लक्ष्याभ्यास एवं अस्त्र — साधना का विज्ञान
दोनों हाथों का श्रम, प्राणायाम-सहित मोक्षण, बाण की शुद्ध और दोषपूर्ण गतियाँ, दृढ़-भेद्य चतुष्क, काष्ठछेद, धावल्-लक्ष्य और शब्दवेध; अन्त में अस्त्र-मन्त्र-प्रकरण।
दोनों हाथों का श्रम
अब लक्ष्याभ्यास के स्वरूप — जो मनुष्य पहले बायें हाथ से श्रम (अभ्यास) करता है, उसे धनुष-क्रिया की सिद्धि शीघ्र ही प्राप्त होती है।
पहले बायाँ हाथ — जो धनुष थामता है। थामने वाला हाथ सधे बिना खींचने वाला व्यर्थ है। यही कारण है कि अखाड़े में कम्बु पहल े "धारण" सधता है, फिर "प्रहार"। नींव पहले, शिखर बाद में।
बायाँ हाथ भली भाँति सध जाने पर फिर दायें का आरम्भ करे; फिर दोनों से नाराच और (साधारण) बाणों का श्रम करे।
बायें (हाथ) से ही श्रम करे — तब दायें हाथ में सुसिद्धि आती है; रथी विशाख और असम स्थान में तथा कैशिक व्याय में (अभ्यास करे)।
दिशा, दूरी एवं लक्ष्य-मान
सूर्य उदय होने पर लक्ष्य पश्चिम में रखे, और अपराह्न में लक्ष्य पूर्व दिशा में रखे।
सूर्य पीठ पीछे, आँखों में नहीं — यह सीधा व्यावहारिक विवेक है। प्रातः पश्चिम-लक्ष्य, संध्या पूर्व-लक्ष्य, ताकि प्रकाश साधक के साथ रहे, सामने चौंधियाए नहीं। खुले अखाड़े में कम्बु-अभ्यास पर भी यही लागू है।
उत्तर की ओर अभ्यास सदा (शुभ, अतः) अवश्य करने योग्य; संग्राम के बिना दक्षिणमुख लक्ष्य नहीं करना चाहिए।
साठ धनुष की दूरी पर रखा लक्ष्य ज्येष्ठ (श्रेष्ठ) कहा गया है, चालीस पर मध्यम, और बीस पर कनिष्ठ।
(अन्य मान से) चालीस, तीस और सोलह (धनुष की दूरियाँ क्रमशः ज्येष्ठ-मध्यम- कनिष्ठ) होती हैं।
जो सूर्योदय से अस्त तक चार सौ बाणों से लक्ष्य-अभ्यास करे, वह धनुर्धरों में ज्येष्ठ होता है।
"दिनभर में चार सौ बाण" — यह मात्रा का शास्त्र है। सिद्धि गिनती से नहीं, पर गिनती के बिना भी नहीं। नित्य नियत आवृत्ति ही स्नायु में स्मृति बैठाती है — कम्बु के चक्रों की गिनती इसी परम् परा में है।
तीन सौ बाणों से मध्यम, दो सौ से कनिष्ठ; लक्ष्य पुरुष के माप का, चन्द्रक (गोल चिह्न) सहित बनाए।
हे भृगु (भार्गव)! जो लक्ष्य के ऊपरी भाग को भेदे वह ज्येष्ठ, नाभि (मध्य) को भेदे मध्यम, और पाद (नीचे) को भेदे वह कनिष्ठ माना गया है।
अनध्याय — जब अभ्यास न करे
अब अनध्याय — अष्टमी, अमावास्या, चतुर्दशी और पूर्णिमा तक का आधा दिन — ये सब कर्मों में निषिद्ध (विश्राम के) हैं।
परम्परा विश्राम को भी नियम बनाती है। शरीर को पुनर्निर्माण के दिन चाहिए; पर्व-तिथियों का यह अनध्याय आधुनिक "rest day" का ही शास्त्रीय रूप है।
असमय में मेघ गरजें या दुर्दिन (मेघाच्छन्न दिन) हो — तो पहले से चलता आ रहा लक्ष्य-अभ्यास भी अनध्याय (स्थगित) कहा जाता है।
