धनुर्वेद संहिता
चर्चा
अध्याय

लक्ष्याभ्यास एवं अस्त्र — साधना का विज्ञान

दोनों हाथों का श्रम, प्राणायाम-सहित मोक्षण, बाण की शुद्ध और दोषपूर्ण गतियाँ, दृढ़-भेद्य चतुष्क, काष्ठछेद, धावल्-लक्ष्य और शब्दवेध; अन्त में अस्त्र-मन्त्र-प्रकरण।

दोनों हाथों का श्रम

अथ लक्ष्याभ्यासस्वरूपाणि — प्रथमं वामहस्तेन यः श्रमं कुरुते नरः । तस्य चापक्रियासिद्धिरचिरादेव जायते ॥ १ ॥
हिंदी अर्थ

अब लक्ष्याभ्यास के स्वरूप — जो मनुष्य पहले बायें हाथ से श्रम (अभ्यास) करता है, उसे धनुष-क्रिया की सिद्धि शीघ्र ही प्राप्त होती है।

टीका

पहले बायाँ हाथ — जो धनुष थामता है। थामने वाला हाथ सधे बिना खींचने वाला व्यर्थ है। यही कारण है कि अखाड़े में कम्बु पहले "धारण" सधता है, फिर "प्रहार"। नींव पहले, शिखर बाद में।

वामहस्ते सुसंसिद्धे पश्चाद्दक्षिणमारभेत् । उभाभ्याञ्च श्रमं कुर्यान्नाराचैश्च शरैस्तथा ॥ २ ॥
हिंदी अर्थ

बायाँ हाथ भली भाँति सध जाने पर फिर दायें का आरम्भ करे; फिर दोनों से नाराच और (साधारण) बाणों का श्रम करे।

वामेनैव श्रमं कुर्यात् सुसिद्धिर्दक्षिणे करे । विशाखेनासमेनैव रथी व्याये च कैशिके ॥ ३ ॥
हिंदी अर्थ

बायें (हाथ) से ही श्रम करे — तब दायें हाथ में सुसिद्धि आती है; रथी विशाख और असम स्थान में तथा कैशिक व्याय में (अभ्यास करे)।

दिशा, दूरी एवं लक्ष्य-मान

उदिते भास्करे लक्ष्यं पश्चिमायां निवेशयेत् । अपराह्णे च कर्तव्यं लक्ष्यं पूर्वदिगाश्रितम् ॥ ४ ॥
हिंदी अर्थ

सूर्य उदय होने पर लक्ष्य पश्चिम में रखे, और अपराह्न में लक्ष्य पूर्व दिशा में रखे।

टीका

सूर्य पीठ पीछे, आँखों में नहीं — यह सीधा व्यावहारिक विवेक है। प्रातः पश्चिम-लक्ष्य, संध्या पूर्व-लक्ष्य, ताकि प्रकाश साधक के साथ रहे, सामने चौंधियाए नहीं। खुले अखाड़े में कम्बु-अभ्यास पर भी यही लागू है।

उत्तरेण सदा कार्यमवश्यमवरोधिकम् । संग्रामेण विना कार्यं न लक्ष्यं दक्षिणामुखम् ॥ ५ ॥
हिंदी अर्थ

उत्तर की ओर अभ्यास सदा (शुभ, अतः) अवश्य करने योग्य; संग्राम के बिना दक्षिणमुख लक्ष्य नहीं करना चाहिए।

षष्टिधन्वन्तरे लक्ष्यं ज्येष्ठं लक्ष्यं प्रकीर्तितम् । चत्वारिंशत् मध्यमञ्च विंशतिश्च कनिष्ठकम् ॥ ६ ॥
हिंदी अर्थ

साठ धनुष की दूरी पर रखा लक्ष्य ज्येष्ठ (श्रेष्ठ) कहा गया है, चालीस पर मध्यम, और बीस पर कनिष्ठ।

चत्वारिंशञ्च त्रिंशञ्च षोडशैव भवेत्ततः ॥ ७ ॥
हिंदी अर्थ

(अन्य मान से) चालीस, तीस और सोलह (धनुष की दूरियाँ क्रमशः ज्येष्ठ-मध्यम- कनिष्ठ) होती हैं।

चतुः शतैश्च काण्डानां यो हि लक्ष्यं विसर्जयेत् । सूर्योदये चास्तमने स ज्येष्ठो धन्विनां भवेत् ॥ ८ ॥
हिंदी अर्थ

जो सूर्योदय से अस्त तक चार सौ बाणों से लक्ष्य-अभ्यास करे, वह धनुर्धरों में ज्येष्ठ होता है।

टीका

"दिनभर में चार सौ बाण" — यह मात्रा का शास्त्र है। सिद्धि गिनती से नहीं, पर गिनती के बिना भी नहीं। नित्य नियत आवृत्ति ही स्नायु में स्मृति बैठाती है — कम्बु के चक्रों की गिनती इसी परम्परा में है।

त्रिंशतैर्मध्यमश्चैव द्विशताभ्यां कनिष्ठकः । लक्ष्यं च पुरुषोन्मानं कुर्याच्चन्द्रकसंयुतम् ॥ ९ ॥
हिंदी अर्थ

तीन सौ बाणों से मध्यम, दो सौ से कनिष्ठ; लक्ष्य पुरुष के माप का, चन्द्रक (गोल चिह्न) सहित बनाए।

ऊर्द्धभेदी भवेज्ज्येष्ठो नाभिभेदी च मध्यमः । पादभेदी तु लक्ष्यस्य स कनिष्ठो मतो भृगो ॥ १० ॥
हिंदी अर्थ

हे भृगु (भार्गव)! जो लक्ष्य के ऊपरी भाग को भेदे वह ज्येष्ठ, नाभि (मध्य) को भेदे मध्यम, और पाद (नीचे) को भेदे वह कनिष्ठ माना गया है।

अनध्याय — जब अभ्यास न करे

अथानध्यायः — अष्टमी च ह्यमावास्या वर्जनीया चतुर्दशी । पूर्णिमार्द्धदिनं यावन्निषिद्धं सर्वकर्मसु ॥ ११ ॥
हिंदी अर्थ

अब अनध्याय — अष्टमी, अमावास्या, चतुर्दशी और पूर्णिमा तक का आधा दिन — ये सब कर्मों में निषिद्ध (विश्राम के) हैं।

टीका

परम्परा विश्राम को भी नियम बनाती है। शरीर को पुनर्निर्माण के दिन चाहिए; पर्व-तिथियों का यह अनध्याय आधुनिक "rest day" का ही शास्त्रीय रूप है।

अकाले गर्जिते देवे दुर्दिनं चाथवा भवेत् । पूर्वकालाहतं लक्ष्यमनध्याये प्रचक्षते ॥ १२ ॥
हिंदी अर्थ

