दीक्षा से लक्ष्य तक — धनुर्धर की आधारशिला
सदाशिव–परशुराम–वसिष्ठ परम्परा का उपक्रम; अधिकारी, आचार्य, मुहूर्त, दीक्षा और अङ्गन्यास; फिर धनुष, गुण, बाण, फल की परख; अन्त में मुष्टि, स्थान और लक्ष्य के भेद।
धनुर्वेद-परिचय एवं परम्परा
एक बार विजिगीषु राजर्षि विश्वामित्र गुरु वसिष्ठ के पास जाकर, प्रणाम करके बोले — "भगवन्! श्रोत्रिय, दृढ़चित्त और योग्य शिष्य को, तथा दुष्ट शत्रुओं के नाश के लिए, मुझे धनुर्विद्या कहिए।" तब महर्षियों में श्रेष्ठ ब्रह्मर्षि वसिष्ठ बोले — "हे राजन् विश्वामित्र! सुनो। जिस रहस्यसहित धनुर्विद्या को भगवान् सदाशिव ने परशुराम से कहा था, वही रहस्यसहित संहिता मैं तुम्हारे हित के लिए, तथा गौ-ब्राह्मण-साधु-वेद की रक्षा के लिए कहता हूँ — यह संहिता यजुर्वेद और अथर्ववेद से सम्मत है।"
जैसा महादेव ने बुद्धिमान् भार्गव (परशुराम) से कहा था, वही मैं तुम्हें यथार्थ रूप में कहता हूँ — भली भाँति सुनो।
यह धनुर्वेद चार पादों वाला है — पहले पाद में दीक्षा की विधि, दूसरे में संग्रह (सामग्री), तीसरे में सिद्ध प्रयोग, और चौथे में प्रयोग की विधियाँ।
यह श्लोक पूरे ग्रन्थ का नक्शा है। दीक्षा → संग्रह → सिद्धप्रयोग → प्रयोगविधि — यही क्रम हमारे अखाड़े मे ं भी है: पहले शरणागति और आधार (स्टान्स-श्वास), फिर उपकरण की परख (कम्बु/कट्टै/आयुध), फिर सधे हुए अभ्यास, और अन्त में जोड़ी-प्रयोग। सीधे "प्रयोग" पर कूदना परम्परा के विरुद्ध है।
अधिकारी एवं आयुध
धनुर्वेद में गुरु विप्र (ब्राह्मण) कहा गया है, तथा दो वर्णों (क्षत्रिय- वैश्य) का भी अध्यापन-अधिकार है; युद्ध का अधिकार सबका है और शिक्षा से हर कोई स्वयं समर्थ बनता है।
आयुध चार प्रकार का है — मुक्त (छोड़ा जाने वाला, जैसे बाण), अमुक्त (हाथ में रहने वाला, जैसे खड्ग), मुक्तामुक्त (छोड़कर वापस लिया जाने वाला), और यन्त्रमुक्त (यन्त्र से छूटने वाला)।
यही चतुर्विध वर्गीकरण सिलम्बम् व कुथु-वरिसै तक विस्तृत है — कम्बु (अमुक्त), पोडी-कुच्चि का फेंकना (मुक्त), और जोड़ी में लौटती चालें (मुक्तामुक्त की भावना)। आयुध का स्वभाव समझे बिना उसका अभ्यास अधूरा है।
दुष्टों, दस्युओं और चोरों से सज्जनों की धर्मपूर्वक रक्षा तथा प्रजा का पालन — यही धनुर्वेद का प्रयोजन है।
जिस नगर में एक भी प्रसिद्ध धनुर्धर हो, वहाँ से शत्रु वैसे ही दूर भाग जाते हैं जैसे सिंह के घर से मृग।
आचार्य भली भाँति परखे हुए पात्र को ही धनुर्विद्या दे; लोभी, धूर्त, कृतघ्न और मन्दबुद्धि को न दे।
ब्राह्मण को धनुष, क्षत्रिय को खड्ग, वैश्य को कुन्त (भाला) और शूद्र को गदा देनी चाहिए।
धनुष, चक्र, कुन्त, खड्ग, चुरिका (कटार) और गदा — तथा सातवाँ बाहुयुद्ध (निःशस्त्र मल्लयुद्ध); इस प्रकार युद्ध सात प्रकार के हैं।
सातवाँ "बाहुयुद्ध" ही अखाड़े का आधार है — निःशस्त्र देहबल के बिना कोई आयुध सधता नहीं। कुथु-वरिसै इसी सातवें अंग की जीवित परम्परा है।
आचार्य-लक्षण एवं मुहूर्त
जो सातों युद्धों में निपुण हो वही आचार्य; चार में निपुण भार्गव; दो में योद्धा; और एक में निपुण मात्र गणक (गिनती का) कहलाता है।
हस्त, पुनर्वसु, पुष्य, रोहिणी, तीनों उत्तरा, अनुराधा, अश्विनी और रेवती — ये (शुभ) नक्षत्र हैं (शस्त्रारम्भ के लिए)।
जन्मराशि से चन्द्रमा के प्रथम, तृतीय, षष्ठ, सप्तम, दशम और एकादश स्थान में रहने पर सब कार्य करने चाहिए।
तृतीया, पञ्चमी, सप्तमी, दशमी, त्रयोदशी और द्वादशी — ये तिथियाँ शुभ मानी गई हैं।
