बल से भारी है वह आपको साधता है, आप उसे नहीं। अगला श्लोक इसी को खोलता है।

वरं प्राणाधिको धन्वी न तु प्राणाधिकं धनुः । धनुषा पीड्यमानस्तु धन्वी लक्ष्यं न पश्यति ॥ ३१ ॥
हिंदी अर्थ

धनुर्धर धनुष से बढ़कर (बलवान्) हो — यही अच्छा; धनुष धनुर्धर से बढ़कर न हो। धनुष से पीड़ित होता धन्वी लक्ष्य ही नहीं देख पाता।

अतो निजबलोन्मानं चापं स्याच्छुभकारकम् । देवानामुत्तमं चापं ततो न्यूनं च मानवम् ॥ ३२ ॥
हिंदी अर्थ

इसलिए अपने बल के अनुरूप धनुष ही शुभ है। देवताओं का धनुष उत्तम (सबसे बड़ा), और उससे कम मानव का।

अर्द्धपञ्चमहस्तन्तु श्रेष्ठं चापं प्रकीर्तितम् । तद्विज्ञेयं धनुर्दिव्यं शङ्करेण धृतं पुरा ॥ ३३ ॥
हिंदी अर्थ

साढ़े चार हाथ का धनुष श्रेष्ठ कहा गया है; उसे दिव्य धनुष जानो, जिसे पूर्वकाल में शङ्कर ने धारण किया था।

चतुर्विंशाङ्गुलो हस्तश्चतुर्हस्तं धनुः स्मृतम् । तादृशं मानवं चापं सर्वलक्षणसंयुतम् ॥ ३४ ॥
हिंदी अर्थ

चौबीस अङ्गुल का एक हाथ; चार हाथ का धनुष कहा गया है — ऐसा सर्वलक्षण- युक्त मानव-चाप होता है।

शुभ-चाप-लक्षण

अथ शुभचापलक्षणम् — त्रिपर्व पञ्चपर्व वा सप्तपर्व तथा पुनः । नव पर्वञ्च कोदण्डं सर्वदा शुभकारकम् ॥ ३५ ॥
हिंदी अर्थ

अब शुभ धनुष के लक्षण — तीन, पाँच, सात अथवा नौ पर्व (गाँठ/खण्ड) वाला कोदण्ड सदा शुभकारक होता है।

चतुष्पर्वञ्च षट्पर्वं अष्टपर्वं विवर्जयेत् ॥ ३६ ॥
हिंदी अर्थ

चार, छह और आठ पर्व वाले (सम-पर्व) धनुष का त्याग करना चाहिए।

केषाञ्चिद् भवेच्चापं वितस्तिनवसम्मितम् ॥ ३७ ॥
हिंदी अर्थ

किन्हीं का धनुष नौ वितस्ति (बित्ते) माप का होता है।

वर्जित धनुष — त्याज्य धनुष

अथ वर्जितधनुः — अतिजीर्णमपक्वञ्च ज्ञातिधृष्टं तथैव च । दग्धं छिद्रं न कर्तव्यं बाह्याभ्यन्तरहस्तकम् ॥ ३८ ॥
हिंदी अर्थ

अब त्याज्य धनुष — अत्यन्त जीर्ण, अपक्व (कच्चा), ज्ञाति-द्वारा मर्दित, जला हुआ, तथा बाहर या भीतर छिद्र वाला धनुष नहीं बनाना चाहिए।

गुणहीनं गुणाक्रान्तं काण्डदोषसमन्वितम् । गलग्रन्थि न कर्तव्यं तलमध्ये तथैव च ॥ ३९ ॥
हिंदी अर्थ

गुण(डोरी)-हीन, गुण से अत्यधिक कसा, काण्ड-दोष वाला, गले या तल के मध्य में गाँठ वाला — ऐसा धनुष नहीं बनाना चाहिए।

अपक्वं भङ्गमायाति ह्यति जीर्णन्तु कर्कशम् । ज्ञातिधृष्टं तु सोद्वेगं कलहो बान्धवैः सह ॥ ४० ॥
हिंदी अर्थ

कच्चा धनुष टूट जाता है, अति जीर्ण कर्कश हो जाता है, ज्ञाति-मर्दित उद्वेग लाता है और बन्धुओं से कलह कराता है।

दग्धेन दह्यते वेश्म छिद्रं युद्धविनाशकम् । बाह्ये लक्ष्यं न लभ्येत तथैवाभ्यन्तरेऽपि च ॥ ४१ ॥
हिंदी अर्थ

जले धनुष से घर जलता है, छिद्रवाला युद्ध का नाश करता है; बाहरी छिद्र से बाह्य लक्ष्य नहीं सधता, वैसे ही भीतरी से (भी)।