असमय में मेघ गरजें या दुर्दिन (मेघाच्छन्न दिन) हो — तो पहले से चलता आ रहा लक्ष्य-अभ्यास भी अनध्याय (स्थगित) कहा जाता है।

अनुराधर्क्षमारभ्य षोडशर्क्षे दिवाकरः । यावच्चरति तं कालमकालं हि प्रचक्षते ॥ १३ ॥
हिंदी अर्थ

अनुराधा नक्षत्र से आरम्भ कर सोलहवें नक्षत्र तक जब सूर्य विचरता है, उस काल को अकाल (अनुपयुक्त) कहते हैं।

अरुणोदयः वेलायां वारिदो यदि गर्जति । तद्दिने स्यादनध्यायस्तमकालं प्रचक्षते ॥ १४ ॥
हिंदी अर्थ

अरुणोदय के समय यदि मेघ गरजे, तो उस दिन अनध्याय होता है — उसे अकाल कहते हैं।

श्रमं च कुर्वतस्तत्र भुजङ्गो दृश्यते यदि । अथवा भज्यते चापं यदैव श्रमकर्मणि ॥ १५ ॥
हिंदी अर्थ

अभ्यास करते समय यदि वहाँ साँप दिखे, अथवा श्रम-कर्म में धनुष टूट जाए —

त्रुट्यते वा गुणो यत्र प्रथमे बाणमोक्षणे । श्रमं तत्र न कुर्वीत शस्त्रे मतिमतां वरः ॥ १६ ॥
हिंदी अर्थ

अथवा प्रथम बाण-मोक्षण में ही डोरी टूट जाए — तो बुद्धिमानों में श्रेष्ठ उस दिन शस्त्र-श्रम न करे।

टीका

अपशकुन-संकेत को अन्धविश्वास न कहें — टूटती डोरी या भागती एकाग्रता प्रायः थके शरीर का संकेत होती है। परम्परा कहती है: जिस दिन उपकरण और मन साथ न दें, उस दिन रुक जाओ। यह चोट से बचने का विवेक है।

श्रमक्रिया — मोक्षण की सम्पूर्ण विधि

अथ श्रमक्रिया — क्रियाकलापान् वच्यामि श्रमसाध्यान् शुचिष्मताम् । येषां विज्ञानमात्रेण सिद्धिर्भवति नान्यथा ॥ १७ ॥
हिंदी अर्थ

अब श्रमक्रिया — पवित्र साधकों के लिए श्रम से सिद्ध होने वाली क्रियाओं का समूह कहता हूँ, जिनके ज्ञानमात्र से ही सिद्धि होती है, अन्यथा नहीं।

प्रथमं चापमारोप्य चुलिकां बन्धयेत्ततः । स्थानकं तु ततः कृत्वा बाणोपरि करं न्यसेत् ॥ १८ ॥
हिंदी अर्थ

पहले धनुष चढ़ाकर चूलिका (डोरी की गाँठ) बाँधे; फिर स्थान (स्टान्स) बनाकर बाण पर हाथ रखे।

तोलनं धनुषश्चैव कर्तव्यं वामपाणिना । आदानञ्च ततः कृत्वा सन्धानञ्च ततः परम् ॥ १९ ॥
हिंदी अर्थ

बायें हाथ से धनुष को तौले (सम्हाले); फिर बाण का आदान (उठाना), फिर सन्धान (जोड़ना) करे।

सकृदाकृष्टचापेन भूमिवेधं न कारयेत् । नमस्कुर्याच्च मां विघ्नराजं गुरुं धनुः शरान् ॥ २० ॥
हिंदी अर्थ

एक बार खींचे धनुष से भूमि-वेध न करे (व्यर्थ न छोड़े); विघ्नराज (गणेश), गुरु, धनुष और बाणों को नमस्कार करे।

याचितव्या गुरोराज्ञा बाणस्याकर्षणं प्रति । प्राणवायुं प्रयत्नेन प्राणेन सह पूरयेत् ॥ २१ ॥
हिंदी अर्थ

बाण के आकर्षण (खींचने) के लिए गुरु की आज्ञा माँगे; प्रयत्नपूर्वक प्राणवायु को प्राण के साथ भीतर भरे (पूरक)।

कुम्भकेन स्थिरं कृत्वा हुङ्कारेण विसर्जयेत् । इत्यभ्यासक्रिया कार्या धन्विता सिद्धिमिच्छता ॥ २२ ॥
हिंदी अर्थ

कुम्भक (श्वास रोककर) से स्थिर होकर हुँकार के साथ (बाण) छोड़े — सिद्धि चाहने वाले धनुर्धर को यही अभ्यास-क्रिया करनी चाहिए।

टीका

पूरक → कुम्भक → मोक्षण — यही धनुर्वेद का प्राण-मर्म है। श्वास भरकर, रोककर, स्थिर होकर छूट — बाण श्वास के विराम-बिन्दु पर छूटता है। यही सूत्र सिलम्बम् के प्रहार और कर्लाकट्टै के झूले पर भी लागू है: शक्ति श्वास की शान्ति से आती है, आवेश से नहीं।

षण्मासात् सिध्यते मुष्टिः शराः संवत्सरेण तु । नाराचास्तस्य सिध्यन्ति यस्य तुष्टो महेश्वरः ॥ २३ ॥
हिंदी अर्थ

छह मास में मुष्टि (पकड़) सधती है, एक वर्ष में (साधारण) बाण; और नाराच उसी को सधते हैं जिस पर महेश्वर प्रसन्न हों।

पुष्पवद्धारयेद्बाणं सर्पवत् पीडयेद्धनुः । धनवच्चिन्तयेल्लक्ष्यं यदीच्छेत् सिद्धिमात्मनः ॥ २४ ॥
हिंदी अर्थ

यदि अपनी सिद्धि चाहे तो बाण को फूल की तरह (कोमलता से) थामे, धनुष को साँप की तरह (कसकर) दबाए, और लक्ष्य को धन की तरह (एकाग्रता से) चिन्तन करे।

टीका

तीन उपमाएँ, तीन भाव — बाण पर कोमल पकड़ (तनाव नहीं), धनुष पर दृढ़ पकड़, और लक्ष्य पर लोभी की-सी एकाग्रता। यह श्लोक धनुर्वेद की सबसे सुन्दर अभ्यास-सूक्ति है; इसे स्मरण रखना ही आधा अभ्यास है।

क्रियामिच्छन्ति चाचार्या दूरमिच्छन्ति भार्गवाः । राजानो दृढमिच्छन्ति लक्ष्यमिच्छन्ति चेतरे ॥ २५ ॥
हिंदी अर्थ