अनुराधा नक्षत्र से आरम्भ कर सोलहवें नक्षत्र तक जब सूर्य विचरता है, उस काल को अकाल (अनुपयुक्त) कहते हैं।
अरुणोदय के समय यदि मेघ गरजे, तो उस दिन अनध्याय होता है — उसे अकाल कहते हैं।
अभ्यास करते समय यदि वहाँ साँप दिखे, अथवा श्रम-कर्म में धनुष टूट जाए —
अथवा प्रथम बाण-मोक्षण में ही डोरी टूट जाए — तो बुद्धिमानों में श्रेष्ठ उस दिन शस्त्र-श्रम न करे।
अपशकुन-संकेत को अन्धविश्वास न कहें — टूटती डोरी या भागती एकाग्रता प्रायः थके शरीर का संकेत होती है। परम्परा कहती है: जिस दिन उपकरण और मन साथ न दें, उस दिन रुक जाओ। यह चोट से बचने का विवेक है।
श्रमक्रिया — मोक्षण की सम्पूर्ण विधि
अब श्रमक्रिया — पवित्र साधकों के लिए श्रम से सिद्ध होने वाली क्रियाओं का समूह कहता हूँ, जिनके ज्ञानमात्र से ही सिद्धि होती है, अन्यथा नहीं।
पहले धनुष चढ़ाकर चूलिका (डोरी की गाँठ) बाँधे; फिर स्थान (स्टान्स) बनाकर बाण पर हाथ रखे।
बायें हाथ से धनुष को तौले (सम्हाले); फिर बाण का आदान (उठाना), फिर सन्धान (जोड़ना) करे।
एक बार खींचे धनुष से भूमि-वेध न करे (व्यर्थ न छोड़े); विघ्नराज (गणेश), गुरु, धनुष और बाणों को नमस्कार करे।
बाण के आकर्षण (खींचने) के लिए गुरु की आज्ञा माँगे; प्रयत्नपूर्वक प्राणवायु को प्राण के साथ भीतर भरे (पूरक)।
कुम्भक (श्वास रोककर) से स्थिर होकर हुँकार के साथ (बाण) छोड़े — सिद्धि चाहने वाले धनुर्धर को यही अभ्यास-क्रिया करनी चाहिए।
पूरक → कुम्भक → मोक्षण — यही धनुर्वेद का प्राण-मर्म है। श्वास भरकर, रोककर, स्थिर होकर छूट — बाण श्वास के विराम-बिन्दु पर छूटता है। यही सूत्र सिलम्बम् के प्रहार और कर्लाकट्टै के झूले पर भी लागू है: शक्ति श्वास की शान्ति से आती है, आवेश से नहीं।
छह मास में मुष्टि (पकड़) सधती है, एक वर्ष में (साधारण) बाण; और नाराच उसी को सधते हैं जिस पर महेश्वर प्रसन्न हों।
यदि अपनी सिद्धि चाहे तो बाण को फूल की तरह (कोमलता से) थामे, धनुष को साँप की तरह (कसकर) दबाए, और लक्ष्य को धन की तरह (एकाग्रता से) चिन्तन करे।
तीन उपमाएँ, तीन भाव — बाण पर कोमल पकड़ (तनाव नहीं), धनुष पर दृढ़ पकड़, और लक्ष्य पर लोभी की-सी एकाग्रता। यह श्लोक धनुर्वेद की सबसे सुन्दर अभ्या स-सूक्ति है; इसे स्मरण रखना ही आधा अभ्यास है।
आचार्य (सुन्दर) क्रिया चाहते हैं, भार्गव दूरी चाहते हैं, राजा दृढ़ता चाहते हैं, और शेष लोग बस लक्ष्य-भेद चाहते हैं।
जिससे लक्ष्य-भेद द्वारा लोगों का रञ्जन (प्रसन्नता) हो — इसलिए साधारण बाण से भी किया गया लक्ष्यवेध प्रशस्त है।
लक्ष्यस्खलन-विधि — अचूक छूट का क्रम
अब लक्ष्य-भेद की विधि — विशाख स्थान बनाकर सम-सन्धान करे; गोपुच्छ-मुख बाण और सिंहकर्ण मुष्टि से —
