आयुध-कर्म, मल्लयुद्ध की भङ्गिमाएँ एवं रण-व्यूह
खड्ग के बत्तीस कर्म; चक्र, शूल, तोमर, गदा, परशु, मुद्गर, भिन्दिपाल, कृपाण, क्षेपणी के कर्म; फिर मल्लयुद्ध (नियुद्ध) की अनेक भङ्गिमाएँ; और अन्त में गज-अश्व-रथ का रण-व्यूह तथा त्रैलोक्यमोहन कवच।
यह अन्तिम अध्याय आयुध-विद्या की शब्दावली है — प्रत्येक आयुध की गति- भङ्गिमाओं ("कर्म") की सूची, जैसे कोई गुरु शिष्य को नाम लेकर एक-एक भङ्गिमा सिखाता है। फिर आता है मल्लयुद्ध (नियुद्ध — बिना आयुध का बाहु-युद्ध), और अन्त में रणभूमि का व्यूह तथा रक्षक-कवच।
खड्ग-चर्म के बत्तीस कर्म
अग्निदेव ने कहा — तलवार चलाने के (बत्तीस) प्रकारों को जानो — भ्रान्त, उद्भ्रान्त, आविद्ध, आप्लुत, विप्लुत, सम्पात, समुदीर्ण, श्येनपात, आकुल —
— उद्भूत, अवधूत, सव्य (बायाँ), दक्षिण (दाहिना), अनालक्षित, विस्फोट, करालेन्द्र, महासख —
— विकराल, निपात, विभीषण, भयानक, समग्र, अर्ध, तृतीयांश, पाद, पादार्ध, वारिज —
— प्रत्यालीढ, आलीढ, वाराह और लुलित — इस प्रकार संग्राम में ढाल और तलवार चलाने के ये बत्तीस (३२) कर्म जानने चाहिए।
कर्म — भङ्गिमाओं की नामावली
"कर्म" यहाँ चाल या भङ्गिमा का पारिभाषिक नाम है। जैसे Silambam में हर घुमाव, प्रहार और रक्षा का अपना नाम है, वैसे ही खड्ग-चर्म की ये बत्तीस भङ्गिमाएँ हैं — भ्रान्त (घुमाव), निपात (गिरना), श्येनपात (बाज़ की झपट), आलीढ/प्रत्यालीढ (वही पद-स्थान जो अध्याय २४९ में आए)। नाम ही मुद्रा को स्मरण-योग्य बनाते हैं; यही मौखिक-परम्परा का कोश है।
पाश-कर्म
पाश (रज्जु-अस्त्र) के कर्म — परावृत्त, अपरावृत्त, गृहीत, लघु, ऊर्ध्व-क्षिप्त, अधः-क्षिप्त, सन्धारित, विधारित —
— श्येनपात, गजग्राह्य (और ग्रहग्राह्य) — इस प्रकार पाश-विधि में ग्यारह प्रकार के कर्म जानने चाहिए।
ऋजु, आयत, विशाल, तिर्यक् और भ्रामित — व्यस्त-पाश (छूटे हुए पाश) में महात्माओं ने इन पाँच कर्मों का निर्देश किया है।
चक्र, शूल एवं तोमर के कर्म
छेदन, भेदन, पात, भ्रमण, शयन, विकर्तन और कर्तन — ये चक्र के (सात) कर्म हैं।
आस्फोट, छेदन, भेद, त्रास, आन्दोलित — और छठा आघात — इन्हें शूल के कर्म जानो।
हे द्विजोत्तम! दृष्टिघात, भुजाघात, पार्ष्णिघात, ऋजु-प्रक्षेपण और इषु-पात — ये तोमर के कर्म कहे गए हैं।
गदा-कर्म
हे विप्र! आहत, गोमूत्र, प्रभूत, कमलासन, ऊर्ध्वगात्र, नमित, वाम, दक्षिण —
— आवृत्त, परावृत्त, पादोद्धूत, अवप्लुत, हंसमर्द और विमर्द — ये गदा के कर्म कहे गए हैं।
परशु, मुद्गर, भिन्दिपाल, वज्र एवं पट्टिश
कराल, अवघात, दंशन, उत्प्लुत, क्षिप्तहस्त, स्थित और शून्य — ये परशु के कर्म जानने चाहिए।
हे विप्र! ताडन, छेदन, चूर्णन, प्लवन और घातन — ये मुद्गर के कर्म हैं।
संभ्रान्त, विश्रान्त, गोविसर्ग और सुदुर्धर — ये भिन्दिपाल एवं लगुड दोनों के कर्म हैं।
हे द्विजोत्तम! अन्त्य, मध्य, परावृत्त और निदेशान्त — ये वज्र एवं पट्टिश के समान कर्म हैं।
कृपाण एवं क्षेपणी-यन्त्र के कर्म
हरण, छेदन, घात, बलोद्धरण, आयत, पातन और स्फोटन — ये कृपाण (तलवार) के कर्म कहे गए हैं।
त्रासन, रक्षण, घात, बलोद्धरण और आयत — ये क्षेपणी (गोफन) तथा यन्त्र के समान कर्म कहे गए हैं।