हीने तु सन्धिते बाणे संग्रामे भङ्गकारकम् । आक्रान्ते तु पुनः क्वापि लक्ष्यं न प्राप्यते दृढम् ॥ ४२ ॥
हिंदी अर्थ

दोषयुक्त धनुष पर बाण साधने से संग्राम में भंग होता है; अत्यधिक कसे धनुष से कहीं भी दृढ़ लक्ष्य नहीं सधता।

गलग्रन्थितलग्रन्थिधनहानिकरं धनुः । एभिर्दोषैर्विनिर्मुक्तं सर्वकार्यकरं स्मृतम् ॥ ४३ ॥
हिंदी अर्थ

गले या तल में गाँठ वाला धनुष धन का नाश करता है। इन दोषों से रहित धनुष ही सब कार्य सिद्ध करने वाला कहा गया है।

शार्ङ्ग — दिव्य धनुष

शार्ङ्गं पुनर्धनुर्दिव्यं विष्णोः परमायुधम् । वितस्ति सप्तमं मानं निर्मितं विश्वकर्मणा ॥ ४४ ॥
हिंदी अर्थ

शार्ङ्ग तो दिव्य धनुष है, विष्णु का परम आयुध; उसका माप सात वितस्ति है, विश्वकर्मा द्वारा निर्मित।

न स्वर्गे न च पाताले न भूमौ कस्यचित् करे । तद्धनुर्वशमायाति मुक्तैकं पुरुषोत्तमम् ॥ ४५ ॥
हिंदी अर्थ

न स्वर्ग में, न पाताल में, न भूमि पर किसी के हाथ में — वह धनुष एकमात्र पुरुषोत्तम को छोड़कर किसी के वश में नहीं आता।

पौरुषेयं तु यच्छार्ङ्गं बहुवत्सरशोभितम् । वितस्तिभिः सार्द्धषड्भिर्निर्मितं चार्थसाधनम् ॥ ४६ ॥
हिंदी अर्थ

जो मानव-निर्मित शार्ङ्ग (सींग का) धनुष कई वर्षों से परिपक्व हो, साढ़े छह वितस्ति का बना हो — वह अर्थसाधक (कार्यसिद्ध) होता है।

प्रायो योज्यं धनुः शार्ङ्गं गजारोहाश्वसादिनाम् । रथिनां च पदातीनां वांशं चापं प्रकीर्तितम् ॥ ४७ ॥
हिंदी अर्थ

प्रायः शार्ङ्ग (सींग) धनुष गजारोही और अश्वारोही के लिए, तथा रथी और पैदल के लिए वांश (बाँस) का धनुष कहा गया है।

टीका

अलग सवारी के लिए अलग धनुष — भारवाहक हाथी/घोड़े पर लचीला सींग-धनुष, पैदल-रथी के लिए हल्का बाँस। उपकरण को शरीर और परिस्थिति से जोड़ना धनुर्वेद का व्यावहारिक विवेक है।

धनुष-द्रव्य — निर्माण-सामग्री

विश्वामित्र शृणुष्वाथ धनुर्द्रव्यत्रयं क्रमात् । लोहं शृङ्गञ्च काष्ठञ्च गदितं शम्भुना पुरा ॥ ४८ ॥
हिंदी अर्थ

हे विश्वामित्र! अब धनुष की तीन प्रकार की सामग्री क्रम से सुनो — लोह (धातु), शृङ्ग (सींग) और काष्ठ (लकड़ी) — ऐसा शम्भु ने पूर्वकाल में कहा।

लोहानि स्वर्णरजतताम्रकृष्णायसानि । शृङ्गाणि महिषशरभरोहितानाम् । दारूणि चन्दनवेत्रसाधावन-शालशाल्मलि-साककुकुभवंशाञ्जनानाम् ॥ ४९ ॥
हिंदी अर्थ

धातुओं में स्वर्ण, रजत, ताम्र और लोहा; सींगों में महिष, शरभ और रोहित (मृग) के; तथा लकड़ियों में चन्दन, वेत्र, शाल, शाल्मलि, साक, ककुभ, वंश (बाँस) और अञ्जन की — (इनसे धनुष बनता है)।

गुण-लक्षण — धनुष की डोरी

अथ गुणलक्षणानि — गुणानां लक्षणं वच्ये यादृशं कारयेद्गुणम् । षट्सूत्रो गुणः कार्यः कनिष्ठामानसम्मितः ॥ ५० ॥
हिंदी अर्थ

अब गुण (डोरी) के लक्षण — कैसी डोरी बनानी चाहिए यह कहता हूँ। डोरी छह सूत्र (लड़ियों) वाली और कनिष्ठा (अँगुली) के माप की मोटाई वाली बनानी चाहिए।