कैशिक व्याय (केश-मूल तक) खींचे, पर शिखा को न हिलाए; दोनों हाथ आगे-पीछे समान, कन्धों-सहित निश्चल रखे।
आँखों को न झपकाए, दृष्टि लक्ष्य पर टिकाए; मुष्टि से ढके लक्ष्य को बाण के अग्र (नोक) पर संयोजित करे।
मन को दृष्टि के साथ एक करके फिर बाण छोड़े; जिसने श्रम को जीत लिया वह योद्धा लक्ष्य से कभी नहीं चूकता।
स्थान → खिंचाव → स्थिर शिखा → अपलक दृष्टि → नोक और लक्ष्य का संयोग → मन-दृष्टि का एकत्व → छूट। यह अचूकता की पूरी शृंखला है — आधुनिक "aim–anchor–focus–release" का सम्पूर्ण पूर्वज। "मनो दृष्टिगतं कृत्वा" ही वह क्षण है जहाँ धनुर्वेद ध्यान बन जाता है।
शीघ्रसन्धान · दूरपात · दृढभेद
अब शीघ्रसन्धान — जो तूणीर से बाण का आदान, सन्धान, कर्षण और क्षेपण त्वरा (शीघ्रता) से करता है, नित्य अभ्यास से उसे शीघ्रसन्धान (तीव्र बाण-प्रवाह) सिद्ध होता है।
अथ दूरपातित्वम् — पताका-मुष्टि और आगे-भारी (स्त्री-चिह्न) बाण से दूर प्रहार सधता है।
दृढ़-भेदन — प्रत्यालीढ स्थान में अधः-सन्धान करे; दर्दुर स्थान लेकर ऊर्ध्व-धारण करे।
स्कन्ध-व्याय, वज्रमुष्टि और चाप-मार्ग से भुजाओं में अत्यन्त सौष्ठव (दक्षता) आती है, जिससे दृढ़-भेदन-सामर्थ्य उत्पन्न होता है।
हीन-गति — बाण की दोषपूर्ण उड़ान
हीन (दोषपूर्ण) गतियों का समूह — सूचीमुखा, मीनपुच्छा और तीसरी भ्रमरी — विद्वानों ने बाणों की ये तीन (दोषपूर्ण) गतियाँ बताई हैं।
जिस बाण के पंख टेढ़े (विकृत) हों अथवा कम (हीन) हों, उसकी गति सूचीमुखा (सूई-मुख की तरह डगमगाती) होती है।
कठोर डोरी वाले धनुष से जो बाण हीन (ढीली) मुष्टि से खींचा जाए, उसकी गति मत्स्यपुच्छा (मछली की पूँछ-सी लहराती) कही गई है।
शिव ने श्रम-कर्म में इसे भ्रमरी कहा — जब छोड़ा गया बाण सीधेपन के बिना (घूमता हुआ) जाता है।
तीन दोष-गतियाँ, तीन कारण: विकृत पंख (सूचीमुखा), डोरी-मुष्टि का बेमेल (मत्स्यपुच्छा), और सीधेपन का अभाव (भ्रमरी)। आज की धनुर्विद्या इन्हें "porpoising", "fishtailing" और "wobble" कहती है — निदान वही है: पंख, पकड़ और छूट सुधारो।
लक्ष्यस्खलन-गति — चूक की चार दिशाएँ
लक्ष्य से चूकने की गतियाँ — बायीं, दायीं, ऊपर की और नीचे की — ये चार गतियाँ बाण के लक्ष्य से चूकने के कारण कही गई हैं।
यदि बाण के पीछे गुण-मुष्टि (डोरी वाला हाथ) काँपे और धनुष-मुष्टि आगे झुके, तब गति बायीं ओर (चूक) होती है।
जिसकी पकड़ ढीली और सीधेपन से रहित हो, उसका बाण निःसन्देह दायीं ओर जाता है।
यदि धनुष-मुष्टि ऊपर और गुण-मुष्टि नीचे हो, तो छोड़ा बाण निःसन्देह लक्ष्य से ऊपर जाता है।
बाण छोड़ते समय यदि धनुष-मुष्टि नीचे और गुण-मुष्टि ऊपर हो, तब गति अधोगामी (नीचे की ओर) होती है।
