औषधि, संग्रामविधि एवं रण का धर्म
शस्त्र-निवारक औषधियाँ; संग्राम की मुद्रा एवं स्वर-नाडी-विज्ञान; राहुयुक्त योगिनी-दिशा; व्यूह-रचना और सेना-नयन; और अन्त में हन्तव्य-अहन्तव्य का सनातन धर्मोपदेश।
संग्राम-रक्षक औषधियाँ
अब औषधि-प्रकरण — हस्त नक्षत्र में लाई गई लाङ्गली (कलिहारी) की गाँठ का लेप — उसके प्रभाव से डरपोक भी रण में शूर का दर्प हर लेता है (निर्भय होता है)।
शुभ योग-नक्षत्रों में लाई गई अपामार्ग (चिरचिटा) की जड़ — उसका लेपमात्र वीरों के लिए सब शस्त्रों का निवारण (कवच) बनता है।
अधःपुष्पी, शङ्खपुष्पी, लज्जालु (छुईमुई), गिरिकर्णिका, नलिनी, सहदेवी — तथा अर्क आदि के पत्ते (शस्त्र-रक्षक औषधियों में गिने गए हैं)।
इन सबकी तथा विष्णुकान्ता की जड़ रविवार के दिन लेनी चाहिए; भुजा पर बाँधने या शरीर पर लेप करने से ये शस्त्र-निवारक होती हैं।
जिसके शरीर पर अष्ट-मातृकाओं (की रक्षा) स्थित हो, उसे सर्प-व्याघ्र आदि प्राणियों और भूत आदि का भय नहीं होता।
हस्त नक्षत्र में लिया छुछुन्दर (छछूँदर) से बना चूर्ण — उसके प्रभाव से धूल (शत्रु का बल) निश्चय ही सामने नहीं आती।
सिंह-मांस लेकर घोड़ों के मार्ग में डाल दे, तो पीटने पर भी वे घोड़े उस मार्ग से नहीं आते। श्वेत गिरिकर्णिका की जड़ हाथ में रखने पर (शत्रु-)धूल को रोकती है; श्वेत करटारिका की जड़ व्याघ्र आदि का भय हरती है।
पुष्य नक्षत्र में उखाड़ी पाठा (पाढ़) की जड़ मुख में रखने पर रण में तीक्ष्ण अस्त्र-अग्र मनुष्यों के शरीर को नहीं छूते। पुष्य-नक्षत्र में विधिपूर्वक निकाली गान्धारी की उत्तर-मुखी जड़ मुख में रखने पर सामने आते शस्त्र-समूह को रोकती है।
पुष्य-रविवार में उपवासपूर्वक ली गई शुभ जटानीली (नील की जटा) — भुजा, शिर या मुख पर धारण करने पर शस्त्र-निवारक होती है और राजा, सर्प तथा चोर के भय का नाश करती है।
संग्रामविधि — मुद्रा एवं स्वर-नाडी-विज्ञान
आदौ तु क्रियते मुद्रा पश्चाद्युद्धं समाचरेत् — पहले (रक्षक) मुद्रा की जाती है, फिर युद्ध किया जाता है।
जिसने सर्प-मुद्रा कर ली, उसकी (रक्षा-)सिद्धि निःसन्देह होती है।
श्री रुद्र का ध्यान करके उनका मन्त्र जपे, फिर सिंहासन पर विराजित रुद्राणी का ध्यान करे। (इस श्लोक के बीज-मन्त्र गुरुमुख-ग्राह्य हैं; यहाँ केवल ध्यान-संकेत दिया गया है — पाठभेद संभावित।)
जो पूर्ण-सत्त्व (आत्मबल) में स्थित होकर शत्रु की सामग्री को अपूर्ण और अपने बल को पूर्ण अनुभव करता है, वह अकेला ही पृथ्वी को जीत लेता है।
संग्राम-विजय का पहला रहस्य बाहर नहीं, भीतर है — "पूर्णसत्त्वस्थ" चित्त। शत्रु को अपूर्ण और स्वयं को पूर्ण देखने वाला मनोबल ही अर्ध-विजय ह ै। यही भाव जोड़ी-अभ्यास में भी काम करता है: भय भरा मन प्रहार से पहले ही हार जाता है।
हे गाधि! जिसकी पीठ-दायीं ओर राहुयुक्त योगिनी हो, वह अकेला लाख शत्रुओं को मारता है; जिसके पीछे-दायें सूर्य, रात में सामने-बायें चन्द्र, और पीछे-दायें वायु हो — वह योद्धा दायीं ओर से शत्रुओं का नाश करता है।