आचार्य (सुन्दर) क्रिया चाहते हैं, भार्गव दूरी चाहते हैं, राजा दृढ़ता चाहते हैं, और शेष लोग बस लक्ष्य-भेद चाहते हैं।

जनानां रञ्जनं येन लक्ष्यपातात् प्रजायते । हीनेनापीषुणा तस्मात्प्रशस्तं लक्ष्यवेधनम् ॥ २६ ॥
हिंदी अर्थ

जिससे लक्ष्य-भेद द्वारा लोगों का रञ्जन (प्रसन्नता) हो — इसलिए साधारण बाण से भी किया गया लक्ष्यवेध प्रशस्त है।

लक्ष्यस्खलन-विधि — अचूक छूट का क्रम

अथ लक्ष्यस्खलनविधिः — विशाखस्थानकं हित्वा समसन्धानमाचरेत् । गोपुच्छमुख बाणेन सिंहकर्णेन मुष्टिना ॥ २७ ॥
हिंदी अर्थ

अब लक्ष्य-भेद की विधि — विशाख स्थान बनाकर सम-सन्धान करे; गोपुच्छ-मुख बाण और सिंहकर्ण मुष्टि से —

आकर्षेत् केशिकव्याये न शिखां चालयेत्ततः । पूर्वापरौ समं कार्यौ समांसौ निश्चलौ करौ ॥ २८ ॥
हिंदी अर्थ

कैशिक व्याय (केश-मूल तक) खींचे, पर शिखा को न हिलाए; दोनों हाथ आगे-पीछे समान, कन्धों-सहित निश्चल रखे।

चक्षुषी स्पन्दयेन्नैव दृष्टिं लक्ष्ये नियोजयेत् । मुष्टिनाच्छादितं लक्ष्यं शरस्याग्रे नियोजयेत् ॥ २९ ॥
हिंदी अर्थ

आँखों को न झपकाए, दृष्टि लक्ष्य पर टिकाए; मुष्टि से ढके लक्ष्य को बाण के अग्र (नोक) पर संयोजित करे।

मनो दृष्टिगतं कृत्वा ततः काण्डं विसर्जयेत् । स्खलत्येव कदाचिन्न लक्ष्ये योद्धा जितश्रमः ॥ ३० ॥
हिंदी अर्थ

मन को दृष्टि के साथ एक करके फिर बाण छोड़े; जिसने श्रम को जीत लिया वह योद्धा लक्ष्य से कभी नहीं चूकता।

टीका

स्थान → खिंचाव → स्थिर शिखा → अपलक दृष्टि → नोक और लक्ष्य का संयोग → मन-दृष्टि का एकत्व → छूट। यह अचूकता की पूरी शृंखला है — आधुनिक "aim–anchor–focus–release" का सम्पूर्ण पूर्वज। "मनो दृष्टिगतं कृत्वा" ही वह क्षण है जहाँ धनुर्वेद ध्यान बन जाता है।

शीघ्रसन्धान · दूरपात · दृढभेद

अथ शीघ्रसन्धानम् — आदानं चैव तूणीरात् सन्धानं कर्षणं तथा । क्षेपणं च त्वरायुक्तं बाणस्य कुरुते तु यः । नित्याभ्यासवशात्तस्य शीघ्रसन्धानता भवेत् ॥ ३१ ॥
हिंदी अर्थ

अब शीघ्रसन्धान — जो तूणीर से बाण का आदान, सन्धान, कर्षण और क्षेपण त्वरा (शीघ्रता) से करता है, नित्य अभ्यास से उसे शीघ्रसन्धान (तीव्र बाण-प्रवाह) सिद्ध होता है।

अथ दूरपातित्वम् — पताका-मुष्टि और आगे-भारी (स्त्री-चिह्न) बाण से दूर प्रहार सधता है।

दृढभेदनम् — प्रत्यालीढे कृते स्थाने ह्यधः सन्धानमाचरेत् । दर्दूरस्थानमास्थाय ह्यूर्द्ध्वधारणमाचरेत् ॥ ३२ ॥
हिंदी अर्थ

दृढ़-भेदन — प्रत्यालीढ स्थान में अधः-सन्धान करे; दर्दुर स्थान लेकर ऊर्ध्व-धारण करे।

स्कन्ध व्यायेन वज्रस्य मुष्ट्या चापमार्गेण च । अत्यन्त सौष्ठवं बाह्वोर्जायते दृढभेदिता ॥ ३३ ॥
हिंदी अर्थ

स्कन्ध-व्याय, वज्रमुष्टि और चाप-मार्ग से भुजाओं में अत्यन्त सौष्ठव (दक्षता) आती है, जिससे दृढ़-भेदन-सामर्थ्य उत्पन्न होता है।

हीन-गति — बाण की दोषपूर्ण उड़ान

हीनगतिसमूहः — सूचीमुखा मीनपुच्छा भ्रमरी च तृतीयका । शराणां गतयस्तिस्रः कथिता बुधैर्बुधैः ॥ ३४ ॥
हिंदी अर्थ

हीन (दोषपूर्ण) गतियों का समूह — सूचीमुखा, मीनपुच्छा और तीसरी भ्रमरी — विद्वानों ने बाणों की ये तीन (दोषपूर्ण) गतियाँ बताई हैं।

सूचीमुखा गतिस्तस्य सायकस्य प्रजायते । पत्रं विलोकितं यस्य ह्यथवा हीनपत्रकम् ॥ ३५ ॥
हिंदी अर्थ

जिस बाण के पंख टेढ़े (विकृत) हों अथवा कम (हीन) हों, उसकी गति सूचीमुखा (सूई-मुख की तरह डगमगाती) होती है।

कर्कशस्तन्तु चापेन यः कृष्टो हीनमुष्टिना । मत्स्यपुच्छा गतिस्तस्य सायकस्य प्रकीर्तिता ॥ ३६ ॥
हिंदी अर्थ

कठोर डोरी वाले धनुष से जो बाण हीन (ढीली) मुष्टि से खींचा जाए, उसकी गति मत्स्यपुच्छा (मछली की पूँछ-सी लहराती) कही गई है।

भ्रमरी कथिता ह्येषा शिवेन श्रमकर्मणि । ऋजुत्वेन विना याति क्षिप्यमाणस्तु सायकः ॥ ३७ ॥
हिंदी अर्थ

शिव ने श्रम-कर्म में इसे भ्रमरी कहा — जब छोड़ा गया बाण सीधेपन के बिना (घूमता हुआ) जाता है।