धनुः प्रमाणे निःसन्धिः शुद्धैस्त्रिगुणतन्तुभिः । वर्तितः स्यादुरुः श्लक्ष्णः सर्वकर्मसहो युधि ॥ ५१ ॥
हिंदी अर्थ

डोरी धनुष के माप की, बिना जोड़ की, शुद्ध तीन-गुनी लड़ियों से बटी हुई, सुदृढ़ और चिकनी हो — तब वह युद्ध में सब कार्य सहती है।

अभावे षट्सूत्रस्य हरिणीस्नायुरिष्यते । गुणार्थमपि च ग्राह्या स्नायवो महिषी भवाः ॥ ५२ ॥
हिंदी अर्थ

छह-सूत्र (सूत) के अभाव में हरिणी की स्नायु (नस) उपयुक्त है; डोरी के लिए भैंस की स्नायु भी ग्राह्य है।

तत्कालहतछागस्य तन्तुना वा गुणाः शुभाः । निर्लोमतन्तुसूत्रेण कुर्याद्वा गुणमुत्तमम् ॥ ५३ ॥
हिंदी अर्थ

तत्काल मारे गए बकरे के तन्तु से बनी डोरी शुभ है; अथवा रोमरहित तन्तु-सूत से उत्तम डोरी बनाए।

पक्ववंशत्वचः कार्यो गुणस्तु स्थावरो दृढः । षट्सूत्रेण सन्नद्धः सर्वकर्मसहो युधि ॥ ५४ ॥
हिंदी अर्थ

पके बाँस की छाल से बनी डोरी स्थावर (टिकाऊ) और दृढ़ होती है; छह-सूत्र से बटी वह युद्ध में सब कार्य सहती है।

प्राप्ते भाद्रपदे मासि त्वर्कस्य प्रशस्यते । तस्यास्तत्र गुणः कार्यो न वित्तः स्थावरो दृढः ॥ ५५ ॥
हिंदी अर्थ

भाद्रपद मास आने पर अर्क (आक) की (छाल) प्रशस्त होती है; उससे बनी डोरी दृढ़ और स्थिर होती है।

शर-लक्षण — बाण की परख

अथ शरलक्षणानि — अतः परं प्रवक्ष्यामि शराणां लक्षणं शुभम् । स्थूलं नाति सूक्ष्मञ्च नोपक्वं न कुभूमिजम् ॥ ५६ ॥
हिंदी अर्थ

अब बाणों के शुभ लक्षण कहता हूँ — बाण न अधिक मोटा हो, न सूक्ष्म, न कच्चा, और न खराब भूमि में उपजा।

हीनग्रन्थिविदीर्णं च वर्जयेदीदृशं शरम् । पूर्णग्रन्थि सुपक्वं च पारङ्करं समयाहृतम् ॥ ५७ ॥
हिंदी अर्थ

जिसकी गाँठ हीन या फटी हो, ऐसा बाण त्यागे; पूर्ण गाँठ वाला, भली भाँति पका, उपयुक्त और समय पर लाया गया (बाण ग्राह्य है)।

शरवंशा गृहीतव्या शरत्काले च गाधिज । कठिनं वर्तुलं काण्डं गृह्णीयात् सुप्रदेशजम् ॥ ५८ ॥
हिंदी अर्थ

हे गाधिज (विश्वामित्र)! बाण के बाँस शरद्काल में लेने चाहिए; कठोर, गोल और अच्छे प्रदेश में उपजा काण्ड ग्रहण करे।

टीका

"शरद् में काटा बाँस" — ऋतु का यह विवेक आज भी सधा है: शरद् में काष्ठ का रस स्थिर होता है, बाँस कम चटकता है। कम्बु के लिए भी परिपक्व, सीधा, गाँठ-समान बाँस यही परख माँगता है।

द्वौ हस्तौ मुष्टिहीनौ च दैर्घ्ये स्थूले कनिष्ठिका । विधेयाः शरमानेषु यन्त्रेष्वाकर्षयेत् ततः ॥ ५९ ॥
हिंदी अर्थ

बाण की लम्बाई दो हाथ में एक मुष्टि कम, और मोटाई कनिष्ठा (छोटी अँगुली) के बराबर — ऐसे माप बनाए; फिर यन्त्र (धनुष) पर उसे खींचे।

काकहंसशशादानां मत्स्यादक्रौञ्चकेकिनाम् । गृध्राणां कुरराणाञ्च पक्षा एते सुशोभनाः ॥ ६० ॥
हिंदी अर्थ

कौआ, हंस, शशाद (बाज़), मत्स्याद (मछलीभक्षी), क्रौञ्च, मयूर, गृध्र और कुरर — इनके पंख (बाण के परों के लिए) सुन्दर (उपयुक्त) हैं।

षडङ्गुलप्रमाणेन पक्षच्छेदञ्च कारयेत् । दशाङ्गुलमिता पक्षा शार्ङ्गचापस्य मार्गणे ॥ ६१ ॥
हिंदी अर्थ

