अध्याय २५२

आयुध-कर्म, मल्लयुद्ध की भङ्गिमाएँ एवं रण-व्यूह

खड्ग के बत्तीस कर्म; चक्र, शूल, तोमर, गदा, परशु, मुद्गर, भिन्दिपाल, कृपाण, क्षेपणी के कर्म; फिर मल्लयुद्ध (नियुद्ध) की अनेक भङ्गिमाएँ; और अन्त में गज-अश्व-रथ का रण-व्यूह तथा त्रैलोक्यमोहन कवच।

यह अन्तिम अध्याय आयुध-विद्या की शब्दावली है — प्रत्येक आयुध की गति- भङ्गिमाओं ("कर्म") की सूची, जैसे कोई गुरु शिष्य को नाम लेकर एक-एक भङ्गिमा सिखाता है। फिर आता है मल्लयुद्ध (नियुद्ध — बिना आयुध का बाहु-युद्ध), और अन्त में रणभूमि का व्यूह तथा रक्षक-कवच।

खड्ग-चर्म के बत्तीस कर्म

अग्निरुवाच — भ्रान्तमुद्भ्रान्तमाविद्धमाप्लुतं विप्लुतं स्मृतम् । सम्पातं समुदीर्णं च श्येनपातमथाकुलम् ॥ १ ॥
हिंदी अर्थ

अग्निदेव ने कहा — तलवार चलाने के (बत्तीस) प्रकारों को जानो — भ्रान्त, उद्भ्रान्त, आविद्ध, आप्लुत, विप्लुत, सम्पात, समुदीर्ण, श्येनपात, आकुल —

उद्भूतमवधूतं च सव्यं दक्षिणमेव च । अनालक्षितविस्फोटौ करालेन्द्रमहासखौ ॥ २ ॥
हिंदी अर्थ

— उद्भूत, अवधूत, सव्य (बायाँ), दक्षिण (दाहिना), अनालक्षित, विस्फोट, करालेन्द्र, महासख —

विकरालनिपातौ च विभीषणभयानकौ । समग्राद्धं तृतीयांशं पादपादार्धवारिजाः ॥ ३ ॥
हिंदी अर्थ

— विकराल, निपात, विभीषण, भयानक, समग्र, अर्ध, तृतीयांश, पाद, पादार्ध, वारिज —

प्रत्यालीढमथालीढं वाराहं लुलितं तथा । इति द्वात्रिंशतो ज्ञेयाः खड्गाच्चर्मविधौ रणे ॥ ४ ॥
हिंदी अर्थ

— प्रत्यालीढ, आलीढ, वाराह और लुलित — इस प्रकार संग्राम में ढाल और तलवार चलाने के ये बत्तीस (३२) कर्म जानने चाहिए।

टीका

कर्म — भङ्गिमाओं की नामावली

"कर्म" यहाँ चाल या भङ्गिमा का पारिभाषिक नाम है। जैसे Silambam में हर घुमाव, प्रहार और रक्षा का अपना नाम है, वैसे ही खड्ग-चर्म की ये बत्तीस भङ्गिमाएँ हैं — भ्रान्त (घुमाव), निपात (गिरना), श्येनपात (बाज़ की झपट), आलीढ/प्रत्यालीढ (वही पद-स्थान जो अध्याय २४९ में आए)। नाम ही मुद्रा को स्मरण-योग्य बनाते हैं; यही मौखिक-परम्परा का कोश है।

पाश-कर्म

परावृत्तमपरावृत्तं गृहीतं लघुसंज्ञितम् । ऊर्ध्वात् क्षिप्रमधःक्षिप्तं सन्धारितविधारितम् ॥ ५ ॥
हिंदी अर्थ

पाश (रज्जु-अस्त्र) के कर्म — परावृत्त, अपरावृत्त, गृहीत, लघु, ऊर्ध्व-क्षिप्त, अधः-क्षिप्त, सन्धारित, विधारित —

श्येनपातं गजग्राह्यं तथैव च । एवमेकादशविधा ज्ञेयाः पाशविधौ रणाः ॥ ६ ॥
हिंदी अर्थ

— श्येनपात, गजग्राह्य (और ग्रहग्राह्य) — इस प्रकार पाश-विधि में ग्यारह प्रकार के कर्म जानने चाहिए।

ऋजवायतं विशालं च तिर्यग्भ्रामितमेव च । पञ्चकर्म विनिर्दिष्टं व्यस्ते पाशे महात्मभिः ॥ ७ ॥
हिंदी अर्थ