शरीर में जो नाडी (स्वर) बह रही हो, उसी में अधिदेवता (का बल) रहता है; उनकी सम्मुख दिशा भी सब कार्यों में फलदायक होती है।
वायु (स्वर) जिस दिशा में बह रहा हो, युद्ध उसी दिशा में करे; तब सामने साक्षात् इन्द्र भी हो तो निःसन्देह विजय होती है।
यह स्वरोदय (स्वर-नाडी) विज्ञान है — कौन-सा नथुना (इडा/पिङ्गला) चल रहा है, इससे कार्य की दिशा और काल का निर्णय। साँस को पढ़कर कर्म का सम य चुनना — यह वही सूक्ष्म आत्म-निरीक्षण है जो प्रत्येक योद्धा-कला की आधार- भूमि है। बाण हो या कम्बु, छूट सदा साँस के साथ बँधी है।
सूर्य-स्वर में पूर्व-उत्तर की ओर, चन्द्र-स्वर में पश्चिम-दक्षिण की ओर — इस प्रकार सेनापति सादर सेना भेजे। जिस अङ्ग की नाडी में वायु बहे, उसी ओर प्राण खींचकर (कान तक बाण) ले जाए, तो इन्द्र को भी जीत ले।
जो अपने पूर्ण अङ्ग (शरीर) की शत्रु-प्रहारों से रक्षा करता है, उसकी शक्ति बलिष्ठ शत्रुओं से भी नष्ट नहीं होती।
अँगूठे-तर्जनी की पंक्ति में और पैर के अँगूठे में युद्ध-काल में (चटकाकर) ध्वनि करनी चाहिए; ऐसा (सजग) लक्ष्य-योद्धा विजयी होता है।
भू-तत्त्व से उदर की, जल-तत्त्व से पैरों की, अग्नि-तत्त्व से जाँघों की, और वायु-तत्त्व से हाथों की रक्षा (ध्यान-कवच से) करे।
पञ्च-तत्त्व से अंग-रक्षा — यह ध्यान-कवच (न्यास) की वही परम्परा है जो अध्याय १ के अङ्गन्यास में दिखी। शरीर के हर भाग को एक तत्त्व-देवता से जोड़कर सजगता का पूर् ण मानचित्र बनता है।
सूर्य-स्वर में पूर्व-उत्तर मुख करके जय पाए, चन्द्र-स्वर में सदा दक्षिण- पश्चिम मुख करे। लम्बे युद्ध में चन्द्र-स्वर शुभ, शीघ्र-युद्ध में सूर्य; दूर-युद्ध में चन्द्र विजयी, निकट-युद्ध में सूर्य।
प्राण-पवन को खींचकर (सचेत होकर) वाहन पर चढ़े, कदम बढ़ाए, सब कार्य साधे। जो (नाडी की दृष्टि से) "शून्य" में स्थित है, उसे न घोर काल, न शस्त्र, न सर्प, न शत्रु-व्याधि-चोर — कोई नष्ट नहीं कर सकता।
अयन, तिथि, दिन और दिनेश (वार) के साथ अपने तत्त्व एवं मार्ग में यदि किसी का स्वर दैवयोग से बहे, तो वह स्तम्भमात्र स्वर से शत्रु-सेना जीत लेता है; लोक में केशव (विष्णु) को भी उस पर विघ्न नहीं (होता)।
जीव (चलती नाडी) के साथ शस्त्र बाँधे, जीव के साथ ही तैयारी करे और जीव के साथ ही शस्त्र छोड़े — तब युद्ध में सदा विजय। वाम-नाडी उदय में चन्द्र को वाम-सन्मुख रखे; सूर्य-चार में सूर्य को पीठ-दक्षिण रखकर जीते।
उग्र कार्य में चलती नाडी को (सम्मुख) दिशा में रखे, शान्त कार्य में जीव-सहित — तब कार्य सिद्ध होते हैं। कपर्दी (शिव) ने तत्त्व-बल से नाडी-बल को अधिक कहा है; इस स्वर-चार को जानकर मनुष्य कार्य-निपुण होता है।
यह (विद्या) क्रूर, कुबुद्धि, अशान्त, गुरुद्रोही और अभक्त को न दी जाए — और ब्रह्मचारी, धर्मपूर्वक प्रजापालक, दुष्टों को दण्ड देने वाले तथा साधुओं के रक्षक को अवश्य दी जाए — यही उपदेश है, यही उपदेश है।