छह अङ्गुल के माप से पंख काटे; शार्ङ्ग-धनुष के बाण में दस अङ्गुल तक के पंख (लगाए)।

योज्या दृढाश्चतुः संख्याः सन्नद्धाः स्नायुतन्तुभिः । शराश्च त्रिविधा ज्ञेयाः स्त्रीपुंसाश्च नपुंसकः । व्यग्रस्थूलो भवेन्नारी पश्चात् स्थूलो भवेत् पुमान् ॥ ६२ ॥
हिंदी अर्थ

चार दृढ़ पंख स्नायु-तन्तु से बाँधे। बाण तीन प्रकार के जानो — स्त्री, पुरुष और नपुंसक। आगे से मोटा हो तो नारी-बाण, पीछे से मोटा हो तो पुरुष-बाण।

समो नपुंसको ज्ञेय तल्लक्ष्यार्थे प्रशस्यते । दूरपातो युवत्या च पुरुषो भेदयेद् दृढम् ॥ ६३ ॥
हिंदी अर्थ

जो समान (मोटाई का) हो वह नपुंसक-बाण; लक्ष्यवेध के लिए वही प्रशस्त है। नारी-बाण दूर तक जाता है, पुरुष-बाण दृढ़ता से भेदता है।

टीका

आगे/पीछे के भार-सन्तुलन से बाण का स्वभाव बदलता है — यह वही भौतिकी है जिसे आज "spine" और "FOC (front of centre)" कहते हैं। सम-सन्तुलित "नपुंसक" बाण सर्वोत्तम लक्ष्यवेधी — क्योंकि वह न दूरी की ओर झुका है, न भेदन की ओर, केवल सत्य उड़ान की ओर।

फल-लक्षण — बाण की नोक

अथ फललक्षणम् — आरामुखं क्षुरप्रञ्च गोपुच्छं चार्द्धचन्द्रकम् । सूचीमुखञ्च भल्लञ्च वत्सदन्तं द्विभल्लकम् ॥ ६४ ॥
हिंदी अर्थ

अब नोक (फल) के प्रकार — आरामुख, क्षुरप्र, गोपुच्छ, अर्द्धचन्द्र, सूचीमुख, भल्ल, वत्सदन्त और द्विभल्ल।

कर्णिकं काकतुण्डं च तथान्यान्यप्यनेकशः । फलानि देशभेदेन भवन्ति बहुरूपतः ॥ ६५ ॥
हिंदी अर्थ

कर्णिक, काकतुण्ड तथा और भी अनेक; देश-भेद से नोकें बहुरूप में होती हैं।

अथैतेषां कर्माणि — आरामुखेन चर्मच्छेदनम्, क्षुरप्रेण बाणकर्तनम् वा, बाहुकर्तनं गोपुच्छेन, लक्ष्यसाधनम् अर्द्धचन्द्रेण ग्रीवामस्तकधनुरादीनां छेदनम्, सूचीमुखेन कवचभेदनम्, भल्लेन हृदयभेदनम्, वत्सदन्तेन गुणचर्वणम्, द्विभल्लेन बाणावरोधनम्, कर्णिकेन लोहमयबाणानां छेदनम्, काकतुण्डेन वेध्यानां वेधं कुर्यात् ॥ ६६ ॥
हिंदी अर्थ

अब इनके कर्म — आरामुख से चर्मछेदन; क्षुरप्र से बाण या बाहु का काटना; गोपुच्छ से लक्ष्यसाधन; अर्द्धचन्द्र से ग्रीवा-मस्तक-धनुष आदि का छेदन; सूचीमुख से कवचभेदन; भल्ल से हृदयभेदन; वत्सदन्त से डोरी का चबाना (काटना); द्विभल्ल से बाण का अवरोध; कर्णिक से लोहमय बाणों का छेदन; और काकतुण्ड से वेध्य वस्तुओं का वेध करे।

टीका

प्रत्येक नोक का एक ही धर्म — यही शस्त्र-विवेक है। एक बहुउद्देशीय हथियार के मोह में उलझने के बजाय परम्परा कहती है: कार्य को पहचानो, फिर उसका उपकरण चुनो। आयुध-कला में यही "सही औजार, सही काम" का अनुशासन है।

अन्यद्गोपुच्छकं ज्ञेयं शुद्धकाष्ठविनिर्मितम् । मुखे च लोहकरटेन विद्धं त्र्यङ्गुलसम्मितम् ॥ ६७ ॥
हिंदी अर्थ

एक और गोपुच्छ जानो — शुद्ध काष्ठ का बना, मुख पर लोहे के करट (छल्ले) से जड़ा, तीन अङ्गुल के माप का।

