अग्निपुराण — धनुर्वेद खण्ड
सानुवाद · योधाभ्यास-टीका सहित
पारम्परिक — आग्नेय महापुराण (अग्नि-वसिष्ठ संवाद)
प्रस्तुति: Vak
अग्निपुराण — धनुर्वेद खण्ड
आग्नेय महापुराण हमारी परम्परा के उन थोड़े-से ग्रन्थों में है जिन्हें विश्वकोश-पुराण कहा जाता है — जिसमें सृष्टि और प्रलय, मन्त्र और मूर्ति, आयुर्वेद और ज्योतिष, राजनीति और व्याकरण, छन्द और अलंकार, और साथ ही धनुर्वेद — सब एक ही धारा में प्रवाहित हैं। कहा गया है कि यह ज्ञान स्वयं अग्निदेव ने महर्षि वसिष्ठ को प्रदान किया; इसी कारण प्रत्येक प्रसंग "अग्निरुवाच" से आरम्भ होता है — "अग्नि ने कहा।"
इस समूचे महापुराण के भीतर धनुर्वेद का अंश बहुत संक्षिप्त है — केवल चार अध्याय (२४९–२५२) — किन्तु यही चार अध्याय शस्त्र-विद्या के उपलब्ध प्राचीनतम व्यवस्थित पाठों में गिने जाते हैं। यहाँ जो कहा गया है, वह किसी कथा या स्तुति के लिए नहीं, अपितु अभ्यास के लिए है — योधा को कैसे खड़ा होना है, धनुष कैसे पकड़ना है, बाण कैसे छोड़ना है, कौन-सा आयुध किस प्रकार चलता है।
इस खण्ड में क्या है
- अध्याय २४९ — धनुर्वेद-परिचय। धनुर्वेद के चार पाद और पञ्च-विध आयुध: यन्त्र-मुक्त (यन्त्र से फेंके जाने वाले — बाण, क्षेपणी), पाणि-मुक्त (हाथ से फेंके — तोमर, शिला), मुक्त-सन्धारित (फेंककर फिर खी ंच लिए जाने वाले — पाश), अमुक्त (सदा हाथ में रहने वाले — खड्ग), और बाहु-युद्ध (नियुद्ध / मल्लयुद्ध)। फिर आती है स्थान-विद्या — समपद, वैशाख, मण्डल, आलीढ, प्रत्यालीढ, विकट, सम्पुट, स्वस्तिक — योधा के आठ मूल पद-स्थान; और धनुष-ग्रहण, आकर्षण, विमोक्ष तथा धनुष-बाण के प्रमाण।
- अध्याय २५० — धनुर्वेद-कथन (आगे)। शस्त्र-पूजन, बाण-सन्धान, सिंहकर्ण मुद्रा, चन्द्रक (षोडशाङ्गुल लक्ष्य-चिह्न), और वेध्य-अभ्यास का क्रम — स्थिर से चल, सरल से दुष्कर, चित्रदुष्कर तक।
- अध्याय २५१ — पाश, खड्ग, शलाका, लगुड। पाश (रज्जु-अस्त्र) का प्रमाण एवं प्रयोग, खड्ग का परिमाण (छह अङ्गुल चौड़ा, सात हस्त लम्बा), कवच-शलाका, और लगुड (लाठी / दण्ड) का अभ्यास।
- अध्याय २५२ — आयुध-कर्म एवं व्यूह। प्रत्येक आयुध के "कर्म" अर्थात् उसकी गति-भङ्गिमाओं की सूची — खड्ग के बत्तीस, चक्र, शूल, तोमर, गदा, परशु, मुद्गर, भिन्दिपाल, कृपाण, क्षेपणी के कर्म; फिर मल्लयुद्ध (नियुद्ध) की भङ्गिमाएँ; और अन्त में रण-व्यूह की रचना तथा त्रैलोक्यमोहन कवच।
यह अखाड़ा इसे क्यों पढ़ता है
करला कुतूहल अखाड़ा में हम भारतीय योद्धा-कलाएँ — Silambam, Kuthu-Varisai, Karlakattai और शास्त्रीय आयुध — Tamizhar Kalai Puducherry की जीवित परम्परा में सिखाते हैं। जो कुछ हम फर्श पर रोज़ करते हैं, उसकी शब्दावली और शास्त्र- आधार इन्हीं जैसे पाठों में मिलता है। धनुर्वेद के स्थान आज भी हमारे पद-अभ्यास (MeiPadam, TaraiPadam, Kaal-Padam) में जीवित हैं; आयुध-कर्मों की सूची वैसी ही है जैसे कोई गुरु शिष्य को "अब यह भङ्गिमा, अब वह" कहकर सिखाता है। इसलिए हम इसे "पुरातन रहस्य" कहकर नहीं, बल् कि समय-सिद्ध जीवित पद्धति मानकर पढ़ते हैं — मूल श्लोक, उसका सरल अर्थ, और जहाँ उपयोगी हो वहाँ अभ्यास की टीका के साथ।
पाठ-नीति — यहाँ का मूल आग्नेय महापुराण के मुद्रित पाठ से लिया गया है। अर्थ हमारा अपना है (किसी आधुनिक अनुवादक का गद्य नहीं)। जहाँ मुद्रित पाठ स्पष्ट नहीं, वहाँ (पाठभेद संभावित) अंकित है। विस्तृत स्रोत-टिप्पणी
SOURCES.mdमें है।
🚩 हर हर महादेव!
सूची
- अध्याय २४९धनुर्वेद-परिचय — पञ्च-विध आयुध, अष्ट-स्थान एवं शर-सन्धान
धनुर्वेद के चार पाद और पाँच प्रकार के आयुध; योधा के आठ मूल स्थान (समपद से स्वस्तिक तक); तथा धनुष-ग्रहण, आकर्षण, विमोक्ष और धनुष-बाण के प्रमाण।
- अध्याय २५०शस्त्र-पूजन, सिंहकर्ण-सन्धान एवं वेध्य-अभ्यास का क्रम
यज्ञभूमि में शस्त्र-पूजन, सिंहकर्ण मुद्रा से बाण-सन्धान, चन्द्रक (षोडशाङ्गु ल लक्ष्य-चिह्न), और स्थिर से चल — सरल से चित्रदुष्कर तक — वेध्याभ्यास का चरणबद्ध क्रम।
- अध्याय २५१पाश, खड्ग, कवच-शलाका एवं लगुड का अभ्यास
रज्जु-अस्त्र पाश का प्रमाण एवं फेंकने की विधि, खड्ग का परिमाण (छह अङ्गुल चौड़ा, सात हस्त लम्बा) एवं म्यान-प्रयोग, अयोमय कवच-शलाका, और लगुड (लाठी/दण्ड) से प्रहार।
- अध्याय २५२आयुध-कर्म, मल्लयुद्ध की भङ्गिमाएँ एवं रण-व्यूह
खड्ग के बत्तीस कर्म; चक्र, शूल, त ोमर, गदा, परशु, मुद्गर, भिन्दिपाल, कृपाण, क्षेपणी के कर्म; फिर मल्लयुद्ध (नियुद्ध) की अनेक भङ्गिमाएँ; और अन्त में गज-अश्व-रथ का रण-व्यूह तथा त्रैलोक्यमोहन कवच।