टीका

तीन दोष-गतियाँ, तीन कारण: विकृत पंख (सूचीमुखा), डोरी-मुष्टि का बेमेल (मत्स्यपुच्छा), और सीधेपन का अभाव (भ्रमरी)। आज की धनुर्विद्या इन्हें "porpoising", "fishtailing" और "wobble" कहती है — निदान वही है: पंख, पकड़ और छूट सुधारो।

लक्ष्यस्खलन-गति — चूक की चार दिशाएँ

बाणलक्ष्यस्खलनगतिसमूहः — वामगा दक्षिणा चैव ऊर्द्ध्वगाधोगमा तथा । चतस्रो गतयः प्रोक्ता बाणस्खलनहेतवः ॥ ३८ ॥
हिंदी अर्थ

लक्ष्य से चूकने की गतियाँ — बायीं, दायीं, ऊपर की और नीचे की — ये चार गतियाँ बाण के लक्ष्य से चूकने के कारण कही गई हैं।

कम्पते गुणमुष्टिस्तु मार्गणस्य तु पृष्ठतः । सन्मुखोऽस्याद्धनुर्मुष्टिस्तदा वामे गतिर्भवेत् ॥ ३९ ॥
हिंदी अर्थ

यदि बाण के पीछे गुण-मुष्टि (डोरी वाला हाथ) काँपे और धनुष-मुष्टि आगे झुके, तब गति बायीं ओर (चूक) होती है।

ग्रहणं शिथिलं यस्य ऋजुत्वेन विवर्जितम् । पार्श्नन्तु दक्षिणं याति सायकस्य न संशयः ॥ ४० ॥
हिंदी अर्थ

जिसकी पकड़ ढीली और सीधेपन से रहित हो, उसका बाण निःसन्देह दायीं ओर जाता है।

ऊर्द्ध्वे भवेच्चापमुष्टिर्गुणमुष्टिरधो भवेत् । समुक्तो मार्गणो लक्ष्यादूर्द्ध्वे याति न संशयः ॥ ४१ ॥
हिंदी अर्थ

यदि धनुष-मुष्टि ऊपर और गुण-मुष्टि नीचे हो, तो छोड़ा बाण निःसन्देह लक्ष्य से ऊपर जाता है।

मोक्षणे चैव बाणस्य चापमुष्टिरधो भवेत् । गुणमुष्टिर्भवेदूर्द्ध्वे तदाधोगामिनी गतिः ॥ ४२ ॥
हिंदी अर्थ

बाण छोड़ते समय यदि धनुष-मुष्टि नीचे और गुण-मुष्टि ऊपर हो, तब गति अधोगामी (नीचे की ओर) होती है।

टीका

चार चूकों का सटीक यान्त्रिक निदान — काँपता या झुकता हाथ बाण को उसी ओर ले जाता है। यही "follow-through analysis" है: बाण जहाँ चूका, दोष उसी दिशा के हाथ में खोजो। परम्परा दोष को रहस्य नहीं, यन्त्र-दोष मानती है।

शुद्ध-गति एवं श्रेष्ठ धन्वी

अथ शुद्धगतयः — लक्ष्यबाणाग्रदृष्टीनां सङ्गतिस्तु यदा भवेत् । तदानीं मुक्तो बाणो लक्ष्यान्न स्खलति ध्रुवम् ॥ ४३ ॥
हिंदी अर्थ

अब शुद्ध गति — जब लक्ष्य, बाण-अग्र और दृष्टि — इन तीनों का संयोग हो जाए, तब छोड़ा बाण निश्चय ही लक्ष्य से नहीं चूकता।

निर्दोषः शब्दहीनश्च सममुष्टिद्वयोऽङ्कितः । भिनक्ति दृढभेद्यानि सायको नास्ति संशयः ॥ ४४ ॥
हिंदी अर्थ

निर्दोष, ध्वनिरहित और दोनों मुष्टियों के सम-संतुलन से चिह्नित बाण दृढ़-भेद्य वस्तुओं को भी भेद देता है, इसमें संशय नहीं।

स्वाकृष्टस्तेजितोयश्च सुशुद्धो गाढमुष्टितः । नरनागाश्च कायेषु न तिष्ठति स मार्गणः ॥ ४५ ॥
हिंदी अर्थ

भली भाँति खींचा, तेज किया, सुशुद्ध और गाढ़ी मुष्टि से छोड़ा बाण मनुष्य और हाथी के शरीरों में (रुकता नहीं) पार निकल जाता है।

यस्य तृणसमा बाणाः यस्येन्धनसमं धनुः । यस्य प्राणसमा मौर्वी स धन्वी धन्विनां वरः ॥ ४६ ॥
हिंदी अर्थ

जिसके लिए बाण तृण-समान (सहज), धनुष ईंधन-समान (सुलभ, कभी न चुकने वाला), और मौर्वी (डोरी) प्राण-समान (अभिन्न) हो — वही धनुर्धरों में श्रेष्ठ है।

टीका

यह अध्याय की मुकुट-सूक्ति है। जब उपकरण देह का अंग बन जाए — बाण जैसे तिनका, धनुष जैसे अक्षय ईंधन, डोरी जैसे अपना प्राण — तब कला साधना बन जाती है। कम्बु जब हाथ का ही विस्तार लगे, वही यह अवस्था है।

दृढ-भेद्य चतुष्क — चार कठिन लक्ष्य

अथ दृढचतुष्कम् — अयश्चर्म घटश्चैव मृत्पिण्डश्च चतुष्टयम् । यो भिनत्ति न तस्येषुर्वज्रेणापि विदीर्यते ॥ ४७ ॥
हिंदी अर्थ

अब दृढ़ चतुष्क — लोहा, चर्म, घट और मृत्पिण्ड — इन चारों को जो भेद दे, उसका बाण वज्र से भी नहीं फटता (अभेद्य हो जाता है)।

सार्द्धाङ्गुलप्रमाणेन लोहपत्राणि कारयेत् । तानि भित्त्वैकबाणेन दृढघाती भवेन्नरः ॥ ४८ ॥
हिंदी अर्थ

डेढ़ अङ्गुल के माप के लोहपत्र बनाए; उन्हें एक ही बाण से भेदकर मनुष्य दृढ़घाती (कठोर-भेदी) होता है।

चतुर्विंशति चर्माणि यो भिनत्तीषुणा नरः । तस्य बाणो गजेन्द्रस्य कायं निर्भिद्य गच्छति ॥ ४९ ॥
हिंदी अर्थ

जो मनुष्य चौबीस चर्म (परतों) को एक बाण से भेदे, उसका बाण गजेन्द्र के शरीर को भी भेदकर पार निकल जाता है।

भ्राम्यन् जले घटो वेध्यश्चक्रे मृत्पिण्डकं तथा । भ्रमन्ति वेधयेद्यो हि दृढ भेदी स उच्यते ॥ ५० ॥
हिंदी अर्थ