बाणस्य फलस्थाने करटकयोजनात् गोपुच्छबाणो भवति । अनेन शराभ्यासस्तथा लक्ष्याभ्यासो वा कर्तव्यः ॥ ६८ ॥
हिंदी अर्थ

बाण के फल-स्थान पर करट जोड़ने से गोपुच्छ-बाण बनता है; इसी से शर-अभ्यास अथवा लक्ष्य-अभ्यास करना चाहिए।

टीका

यह "करट जड़ा अभ्यास-बाण" ही परम्परा का प्रशिक्षण-उपकरण है — नुकीली नोक के बिना, भार बराबर रखकर, बार-बार बिना क्षति के अभ्यास। आज के rubber- tipped या blunt अभ्यास-बाण का सीधा पूर्वज।

पायन — बाण का संस्कार (tempering)

अथ पायनम् — शरोपरि औषधलेपनम् । इषुफले शरवंशामूललेपनाद् भवति तज्जिह्ममेतत् । यस्मिन् शरवंशसमहे स्वातिबिन्दुर्निपतति स पीतवर्णो भवति; तस्य मूले विषमुत्पद्यते तन्मूलं ग्राह्यम् । स च सर्वदा पवनाभावेऽपि कम्पते — इदमेव तल्लक्ष्म इति ॥ ६९ ॥
हिंदी अर्थ

अब पायन (संस्कार) — बाण पर औषध का लेप। बाण-फल पर बाँस-मूल का लेप करने से (जो टेढ़ापन हो वह सुधरता है)। जिस बाँस-समूह पर स्वाति-बिन्दु गिरता है वह पीतवर्ण हो जाता है; उसके मूल में विष उत्पन्न होता है, वही मूल ग्राह्य है। वह बिना वायु के भी सदा कम्पित रहता है — यही उसका लक्षण है।

फलस्य पावनं वच्ये दिव्यौषधिविलेपनैः । येन दुर्भेद्यवर्माणि भेदयेत्तरुपर्णवत् ॥ ७० ॥
हिंदी अर्थ

अब दिव्य औषधियों के लेप से नोक का संस्कार कहता हूँ, जिससे दुर्भेद्य कवच भी वृक्ष के पत्ते की तरह भेदे जाएँ।

पिप्पली सैन्धवं कुष्ठं गोमूत्रेण सुपेषयेत् । अनेन लेपयेच्छस्त्रं लिप्तं चाग्नौ प्रतापयेत् ॥ ७१ ॥
हिंदी अर्थ

पिप्पली, सैन्धव और कुष्ठ को गोमूत्र में भली भाँति पीसे; इससे शस्त्र पर लेप करे और लेपे हुए को अग्नि में तपाए।

शिखिग्रीवानुवर्णाभं तप्तपीतं तथौषधम् । ततस्तु विमलं तोयं पाययेच्छस्त्रमुत्तमम् ॥ ७२ ॥
हिंदी अर्थ

मयूर-ग्रीवा के रंग जैसा तपाकर पीत हुआ वह औषध — फिर उत्तम शस्त्र को निर्मल जल पिलाए (जल में बुझाए)।

टीका

तपाना, फिर निर्मल जल में बुझाना — यह धातु-कर्म का वही tempering है जिसे लोहार-परम्परा आज भी करती है। "शस्त्र को जल पिलाना" रूपक नहीं, यथार्थ प्रक्रिया है।

नाराच, नालीक एवं यन्त्र-बाण

अथ नाराचनालीकशतघ्नीनां वर्णनम् — सर्वं लोहास्तु ये बाणा नाराचास्ते प्रकीर्तिताः । पञ्चभिः पृथुलैः पक्षैर्युक्ताः सिद्ध्यन्ति कस्यचित् ॥ ७३ ॥
हिंदी अर्थ

अब नाराच, नालीक और शतघ्नी का वर्णन — जो बाण सर्वथा लोहमय हों वे नाराच कहलाते हैं; पाँच चौड़े पंखों से युक्त होकर वे किन्हीं (सामर्थ्यवान्) को सिद्ध होते हैं।

नालीका लघवो बाणा नलयन्त्रेण नोदिताः । अत्युच्चदूरपातेषु दुर्गयुद्धेषु ते मताः ॥ ७४ ॥
हिंदी अर्थ

नालीक हल्के बाण हैं जो नल-यन्त्र से छोड़े जाते हैं; अत्यन्त ऊँचे-दूर प्रहार और दुर्गयुद्धों में वे उपयुक्त माने गए हैं।

सिंहासनस्य रक्षार्थं शतघ्नं स्थापयेत् गढे । रंजकंबहुलं तत्र स्थाप्यं वटयो धीमता ॥ ७५ ॥
हिंदी अर्थ

