आग्नेय महापुराण हमारी परम्परा के उन थोड़े-से ग्रन्थों में है जिन्हें विश्वकोश-पुराण कहा जाता है — जिसमें सृष्टि और प्रलय, मन्त्र और मूर्ति, आयुर्वेद और ज्योतिष, राजनीति और व्याकरण, छन्द और अलंकार, और साथ ही धनुर्वेद — सब एक ही धारा में प्रवाहित हैं। कहा गया है कि यह ज्ञान स्वयं अग्निदेव ने महर्षि वसिष्ठ को प्रदान किया; इसी कारण प्रत्येक प्रसंग "अग्निरुवाच" से आरम्भ होता है — "अग्नि ने कहा।" इस समूचे महापुराण के भीतर धनुर्वेद का अंश बहुत संक्षिप्त है — केवल चार अध्याय (२४९–२५२) — किन्तु यही चार अध्याय शस्त्र-विद्या के उपलब्ध प्राचीनतम व्यवस्थित पाठों में गिने जाते हैं। यहाँ जो कहा गया है, वह किसी कथा या स्तुति के लिए नहीं, अपितु अभ्यास के लिए है — योधा को कैसे खड़ा होना है, धनुष कैसे पकड़ना है, बाण कैसे छोड़ना है, कौन-सा आयुध किस प्रकार चलता है।
करला कुतूहल अखाड़ा में हम भारतीय योद्धा-कलाएँ — Silambam, Kuthu-Varisai, Karlakattai और शास्त्रीय आयुध — Tamizhar Kalai Puducherry की जीवित परम्परा में सिखाते हैं। जो कुछ हम फर्श पर रोज़ करते हैं, उसकी शब्दावली और शास्त्र- आधार इन्हीं जैसे पाठों में मिलता है। धनुर्वेद के स्थान आज भी हमारे पद-अभ्यास (MeiPadam, TaraiPadam, Kaal-Padam) में जीवित हैं; आयुध-कर्मों की सूची वैसी ही है जैसे कोई गुरु शिष्य को "अब यह भङ्गिमा, अब वह" कहकर सिखाता है। इसलिए हम इसे "पुरातन रहस्य" कहकर नहीं, बल्कि समय-सिद्ध जीवित पद्धति मानकर पढ़ते हैं — मूल श्लोक, उसका सरल अर्थ, और जहाँ उपयोगी हो वहाँ अभ्यास की टीका के साथ।
पाठ-नीति — यहाँ का मूल आग्नेय महापुराण के मुद्रित पाठ से लिया गया है। अर्थ हमारा अपना है (किसी आधुनिक अनुवादक का गद्य नहीं)। जहाँ मुद्रित पाठ स्पष्ट नहीं, वहाँ (पाठभेद संभावित) अंकित है। विस्तृत स्रोत-टिप्पणी
SOURCES.mdमें है। 🚩 हर हर महादेव!