ऋजु, आयत, विशाल, तिर्यक् और भ्रामित — व्यस्त-पाश (छूटे हुए पाश) में महात्माओं ने इन पाँच कर्मों का निर्देश किया है।

चक्र, शूल एवं तोमर के कर्म

छेदनं भेदनं पातो भ्रमणं शयनं तथा । विकर्तनं च कर्तनं च चक्रकर्मेदमेव च ॥ ८ ॥
हिंदी अर्थ

छेदन, भेदन, पात, भ्रमण, शयन, विकर्तन और कर्तन — ये चक्र के (सात) कर्म हैं।

आस्फोटः छेदनं भेदनास्त्रासादोलितौ तथा । शूलकर्माणि जानीहि षष्ठमाघातसंज्ञितम् ॥ ९ ॥
हिंदी अर्थ

आस्फोट, छेदन, भेद, त्रास, आन्दोलित — और छठा आघात — इन्हें शूल के कर्म जानो।

दृष्टिघातं भुजाघातं पार्ष्णिघातं द्विजोत्तम । ऋजुप्रक्षेपणापातं तोमरस्य प्रकीर्तितम् ॥ १० ॥
हिंदी अर्थ

हे द्विजोत्तम! दृष्टिघात, भुजाघात, पार्ष्णिघात, ऋजु-प्रक्षेपण और इषु-पात — ये तोमर के कर्म कहे गए हैं।

गदा-कर्म

आहतं विप्र गोमूत्रप्रभूतं कमलासनम् । ततोर्ध्वगात्रं नमितं वामदक्षिणमेव च ॥ ११ ॥
हिंदी अर्थ

हे विप्र! आहत, गोमूत्र, प्रभूत, कमलासन, ऊर्ध्वगात्र, नमित, वाम, दक्षिण —

आवृत्तं परावृत्तं पादोद्धूतमवप्लुतम् । हंसमर्दं विमर्दं च गदाकर्म प्रकीर्तितम् ॥ १२ ॥
हिंदी अर्थ

— आवृत्त, परावृत्त, पादोद्धूत, अवप्लुत, हंसमर्द और विमर्द — ये गदा के कर्म कहे गए हैं।

परशु, मुद्गर, भिन्दिपाल, वज्र एवं पट्टिश

करालमवघातं च दंशनोत्प्लुतमेव च । क्षिप्तहस्तं स्थितं शून्यं परशोस्तु विनिर्दिशेत् ॥ १३ ॥
हिंदी अर्थ

कराल, अवघात, दंशन, उत्प्लुत, क्षिप्तहस्त, स्थित और शून्य — ये परशु के कर्म जानने चाहिए।

ताडनं छेदनं विप्र तथा चूर्णनमेव च । मुद्गरस्य तु कर्माणि तथा प्लवनघातनम् ॥ १४ ॥
हिंदी अर्थ

हे विप्र! ताडन, छेदन, चूर्णन, प्लवन और घातन — ये मुद्गर के कर्म हैं।

संभ्रान्तमथ विश्रान्तं गोविसर्गं सुदुर्धरम् । भिन्दिपालस्य कर्माणि लगुडस्य च तान्यपि ॥ १५ ॥
हिंदी अर्थ

संभ्रान्त, विश्रान्त, गोविसर्ग और सुदुर्धर — ये भिन्दिपाल एवं लगुड दोनों के कर्म हैं।

अन्यन्मध्ये परावृत्तं निदेशान्तं द्विजोत्तम । वज्रस्यैतानि कर्माणि पट्टिशस्य च तान्यपि ॥ १६ ॥
हिंदी अर्थ

हे द्विजोत्तम! अन्त्य, मध्य, परावृत्त और निदेशान्त — ये वज्र एवं पट्टिश के समान कर्म हैं।

कृपाण एवं क्षेपणी-यन्त्र के कर्म

हरणं छेदनं घातो बलोद्धरणमायतम् । कृपाणकर्म निर्दिष्टं पातनं स्फोटनं तथा ॥ १७ ॥
हिंदी अर्थ

हरण, छेदन, घात, बलोद्धरण, आयत, पातन और स्फोटन — ये कृपाण (तलवार) के कर्म कहे गए हैं।

त्रासनं रक्षणं घातो बलोद्धरणमायतम् । क्षेपणीकर्म निर्दिष्टं यन्त्रकर्मैव तु ॥ १८ ॥
हिंदी अर्थ