पात्र की परीक्षा अध्याय १ (श्लोक ७) में आरम्भ हुई थी, यहाँ फिर दोहराई जाती है। विद्या का द्वार चरित्र से खुलता है, बल से नहीं। "प्रजापालक, दुष्ट-दण्डक, साधु-रक्षक" — यही धनुर्वेद का अधिकारी है; यही हमारे अखाड़े का भी मूल्य है।
राहुयुक्त योगिनी-दिशा
प्रतिपदा-नवमी को प्रथम अर्ध-याम में राहुयुक्त योगिनी पूर्व दिशा में स्थित रहती है; द्वितीया-दशमी को पाँचवें अर्ध-याम में राहु-सहिता शिवा पश्चिम में उदित होती है।
तृतीया-एकादशी को तीसरे अर्ध-याम में तमोयुक्त पार्वती दक्षिण में घूमती है; चतुर्थी-द्वादशी को सातवें अर्ध-याम में राहु-सहित नगजा उत्तर में; पञ्चमी-त्रयोदशी को आठवें अर्ध-याम में स्वर्भानु-युता गौरी नैर्ऋत्य में; और षष्ठी-चतुर्दशी को कात्यायनी वायव्य में आती है।
सप्तमी-पूर्णिमा को चौथे अर्ध-प्रहर में राहु-सहित योगिनी को ईशान में जाने; अष्टमी-अमावास्या को छठे अर्ध-याम में तमोयुक्त रुद्राणी आग्नेय में दिखती है, तथा दूसरे अर्ध-याम में सैंहिकेय (राहु) युक्त — इस प्रकार राहुयुक्त योगिनी की दिशा जाननी चाहिए। (तिथि-दिशा-सारणी; कुछ पद वाचना-भेद के अधीन — पाठभेद संभावित।)
योगिनी की दिशा को पीठ या दायीं ओर रखकर आक्रमण करना — यह काल-दिक् का वही शकुन-शास्त्र है जो लोक-परम्परा में "योगिनी-दिशा वर्जित" कहकर आज भी जीवित है। युद्ध हो या यात्रा, दिशा-काल का विवेक इसी से आता है।
शूर-धर्म एवं रणनीति
राजपुत्र, सामन्त, विश्वस्त और सेवक-वर्ग — इन सबको राजा अपनी रक्षा के लिए अपने पास (बगल में) रखे। परस्पर अनुरक्त (एकजुट), शार्ङ्ग-धनुर्धर, युद्ध के ज्ञाता और घुड़सवार योद्धा रण में शत्रुओं को जीतते हैं।
एक कायर भी भागकर विशाल सेना को तोड़ देता है; उसके टूटने पर अत्यन्त शूर योद्धा भी टूट जाते हैं। इसलिए राजा कायर को (अकेला नहीं) बल (टुकड़ी) के साथ ही लगाए। लोक में दो पुरुष सूर्यमण्डल को भेदते हैं (परम गति पाते हैं) —
योगयुक्त परिव्राजक, और रण में सम्मुख होकर मारा गया (वीर) — शत्रुओं से घिरा शूर जहाँ भी मारा जाए, यदि कायरता की बात न कहे तो अक्षय लोक पाता है।
मूर्च्छित, विकल (अपंग), शस्त्रहीन, दूसरे से लड़ते हुए, भागते हुए और शरणागत — इनकी हिंसा कभी न करे।
यह रण-धर्म की आधारशिला है — युद्ध के भी नियम हैं। असहाय, निःशस्त्र, शरणागत और भागते पर वार वर्जित। यही मर्यादा भारतीय युद्ध-परम्परा को पशुबल से अलग कर ती है; यही अखाड़े का भी अनुशासन है — जोड़ी-अभ्यास में गिरे साथी पर प्रहार नहीं।
बलवान् को भागते डरपोक का पीछा नहीं करना चाहिए; शरण न पाकर वह कभी शूरता पर उतर आता है। (अतः) राजा विशाल चतुरङ्ग सेना एकत्र करके —
व्यूह बनाकर जय की इच्छा से शूरों को आगे रखे। जिसकी पीठ पीछे वायु बहे, पीठ पीछे सूर्य और पक्षी हों, और मेघ (अनुकूल) चलें — उसकी रण में जय। (सो) अपूर्ण (अधूरे मन) से मरना पड़ता है, और सम्पूर्ण (पूर्ण मन) से ही जीवन।
इसलिए धैर्य धारण करके ही शत्रु-सेना का सामना करे — जीतने पर लक्ष्मी, मरने पर स्वर्ग, और धरती पर कीर्ति। क्षत्रिय के लिए घर में रोग से मरना अधर्म है; रण में मरना ही उसका सनातन धर्म है।
