अस्त्रों की परम्परा — कृशाश्व के पुत्र
अस्त्र कहाँ से आते हैं? वसिष्ठजी बताते हैं — वे कृशाश्व प्रजापति की सन्तानें हैं, जो पूर्वकाल में विश्वामित्र को सौंपी गयीं। शस्त्र की भी वंशावली होती है।
राम-लक्ष्मण को विदा करते समय सभा में यह प्रश्न स्वाभाविक है — विश्वामित्र के पास वह क्या है जो वे राम को देंगे? इस सर्ग में वसिष्ठजी अस्त्रों की वंशावली सुनाते हैं। ध्यान से पढ़िये: हमारी परम्परा में अस्त्र निर्जीव उपकरण नहीं — वे चेतन विद्याएँ हैं, जिनका कुल है, क्रम है, और अधिकारी को ही मिलने का नियम है।
अस्त्र विद्याएँ हैं — वस्तुएँ नहीं
समस्त अस्त्र प्रजापति कृशाश्व के परम धर्मात्मा पुत्र हैं। वे पूर्वकाल में कुशिक-नन्दन विश्वामित्र को, जब वे राज्य का शासन करते थे, प्रदान किये गये थे। कृशाश्व के वे पुत्र प्रजापति दक्ष की दो पुत्रियों की सन्तानें हैं — अनेक रूपोंवाले, महापराक्रमी, प्रकाशमान और विजय दिलानेवाले।
पहला ही वाक्य हमारी शस्त्र-दृष्टि बदल देता है — अस्त्र पुत्र हैं। वे "चीज़ें" नहीं जो दुकान से आती हैं; वे धर्मात्मा सन्तानें हैं, जो व्यक्ति से व्यक्ति को, अधिकार देखकर, सौंपी जाती हैं। और वे परमधार्मिक हैं — शस्त्र स्वयं धर्म से बँधा है; उसका दुरुपयोग उसकी प्रकृति के विरुद्ध है।
इसीलिये अखाड़े में हम आयुध को पैर नहीं लगाते, उसे लाँघते नहीं, अभ्यास के पहले उसे प्रणाम करते हैं। सिलम्बम् कम्बु या कर्लकट्टै जब हाथ में आता है, तो वह पीढ़ियों की धारा से आता है — गुरु से गुरु तक। वस्तु वही है, पर उसमें बहती विद्या जीवित है।
जया और सुप्रभा — सौ अस्त्रों की माताएँ
प्रजापति दक्ष की दो कन्याएँ हैं — जया और सुप्रभा। उन्होंने सौ परम प्रकाशमान अस्त्र-शस्त्रों को जन्म दिया। जया ने वर पाकर पचास श्रेष्ठ पुत्र प्राप्त किये — अपरिमित शक्तिवाले, रूपरहित, जो असुर-सेनाओं के वध के लिये प्रकट हुए। फिर सुप्रभा ने भी संहार नामक पचास पुत्रों को जन्म दिया — अत्यन्त दुर्जय, दुराक्रम्य और बलिष्ठ।
सौ अस्त्र — पचास प्रयोग के, पचास संहार के। संहार-अस्त्र वे हैं जो चलाये गये अस्त्र को वापस बुलाते या निष्फल करते हैं। परम्परा का गणित देखिये: छोड़ना आधी विद्या है; रोकना और लौटाना पूरी दूसरी आधी।
यह सीधे हमारे प्रशिक्षण-क्रम में उतरता है। नये योद्धा को लगता है कि प्रहार सीखना ही विद्या है; पर कोच उतना ही समय रोकने पर लगाते हैं — प्रहार को लक्ष्य से एक अंगुल पहले थाम लेना, जोड़ी-अभ्यास में साथी की गति देखकर अपनी गति घटाना, कम्बु को पूरे वेग से घुमाकर भी ठीक वहीं विराम देना जहाँ चाहा था। जो रोक नहीं सकता, वह चला भी नहीं सकता — केवल फेंक सकता है।
आगे सर्ग २७ में विश्वामित्र राम को अस्त्र देंगे, और उसके अगले ही सर्ग (२८) में उनके संहार भी सिखायेंगे। परम्परा कभी छोड़ना सिखाकर रोकना सिखाना नहीं भूलती।
नैकरूपा महावीर्या दीप्तिमन्तो जयावहाः ।
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