जल में घूमता घड़ा और चक्र पर घूमता मृत्पिण्ड — जो इन घूमते (लक्ष्यों) को वेध दे, वह दृढ़-भेदी कहलाता है।

अयस्तु काकतुण्डेन चर्मचारामुखेन हि । मृत्पिण्डं घटं चैव विध्येत् सूचीमुखेन वै ॥ ५१ ॥
हिंदी अर्थ

लोहे को काकतुण्ड नोक से, चर्म को आरामुख से, तथा मृत्पिण्ड और घट को सूचीमुख नोक से भेदे।

बाणभङ्करावर्तः काष्ठच्छेदनमेव च । बिन्दुकं गोलकयुग्मं यो वेत्ति स जयी भवेत् ॥ ५२ ॥
हिंदी अर्थ

बाण को तोड़ना-मोड़ना, काष्ठ-छेदन, बिन्दु-वेध और गोलक-युग्म (जोड़ी गोले) का वेध — जो इन्हें जानता है वह विजयी होता है।

बाणच्छेद एवं काष्ठच्छेद

लक्ष्य स्थाने धृतं कान्तं सम्मुखं छेदयेत्ततः । किञ्चिद् मुष्टिं विधाय स्वां तिर्यग् द्विफलकेषुणा ॥ ५३ ॥
हिंदी अर्थ

लक्ष्य-स्थान पर टँगे सुन्दर (लक्ष्य) को सामने से छेदे; अपनी मुष्टि को कुछ (तिरछा) करके द्विफलक (दोधारी) बाण से तिरछा (काटे)।

सम्मुखं बाणमायान्तं तिर्यग् बाणं न सञ्चरेत् । प्राज्ञः शरेण यश्छिन्द्याद्बाणच्छेदी स उच्यते ॥ ५४ ॥
हिंदी अर्थ

सामने आते बाण को — जो तिरछा न जाने — जो बुद्धिमान् अपने बाण से काट दे, वह बाणच्छेदी कहलाता है।

टीका

आते हुए बाण को बाण से काटना — यह सर्वोच्च प्रतिक्रिया-कौशल है, जिसका जीवित रूप जोड़ी-अभ्यास (Jodi sparring) में है: आते प्रहार को अपने कम्बु से बीच में ही काट देना। द्रव्य बदला है, कौशल वही।

अथ काष्ठछेदनम् — काष्ठेऽश्वकेशं संयम्य तत्र बध्वा वराटिकाम् । हस्तेन भ्राम्यमाणां च यो हन्ति सो धनुर्धरः ॥ ५५ ॥
हिंदी अर्थ

अब काष्ठ-छेदन — काठ पर घोड़े का बाल बाँधकर उसमें कौड़ी लटकाए; हाथ से घुमाई जाती उस (कौड़ी) को जो वेध दे, वही (सच्चा) धनुर्धर है।

लक्ष्य स्थानेन्यसेत् काष्ठं सार्द्रं गोपुच्छसन्निभम् । यश्छिन्द्यात्तत् क्षुरप्रेण काष्ठच्छेदी स जायते ॥ ५६ ॥
हिंदी अर्थ

लक्ष्य-स्थान पर गोपुच्छ जैसा गीला (हरा) काठ रखे; जो उसे क्षुरप्र नोक से काट दे, वह काष्ठच्छेदी होता है।

लक्ष्ये बिन्दुं न्यसेच्छुभ्रं शुभबन्धूककपुष्पवत् । हन्ति तं बिन्दुकं यस्तु चित्रयोधा स उच्यते ॥ ५७ ॥
हिंदी अर्थ

लक्ष्य पर बन्धूक के फूल जैसा उजला बिन्दु रखे; जो उस बिन्दु को वेध दे, वह चित्रयोधा (विचित्र-कौशली) कहलाता है।

द्रुत युग्म-वेध, धावल्-लक्ष्य एवं चलती-दिशा

काष्ठगोलयुगं क्षिप्रं दूरमूर्द्ध्वे पुरा स्थितैः । असम्प्राप्तं शरं पृष्ठे तद् गोपुच्छमुखेन हि ॥ ५८ ॥
हिंदी अर्थ

काठ के जोड़ी-गोले को शीघ्रता से दूर-ऊपर उछाले; (एक बाण से आगे वाले को,) और अभी न पहुँचे दूसरे को पीछे से गोपुच्छ-मुख बाण से (वेधे) —

यो हन्ति शरयुग्मेन शीघ्रसन्धान योगतः । स स्याद्धनुर्भृतां श्रेष्ठः पूजितः सर्वपार्थिवैः ॥ ५९ ॥
हिंदी अर्थ

जो शीघ्रसन्धान के योग से बाण-युग्म द्वारा (दोनों गोलों को) वेध दे, वह धनुर्धरों में श्रेष्ठ और सब राजाओं द्वारा पूजित होता है।

अथ धावल्लक्ष्यम् — रथस्थेन गजस्थेन हयस्थेन च पत्तिना । धावता वै श्रमः कार्यो लक्ष्यं हन्तुं सुनिश्चितम् ॥ ६० ॥
हिंदी अर्थ

अब धावल्-लक्ष्य (दौड़ते हुए वेध) — रथ पर, हाथी पर, घोड़े पर और पैदल — दौड़ते हुए लक्ष्य-भेद का अभ्यास दृढ़तापूर्वक करना चाहिए।

अथ विधिः — वामादायाति यल्लक्ष्यं दक्षिणं हि प्रधावति । तच्छिन्द्याच्चापमाकृष्य सव्येनैव च पाणिना ॥ ६१ ॥
हिंदी अर्थ

अब विधि — जो लक्ष्य बायीं ओर से आकर दायीं ओर दौड़े, उसे बायें हाथ से धनुष खींचकर वेध दे।

तथैव दक्षिणायान्तं विध्येद् वामाद् धनुर्धरः । आलीढक्रममारोप्य त्वरा हन्याच्च तं नरः ॥ ६२ ॥
हिंदी अर्थ

वैसे ही दायीं ओर से आते (लक्ष्य) को धनुर्धर बायीं ओर से वेधे; आलीढ क्रम लेकर मनुष्य शीघ्रता से उसे मारे।

वायोरपि बलं दृष्ट्वा वामदक्षिणवाहतः । लक्ष्यं संसाधयेदेवं गाधिपुत्र नृपात्मज ॥ ६३ ॥
हिंदी अर्थ

हे गाधिपुत्र, राजकुमार (विश्वामित्र)! वायु के बल को भी — जो बायें-दायें बहता हो — देखकर इस प्रकार लक्ष्य साध ले।

