गुरु के पीछे-पीछे — बला-अतिबला की दीक्षा
धनुर्धारी राम-लक्ष्मण विश्वामित्र के पीछे चल पड़ते हैं। सरयू-तट पर गुरु पहली दीक्षा देते हैं — बला और अतिबला: न थकान, न ज्वर, न रूप का ह्रास।
अयोध्या छूट गयी। अब दृश्य है — आगे-आगे गुरु, पीछे- पीछे दो किशोर, कंधे पर धनुष, पीठ पर तूणीर। यह चित्र हमारी परम्परा का मूल-चित्र है; हर पीढ़ी में यही दोहराया जाता है — गुरु आगे, शिष्य पीछे, मार्ग अनजाना, श्रद्धा पूरी।
गुरु आगे, शिष्य पीछे
आगे-आगे विश्वामित्र चले, उनके पीछे काकपक्ष (कानों तक झूलती बालकों की लटें) धारण किये धनुर्धर महायशस्वी श्रीराम, और उनके पीछे सुमित्राकुमार लक्ष्मण। दोनों की पीठ पर तूणीर बँधे थे, हाथों में धनुष शोभा दे रहे थे; दसों दिशाओं को सुशोभित करते वे दोनों महात्मा विश्वामित्र के पीछे ऐसे चल रहे थे जैसे तीन-तीन फनवाले दो नाग। उदार-हृदय, कान्ति से दीप्त वे दोनों अनिन्द्य राजकुमार गुरु के पीछे वैसे ही चले जा रहे थे जैसे ब्रह्माजी के पीछे दोनों अश्विनीकुमार।
काकपक्षधरो धन्वी — यह अद्भुत युग्म है: बालों में अभी बालपन की लटें हैं, और हाथ में धनुष है। परम्परा किशोर को किशोर रहने देती है — और फिर भी उसे योद्धा की मर्यादा सौंपती है। हमारे अखाड़े की चटाई पर भी यही दृश्य है: पाँच-छह वर्ष के योद्धा, हाथ में अपने नाप की पोडि-कुची, आँखों में खेल भी और एकाग्रता भी। दोनों साथ रह सकते हैं; बालकाण्ड इसका प्रमाण है।
और चलने का क्रम देखिये — गुरु आगे, राम बीच में, लक्ष्मण पीछे। पंक्ति अपने-आप में अनुशासन है। अखाड़े में पंक्ति बनाना, वरिष्ठता का क्रम रखना, कक्षा का आरम्भ और समापन प्रणाम से करना — ये औपचारिकताएँ नहीं हैं; यही वह ढाँचा है जिसमें विद्या सुरक्षित बहती है।
पहली दीक्षा — शरीर पहले, शस्त्र बाद में
(विश्वामित्रजी कहते हैं —) बला और अतिबला नाम से प्रसिद्ध इस मन्त्र-समुदाय को ग्रहण करो। इसके प्रभाव से तुम्हें न थकान का अनुभव होगा, न ज्वर (रोग या चिन्ता का ताप) होगा, न तुम्हारे रूप-तेज में कोई ह्रास आयेगा। तात राघव! बला और अतिबला का अभ्यास करने से तीनों लोकों में तुम्हारे समान कोई नहीं रहेगा।
यह क्षण हमारे पूरे प्रशिक्षण-दर्शन की जड़ है। विश्वामित्र के पास संसार के समस्त दिव्यास्त्र हैं — पर पहली दीक्षा अस्त्र नहीं है। पहली दीक्षा है बला-अतिबला: वह विद्या जो थकान, रोग और तेज-ह्रास से बचाती है। अर्थात् — पहले शरीर और प्राण को सिद्ध करो; शस्त्र उसके बाद।
अखाड़े का क्रम ठीक यही है। नया योद्धा पहले महीनों में क्या करता है? मेइ-पडम् — शरीर के मूल संचालन; तरै-पडम् — भूमि पर पद-विन्यास; श्वास, लय, सहनशक्ति। तब कहीं जाकर कम्बु घूमता है। जो नींव के इन महीनों को "अभी असली चीज़ नहीं सीख रहे" समझता है, वह बालकाण्ड को उलटा पढ़ रहा है — यही असली चीज़ है। बला-अतिबला के बिना दिये गये अस्त्र वैसे ही हैं जैसे कच्ची दीवार पर रखा भारी छत्र।
एक और सूक्ष्म बात — ये विद्य ाएँ सरयू-तट पर, जल-स्पर्श कराकर, मन्त्रपूर्वक दी गयीं। दीक्षा का एक संस्कार होता है; विद्या यों ही हाथ में नहीं थमा दी जाती। इसीलिये हमारी स्तर-उन्नति (बेल्ट-प्रदान) भी समारोहपूर्वक होती है — तमिऴर कलै पुदुच्चेरी की साक्षी में। संस्कार विद्या को स्मृति में गाँठ की तरह बाँध देता है।
पहले शरीर सधे, फिर शस्त्र ।
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