त्रासन, रक्षण, घात, बलोद्धरण और आयत — ये क्षेपणी (गोफन) तथा यन्त्र के समान कर्म कहे गए हैं।

मल्लयुद्ध (नियुद्ध) की भङ्गिमाएँ

सन्त्यागमवदंशश्च वराहोद्धूतकं तथा । हस्तावहस्तमालीनमेकहस्तावहस्तके ॥ १९ ॥
हिंदी अर्थ

अब मल्लयुद्ध (नियुद्ध) के प्रकार — संत्याग, अवदंश, वराहोद्धूतक, हस्त, अवहस्त, आलीन, एक-हस्त, अवहस्तक —

द्विहस्तबाहुपाशे च कटिरेचितकोद्धृते । उरोललाटघाते च भुजाविधमनं तथा ॥ २० ॥
हिंदी अर्थ

— द्विहस्त, बाहुपाश, कटिरेचितक, उद्धृत, उरोघात, ललाटघात, भुजाविधमन —

करोद्धृतं विमानं च पादाहति विपादिकम् । गात्रसंश्लेषणं शान्तं तथा गात्रविपर्ययः ॥ २१ ॥
हिंदी अर्थ

— करोद्धृत, विमान, पादाहति, विपादिक, गात्र-संश्लेषण, शान्त और गात्र-विपर्यय —

ऊर्ध्वप्रहारं घातं च गोमूत्रं सव्यदक्षिणे । पारकं तारकं दण्डं करवीरन्धमाकुलम् ॥ २२ ॥
हिंदी अर्थ

— ऊर्ध्वप्रहार, घात, गोमूत्र, सव्य, दक्षिण, पारक, तारक, दण्ड, करवीरन्ध, आकुल —

तिर्यग्बन्धमपामार्गं भीमवेगं सुदर्शनम् । सिंहाक्रान्तं गजाक्रान्तं गर्दभाक्रान्तमेव च ॥ २३ ॥
हिंदी अर्थ

— तिर्यग्बन्ध, अपामार्ग, भीमवेग, सुदर्शन, सिंहाक्रान्त, गजाक्रान्त और गर्दभाक्रान्त —

गदाकर्माणि जानीयात्रि युद्धार्थं कर्म च । आकर्षणं विकर्षं च बाहूनां मूलमेव च ॥ २४ ॥
हिंदी अर्थ

— (ऊपर जो गिनाए, उनमें कुछ) गदा-युद्ध के कर्म भी जान; और मल्लयुद्ध के — आकर्षण, विकर्षण, बाहु-मूल —

ग्रीवाविपरिवर्तं च पृष्ठभङ्गं सुदारुणम् । पर्यासनविपर्यासौ पशुमारमजाविकम् ॥ २५ ॥
हिंदी अर्थ

— ग्रीवा-विपरिवर्तन, पृष्ठभंग, पर्यासन, विपर्यास, पशुमार, अजाविक —

पादप्रहारमास्फोटं कटिरेचितकं तथा । गात्राश्लेषं स्कन्धगतं महीयाजनमेव च ॥ २६ ॥
हिंदी अर्थ

— पादप्रहार, आस्फोट, कटिरेचितक, गात्रश्लेष, स्कन्धगत, महीयाजन —

उरोललाटघातं च विस्फोटतरणं तथा । उद्भूतमवधूतं च तिर्यगूर्ध्वगतं तथा ॥ २७ ॥
हिंदी अर्थ

— उरोघात, ललाटघात, विस्फोट-तरण, उद्भूत, अवधूत, तिर्यक्-ऊर्ध्वगत —

गजकम्भमवक्षेपमपराङ्मुखमेव च । देवमार्गमधोमार्गमगमार्गगमनाकुलम् ॥ २८ ॥
हिंदी अर्थ

— गज-स्कन्ध, अवक्षेप, अपराङ्मुख, देवमार्ग-गमन, अधोमार्ग-गमन, अगमार्ग-गमन, आकुल —

यष्टिघातमवक्षेपो वसुधाधारणं तथा । जानुबन्धं भुजाबन्धं गात्रबन्धं सुदारुणम् ॥ २९ ॥
हिंदी अर्थ

— यष्टिघात, अवक्षेप, वसुधाधारण, जानुबन्ध, भुजाबन्ध, गात्रबन्ध (सुदारुण) —

विपृष्ठं सोदकं शुभ्रं भुजावेष्टितमेव च । सन्नद्धः संयुगे भाव्यं सशस्त्रैस्तैर्गजादिभिः ॥ ३० ॥
हिंदी अर्थ