व्यूह-रचना
अब व्यूह कहते हैं — बलवान् स्वर में मध्य-सेना आलस्यरहित होकर युद्ध करे; दो सेनाएँ दोनों पार्श्वों में, एक सदा पीछे रक्षा करे, और एक विकट (प्रबल) सेना को दूर रखकर रण में (आवश्यकतानुसार) घुमाए।
दण्ड, शकट, वराह, मकर, सूची, गरुड और पद्म — ये (प्रमुख) व्यूह माने गए हैं। इन व्यूहों की रचना करके सेनापति सदा (मध्य में) रहे, और बलाध्यक्ष आदि सबको सब दिशाओं में नियुक्त करे।
दिशा-अनुसार व्यूह — सर्वतोभय में दण्डव्यूह; पृष्ठ (पीछे) भय में शकटव्यूह; पार्श्व-भय में वराह या गरुड-व्यूह; तथा अग्र (सामने) भय में पिपीलिका-व्यूह (चींटियों की पंक्ति-सा) रचे।
व्यूह-विन्यास ऐसे करे — छोटी सेना (सीमित) युद्ध करे, बड़ी सेना चारों ओर घूमे; समतल भूमि पर घुड़सवार लड़ें; जल में हाथी, तुम्बी, चर्म-मशक और नौकाओं से युद्ध करे; पैदल भुशुण्डी या धनुष लेकर; वन में वृक्षों पर चढ़कर; स्थल पर चर्म-खड्ग-भल्ल से लड़ें। उत्साही, ऊँचे (बलवान्) योद्धा आगे, शेष पीछे रखे जाएँ।
सात व्यूह और भूमि-अनुसार युद्ध — जल, वन, समतल, स्थल के लिए अलग रणनीति। यही "terrain-based tactics" है। ध्यान दें: भय जिस दिशा से आए, व्यूह उसी के अनुरूप — प्रतिक्रिया परिस्थिति से जन्मे, पूर्वग्रह से नहीं।
सेना-नयन एवं क्रम
अब सेना-नयन — हे गाधिज! यह मेरी आज्ञा है कि राजा पहले (आज्ञा-सूचक) व्याकरण-शिक्षा ले — लट्-लकार के मध्यम-पुरुष के रूप कण्ठस्थ करे, ताकि आज्ञा-कार्य सिद्ध हों। मध्यम-पुरुष (तुम/आप) से दिए स्पष्ट आदेश ही सर्व-सिद्धिदायक हैं; उन्हीं से राजा के सेवक-पुरुष कार्य साधते हैं।
अनूठा सू त्र — सेनापति को व्याकरण आना चाहिए। क्यों? क्योंकि युद्ध का आधा भाग स्पष्ट आदेश है। "मध्यम-पुरुष लट्-लकार" (तुम करो — आज्ञा-रूप) पर अधिकार ही आदेश को अचूक बनाता है। भ्रामक आदेश सेना तोड़ते हैं; स्पष्ट वाणी उन्हें जोड़ती है।
पदाति-क्रम — कूदने और दौड़ने में समान गति वाले, संतुलित पैदल ही ग्रहण करने योग्य हैं; असंतुलित कभी नहीं। पीछे हटना, स्थिर होना, लेटना, दौड़ना और शत्रु-सेना में पार्श्व-दिशाओं से चलना — इनका अभ्यास कराए।
जिनके (जन्म-कुण्डली के) छठे स्थान में क्रूर-पाप ग्रह पड़ें, वे वीर युद्ध में लड़ें — क्योंकि अन्य (उतने) कार्यकर नहीं होते।
उदाहरण — जैसे विवस्वान्, भरत, धुन्धुमार आदि छत्रपति (राजा) — जिनके वस्त्र और ध्वजा पीत थे — वैसे ही युद्ध-यूप भी पीत और चतुरस्र-अंग-युक्त हो। श्वेत, रक्त, हरित और कृष्ण — इन (वर्णों) से अन्य सेनाओं को भी जय-लाभ-सुख चाहने वाले राजा विभाग-पूर्वक नित्य सजाएँ।
हे गाधिज! ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, चन्द्र और सूर्य — क्रमशः पाँच सेना- विभागों के अधिष्ठाता जानो। ब्रह्मा रुद्र-बल पर, विष्णु चन्द्र-बल पर, रुद्र सूर्य-बल पाकर, चन्द्र ब्रह्म-बल पर, और सूर्य विष्णु-बल पाकर — निःसन्देह जीतते हैं। (यह सेना-विभागों के परस्पर आधिक्य का सांकेतिक चक्र है।)