चार चूकों का सटीक यान्त्रिक निदान — काँपता या झुकता हाथ बाण को उसी ओर ले जाता है। यही "follow-through analysis" है: बाण जहाँ चूका, दोष उसी दिशा के हाथ में खोजो। परम्परा दोष को रहस्य नहीं, यन्त्र-दोष मानती है।
शुद्ध-गति एवं श्रेष्ठ धन्वी
अब शुद्ध गति — जब लक्ष्य, बाण-अग्र और दृष्टि — इन तीनों का संयोग हो जाए, तब छोड़ा बाण निश्चय ही लक्ष्य से नहीं चूकता।
निर्दोष, ध्वनिरहित और दोनों मुष्टियों के सम-संतुलन से चिह्नित बाण दृढ़-भेद्य वस्तुओं को भी भेद देता है, इसमें संशय नहीं।
भली भाँति खींचा, तेज किया, सुशुद्ध और गाढ़ी मुष्टि से छोड़ा बाण मनुष्य और हाथी के शरीरों में (रुकता नहीं) पार निकल जाता है।
जिसके लिए बाण तृण-समान (सहज), धनुष ईंधन-समान (सुलभ, कभी न चुकने वाला), और मौर्वी (डोरी) प्राण-समान (अभिन्न) हो — वही धनुर्धरों में श्रेष्ठ है।
यह अध्याय की मुकुट-सूक्ति है। जब उपकरण देह का अंग बन जाए — बाण जैसे तिनका, धनुष जैसे अक्षय ईंधन, डोरी जैसे अपना प्राण — तब कला साधना बन जाती ह ै। कम्बु जब हाथ का ही विस्तार लगे, वही यह अवस्था है।
दृढ-भेद्य चतुष्क — चार कठिन लक्ष्य
अब दृढ़ चतुष्क — लोहा, चर्म, घट और मृत्पिण्ड — इन चारों को जो भेद दे, उसका बाण वज्र से भी नहीं फटता (अभेद्य हो जाता है)।
डेढ़ अङ्गुल के माप के लोहपत्र बनाए; उन्हें एक ही बाण से भेदकर मनुष्य दृढ़घाती (कठोर-भेदी) होता है।
जो मनुष्य चौबीस चर्म (परतों) को एक बाण से भेदे, उसका बाण गजेन्द्र के शरीर को भी भेदकर पार निकल जाता है।
जल में घूमता घड़ा और चक्र पर घूमता मृत्पिण्ड — जो इन घूमते (लक्ष्यों) को वेध दे, वह दृढ़-भेदी कहलाता है।
लोहे को काकतुण्ड नोक से, चर्म को आरामुख से, तथा मृत्पिण्ड और घट को सूचीमुख नोक से भेदे।
बाण को तोड़ना-मोड़ना, काष्ठ-छेदन, बिन्दु-वेध और गोलक-युग्म (जोड़ी गोले) का वेध — जो इन्हें जानता है वह विजयी होता है।
बाणच्छेद एवं काष्ठच्छेद
लक्ष्य-स्थान पर टँगे सुन्दर (लक्ष्य) को सामने से छेदे; अपनी मुष्टि को कुछ (तिरछा) करके द्विफलक (दोधारी) बाण से तिरछा (काटे)।
सामने आते बाण को — जो तिरछा न जाने — जो बुद्धिमान् अपने बाण से काट दे, वह बाणच्छेदी कहलाता है।
आते हुए बाण को बाण से काटना — यह सर्वोच्च प्रतिक्रिया-कौशल है, जिसका जीवित रूप जोड़ी-अभ्यास (Jodi sparring) में है: आते प्रहार को अपने कम्बु से बीच में ही काट देना। द्रव्य बदला है, कौशल वही।
अब काष्ठ-छेदन — काठ पर घोड़े का बाल बाँधकर उसमें कौड़ी लटकाए; हाथ से घुमाई जाती उस (कौड़ी) को जो वेध दे, वही (सच्चा) धनुर्धर है।
लक्ष्य-स्थान पर गोपुच्छ जैसा गीला (हरा) काठ रखे; जो उसे क्षुरप्र नोक से काट दे, वह काष्ठच्छेदी होता है।