वायुः पृष्ठे दक्षिणे च वहन् सूचयते बलम् । सन्मुखीनश्च वामश्च भटानां भङ्गसूचकः ॥ ६४ ॥
हिंदी अर्थ

पीठ पीछे और दायीं ओर बहती वायु बल (विजय) की सूचक है; सामने और बायीं ओर बहती वायु योद्धाओं के भंग (पराजय) की सूचक है।

टीका

वायु-पाठ आज का "wind reading" है — तीरंदाज़ी की सूक्ष्मतम कला। बगल की वायु बाण को बहा ले जाती है; परम्परा इसे शकुन के साथ जोड़कर योद्धा को सावधान करती है। दौड़ते लक्ष्य को विपरीत दिशा से लेना ("lead the target") भी यहीं सिखाया गया है।

शब्दवेध — अंधकार में ध्वनि से वेध

अथ शब्दवेधित्वम् — लक्ष्यस्थाने न्यसेत् कांस्यपात्रं हस्तद्वयान्तरे । ताडयेच्छर्कराभिस्तच्छब्दः सञ्जायते यदा ॥ ६५ ॥
हिंदी अर्थ

अब शब्दवेध — लक्ष्य-स्थान पर दो हाथ की दूरी पर कांसे का पात्र रखे; जब उसे कंकड़ों से मारने पर ध्वनि उत्पन्न हो —

यत्र चैवोद्यते शब्दस्तं सम्यक् तत्र चिन्तयेत् । कर्णेन्द्रियमनोयोगाल्लक्ष्यं निश्चयतां नयेत् ॥ ६६ ॥
हिंदी अर्थ

जहाँ से शब्द उठे, उसी स्थान का भली भाँति चिन्तन करे; कर्ण-इन्द्रिय और मन के योग से लक्ष्य को निश्चित करे।

पुनः शर्करया तञ्च ताडयेच्छब्दहेतवे । पुनर्निश्चयतां नेयं शब्दस्थानानुसारतः ॥ ६७ ॥
हिंदी अर्थ

शब्द उत्पन्न करने के लिए फिर कंकड़ से उसे मारे; शब्द के स्थान के अनुसार लक्ष्य को पुनः निश्चित करे।

ततः किञ्चित् कृतं दूरं नित्यं नित्यं विधानतः । लक्ष्यं समभ्यसेद् ध्वान्ते शब्दवेधनहेतवे ॥ ६८ ॥
हिंदी अर्थ

फिर कुछ-कुछ दूरी बढ़ाकर, प्रतिदिन विधिपूर्वक, अंधकार में शब्दवेध के लिए लक्ष्य-अभ्यास करे।

ततो बाणेन हन्यात्तदवधानेन तीक्ष्णधीः । एतच्च दुष्करं कर्म भाग्ये कस्यापि सिद्ध्यति ॥ ६९ ॥
हिंदी अर्थ

फिर तीक्ष्ण-बुद्धि (साधक) सावधानी से बाण द्वारा उसे वेधे; यह दुष्कर कर्म किसी बिरले के भाग्य में ही सिद्ध होता है।

टीका

शब्दवेध — केवल कान और मन से, बिना देखे, वेध। यह इन्द्रिय-प्रत्याहार की पराकाष्ठा है। "किसी बिरले को ही सिद्ध होता है" — परम्परा स्वयं इसकी दुर्लभता स्वीकार करती है, पर मार्ग स्पष्ट देती है: कंकड़-ध्वनि, बढ़ती दूरी, नित्य अंधकार-अभ्यास।

प्रत्यागमन एवं वार्षिक साधना-चक्र

अथ प्रत्यागमनम् — खगं बाणं तु राजेन्द्र प्रक्षिपेद् वायुसन्मुखे । रञ्जकस्य च नालाभिरतो ह्यागमनं भवेत् ॥ ७० ॥
हिंदी अर्थ

अब प्रत्यागमन (लौटता बाण) — हे राजेन्द्र! विशेष (खग) बाण को वायु के सामने छोड़े; (उसकी) रचना और नाल के कारण उसका (लौटकर) वापस आना होता है।

एवं श्रमविधिं कुर्याद्यावद् सिद्धिः प्रजायते । श्रमे सिद्धे च वर्षासु नैव ग्राह्यं धनुष्करे ॥ ७१ ॥
हिंदी अर्थ

इस प्रकार श्रम-विधि तब तक करे जब तक सिद्धि न हो जाए; श्रम सिद्ध हो जाने पर वर्षा-ऋतु में हाथ में धनुष न ले।

पूर्वाभ्यासस्य शास्त्राणामविस्मरणहेतवे । मासद्वयं श्रमं कुर्यात् प्रतिवर्षं शरद्ऋतौ ॥ ७२ ॥
हिंदी अर्थ

पूर्व-अभ्यास और शास्त्रों को न भूलने के लिए प्रति वर्ष शरद्-ऋतु में दो मास श्रम करे।

टीका

सिद्धि के बाद भी हर वर्ष दो मास का पुनरभ्यास — क्योंकि कौशल बिना दोहराव के क्षीण होता है। यह "seasonal refresher" परम्परा का यथार्थ प्रशिक्षण- विवेक है; अखाड़े का वार्षिक चक्र भी शरद् से बँधा है।

शस्त्र-पूजा एवं अस्त्र-सिद्धि की भूमिका

जाते वाश्च युजि मासे नवमी देवतादिने । पूजयेदीश्वरीं चण्डीं गुरुं शास्त्राणि वाजिनः ॥ ७३ ॥
हिंदी अर्थ

आश्विन मास की नवमी, देवता के दिन — ईश्वरी चण्डी, गुरु, शस्त्रों और अश्वों की पूजा करे।

विप्रेभ्यो दक्षिणां दत्वा कुमारीभोजयेत्ततः । देव्यै पशुबलिं दद्याद् भूरिवादित्रमङ्गलैः ॥ ७४ ॥
हिंदी अर्थ

ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर कुमारियों को भोजन कराए; फिर बहुत वाद्य और मंगल-ध्वनियों के साथ देवी को (विधिवत्) बलि अर्पित करे।

ततस्तु साधयेन्मन्त्रान् वेदोक्तान् आगमोदितान् । अस्त्राणां कर्मसिद्ध्यर्थं जपहोम विधानतः ॥ ७५ ॥
हिंदी अर्थ

फिर अस्त्रों की कर्म-सिद्धि के लिए वेद और आगम में कहे मन्त्रों को जप-होम की विधि से सिद्ध करे।

ब्राह्मं नारायणं शैवमैन्द्रं वायव्यवारुणे । आग्नेयं चापरास्त्राणि गुरुदत्तानि साधयेत् ॥ ७६ ॥
हिंदी अर्थ