मल्लयुद्ध (नियुद्ध) की भङ्गिमाएँ
अब मल्लयुद्ध (नियुद्ध) के प्रकार — संत्याग, अवदंश, वराहोद्धूतक, हस्त, अवहस्त, आलीन, एक-हस्त, अवहस्तक —
— द्विहस्त, बाहुपाश, कटिरेचितक, उद्धृत, उरोघात, ललाटघात, भुजाविधमन —
— करोद्धृत, विमान, पादाहति, विपादिक, गात्र-संश्लेषण, शान्त और गात्र-विपर्यय —
— ऊर्ध्वप्रहार, घात, गोमूत्र, सव्य, दक्षिण, पारक, तारक, दण्ड, करवीरन्ध, आकुल —
— तिर्यग्बन्ध, अपामार्ग, भीमवेग, सुदर्शन, सिंहाक्रान्त, गजाक्रान्त और गर्दभाक्रान्त —
— (ऊपर जो गिनाए, उनमें कुछ) गदा-युद्ध के कर्म भी जान; और मल्लयुद्ध के — आकर्षण, विकर्षण, बाहु-मूल —
— ग्रीवा-विपरिवर्तन, पृष्ठभंग, पर्यासन, विपर्यास, पशुमार, अजाविक —
— पादप्रहार, आस्फोट, कटिरेचितक, गात्रश्लेष, स्कन्धगत, महीयाजन —
— उरोघात, ललाटघात, विस्फोट-तरण, उद्भूत, अवधूत, तिर्यक्-ऊर्ध्वगत —
— गज-स्कन्ध, अवक्षेप, अपराङ्मुख, देवमार्ग-गमन, अधोमार्ग-गमन, अगमार्ग-गमन, आकुल —
— यष्टिघात, अवक्षेप, वसुधाधारण, जानुबन्ध, भुजाबन्ध, गात्रबन्ध (सुदारुण) —
— विपृष्ठ, सोदक, शुभ्र और भुजावेष्टित — (ये मल्लयुद्ध की भङ्गिमाएँ हैं)। युद्ध में कवच-सज्जित होकर शस्त्रयुक्त गज आदि के साथ उपस्थित होना चाहिए।
नियुद्ध — हमारा Kuthu-Varisai और कुश्ती
श्लोक १९–३० की यह लम्बी नामावली नियुद्ध (बिना आयुध के बाहु-युद्ध) की है — आकर्षण, विकर्षण, ग्रीवा-विपरिवर्तन, जानुबन्ध, भुजाबन्ध, पृष्ठभंग। यही हमारे Kuthu-Varisai (मुक्का-कला) और भारतीय कुश्ती का शास्त्रीय पूर्वज है — पकड़, मोड़, गिराव, बन्ध। भङ्गिमाओं के नाम बदले होंगे, पर तन्त्र वही है: शत्रु के भार और सन्धि को अपने पक्ष में मोड़ना। इसी कारण धनुर्वेद इसे पाँचवाँ आयुध — बाहु-युद्ध — मानता है (देखें अध्याय २४९, श्लोक २)।
रण-व्यूह एवं रक्षक-कवच
हाथी पर उत्तम अंकुश धारण किए दो महावत हों — एक ग्रीवा (गर्दन) पर, दूसरा कन्धे पर। इनके अतिरिक्त गज पर दो धानुष्क (धनुर्धर) तथा दो खड्गधारी हों।
युद्ध में रथ अथवा हाथी की रक्षा के लिए तीन-तीन घुड़सवार हों; और घोड़े की रक्षा के लिए तीन-तीन धनुर्धर (पैदल) कहे गए हैं।
धनुर्धरों की रक्षा के लिए ढाल-धारी (चर्मी) योधाओं को नियुक्त करे। जो योधा अपने-अपने मन्त्रों से प्रत्येक शस्त्र का पूजन करके त्रैलोक्यमोहन कवच का पाठ कर युद्ध में जाता है, वह शत्रुओं पर विजय पाकर पृथ्वी का पालन करता है।
व्यूह — रक्षा की परतें
यहाँ धनुर्वेद युद्ध को व्यक्ति से आगे बढ़ाकर व्यवस्था बना देता है — गज, अश्व, रथ, पत्ति (वही चार आधार जो अध्याय २४९ के प्रथम श्लोक में आए) एक-दूसरे की रक्षा की परतों में गुँथे हैं। और अन्त में — जैसे हर भारतीय विद्या में — कर्म से पूर्व पूजन और मन्त्र (त्रैलोक्यमोहन कवच): शस्त्र को केवल औज़ार नहीं, श्रद्धेय शक्ति मानकर उठाना। यही भाव हमारे अखाड़े में भी है — अभ्यास से पहले गुरु-प्रणाम, आयुध को माथे से लगाना।
इस प्रकार आग्नेय महापुराण का "धनुर्वेद-कथन" नामक दो सौ बावनवाँ अध्याय समाप्त हुआ ॥ २५२ ॥ — यहीं धनुर्वेद खण्ड सम्पूर्ण होता है।
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