लक्ष्य पर बन्धूक के फूल जैसा उजला बिन्दु रखे; जो उस बिन्दु को वेध दे, वह चित्रयोधा (विचित्र-कौशली) कहलाता है।
द्रुत युग्म-वेध, धावल्-लक्ष्य एवं चलती-दिशा
काठ के जोड़ी-गोले को शीघ्रता से दूर-ऊपर उछाले; (एक बाण से आगे वाले को,) और अभी न पहुँचे दूसरे को पीछे से गोपुच्छ-मुख बाण से (वेधे) —
जो शीघ्रसन्धान के योग से बाण-युग्म द्वारा (दोनों गोलों को) वेध दे, वह धनुर्धरों में श्रेष्ठ और सब राजाओं द्वारा पूजित होता है।
अब धावल्-लक्ष्य (दौड़ते हुए वेध) — रथ पर, हाथी पर, घोड़े पर और पैदल — दौड़ते हुए लक्ष्य-भेद का अभ्यास दृढ़तापूर्वक करना चाहिए।
अब विधि — जो लक्ष्य बायीं ओर से आकर दायीं ओर दौड़े, उसे बायें हाथ से धनुष खींचकर वेध दे।
वैसे ही दायीं ओर से आते (लक्ष्य) को धनुर्धर बायीं ओर से वेधे; आलीढ क्रम लेकर मनुष्य शीघ्रता से उसे मारे।
हे गाधिपुत्र, राजकुमार (विश्वामित्र)! वायु के बल को भी — जो बायें-दायें बहता हो — देखकर इस प्रकार लक्ष्य साध ले।
पीठ पीछे और दायीं ओर बहती वायु बल (विजय) की सूचक है; सामने और बायीं ओर बहती वायु योद्धाओं के भंग (पराजय) की सूचक है।
वायु-पाठ आज का "wind reading" है — तीरंदाज़ी की सूक्ष्मतम कला। बगल की वायु बाण को बहा ले जाती है; परम्परा इसे शकुन के साथ जोड़कर योद्धा को सावधान करती है। दौड़ते लक्ष्य को विपरीत दिशा से लेना ("lead the target") भी यहीं सिखाया गया है।
शब्दवेध — अंधकार में ध्वनि से वेध
अब शब्दवेध — लक्ष्य-स्थान पर दो हाथ की दूरी पर कांसे का पात्र रखे; जब उसे कंकड़ों से मारने पर ध्वनि उत्पन्न हो —
जहाँ से शब्द उठे, उसी स्थान का भली भाँति चिन्तन करे; कर्ण-इन्द्रिय और मन के योग से लक्ष्य को निश्चित करे।
शब्द उत्पन्न करने के लिए फिर कंकड़ से उसे मारे; शब्द के स्थान के अनुसार लक्ष्य को पुनः निश्चित करे।
फिर कुछ-कुछ दूरी बढ़ाकर, प्रतिदिन विधिपूर्वक, अंधकार में शब्दवेध के लिए लक्ष्य-अभ्यास करे।
फिर तीक्ष्ण-बुद्धि (साधक) सावधानी से बाण द्वारा उसे वेधे; यह दुष्कर कर्म किसी बिरले के भाग्य में ही सिद्ध होता है।
शब्दवेध — केवल कान और मन से, बिना देखे, वेध। यह इन्द्रिय-प्रत्याहार की पराकाष्ठा है। "किसी बिरले को ही सिद्ध होता है" — परम्परा स्वयं इसकी दुर्लभता स्वीकार कर ती है, पर मार्ग स्पष्ट देती है: कंकड़-ध्वनि, बढ़ती दूरी, नित्य अंधकार-अभ्यास।
प्रत्यागमन एवं वार्षिक साधना-चक्र
अब प्रत्यागमन (लौटता बाण) — हे राजेन्द्र! विशेष (खग) बाण को वायु के सामने छोड़े; (उसकी) रचना और नाल के कारण उसका (लौटकर) वापस आना होता है।
इस प्रकार श्रम-विधि तब तक करे जब तक सिद्धि न हो जाए; श्रम सिद्ध हो जाने पर वर्षा-ऋतु में हाथ में धनुष न ले।
पूर्व-अभ्यास और शास्त्रों को न भूलने के लिए प्रति वर्ष शरद्-ऋतु में दो मास श्रम करे।