अस्त्र-शस्त्र-विशारद राजा इस (देव-बल-चक्र) को नित्य जानें। पूर्वोक्त सेनाएँ अपना-अपना बल पाकर यदि युद्ध में जाएँ, तो आधे ही प्रयास से सब शत्रुओं को परास्त कर देती हैं — यह रुद्र-वचन है।
अश्व-हस्ति-रथ-क्रम एवं सेनापति-शिक्षा
अब अश्व-क्रम — मण्डल, चतुरस्र, गोमूत्रिका, अर्धचन्द्र और नागपाश — इन पाँच गति-क्रमों से घोड़े को घुमाए (अभ्यास कराए)।
घोड़े की पाँच चालें — वृत्त, चौकोर, टेढ़ी (गोमूत्रिका), अर्धचन्द्र और नागपाश — यही अश्व-प्रशिक्षण की मूल आकृतियाँ हैं। पैदल योद्धा का पद-विन्यास (footwork) भी इन्हीं ज्यामितीय पथों पर सधता है; सिलम्बम् के काल-पाडम् में यह जीवित है।
हस्ति-क्रम — हाथियों को पर्वत-आरोहण, जल-गमन, दौड़, उठना, बैठना और अलात-चक्र (अग्नि-घेरे) आदि से भय-निवारण का अभ्यास कराना चाहिए। रथ-क्रम — रथ और अश्व का साधन समतल स्थल पर करना चाहिए।
सेनापति-लक्षण — हे राजर्षि विश्वामित्र! जो आकार-विद्या (रचना-कौशल) में समर्थ हो उसे क्षत्रिय-सेनापति जानो। उसके नियम — वह समस्त वाहिनी को एक दृष्टि से देखे, सब पदातियों को उनके परिश्रम के अनुरूप अधिकार दे, और व्यूह-रचना में अति-निपुण हो — ऐसा ही सेनानी नियुक्त करने योग्य है।
शिक्षा-क्रम — पहले छात्र कोश और व्याकरण के सूत्र पढ़े, फिर मनु के सातवें-आठवें अध्याय (राजधर्म), व्यवहार-अध्याय, तथा जयार्णव, विष्णुयामल, विजय आदि स्वर-शास्त्र पढ़े; तत्पश्चात् रहस्य-सहित धनुर्वेद का अध्ययन करे।
यह क्रम बहुत कुछ कहता है — धनुर्वेद सबसे अन्त में। पहले भाषा, धर्म, न्याय और स्वर-विज्ञान; शस्त्र-विद्या इन सबके ऊपर की मंज़िल है। बिना चरित्र और विवेक के हाथ में शस्त्र देना परम्परा में वर्जित है।
हन्तव्य-अहन्तव्य — रण का सनातन धर्म
सोए हुए, गहरी नींद में पड़े, उन्मत्त, कवचहीन, निःशस्त्र, बालक, स्त्री, दीन वचन बोलते हुए (दयायाचक) और भागते हुए — इनका वध कभी न करे।
युद्ध की समस्त मर्यादा इस एक श्लोक में सिमटी है। असहाय, अचेत, निर्बल और शरणागत पर वार नहीं — यही धनुर्वेद को धर्म बनाता है, केवल युद्ध-कौशल नहीं। हमा रे अखाड़े का प्रत्येक यज्ञ इसी मूल्य पर टिका है: बल का उपयोग रक्षा के लिए, दमन के लिए नहीं।
जो धर्म के लिए प्राण त्याग देता है, उसे तीर्थ और जप की क्या आवश्यकता? वह भी मुक्ति का भागी होता है, नरक को नहीं पाता।
ब्राह्मण के लिए, गौ के लिए, अथवा स्त्रियों-बालकों के वध को रोकने के लिए जो प्राण त्यागने को तत्पर है — वह सब (कर्ता) मोक्ष प्राप्त करता है।
इति श्रीमहर्षिवसिष्ठ-प्रणीता धनुर्वेद संहिता समाप्ता।
समूचा ग्रन्थ जहाँ आरम्भ हुआ था — "साधुसंरक्षणं धर् मतः" — वहीं समाप्त होता है: निर्बल की रक्षा में प्राण देना ही परम धर्म, परम मोक्ष। धनुर्वेद का पहला और अन्तिम शब्द विध्वंस नहीं, रक्षण है। यही वसिष्ठ की वाणी है, यही हमारे अखाड़े की आत्मा।
🚩 हर हर महादेव!
अध्याय ३ पर चर्चा (0)
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