शस्त्र-पूजन, सिंहकर्ण-सन्धान एवं वेध्य-अभ्यास का क्रम
यज्ञभूमि में शस्त्र-पूजन, सिंहकर्ण मुद्रा से बाण-सन्धान, चन्द्रक (षोडशाङ्गुल लक्ष्य-चिह्न), और स्थिर से चल — सरल से चित्रदुष्कर तक — वेध्याभ्यास का चरणबद्ध क्रम।
पिछले अध्याय में स्थान और सन्धान की नींव रखी गई; यहाँ अग्निदेव अभ्यास का अनुष्ठान सिखाते हैं — पहले शस्त्रों का पूजन, फिर सिंहकर्ण मुद्रा से सन्धान, और अन्त में लक्ष्य-वेधन का वह क्रम जो सरल से आरम्भ होकर चित्रदुष्कर तक ले जाता है।
शस्त्र-पूजन और बाण-सन्धान
अग्निदेव ने कहा — द्विज अपनी लम्बाई के बराबर (पूर्ण-आयत) धनुष बनवाकर, गदा आदि आयुधों को स्वच्छ करके तथा धनुष को भली प्रकार पोंछकर उसे यज्ञभूमि में स्थापित करे (और पूजे)।
फिर कवच धारण किए हुए, एकाग्रचित्त योधा बाण लेकर, तूणीर (तरकश) को दाहिनी कोख के पास दृढ़ता से बाँधे।
इस प्रकार करने से बाण उस तूणीर में भली प्रकार सुरक्षित रहता है। फिर दाहिने हाथ से तूणीर के भीतर से बाण निकाले।
उसी के साथ, बाण को उसके मध्य-भाग में पकड़कर धारण करे; और बाएँ हाथ से कोख के पास से धनुष उठा ले।
अविचल मन होकर बाण के पुङ्ख को प्रत्यंचा (गुण) पर रखे, और सिंहकर्ण मुद्रा से दबाकर पुङ्ख को समान एवं दृढ़ रूप से थामे।
सिंहकर्ण मुद्रा
"सिंहकर्ण" (सिंह के कान के आकार वाली) — यह वही मुद्रा है जिसमें अँगूठा और तर्जनी प्रत्यंचा तथा बाण-पुङ्ख को इस प्रकार पकड़ते हैं कि हाथ सिंह के कान-सा दिखे। धनुर्धर की यह मुद्रा भारतीय शिल्प और मूर्तियों में बार-बार दिखती है; आज भी पारम्परिक धनुर्विद्या इसी पकड़ को आधार-मुद्रा मानती है।
बाएँ कान तक खिंचे हुए बाण के फलक को बाईं ओर स्थिर रखे; और (धनुष को) दाहिने हाथ की मध्यमा अँगुली से भी धारण किए रहे।
इस श्लोक के अन्तिम पद ("वर्णानां... वामाच्चूलां") का मुद्रित पाठ अस्पष्ट है — (पाठभेद संभावित)। अनुवाद अर्थ के अनुरूप है: धनुष की पकड़ में मध्यमा अँगुली का सहारा।
धनुर्विद्या का ज्ञाता मन को लक्ष्य पर लगाकर, मुट्ठी से (धनुष को) दृढ़ता से थामे रहे; और बाण को शरीर के दाहिने भाग की ओर करके छोड़े।
चन्द्रक — लक्ष्य-चिह्न
धनुष के दण्ड को इतना बड़ा रखे कि उसकी सीध ललाट के बराबर आ जाए, और उसे लक्ष्य पर टिकाए। खींचकर वहाँ चन्द्रक — सोलह अँगुल के लक्ष्य-चिह्न — पर प्रहार करे।
चन्द्रक अभ्यास का लक्ष्य-बिन्दु है — एक सोलह-अँगुल विस्तार वाला चिह्न, जिस पर योधा बार-बार बाण साधता है। यही "एक निश्चित छोटे बिन्दु पर बार-बार" वाला सिद्धान्त हर अस्त्र-अभ्यास का प्राण है — चाहे वह Silambam में एक निश्चित रेखा पर कम्बु का प्रहार हो या मल्लखम्ब पर एक बिन्दु पर पकड़।