सिद्धि के बाद भी हर वर्ष दो मास का पुनरभ्यास — क्योंकि कौशल बिना दोहराव के क्षीण होता है। यह "seasonal refresher" परम्परा का यथार्थ प्रशिक्षण- विवेक है; अखाड़े का वार्षिक चक्र भी शरद् से बँधा है।
शस्त्र-पूजा एवं अस्त्र-सिद्धि की भूमिका
आश्विन मास की नवमी, देवता के दिन — ईश्वरी चण्डी, गुरु, शस्त्रों और अश्वों की पूजा करे।
ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर कुमारियों को भोजन कराए; फिर बहुत वाद्य और मंगल-ध्वनियों के साथ देवी को (विधिवत्) बलि अर्पित करे।
फिर अस्त्रों की कर्म-सिद्धि के लिए वेद और आगम में कहे मन्त्रों को जप-होम की विधि से सिद्ध करे।
ब्राह्म, नारायण, शैव, ऐन्द्र, वायव्य, वारुण, आग्नेय तथा अन्य अस्त्रों को — जो गुरु ने दिए हों — सिद्ध करे।
अस्त्र-प्राप्त साधक को मन-वचन-कर्म से पवित्र रहना चाहिए; अस्त्र अपात्र और असमर्थ पुरुष को (उलटकर) जला देते हैं।
जो (अस्त्र का) प्रयोग और उपसंहार (वापस लेना) दोनों जानता है, वही (योग्य) धनुर्धर है; बुद्धिमान् साधारण कार्य में अस्त्रों का प्रयोग नहीं करता।
अस्त्र-प्रकरण का यह नैतिक द्वार सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है — प्रयोग जानना पर्याप्त नहीं, उपसंहार (रोक लेना) भ ी आना चाहिए। शक्ति और संयम साथ-साथ। पवित्रता के बिना अस्त्र स्वयं साधक को भस्म कर देता है — यह चेतावनी हर शक्तिशाली विद्या पर लागू है।
अस्त्र-प्रकरण — सप्त महास्त्र
अब अस्त्रों को कहता हूँ, सावधान होकर धारण करो — पहला ब्रह्मास्त्र, दूसरा ब्रह्मदण्ड।
तीसरा ब्रह्मशिर, चौथा पाशुपत, पाँचवाँ वायव्य और छठा आग्नेय (माना गया है)।
सातवाँ नारसिंह; इनके भेद अनन्त हैं। हे गाधि (विश्वामित्र)! इनके प्रयोग और संहार दोनों को यथार्थ रूप से सुनो।
वेद-मात्राओं से ही सारे अस्त्र गृहीत और दीप्त होते हैं; हे प्राज्ञ! उनका प्रयोग सुनो — पहले ब्रह्मास्त्र सुनो।
बुद्धिमान् 'द' से 'न' तक (के वर्णों वाली) सावित्री (गायत्री) को उलटकर जपे; पूर्ववत् जपकर विधिपूर्वक बाण अभिमन्त्रित करके शत्रुओं पर छोड़े — तब युद्ध करने आए (सब) सहसा नष्ट होते हैं। (यहाँ 'बाल-वृद्ध-गर्भस्थ' का उल्लेख अस्त्र की भीषण सामर्थ्य दर्शाने को है; अगला श्लोक तुरन्त संहार- विधि देता है।)
मेरे (शिव के) प्रसाद से वे सब नाश की ओर जाते हैं; संहार (अस्त्र को रोकने) की सिद्धि के लिए उसी 'द से न तक' के मन्त्र को यथावत् (सीधा) जपे।
ध्यान दें — प्रत्येक अस्त्र के साथ उसका संहार (उलटकर रोकना) भी दिया गया है। यह परम्परा की गहन नैतिकता है: जो छोड़ ना सिखाया, उसे रोकना भी उसी साँस में सिखाया। विध्वंस का ज्ञान संयम के ज्ञान के बिना नहीं दिया जाता।
