भगवान् परशुराम का दर्शन — तेज के आगे तेज
धनुष-भंग के बाद, अयोध्या लौटती बारात के सम्मुख स्वयं भगवान् परशुराम प्रकट होते हैं — कंधे पर परशु, हाथ में दिव्य धनुष। धनुर्धर की अन्तिम परीक्षा: बड़े तेज के सामने स्थिर रहना।
मिथिला में शिव-धनुष टूट चुका है; सीताजी के साथ श्रीराम अयोध्या लौट रहे हैं। मार्ग में आँधी उठती है, दिशाएँ धुँधली हो जाती हैं — और सामने प्रकट होते हैं भगवान् परशुराम: शस्त्रधारियों की परम्परा के महागुरु, जिनसे आगे चलकर भीष्म और कर्ण जैसे धनुर्धर विद्या पायेंगे। बालकाण्ड का यह अन्तिम धनुर्वेद-प्रसंग है — जहाँ एक धनुष टूटने की ध्वनि दूसरे धनुष की चुनौती बनकर लौटती है।
तेजोमूर्ति का आगमन
राजा दशरथ ने देखा — सामने से भृगुकुल-भूषण जमदग्नि-कुमार परशुराम आ रहे हैं, जिन्होंने उद्दण्ड राजाओं का मान-मर्दन किया है। मस्तक पर जटाओं का मण्डल है; वे कैलास के समान दुर्जय और कालाग्नि के समान दुःसह हैं; अपने तेज से ऐसे जाज्वल्यमान कि साधारण जन उनकी ओर देख भी नहीं सकते। कंधे पर परशु रखे, हाथ में विद्युत्-समूह के समान दीप्तिमान् धनुष और उग्र बाण लिये वे त्रिपुर-विनाशक भगवान ् शिव के समान प्रतीत हो रहे थे।
यह दृश्य क्यों हमारे चयन का समापन है? क्योंकि यहाँ धनुर्वेद अपनी अन्तिम परीक्षा लेता है — और वह परीक्षा तकनीक की नहीं, धैर्य की है।
सोचिये — श्रीराम अभी-अभी वह कर चुके हैं जो कोई नहीं कर सका: शिव-धनुष का भंग। यश शिखर पर है, बारात उत्सव में है। ठीक उसी क्षण सामने आता है उनसे भी वरिष्ठ एक तेज — साक्षात् भार्गव, जिनका परशु राज-मद का काल रहा है। जो अभी विजेता था, वह अब परीक्षार्थी है। विद्या में कोई अन्तिम पड़ाव नहीं; हर सिद्धि के आगे एक बड़ा तेज खड़ा मिलता है। अखाड़े में जो योद्धा नयी बेल्ट पाकर स्वयं को पूर्ण मान ले, उसे यह सर्ग पढ़ाइये — स्तर-उन्नति द्वार है, छत नहीं।
और श्रीराम का उत्तर क्या है? न भय, न उद्दण्डता। वे वरिष्ठ का सम्मान रखते हुए, शान्त स्वर में, वैष्णव धनुष सँभालते हैं — और अपना बल दिखाकर भी प्रहार नहीं करते। सामनेवाला तपस्वी है, ब्राह्मण है, वरिष्ठ है — इसलिये विजय के क्षण में भी मर्यादा सर्वोपरि रहती है। यही सर्ग १ का वचन पूर्ण होता है — धनुर्वेदे च निष्ठितः के साथ धर्मज्ञः भी। बल और विनय एक ही म्यान की दो धारें हैं।
स्वयं भगवान् परशुराम इस भेंट में हारते नहीं — वे पहचानते हैं, और पहचानकर आशीर्वाद देकर महेन्द्र-पर्वत को लौट जाते हैं। बड़ा गुरु वही है जो अपने से आगे निकलते शिष्यत्व को देखकर प्रसन्न हो। हमारी परम्परा में कोच का गौरव इसी में है कि उसका योद्धा एक दिन उससे आगे जाये — और उस दिन भी झुककर ही मिले।
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
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