आदर्श योद्धा — नारद-वर्णित श्रीराम
नारदजी वाल्मीकि को श्रीराम का पूर्ण चित्र देते हैं — बुद्धि, नीति, बल और धनुर्वेद-निष्ठा। अखाड़े का लक्ष्य-चित्र यहीं से आरम्भ होता है।
बालकाण्ड का आरम्भ ही एक प्रश्न से होता है — महर्षि वाल्मीकि देवर्षि नारद से पूछते हैं: इस संसार में गुणों से पूर्ण, वीर, धर्मज्ञ और कृतज्ञ पुरुष कौन है? उत्तर में नारदजी जो चित्र खींचते हैं, वही हर अभ्यासी का लक्ष्य-चित्र है। ध्यान दें — बल का वर्णन अकेला नहीं आता; बुद्धि, नीति, वाणी और धर्म उसके साथ चलते हैं।
धनुर्वेद में निष्ठा — योद्धा का पूर्ण चित्र
वे बुद्धिमान्, नीतिज्ञ और वक्ता हैं; शोभायमान और शत्रुओं का संहार करनेवाले हैं। कंधे चौड़े, भुजाएँ विशाल, ग्रीवा शंख के समान और ठोढ़ी पुष्ट है। उनकी छाती चौड़ी है, वे महान् धनुर्धर हैं; हँसली मांस से ढकी हुई है, वे शत्रुदमनकारी हैं। भुजाएँ घुटनों तक लम्बी, मस्तक सुन्दर, ललाट भव्य और पराक्रम मनोहर है। शरीर न बहुत ऊँचा न नाटा — मध्यम और सुडौल है, वर्ण चिकना, स्वभाव प्रतापी; वक्ष भरा हुआ, नेत्र विशाल, वे लक्ष्मीवान् और शुभलक्षणों से युक्त हैं। धर्म के ज्ञाता, सत्यप्रतिज्ञ और प्रजा के हित में लगे रहते हैं; यशस्वी, ज्ञानी, पवित्र, जितेन्द्रिय और एकाग्रचित्त हैं। वे अपने धर्म और अपने जनों दोनों के रक्षक हैं, वेद-वेदांगों के तत्त्वज्ञ हैं, और धनुर्वेद में निष्ठावान् हैं।
ध्यान दें कि धनुर्वेदे च निष्ठितः सूची के अन्त में आता है — पहले धर्मज्ञता, सत्य, इन्द्रिय-संयम और शास्त्र-ज्ञान गिनाये जाते हैं। यह क्रम आकस्मिक नहीं। हमारी परम्परा में शस्त्र उसी हाथ में शोभा पाता है जो पहले स्वयं पर संयम रखना सीख चुका हो।
अखाड़े में जब कोई नया योद्धा (चाहे वह पाँच वर्ष का बालक हो या उसके माता-पिता) पहली बार पोडि-कुची (छो टी लाठी) उठाता है, हम यही चित्र सामने रखते हैं — बल अकेला लक्ष्य नहीं; लक्ष्य है समविभक्ताङ्ग — सन्तुलित, सुडौल, अनुशासित देह और उतना ही सन्तुलित मन। "समः समविभक्ताङ्गः" — यही मेइ-पडम् और तरै-पडम् के अभ्यास का ध्येय है: शरीर के दोनों पक्ष समान रूप से सधे हुए, गति में सन्तुलन।
धनुर्वेदे च निष्ठितः — "निष्ठा" शब्द विशेष है। यह केवल जानकारी नहीं, वर्षों की निरन्तरता है। इसीलिये हमारा मार्ग छह मास का आधार और उसके बाद तीन-छह मास पर होने वाली स्तर-उन्नति (बेल्ट-उपग्रेडेशन, तमिऴर कलै पुदुच्चेरी द्वारा प्रमाणित) पर टिका है — निष्ठा दिन-दिन बनती है, एक ही दिन में नहीं।
योगः कर्मसु कौशलम् ।
अगस्त्य-प्रदत्त ऐन्द्र धनुष
अगस्त्य मुनि के कहने पर श्रीराम ने प्रसन्नतापूर्वक इन्द्र का धनुष, एक खड्ग, और ऐसे दो तूणीर ग्रहण किये जिनमें बाण कभी समाप्त नहीं होते।
यहाँ एक सूक्ष्म पर महत्त्वपूर्ण बात है — श्रीराम ने ऐन्द्र धनुष स्वयं नहीं उठा लिया; अगस्त्यवचनात् — गुरु के वचन से ग्रहण किया। शस्त्र माँगकर या छीनकर नहीं, सौंपे जाने पर लिया जाता है। यही दीक्षा का मर्म है। अखाड़े में भी अगला आयुध तब मिलता है जब कोच उसे उपयुक्त समझे — योद्धा की उतावली से नहीं।
"अक्षय तूणीर" — जिसके बाण कभी न चुकें — का सच्चा अर्थ अभ्यास में यही है: सधा हुआ धनुर्धर कभी निःशस्त्र नहीं होता, क्योंकि उसका असली तरकश उसका प्रशिक्षण है, बाणों की गिनती नहीं।
बल का प्रमाण — दुन्दुभि-अस्थि और सप्त-साल-भेदन
महाबली श्रीराम ने तनिक मुस्कराकर उस विशाल अस्थि-समूह को देखा, और केवल पैर के अंगूठे से उसे पूरे दस योजन दूर फेंक दिया। फिर एक ही महान् बाण से उन्होंने सात साल-वृक्षों को, और पर्वत तथा रसातल को भी बींध डाला — इस प्रकार अपने बल का विश्वास दिला दिया।
"उत्स्मयित्वा" — तनिक मुस्कराकर। यह शब्द ध्यान देने योग्य है। सच्चा बल आयासरहित होता है; वह दिखावे के लिये तनता नहीं, वह मुस्कराता है। जो अभ्यासी वर्षों साधना कर चुका, उसका पराक्रम सहज हो जाता है — क्रोध या अकड़ से नहीं, शान्त आत्मविश्वास से।
और "प्रत्यय जनयन्" — विश्वास उत्पन्न करते हुए। बल का प्रदर्शन यहाँ अहंकार के लिये नहीं, दूसरों को भरोसा दिलाने के लिये है — कि रक्षक समर्थ है। जोड़ी-अभ्यास (जोडी) में हम यही सिखाते हैं: तुम्हारी शक्ति साथी को भयभीत करने के लिये नहीं, उसका विश्वास बनाने के लिये है।
विद्या की फलश्रुति — सबके लिये खुला द्वार
इस चरित को जो भी पढ़े — विद्वान् को वाणी का श्रेष्ठत्व मिले, राज-धर्म पालक को उन्नति मिले, व्यापारी को उसके कर्म का फल मिले, और परिश्रमी जन को भी महत्त्व और प्रतिष्ठा प्राप्त हो।
यह फलश्रुति हमारे अखाड़े के मूल भाव को ही दोहराती है — यह विद्या सबके ल िये है। राम-कथा किसी एक वर्ग की सम्पत्ति नहीं; जो भी श्रद्धा से इसे ग्रहण करे, उसे उसके अपने जीवन-कर्म में उन्नति मिलती है।
इसीलिये हमारी कक्षाओं में पाँच वर्ष का बालक और उसके माता-पिता, नौकरीपेशा और विद्यार्थी, सब एक ही धरातल पर खड़े होते हैं। शस्त्र-विद्या की मर्यादा यही है — वह किसी को बाहर नहीं करती; वह हर आनेवाले को उसकी क्षमता के अनुसार ऊँचा उठाती है।
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