सिंहासन (राजस्थान) की रक्षा के लिए दुर्ग में शतघ्नी स्थापित करे; बुद्धिमान् वहाँ पर्याप्त रंजक (बारूद/ज्वलनशील) और बत्तियाँ रखे।

स्थान एवं मुष्टि — आकर्षण के आधार

अथ स्थानमुष्ट्याकर्षणलक्षणानि — स्थानान्यष्टौ विधेयानि योजने भिन्नकर्मणाम् । मुष्ट्यः पञ्च समाख्याता व्यायाः पञ्च प्रकीर्तिताः ॥ ७६ ॥
हिंदी अर्थ

अब स्थान, मुष्टि और आकर्षण के लक्षण — भिन्न कार्यों के लिए आठ स्थान (स्टान्स) विधेय हैं; पाँच मुष्टि (पकड़) और पाँच व्याय (चालन) कहे गए हैं।

टीका

आठ स्थान, पाँच मुष्टि, पाँच व्याय — यह वही व्याकरण है जो सिलम्बम् के मेइपाडम्/तरैपाडम्/काल-पाडम् में जीवित है। स्थान ही समस्त प्रहार का आधार है; गलत पैर पर सत्य बाण भी चूकता है।

अग्रतो वामपादश्च दक्षिणं चानुकुञ्चितम् । प्रत्यालीढं प्रकर्तव्यं हस्तद्वयसविस्तरम् ॥ ७७ ॥
हिंदी अर्थ

आगे बायाँ पैर, दायाँ कुछ मोड़ा हुआ — दोनों में दो हाथ का अन्तर रखकर प्रत्यालीढ स्थान बनाना चाहिए।

आलीढं तु प्रकर्तव्यं सव्यं चैवानुकुञ्चितम् । दक्षिणन्तु पुरस्ताद्वा दूरपाते विशिष्यते ॥ ७८ ॥
हिंदी अर्थ

आलीढ स्थान बनाना हो तो बायाँ पैर मुड़ा और दायाँ आगे रखे; यह दूर प्रहार में श्रेष्ठ है।

पादौ सविस्तरौ कार्यौ समौ हस्तप्रमाणतः । विशाखस्थानकं ज्ञेयं कूटलक्ष्यस्य वेधने ॥ ७९ ॥
हिंदी अर्थ

दोनों पैर एक हाथ के अन्तर पर, समान और विस्तृत रखे — यह विशाख स्थान; यह कूट (छिपे/कठिन) लक्ष्य के वेध में जानना चाहिए।

समपादैः समौ पादौ निष्कम्पौ च सुसङ्गतौ । असमे च पुरो वामे हस्तमात्रनतं वपुः ॥ ८० ॥
हिंदी अर्थ

समपाद में दोनों पैर समान, निष्कम्प और भली भाँति मिले हुए; असम में आगे-बाएँ, शरीर एक हाथ झुका हुआ।

आकुञ्चितोरुद्वौ यत्र जानुभ्यां धरणीं गतौ । दर्दुरक्रममित्याहुः स्थानं दृढभेदने ॥ ८१ ॥
हिंदी अर्थ

जहाँ दोनों जाँघें मुड़ी हों और घुटने धरती से लगे हों — उसे दर्दुर (मेंढक) क्रम कहते हैं; यह स्थान दृढ़-भेदन में (उपयोगी) है।

सव्यं जानुगतौ भूमौ दक्षिणं च सकुञ्चितम् । अग्रतो यत्र दातव्यं तद्विद्याद्दर्दुरक्रमम् ॥ ८२ ॥
हिंदी अर्थ

जहाँ बायाँ घुटना भूमि पर और दायाँ मुड़ा हुआ आगे रखा जाए — उसे भी दर्दुर-क्रम जानो।

पद्मासनं प्रसिद्धन्तु ह्युपविश्य यथाक्रमम् । धन्विनां तत्तु विज्ञेयं स्थानं शुभलक्षणम् ॥ ८३ ॥
हिंदी अर्थ

यथाक्रम बैठकर प्रसिद्ध पद्मासन — धनुर्धरों के लिए वह भी शुभलक्षण वाला स्थान जानना चाहिए।

टीका

प्रत्यालीढ, आलीढ, विशाख, समपाद, दर्दुर (दो रूप), पद्मासन — बैठे और खड़े, दूर और भेदन, गुप्त और खुले लक्ष्य के लिए भिन्न स्थान। यही स्टान्स-विविधता हर आयुध-कला का प्राण है; कम्बु-अभ्यास इन्हीं आधारों पर घूमता है।

अथ गुणमुष्टिः — पताका वज्रमुष्टिश्च सिंहकर्णस्तथैव च । मत्सरी काकतुण्डी च योजनीया यथाक्रमम् ॥ ८४ ॥
हिंदी अर्थ