ब्राह्म, नारायण, शैव, ऐन्द्र, वायव्य, वारुण, आग्नेय तथा अन्य अस्त्रों को — जो गुरु ने दिए हों — सिद्ध करे।

मनोवाक्कर्मभिर्भाव्यं लब्धास्त्रेण शुचिष्मता । अपात्रमसमर्थञ्च दहन्त्यस्त्राणि पूरुषम् ॥ ७७ ॥
हिंदी अर्थ

अस्त्र-प्राप्त साधक को मन-वचन-कर्म से पवित्र रहना चाहिए; अस्त्र अपात्र और असमर्थ पुरुष को (उलटकर) जला देते हैं।

प्रयोगं चोपसंहारं यो वेत्ति स धनुर्धरः । सामान्ये कर्मणि प्राज्ञो नैवास्त्राणि प्रयोजयेत् ॥ ७८ ॥
हिंदी अर्थ

जो (अस्त्र का) प्रयोग और उपसंहार (वापस लेना) दोनों जानता है, वही (योग्य) धनुर्धर है; बुद्धिमान् साधारण कार्य में अस्त्रों का प्रयोग नहीं करता।

टीका

अस्त्र-प्रकरण का यह नैतिक द्वार सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है — प्रयोग जानना पर्याप्त नहीं, उपसंहार (रोक लेना) भी आना चाहिए। शक्ति और संयम साथ-साथ। पवित्रता के बिना अस्त्र स्वयं साधक को भस्म कर देता है — यह चेतावनी हर शक्तिशाली विद्या पर लागू है।

अस्त्र-प्रकरण — सप्त महास्त्र

अथास्त्राणि प्रवच्यामि सावधानोऽवधारय । ब्रह्मास्त्रं प्रथमं प्रोक्तं द्वितीयं ब्रह्मदण्डकम् ॥ ७९ ॥
हिंदी अर्थ

अब अस्त्रों को कहता हूँ, सावधान होकर धारण करो — पहला ब्रह्मास्त्र, दूसरा ब्रह्मदण्ड।

ब्रह्मशिरस्तृतीयञ्च तुर्यं पाशुपतं मतम् । वायव्यं पञ्चमं प्रोक्तमाग्नेयं षष्ठकं स्मृतम् ॥ ८० ॥
हिंदी अर्थ

तीसरा ब्रह्मशिर, चौथा पाशुपत, पाँचवाँ वायव्य और छठा आग्नेय (माना गया है)।

नरसिंहं सप्तमञ्च तेषां भेदाह्यनन्तकाः । ससंहारं सविज्ञेयं शृणु गाधे यथातथम् ॥ ८१ ॥
हिंदी अर्थ

सातवाँ नारसिंह; इनके भेद अनन्त हैं। हे गाधि (विश्वामित्र)! इनके प्रयोग और संहार दोनों को यथार्थ रूप से सुनो।

वेदमात्रा सर्वशास्त्रं गृह्यते दीप्यतेऽथवा । तत्प्रयोगं शृणु प्राज्ञ ब्रह्मास्त्रं प्रथमं शृणु ॥ ८२ ॥
हिंदी अर्थ

वेद-मात्राओं से ही सारे अस्त्र गृहीत और दीप्त होते हैं; हे प्राज्ञ! उनका प्रयोग सुनो — पहले ब्रह्मास्त्र सुनो।

दादिदान्ताञ्च सावित्रीं विपरीतां जपेत् सुधीः । जप्त्वा पूर्वां निखर्वञ्च त्वभिमन्त्र्य विधिवच्छरम् । क्षिपेच्छत्रुषु सहसा नश्यन्ति सर्वजातयः । बाला वृद्धाश्च गर्भस्था ये च योद्धुं समागताः ॥ ८३ ॥
हिंदी अर्थ

बुद्धिमान् 'द' से 'न' तक (के वर्णों वाली) सावित्री (गायत्री) को उलटकर जपे; पूर्ववत् जपकर विधिपूर्वक बाण अभिमन्त्रित करके शत्रुओं पर छोड़े — तब युद्ध करने आए (सब) सहसा नष्ट होते हैं। (यहाँ 'बाल-वृद्ध-गर्भस्थ' का उल्लेख अस्त्र की भीषण सामर्थ्य दर्शाने को है; अगला श्लोक तुरन्त संहार- विधि देता है।)

सर्वे ते नाशभायन्ति मम चैव प्रसादतः । यथातथं दादिदान्तं जपेत् संहारसिद्धये ॥ ८४ ॥
हिंदी अर्थ

मेरे (शिव के) प्रसाद से वे सब नाश की ओर जाते हैं; संहार (अस्त्र को रोकने) की सिद्धि के लिए उसी 'द से न तक' के मन्त्र को यथावत् (सीधा) जपे।

टीका

ध्यान दें — प्रत्येक अस्त्र के साथ उसका संहार (उलटकर रोकना) भी दिया गया है। यह परम्परा की गहन नैतिकता है: जो छोड़ना सिखाया, उसे रोकना भी उसी साँस में सिखाया। विध्वंस का ज्ञान संयम के ज्ञान के बिना नहीं दिया जाता।

ब्रह्मदण्डं प्रवच्यामि प्रणवं पूर्वमुच्चरेत् । ततः प्रचोदयाज्ज्ञेयं ततो नो यो धियः क्रमात् । ततो धीमहि देवस्य ततो भर्गो वरेण्यम् । सवितुस्तञ्च योक्तव्यममुकशत्रुं तथैव च ॥ ८५ ॥
हिंदी अर्थ

ब्रह्मदण्ड कहता हूँ — पहले प्रणव (ॐ) उच्चारे, फिर गायत्री के पदों को उलटे क्रम में ('प्रचोदयात्' → 'धियो यो नः' → 'धीमहि' → 'भर्गो वरेण्यं' → 'सवितुः') जोड़े, और साथ में '(अमुक) शत्रु' का नाम लगाए।

ततो हन हन हुं फट् जप्त्वा पूर्वं द्विलक्ष्यकम् । अभिमन्त्र्य शरं तद्वत् प्रक्षिपेच्छत्रुषु स्फुटम् ॥ ८६ ॥
हिंदी अर्थ

फिर 'हन हन हुं फट्' का दो लाख (पुरश्चरण) जप करके, उसी प्रकार बाण को अभिमन्त्रित कर शत्रुओं पर स्पष्ट रूप से छोड़े।

नश्यन्ति शत्रवः सर्वे यमतुल्या अपि ध्रुवम् । एतदेव विपर्य्यस्तं जपेत् संहारसिद्धये ॥ ८७ ॥
हिंदी अर्थ

यम के समान (बलवान्) शत्रु भी निश्चय नष्ट होते हैं; इसी को उलटकर जपने से संहार (उपसंहार) की सिद्धि होती है।