ब्रह्मदण्ड कहता हूँ — पहले प्रणव (ॐ) उच्चारे, फिर गायत्री के पदों को उलटे क्रम में ('प्रचोदयात्' → 'धियो यो नः' → 'धीमहि' → 'भर्गो वरेण्यं' → 'सवितुः') जोड़े, और साथ में '(अमुक) शत्रु' का नाम लगाए।
फिर 'हन हन हुं फट्' का दो लाख (पुरश्चरण) जप करके, उसी प्रकार बाण को अभिमन्त्रित कर शत्रुओं पर स्पष्ट रूप से छोड़े।
यम के समान (बलवान्) शत्रु भी निश्चय नष्ट होते हैं; इसी को उलटकर जपने से संहार (उपसंहार) की सिद्धि होती है।
ब्रह्मशिर कहता हूँ — पहले प्रणव उच्चारे, फिर गायत्री के पदों को (व्यत्यस्त क्रम में) 'धियो यो नः प्रचोदयात्... भर्गो देवस्य धीमहि... तत्सवितुर्वरेण्यं' जोड़कर '(मेरे) शत्रु को हन हन' कहे।
'हुं फट्' का प्रयोग कर ब्रह्मशिर छोड़े; संयमी और पवित्र (साधक) तीन लाख पुरश्चरण करके (इसे सिद्ध करे)।
सब शत्रु — देव और असुर भी — नष्ट होते हैं; इसी को उलटकर विकर्षण (उपसंहार) में प्रयोग करे।
पाशुपत, वायव्य, आग्नेय एवं नारसिंह
अब पाशुपतास्त्र कहता हूँ, जिसके ज्ञानमात्र से सब शत्रु नष्ट होते हैं।
'द से न तक' सावित्री और प्रणव कहकर — 'श्लीं पशुं हुं फट्, (अमुक) शत्रुओं को हन हन हुं फट्' (मन्त्र जपे)।
पहले दो लाख जप करके फिर पाशुपत छोड़े; उसी को उलटकर संहार में लगाए। यह पाशुपतास्त्र सब शत्रुओं का निवारक है।
अब वायव्यास्त्र कहता हूँ, जिससे शत्रु नष्ट होते हैं — 'ॐ वायव्यया... (अमुक) शत्रु को हन हन हुं फट्' — पूर्ववत् दो नियुत (लाख) जप करे। (बीज-पद पाठभेद संभावित)
फिर संहार-रूप से उसका उपसंहार करे; वायव्य नामक यह अस्त्र देवताओं का भी निवारक है।
अब आग्नेयास्त्र कहता हूँ, जिससे शत्रु-भय जल जाता है। (इस श्लोक का बीज-मन्त्र-अंश हस्तलेख में अत्यन्त संक्षिप्त एवं अस्पष्ट है — पाठभेद संभावित; गुरुमुख से ही ग्राह्य।)
पूर्वोक्त पुरश्चरण करके (इसे) शस्त्र पर लगाए; इसी मन्त्र को उलटकर संहार में भी प्रयोग करे।
'ॐ वज्रनख-वज्रदंष्ट्र-आयुधाय महासिंहाय हुं फट्' — पहले एक लाख जप करके नारसिंह (अस्त्र) लगाए; तब सिंह-रूप बाण शत्रु-समूह पर टूट पड़ते हैं।
पूर्वोक्त प्रकार से (इसका) संहार भी कर ले। हे महाभाग, महामते! संक्षेप में तुम्हें (ये अस्त्र) कह दिए; इनके भेद तो शिव ने अनन्त बताए हैं।
इति अस्त्र-प्रकरणम्।
पूरा अस्त्र-प्रकरण एक ही अनुशासन दोहराता है — प्रयोग और संहार सदा य ुग्म में। कोई अस्त्र बिना अपने उपसंहार के नहीं सिखाया गया। यही वसिष्ठ- परम्परा का मर्म है: विद्या का चरम भी संयम से बँधा रहे। ये मन्त्र शास्त्र-संरक्षण-हेतु यहाँ अंकित हैं, प्रयोग-हेतु नहीं — इनका अधिकार गुरुदीक्षा से ही आता है।
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