अब गुण-मुष्टि (डोरी की पकड़) — पताका, वज्रमुष्टि, सिंहकर्ण, मत्सरी और काकतुण्डी — यथाक्रम प्रयोग में लानी चाहिए।

दीर्घा तु तर्जनी यत्र ह्याश्रिताङ्गुष्ठमूलकम् । पताका सा च विज्ञेया नालिका दूरमोक्षणैः ॥ ८५ ॥
हिंदी अर्थ

जहाँ तर्जनी लम्बी होकर अँगूठे के मूल पर टिकी हो — उसे पताका मुष्टि जानो; यह दूर तक बाण छोड़ने में (नालिका के समान उपयुक्त) है।

तर्जनी मध्यमा मध्यं अङ्गुष्ठो विशते यदि । वज्रमुष्टिस्तु सा ज्ञेया स्थूले नाराचमोक्षणैः ॥ ८६ ॥
हिंदी अर्थ

यदि तर्जनी और मध्यमा के बीच अँगूठा प्रवेश करे — उसे वज्रमुष्टि जानो; यह स्थूल (भारी) नाराच छोड़ने में (उपयुक्त)।

अङ्गुष्ठमध्यदेशन्तु तर्जन्यग्रं शुभं स्थितम् । सिंहकर्णः स विज्ञेयो दृढलक्ष्यस्य वेधने ॥ ८७ ॥
हिंदी अर्थ

अँगूठे के मध्यभाग पर तर्जनी का अग्रभाग भली भाँति टिका हो — उसे सिंहकर्ण जानो; यह दृढ़ लक्ष्य के वेध में (उपयुक्त)।

अङ्गुष्ठनखमूले तु तर्जन्यग्रञ्च संस्थितम् । मत्सरी सा च विज्ञेया चित्रलक्ष्यस्य वेधने ॥ ८८ ॥
हिंदी अर्थ

अँगूठे के नख-मूल पर तर्जनी का अग्र स्थित हो — उसे मत्सरी जानो; यह चित्र (विचित्र/जटिल) लक्ष्य के वेध में।

अङ्गुष्ठाग्रे तु तर्जन्यां मुखं यत्र निवेशितम् । काकतुण्डी च सा ज्ञेया सूक्ष्मलक्ष्येषु योजिता ॥ ८९ ॥
हिंदी अर्थ

अँगूठे के अग्र पर तर्जनी का मुख जहाँ रखा जाए — उसे काकतुण्डी जानो; यह सूक्ष्म लक्ष्यों में प्रयुक्त होती है।

टीका

पाँच मुष्टि = पाँच अलग बाणभार और लक्ष्य-सूक्ष्मता के लिए। भारी नाराच को वज्रमुष्टि, महीन लक्ष्य को काकतुण्डी — अँगूठे-तर्जनी का सूक्ष्म भेद ही सम्पूर्ण छूट बदल देता है। यही "finger release" का प्राचीन शास्त्र है।

धनुर्मुष्टि-सन्धान — पकड़ और जोड़

अथ धनुर्मुष्टिसन्धानम् — सन्धानं त्रिविधं प्रोक्तमधमूर्द्धं समं सदा । योजयेत् त्रिप्रकारं हि कार्येष्वपि यथाक्रमम् ॥ ९० ॥
हिंदी अर्थ

अब धनुर्मुष्टि-सन्धान — सन्धान तीन प्रकार का कहा गया है: अधः (नीचे), ऊर्ध्व (ऊपर) और सम; इन तीनों को कार्यानुसार यथाक्रम प्रयोग करे।

अधश्च दूरपातित्वे समे लक्ष्येषु निश्चले । दृढस्फोटं प्रकुर्वीत ऊर्ध्वसन्धानयोगतः ॥ ९१ ॥
हिंदी अर्थ

दूर प्रहार में अधः-सन्धान, निश्चल-सम लक्ष्य में सम-सन्धान, और दृढ़ भेदन ऊर्ध्व-सन्धान के योग से करे।

धनुर्व्याय — चालन के भेद

अथ धनुर्व्यायाः — कैशिकः केशमूले वै शरः शृङ्गे च सात्त्विकः । श्रवणे वत्सकर्णश्च ग्रीवायां भरतो भवेत् ॥ ९२ ॥
हिंदी अर्थ

अब धनुष के व्याय (खींचने के भेद) — केश-मूल तक खींचे तो कैशिक, शृङ्ग (भौंह) तक तो सात्त्विक, कान तक तो वत्सकर्ण, और ग्रीवा तक तो भरत

अंसके स्कन्धनामा च व्यायाः पञ्चप्रकीर्तिताः । कैशिकश्चित्रयुद्धेषु ह्यधो लक्ष्येषु सात्त्विकः ॥ ९३ ॥
हिंदी अर्थ