ब्रह्मशिरः प्रवच्यामि प्रणवं पूर्वमुच्चरेत् । धियो यो नः प्रचोदयात् भर्गो देवस्य धीमहि । तत्सवितुर्वरेण्यम् शत्रूमे हन हनेति च ॥ ८८ ॥
हिंदी अर्थ

ब्रह्मशिर कहता हूँ — पहले प्रणव उच्चारे, फिर गायत्री के पदों को (व्यत्यस्त क्रम में) 'धियो यो नः प्रचोदयात्... भर्गो देवस्य धीमहि... तत्सवितुर्वरेण्यं' जोड़कर '(मेरे) शत्रु को हन हन' कहे।

हुं फट् चैव प्रयोक्तव्यं क्षिपेद् ब्रह्मशिरस्ततः । पुरश्चर्यां पुरस्कृत्वा त्रिलक्ष्यं नियतः शुचिः ॥ ८९ ॥
हिंदी अर्थ

'हुं फट्' का प्रयोग कर ब्रह्मशिर छोड़े; संयमी और पवित्र (साधक) तीन लाख पुरश्चरण करके (इसे सिद्ध करे)।

नश्यन्ति सर्वे रिपवः सर्वे देवासुरा अपि । इदमेव प्रयोक्तव्यः विपर्य्यस्तं विकर्षणे ॥ ९० ॥
हिंदी अर्थ

सब शत्रु — देव और असुर भी — नष्ट होते हैं; इसी को उलटकर विकर्षण (उपसंहार) में प्रयोग करे।

पाशुपत, वायव्य, आग्नेय एवं नारसिंह

पाशुपतास्त्रम् — अतः परं प्रवच्यामि चास्त्रं पाशुपतन्तव । यस्य विज्ञानमात्रेण नश्यन्ति सर्वशत्रवः ॥ ९१ ॥
हिंदी अर्थ

अब पाशुपतास्त्र कहता हूँ, जिसके ज्ञानमात्र से सब शत्रु नष्ट होते हैं।

दादिदान्तां च सावित्रीं प्रोच्य प्रणवमेव च । श्लीं पशुं हुं फट् अमुकशत्रून् हन हन हुं फट् ॥ ९२ ॥
हिंदी अर्थ

'द से न तक' सावित्री और प्रणव कहकर — 'श्लीं पशुं हुं फट्, (अमुक) शत्रुओं को हन हन हुं फट्' (मन्त्र जपे)।

जप्त्वा पूर्वं द्विलक्षञ्च ततः पाशुपतं क्षिपेत् । पुनस्तदेव व्यस्तं स्यात् संहारे तां नियोजयेत् । एतत् पाशुपतं चास्त्रं सर्वशत्रुनिवारणम् ॥ ९३ ॥
हिंदी अर्थ

पहले दो लाख जप करके फिर पाशुपत छोड़े; उसी को उलटकर संहार में लगाए। यह पाशुपतास्त्र सब शत्रुओं का निवारक है।

वच्मि वायव्यमस्त्रं ते येन नश्यन्ति शत्रवः । ॐ वायव्यया या वायव्ययान्योर्वाय या वा तथा । अमुकशत्रुं हन हन हुं फट् चैव प्रकीर्तयेत् । पूर्वमेव तथा जप्त्वा नियुतं द्वितयन्तथा ॥ ९४ ॥
हिंदी अर्थ

अब वायव्यास्त्र कहता हूँ, जिससे शत्रु नष्ट होते हैं — 'ॐ वायव्यया... (अमुक) शत्रु को हन हन हुं फट्' — पूर्ववत् दो नियुत (लाख) जप करे। (बीज-पद पाठभेद संभावित)

पुनः संहाररूपेण संहारं च प्रकल्पयेत् । अस्त्रं वायव्यकं नाम देवानामपि वारणम् ॥ ९५ ॥
हिंदी अर्थ

फिर संहार-रूप से उसका उपसंहार करे; वायव्य नामक यह अस्त्र देवताओं का भी निवारक है।

आग्नेयं संप्रवच्यामि यतः परभयं दहेत् । (आग्नेय-बीजमन्त्रः — गुरुमुखग्राह्यः) ॥ ९६ ॥
हिंदी अर्थ

अब आग्नेयास्त्र कहता हूँ, जिससे शत्रु-भय जल जाता है। (इस श्लोक का बीज-मन्त्र-अंश हस्तलेख में अत्यन्त संक्षिप्त एवं अस्पष्ट है — पाठभेद संभावित; गुरुमुख से ही ग्राह्य।)

पूर्वोक्तां पुरश्चर्यां कृत्वा शस्त्रे नियोजयेत् । इमं मन्त्रं पुनर्व्यस्तं संहारे चैव योजयेत् ॥ ९७ ॥
हिंदी अर्थ

पूर्वोक्त पुरश्चरण करके (इसे) शस्त्र पर लगाए; इसी मन्त्र को उलटकर संहार में भी प्रयोग करे।

ॐ वज्रनखवज्रदंष्ट्रायुधाय महासिंहाय हुं फट् । पूर्वं जप्त्वा च लक्षं हि नरसिंहञ्च योजयेत् । सिंहरूपास्ततो बाणा पतन्ति शत्रवे वने ॥ ९८ ॥
हिंदी अर्थ

'ॐ वज्रनख-वज्रदंष्ट्र-आयुधाय महासिंहाय हुं फट्' — पहले एक लाख जप करके नारसिंह (अस्त्र) लगाए; तब सिंह-रूप बाण शत्रु-समूह पर टूट पड़ते हैं।

पूर्वोक्तेन प्रकारेण संहारञ्च प्रकल्पयेत् । संक्षेपतो महाभाग तवोक्तानि महामते । भेदास्तेषां शिवेनैव ह्यनन्ताः परिकीर्तिताः ॥ ९९ ॥
हिंदी अर्थ

पूर्वोक्त प्रकार से (इसका) संहार भी कर ले। हे महाभाग, महामते! संक्षेप में तुम्हें (ये अस्त्र) कह दिए; इनके भेद तो शिव ने अनन्त बताए हैं।

इति अस्त्र-प्रकरणम्।

टीका

पूरा अस्त्र-प्रकरण एक ही अनुशासन दोहराता है — प्रयोग और संहार सदा युग्म में। कोई अस्त्र बिना अपने उपसंहार के नहीं सिखाया गया। यही वसिष्ठ- परम्परा का मर्म है: विद्या का चरम भी संयम से बँधा रहे। ये मन्त्र शास्त्र-संरक्षण-हेतु यहाँ अंकित हैं, प्रयोग-हेतु नहीं — इनका अधिकार गुरुदीक्षा से ही आता है।

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