धनुर्वेद-परिचय — पञ्च-विध आयुध, अष्ट-स्थान एवं शर-सन्धान
अग्निदेव इस अध्याय में धनुर्वेद का समूचा ढाँचा एक साथ रख देते हैं — पहले आयुधों का वर्गीकरण, फिर योधा के खड़े होने के स्थान, और अन्त में धनुष-बाण का प्रयोग। यही इस पूरे खण्ड की नींव है।
धनुर्वेद के चार पाद और पाँच आयुध
अग्निदेव ने कहा — हे द्विज! अब मैं चार पाद वाले धनुर्वेद का वर्णन करता हूँ, जो पाँच प्रकार का है। यह रथ, गज (हाथी), अश्व (घोड़े) और पत्ति (पैदल) — इन पर आश्रित योधाओं को लेकर कहा गया है। (चतुरंगिनी सेना)।
वे पाँच प्रकार ये हैं — यन्त्र-मुक्त (यन्त्र से फेंका जाने वाला), पाणि-मुक्त (हाथ से फेंका जाने वाला), मुक्त-सन्धारित (फेंककर पुनः खींच लिया जाने वाला), अमुक्त (सदा हाथ में रहने वाला), और बाहु-युद्ध (नियुद्ध / मल्लयुद्ध) — इस प्रकार वह पाँच प्रकार का कहा गया है।
शस्त्र और अस्त्र के भेद से यह पुनः दो प्रकार का है; और ऋजु (सीधे) तथा माया (छल-कौशल) के भेद से फिर दो प्रकार का कहा जाता है।
क्षेपणी, धनुष (चाप), यन्त्र आदि से जो फेंका जाता है, वह यन्त्र-मुक्त कहलाता है। और शिला, तोमर आदि जिन्हें हाथ से फेंका जाता है, वह पाणि-मुक्त है।
पाठभेद संभावित: यन्त्रविमोक्षितम् -> प्रकीर्त्तितम्
जिस प्रास (भाला) आदि शस्त्र से शत्रु पर प्रहार करके पुनः उसे खींच लिया जाए, वह मुक्त-सन्धारित है। खड्ग आदि जो सदा हाथ में रहें, वे अमुक्त; और बिना किसी आयुध के जो युद्ध हो, वह नियुद्ध (बाहु-युद्ध) कहलाता है।
अधिकारी, गुरु और वर्ण-व्यवस्था
युद्ध की इच्छा रखने वाला, श्रम को जीत चुका योधा अपने योग्य पात्रों (आयुधों एवं सहायकों) को सिद्ध करे। धनुष से लड़े जाने वाले युद्ध श्रेष्ठ हैं; जो बीच के हैं वे मध्यम कोटि के।
खड्ग से लड़े जाने वाले तथा भुजाओं से (बाहु-युद्ध) किए जाने वाले युद्ध उत्तरोत्तर निम्न कोटि के हैं। धनुर्वेद में विप्र (ब्राह्मण) को तीनों वर्णों का गुरु कहा गया है।
आपत्ति-काल में स्वयं शिक्षा प्राप्त कर शूद्र को भी युद्ध का अधिकार है। देश में रहने वाले (अन्य वर्ग के लोगों) को राजा की सहायता से युद्ध में सहयोग करना चाहिए।
अष्ट-स्थान — योधा के आठ मूल आसन या निलई
अँगूठे, टखने, हथेली और पैर — ये यदि परस्पर सटे हुए, एक साथ मिले हों, तो लक्षण के अनुसार वह समपद स्थान कहलाता है।
जब दोनों पैर बाहरी अँगुलियों के बल स्थित हों, दोनों घुटने तने और बलयुक्त हों, तथा दोनों के बीच की दूरी तीन वितस्ति (बित्ते) हो — यह वैशाख स्थान कहलाता है।
जिसमें दोनों घुटने हंस-पंक्ति के आकार में समान दिखाई पड़ें, और दोनों के बीच की दूरी चार वितस्ति हो — वह मण्डल स्थान माना गया है।
जिसमें दाहिना घुटना और जंघा तने हुए, हल के आकार का हो, और (पैरों का) विस्तार एक वितस्ति हो — वह आलीढ स्थान कहलाता है।
इससे उलटा (जिसमें बायाँ आगे तना हो) वह प्रत्यालीढ माना गया है — जिसमें बायाँ पैर तिरछा और दाहिना सीधा हो जाए।
जब दोनों टखने और एड़ियाँ पाँच अँगुल की दूरी पर स्थित हों, तो यह द्वादश (बारह) अँगुल लम्बा स्थान बनता है।
जिसमें बायाँ घुटना सीधा हो और दाहिना पैर भली प्रकार फैला हुआ हो; अथवा दाहिना घुटना झुका और निश्चल हो —
— और वह पैर घुटने सहित दण्ड के समान विशाल एवं स्थिर दिखाई दे; इस प्रकार दोनों पैरों में दो हाथ की दूरी वाला स्थान विकट कहा गया है।
जिसमें दोनों घुटने दुहरे मुड़े हों और दोनों पैर उत्तान (ऊपर की ओर) हों — इस विधि से बनने वाला स्थान सम्पुट कहलाता है।
जिसमें दोनों पैर कुछ घुमे हुए, समान रूप से दण्ड के समान तने और स्थिर हों, तथा दृष्टि से (मापने पर) सोलह अँगुल की दूरी पर हों — यह स्वस्तिक स्थान है।
अखाड़े का पद-अभ्यास
