दिव्यास्त्र-प्रदान — पात्रता के बाद ही शस्त्र
ताटका-वध से स न्तुष्ट होकर विश्वामित्र श्रीराम को समस्त दिव्यास्त्र सौंपते हैं — वज्र से लेकर गदाएँ, पाश, अशनि और खड्ग तक। पूरा शस्त्रागार, पर परीक्षा के बाद।
ताटका-वन में परीक्षा हो चुकी। श्रीराम ने गुरु की आज्ञा को अपने संकोच से ऊपर रखा, वध-कर्म धर्म की तुला पर तौलकर किया, और यज्ञ-विघ्न का मूल काटा। अब — और केवल अब — विश्वामित्र वह देते हैं जो वे अयोध्या से लेकर चले थे।
ततो मुनिवरः प्रीतस्ताटकावधतोषितः । मूर्ध्नि राममुपाघ्राय इदं वचनमब्रवीत् ॥
ताटका-वध से सन्तुष्ट मुनिवर ने श्रीराम का मस्तक सूँघकर (व ात्सल्यपूर्वक) यह वचन कहा — और फिर खुलता है परम्परा का पूरा शस्त्रागार।
शस्त्रागार खुलता है
(विश्वामित्रजी कहते हैं —) नरश्रेष्ठ राघव! इन्द्र का वज्रास्त्र, शिवजी का श्रेष्ठ त्रिशूल, ब्रह्माजी का ब्रह्मशिर अस्त्र और ऐषीक अस्त्र — तथा महाबाहो! परम उत्तम ब्रह्मास्त्र भी मैं तुम्हें देता हूँ। ककुत्स्थ-कुलभूषण! मोदकी और शिखरी नाम की दो उज्ज्वल, मंगलमयी गदाएँ तुम्हें अर्पित करता हूँ। पुरुषसिंह राजकुमार! धर्मपाश, कालपाश और वरुण का उत्तम पाशास्त्र भी देता हूँ; और रघु नन्दन! सूखी तथा आर्द्र — दो प्रकार की अशनियाँ (विद्युत्-अस्त्र) भी।
सूची पूरी होती है — गदा से खड्ग तक
पिनाक-सम्बन्धी अस्त्र और नारायणास्त्र भी देता हूँ; अग्नि का प्रिय आग्नेयास्त्र, जो 'शिखर' नाम से प्रसिद्ध है; और अनघ! अस्त्रों में प्रधान वायव्यास्त्र भी। हयशिर नामक अस्त्र, क्रौञ्चास्त्र तथा दो शक्तियाँ भी तुम्हें देता हूँ। कंकाल, घोर मूसल, कपाल और किंकिणी — ये सब, जो राक्षसों के वध में उपयोगी हैं, समस्त रूप से तुम्हें अर्पित करता हूँ; और विद्याधरों का 'नन्दन' नामक म हान् अस्त्र (उत्तम खड्ग) भी।
इस सूची को केवल नामावली मत समझिये — यह एक पाठ्यक्रम का नक्शा है। देखिये इसमें कितने प्रकार हैं: प्रहार-अस्त्र (वज्र, शूल), गदाएँ (मोदकी, शिखरी), पाश — बाँधनेवाले, जो मारते नहीं, रोकते हैं (धर्मपाश, कालपाश, वारुणपाश), तत्त्व-अस्त्र (आग्नेय, वायव्य, अशनि), शक्तियाँ, मूसल, और खड्ग। पूर्ण योद्धा किसी एक शस्त्र का बन्दी नहीं होता — वह दूरी, दिशा और धर्म के अनुसार साधन चुनता है।
हमारा पाठ्यक्रम इसी नक्शे की छोटी प्रतिकृति है — सिलम्बम् कम्बु (दण्ड-वर्ग), कर्लकट्टै और गदा (गदा-वर्ग), पोडि-कुची (लघु-दण्ड), और आगे के स्तरों पर शास्त्रीय आयुध। क्रम वही है जो विश्वामित्र का है: एक-एक कर, नाम लेक र, हाथ में देकर।
पर इस सर्ग की आत्मा सूची नहीं, समय है। ये अस्त्र अयोध्या में नहीं दिये गये — यद्यपि विश्वामित्र चाहते तो पहले ही दिन दे सकते थे। ये मिले परीक्षा के बाद: जब शिष्य ने आज्ञा-पालन, धर्म-विवेक और संकट में स्थिरता — तीनों दिखा दिये। अस्त्र-विद्या पात्रता का पुरस्कार है, प्रवेश-शुल्क नहीं। इसीलिये अखाड़े में कोई योद्धा यह नहीं पूछता कि "अगला हथियार कब मिलेगा" — वह पूछता है, "मैं अगले हथियार के योग्य कब बनूँगा।" उत्तर कोच की आँखों में होता है, कैलेंडर में नहीं।
ध्यान रहे — अगले ही सर्ग (२८) में विश्वामित्र इन अस्त्रों के संहार (वापस बुलाने की विधियाँ) भी सिखाते हैं, और अस्त्र विनीत होकर श्रीराम से कहते हैं — "आज्ञा दीजिये, हम आपकी से वा में हैं।" शक्ति जब संयम से मिलती है, तो वह स्वामी नहीं, सेवक बनकर रहती है।
सर्ग २७ पर चर्चा (0)
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