रविवार, शुक्रवार और गुरुवार — ये तीन वार शस्त्र-कर्म के आरम्भ में शुभ हैं।
दीक्षा एवं अङ्गन्यास
इन शुभ दिनों में गुरु शिष्य को शास्त्र (शस्त्रविद्या) दे — विधिपूर्वक दान और होम से देवताओं को "स्वाहा" कहकर तृप्त करके।
उस अवसर पर ब्राह्मणों और अनेक कुमारियों को भोजन कराए, तथा तपस्वियों और शिवयोगियों की भक्ति से पूजा करे।
अन्न-पान, वस्त्र-अलंकार-आभूषण तथा विविध गन्ध-मालाओं से वहाँ गुरु की पूजा करे।
उपवास किया हुआ, मृगचर्म धारण किए, हाथ जोड़े शिष्य वहाँ गुरु से धनुष की याचना करे।
"बद्धाञ्जलि होकर धनुष की याचना" — यही दीक्षा का मर्म है। अखाड़े में पहला कम्बु शिष्य स्वयं नहीं उठाता; वह गुरु के हाथ से, प्रणाम के साथ मिलता है। शरणागति ही सामर्थ्य का द्वार है।
सिद्धि चाहने वाले को फिर शिवोक्त अङ्गन्यास करना चाहिए; आचार्य शिष्य के शरीर पर यह न्यास करे, जो पाप और विघ्न का नाश करता है।
शिखा-स्थान पर ईश (शिव) का, दोनों भुजाओं पर केशव का, नाभि के मध्य में ब्रह्मा का और दोनों जङ्घाओं पर गणाधिप (गणेश) का न्यास करे।
(न्यास-मन्त्र) — शिखा पर शङ्कर को, भुजाओं पर केशव को, नाभि में ब्रह्मा को, और जङ्घाओं पर गणपति को नमस्कार।
ऐसा न्यास कराए जिससे कल्याण हो; तब दूसरे लोग दुष्ट मन्त्र से भी कभी हिंसा नहीं कर पाते।
धनुर्मन्त्र से अभिमन्त्रित मानव धनुष शिष्य को दे — वेदविधि से, प्रत्येक काण्ड (पर्व) पर मन्त्र पढ़ते हुए।
वेध-विधि — प्रथम अभ्यास
अब वेधविधि — पहले बिना नोक (फल) वाले बाण से पुष्पवेध कराए, फिर नोकदार बाण से ही मत्स्यवेध कराए।
आरम्भ कुन्द (blunt) बाण से पुष्प-लक्ष्य पर — चोट का भय हटाकर पहले मुद्रा और छूट सधती है; फिर नुकीले बाण से चलता (मत्स्य) लक्ष्य। यही क्रम अखाड़े में कम्बु के म ृदु अभ्यास से कठोर जोड़ी-अभ्यास तक चलता है।
इन वेधों के अभ्यास से पुरुषों के बाण सब कार्य सिद्ध करने वाले हो जाते हैं।
मांस-लक्ष्य के वेध में जब बाण पूर्व दिशा की ओर गिरे, तब साधक विजयी और सुखी होता है।
दक्षिण में गिरने पर घोर कलह और विदेशगमन, पश्चिम में धन-धान्य, और उत्तर में सर्वत्र शुभ (फल) होता है।
ईशान में गिरना दुष्ट (अशुभ) है; शेष विदिशाएँ शुभ, हर्ष-पुष्टिकारक और सब कार्यों में सिद्धिदायक हैं।
इस प्रकार दुन्दुभि के मङ्गल-नाद के साथ तीन वेध शुभतापूर्वक करे; फिर गुरु को प्रणाम करके धनुष-बाण समर्पित करे।
चाप-प्रमाण — धनुष का माप
अब धनुष का माप — पहला योग(अभ्यास)-चाप, दूसरा युद्ध-चाप। अपने बाहुबल के माप से कुछ कम (खिंचाव वाला) धनुष शुभ होता है।
"अपने बल से किंचित् कम" — यह अत्यन्त व्यावहारिक सूत्र है। जो धनुष (या कम्बु/कट्टै) आपके बल से भारी है वह आपको साधता है, आप उसे नहीं। अगला श्लोक इसी को खोलता है।
धनुर्धर धनुष से बढ़कर (बलवान्) हो — यही अच्छा; धनुष धनुर्धर से बढ़कर न हो। धनुष से पीड़ित होता धन्वी लक्ष्य ही नहीं देख पाता।
इसलिए अपने बल के अनुरूप धनुष ही शुभ है। देवताओं का धनुष उत्तम (सबसे बड़ा), और उससे कम मानव का।
साढ़े चार हाथ का धनुष श्रेष्ठ कहा गया है; उसे दिव्य धनुष जानो, जिसे पूर्वकाल में शङ्कर ने धारण किया था।
चौबीस अङ्गुल का एक हाथ; चार हाथ का धनुष कहा गया है — ऐसा सर्वलक्षण- युक्त मानव-चाप होता है।
शुभ-चाप-लक्षण
अब शुभ धनुष के लक्षण — तीन, पाँच, सात अथवा नौ पर्व (गाँठ/खण्ड) वाला कोदण्ड सदा शुभकारक होता है।