एक बाण छोड़ने के बाद, तत्काल ही तूणीर से अँगूठे एवं तर्जनी द्वारा दूसरा बाण निकाले, और उसे मध्यमा अँगुली से दबाकर बार-बार (सन्धान का) अभ्यास करे।
वेध्य-अभ्यास का क्रम
आँख की सीध में स्थित लक्ष्य पर तूणीर से बाण चलाए। चारों ओर तथा दाहिनी दिशा में लक्ष्य-वेध का अभ्यास करे — पहले स्थिर स्थिति में स्थित होकर।
उसके पश्चात् वह तीक्ष्ण, परावृत्त (मुड़ते हुए), गत (चलते हुए), निम्न (नीचे) तथा उन्नत (ऊँचे) — इन क्षिप्र (शीघ्र गतिशील) लक्ष्यों के वेध का अभ्यास करे।
इन विविध वेध्य-लक्ष्यों में सत्त्व (बल एवं धैर्य) टिकाए रखे; और सैकड़ों बार हाथ से बाण निकालने-छोड़ने के अभ्यास द्वारा दुष्कर लक्ष्यों को भी जीत ले।
इस श्लोक का मध्य-भाग मुद्रित प्रति में अस्पष्ट है — (पाठभेद संभावित)। भाव यही कि बार-बार का अभ्यास ही कठिनतम वेध को सुलभ बनाता है। यही हमारे अखाड़े का "छह महीने में स्वावलम्बी" वाला सिद्धान्त है — रहस्य नहीं, दोहराव।
हे विप्र! उस वेध्य (लक्ष्य) के दो भेद हैं — दृढ़-वेध्य और दुष्कर-वेध्य; और दुष्कर के भी दो भेद हैं — चित्र और दुष्कर (चित्रदुष्कर)।
जो न बहुत नीचे हो, न बहुत तीक्ष्ण — वह दृढ़-वेध्य कहा गया है। निम्न (नीचे) तथा ऊर्ध्वगत (ऊपर) लक्ष्य दुष्कर-वेध्य कहे गए हैं।
मस्तक की गति के मध्य में स्थित लक्ष्य चित्रदुष्कर कहलाता है। इस प्रकार इन सब वेध्य-भेदों को दाहिनी तथा बाईं — दोनों ओर से सिद्ध करके —
— जिसने लक्ष्य को जीत लिया है, वह वीर पुरुष पहले (वाहन पर) आरूढ़ हो। यही विधि द्रष्टा प्रयोक्ताओं (अनुभवी आचार्यों) ने बतलाई है।
(चलते वाहन पर) अधिक भ्रमण होने से उसकी वेध्यता (कठिनता) अधिक कही गई है। वहाँ योधा अपने बाण से चलते-दृढ़ लक्ष्य को साधे।
जो लक्ष्य भ्रमणशील, अधिक चलायमान, अथवा स्थिर हो — उन सबको चारों ओर से मारे, बेधे, छेदे और पीड़ित करे।
कर्म-योग की विधि का ज्ञाता इस प्रकार समझ-बूझकर विधि का अनुष्ठान करे। जिसने मन, नेत्र और दृष्टि के साथ (लक्ष्य से) एकता की यह योग-विधि जान ली, वह संग्राम में यम को भी जीत सकता है।
मन · नेत्र · दृष्टि — तीन का एक होना
अध्याय का यह अन्तिम श्लोक समूची धनुर्विद्या का सार है — मनसा, चाक्षुषा, दृष्ट्या — मन, आँख और दृष्टि का लक्ष्य से एक हो जाना। यही एकाग्रता हमारी हर योद्धा-कला की आत्मा है; अस्त्र तो केवल उस एकाग्र मन का विस्तार है। अभ्यास-क्रम भी यहीं स्पष्ट है — पहले स्थिर लक्ष्य, फिर चल, फिर चलते वाहन से चलता लक्ष्य; सरल से चित्रदुष्कर तक — ठीक वैसे ही जैसे अखाड़े में हम सरल पद-अभ्यास से क्रमशः Jodi-अभ्यास तक बढ़ते हैं।
इस प्रकार आग्नेय महापुराण का "धनुर्वेद-कथन" नामक दो सौ पचासवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २५० ॥
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