ये आठ स्थान — समपद, वैशाख, मण् डल, आलीढ, प्रत्यालीढ, विकट, सम्पुट, स्वस्तिक — केवल धनुर्धर के नहीं, हर आयुध-योधा के मूल पद हैं। हमारे MeiPadam, TaraiPadam, Kaal-Padam और Silambam के वदिवु या निलई (stances) इन्हीं का जीवित रूप हैं: समपद का सम-स्थिर आरम्भ, वैशाख में मेईपाडम् व प्रारम्भिक सुत्रु अभ्यास, आलीढ / प्रत्यालीढ या वन्डी निलई तो मुख्य आसन है , मण्डल या कुन्दान का चौड़ा नीचा आसन भी अत्यन्त महत्व का है। नाप — वितस्ति (बित्ता), अँगुल — शरीर के अपने माप से लिए जाते हैं; यही "अपने शरीर से नापो" वाला सिद्धान्त मल्लखम्ब और अखाड़े में आज भी चलता है।
धनुष-ग्रहण, प्रणाम और सन्धान
हे द्विज! योधा सबसे पहले स्वस्तिक स्थान में — बाएँ हाथ में धनुष और दाहिने हाथ में बाण लेकर — अपने गुरुजनों को प्रणाम करे।
वैशाख स्थान के सिद्ध हो जाने पर, स्थिर या गतिशील अवस्था में, धनुष का प्रेमी योधा तब प्रत्यंचा (डोरी) को धनुष के छोर पर चढ़ाए।
धनुष की निचली कोटि और बाण के फल-देश (फलक) को भूमि पर टिकाकर, उन्हें तौलकर (सन्तुलित करके) —
हे शुभव्रत! मुट्ठी हुई दोनों भुजाओं एवं कलाइयों (प्रकोष्ठ) द्वारा उस श्रेष्ठ धनुष पर बाण को उसके पुङ्ख-देश (पिछले सिरे) पर सन्धान करे।
यहाँ (पाठभेद संभावित) — बाईसवें श्लोक का प्रथम पद मुद्रित प्रति में अस्पष्ट है; "मुट्ठी बँधी भुजाओं एवं कलाइयों से" यही भाव अनुवादित है।
धनुष और उसकी प्रत्यंचा के बीच का अन्तराल बारह अँगुल होना चाहिए — यह न बहुत कम हो, न बहुत अधिक।
धनुष को नाभि के पास और बाण-समूह को नितम्ब-भाग के पास रखकर, उठे हुए हाथ को आँख और कान के बीच की सीध में ऊपर उठाए।
आगे वाली मुट्ठी में बाण को पकड़कर उसे दाहिने स्तनाग्र की सीध में रखे; फिर हाथ को स्थिर कर शीघ्र ही (प्रत्यंचा को) आगे की ओर फैलाए।
(खींचने वाली मुट्ठी) न तो भीतर की ओर हो, न बाहर, न ऊँची, न नीची, न कुब्ज (झुकी), न उत्तान (उलटी), न चंचल, और न अत्यधिक लिपटी हुई हो।
वह सम, स्थिर और अगले दण्ड के समान अचल हो। इस प्रकार पूर्ण मुट्ठी से लक्ष्य को आच्छादित करके —
— धनुर्धर छाती को उठाकर, त्रिकोण के समान झुककर खड़ा हो; कन्धा ढीला, ग्रीवा निश्चल, और मस्तक मयूर की भाँति शोभित हो।
ललाट, नासिका, मुख और कन्धे को समावस्था में रखे — छाती के समतल में। ठोढ़ी (चिबुक) और कन्धे के बीच तीन अँगुल का अन्तराल होना चाहिए।
पहली बार तीन अँगुल का, दूसरी बार दो अँगुल का, और तीसरी बार एक अँगुल का — ठोढ़ी और कन्धे के बीच का यह अन्तराल क्रमशः घटता जाए।
बाण को उसके पुङ्ख से तर्जनी और अँगूठे से पकड़े, फिर अनामिका से और मध्यमा अँगुली से भी थामे रहे।
बाण को तब तक वेग से खींचे जब तक वह पूरा-पूरा (आकर्ण) न खिंच जाए। इस प्रकार उपक्रम करके बाण को विधिपूर्वक छोड़ना चाहिए।
हे सुव्रत! दृष्टि और मुट्ठी की सीध में स्थित लक्ष्य को बाण से बेध दे। बाण छोड़ने पर पिछले हाथ को वेग से पीछे की ओर झटक दे।
इसे ही (श्रेष्ठ) मोक्ष माना जाता है — यह तुम्हें जानना चाहिए, हे द्विज! धनुर्धर को चाहिए कि खींचते समय अपनी कोहनी को नीचे रखे।
बाण छोड़ते समय कोहनी को ऊपर करना और लक्ष्य से सटाकर रखना मध्यम बचाव है; उससे दूर (नीचे) रखना श्रेष्ठ है — यह धनुष-शास्त्र के विशारद विशेष रूप से जानते हैं।
आकर्ण, दृष्टि, विमोक्ष
श्लोक २७–३५ वस्तुतः एक ही अनुशासन सिखाते हैं — स्थिरता। छाती ऊँची, ग्रीवा निश्चल, कन्धा ढीला (श्लोक २८); श्वास और दृष्टि लक्ष्य पर एकाग्र; मुट्ठी "अगले दण्ड के समान अचल" (२७); आकर्ण खिंचाव (३२); और छोड़ने पर पिछले हाथ का सहज झटका (३३)। यही सन्तुलन Silambam और Kalaripayattu के अस्त्र-प्रयोग में भी मूल है — भङ्गिमा से पहले आधार-स्थिरता।