कन्धे तक खींचे तो स्कन्ध नाम — इस प्रकार पाँच व्याय कहे गए। कैशिक चित्र (विविध) युद्धों में, सात्त्विक नीचे के लक्ष्यों में (उपयुक्त)।

वत्सकर्णः सदाज्ञेयो भरतो दृढ भेदने । दृढभेदे च दूरे च स्कन्धनामानमुद्दिशेत् ॥ ९४ ॥
हिंदी अर्थ

वत्सकर्ण सदा (सामान्य) जानो, भरत दृढ़-भेदन में; दृढ़-भेदन और दूर—दोनों के लिए स्कन्ध-व्याय का निर्देश है।

टीका

खिंचाव-बिन्दु (anchor point) — केश-मूल, भौंह, कान, ग्रीवा, कन्धा — यही आधुनिक धनुर्विद्या का "anchor" शास्त्र है। स्थिर anchor के बिना दो बाण एक-से नहीं लगते। परम्परा ने इसे कार्य के अनुसार पाँच में बाँटा।

लक्ष्य — निशाने के भेद

अथ लक्ष्यम् — लक्ष्यं चतुर्विधं ज्ञेयं स्थिरं चैव चलं तथा । चलाचलं द्वयचलं वेधनीयं क्रमेण तु ॥ ९५ ॥
हिंदी अर्थ

अब लक्ष्य — लक्ष्य चार प्रकार का जानो: स्थिर, चल, चलाचल और द्वयचल — इन्हें क्रम से वेधना चाहिए।

आत्मानं सुस्थिरं कृत्वा लक्ष्यञ्चैव स्थिरं बुधः । वेधयेत् त्रिप्रकारन्तु स्थिरवेधी स उच्यते ॥ ९६ ॥
हिंदी अर्थ

अपने को भली भाँति स्थिर करके स्थिर लक्ष्य को जो तीन प्रकार (सन्धान) से वेधे — बुद्धिमान् वह स्थिरवेधी कहलाता है।

चलन्तु वेधयेद् यस्तु आत्मस्थानेषु संस्थितः । चलं लक्ष्यं तु तत् प्रोक्तमाचार्येण शिवेन वै ॥ ९७ ॥
हिंदी अर्थ

जो स्वयं अपने स्थान पर स्थिर रहकर चलते (लक्ष्य) को वेधे — उसे आचार्य शिव ने चल-लक्ष्य (वेध) कहा है।

धन्वीतः चलते यत्र स्थिरलक्ष्ये समाहितः । चलाचलं भवेत्तत्र ह्यप्रमेयमचिन्ततम् । उभावपि चलौ यत्र लक्ष्यं चापि धनुर्धरः । तद्विज्ञेयं द्वयचलं श्रमेण बहु साध्यते ॥ ९८ ॥
हिंदी अर्थ

जहाँ धनुर्धर स्वयं चलता हो पर स्थिर लक्ष्य पर एकाग्र हो — वह चलाचल (अप्रमेय, अचिन्त्य)। और जहाँ धनुर्धर तथा लक्ष्य दोनों चल हों — उसे द्वयचल जानो; यह बहुत श्रम से सधता है।

टीका

चार लक्ष्य = बढ़ती कठिनाई की चार सीढ़ियाँ: स्थिर-स्थिर, स्थिर-धनुर्धर/ चल-लक्ष्य, चलता-धनुर्धर, और दोनों चल। "द्वयचल" — चलते हुए चलते को वेधना — जोड़ी-अभ्यास (Jodi) का चरम है, और "श्रमेण बहु साध्यते" ही इसका एकमात्र मार्ग।

श्रम का महिमा — अभ्यास ही एकमात्र सिद्धि

श्रमेणास्खलितादृष्टिः शीघ्रसन्धानमाप्यते ॥ ९९ ॥
हिंदी अर्थ

श्रम (निरन्तर अभ्यास) से अस्खलित (अडिग) दृष्टि और शीघ्र-सन्धान प्राप्त होता है।

श्रमेण चित्रयोधित्वं श्रमेण प्राप्यते जयः । तस्माद् गुरुसमक्षं हि श्रमः कार्यो विजानता ॥ १०० ॥
हिंदी अर्थ

श्रम से विचित्र-युद्ध-कौशल और श्रम से ही जय प्राप्त होती है; इसलिए जानकार को गुरु के सामने ही अभ्यास करना चाहिए।

टीका

पूरा अध्याय इसी शिखर पर समाप्त होता है। न मन्त्र, न औषध, न दिव्य धनुष — अन्ततः श्रम ही सिद्धि है, और वह भी गुरु के सामने। यह पंक्ति हमारे अखाड़े का सूत्रवाक्य है: कम्बु हो या कट्टै, बाण हो या जोड़ी — गुरु की दृष्टि में किया गया श्रम ही योद्धा गढ़ता है।

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