— विपृष्ठ, सोदक, शुभ्र और भुजावेष्टित — (ये मल्लयुद्ध की भङ्गिमाएँ हैं)। युद्ध में कवच-सज्जित होकर शस्त्रयुक्त गज आदि के साथ उपस्थित होना चाहिए।

टीका

नियुद्ध — हमारा Kuthu-Varisai और कुश्ती

श्लोक १९–३० की यह लम्बी नामावली नियुद्ध (बिना आयुध के बाहु-युद्ध) की है — आकर्षण, विकर्षण, ग्रीवा-विपरिवर्तन, जानुबन्ध, भुजाबन्ध, पृष्ठभंग। यही हमारे Kuthu-Varisai (मुक्का-कला) और भारतीय कुश्ती का शास्त्रीय पूर्वज है — पकड़, मोड़, गिराव, बन्ध। भङ्गिमाओं के नाम बदले होंगे, पर तन्त्र वही है: शत्रु के भार और सन्धि को अपने पक्ष में मोड़ना। इसी कारण धनुर्वेद इसे पाँचवाँ आयुध — बाहु-युद्ध — मानता है (देखें अध्याय २४९, श्लोक २)।

रण-व्यूह एवं रक्षक-कवच

वराङ्कुशधरौ चोभौ एको ग्रीवागतोऽपरः । स्कन्धगौ द्वौ च धानुष्कौ द्वौ च खड्गधरौ गजे ॥ ३१ ॥
हिंदी अर्थ

हाथी पर उत्तम अंकुश धारण किए दो महावत हों — एक ग्रीवा (गर्दन) पर, दूसरा कन्धे पर। इनके अतिरिक्त गज पर दो धानुष्क (धनुर्धर) तथा दो खड्गधारी हों।

रथे रणे गजे चैव तुरगाणां त्रयं भवेत् । धानुष्काणां त्रयं प्रोक्तं रक्षार्थे तुरगस्य च ॥ ३२ ॥
हिंदी अर्थ

युद्ध में रथ अथवा हाथी की रक्षा के लिए तीन-तीन घुड़सवार हों; और घोड़े की रक्षा के लिए तीन-तीन धनुर्धर (पैदल) कहे गए हैं।

धन्विनो रक्षणार्थाय चर्मिणस्तु नियोजयेत् । स्वमन्त्रैः शस्त्रमभ्यर्च्य शास्त्रं त्रैलोक्यमोहनम् । यो युद्धे याति स जयेदरीन् सम्पालयेद् भुवम् ॥ ३३ ॥
हिंदी अर्थ

धनुर्धरों की रक्षा के लिए ढाल-धारी (चर्मी) योधाओं को नियुक्त करे। जो योधा अपने-अपने मन्त्रों से प्रत्येक शस्त्र का पूजन करके त्रैलोक्यमोहन कवच का पाठ कर युद्ध में जाता है, वह शत्रुओं पर विजय पाकर पृथ्वी का पालन करता है।

टीका

व्यूह — रक्षा की परतें

यहाँ धनुर्वेद युद्ध को व्यक्ति से आगे बढ़ाकर व्यवस्था बना देता है — गज, अश्व, रथ, पत्ति (वही चार आधार जो अध्याय २४९ के प्रथम श्लोक में आए) एक-दूसरे की रक्षा की परतों में गुँथे हैं। और अन्त में — जैसे हर भारतीय विद्या में — कर्म से पूर्व पूजन और मन्त्र (त्रैलोक्यमोहन कवच): शस्त्र को केवल औज़ार नहीं, श्रद्धेय शक्ति मानकर उठाना। यही भाव हमारे अखाड़े में भी है — अभ्यास से पहले गुरु-प्रणाम, आयुध को माथे से लगाना।

इस प्रकार आग्नेय महापुराण का "धनुर्वेद-कथन" नामक दो सौ बावनवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २५२ ॥ — यहीं धनुर्वेद खण्ड सम्पूर्ण होता है।

अध्याय २५२ पर चर्चा (0)

अभी कोई टिप्पणी नहीं — पहली जिज्ञासा आप रखिए।

All rights reserved © Karla Kutuhal Akhara by Vagambhrini 2021-2026
UDYAM ID: UDYAM-UK-07-0005613 | MSME Registered under 8541 - Sports Education