विश्वामित्र का बुलावा — यज्ञ-रक्षा का दायित्व
महर्षि विश्वामित्र दशरथ से किशोर श्रीराम को यज्ञ-रक्षा हेतु माँगते हैं। शत्रु भी 'सुशिक्षित' हैं — इसीलिये शिक्षा को श्रेष्ठतर होना पड़ता है।
अयोध्या की सभा में महर्षि विश्वामित्र पधारते हैं और राजा दशरथ से एक ऐसी माँग रखते हैं जो पिता का हृदय काँपा देती है — यज्ञ की रक्षा के लिये किशोर राम को माँगना। यह सर्ग हमें दिखाता है कि शिष्य के जीवन में वह क्षण कैसे आता है जब गुरु उसे घर की सुरक्षा से निकालकर वास्तविक दायित्व के मैदान में ले जाता है।
शत्रु भी सुशिक्षित हैं
(विश्वामित्रजी कहते हैं —) मेरे व्रत का अधिकांश कार्य पूर्ण हो चुका है; अब उसकी समाप्ति के समय दो राक्षस विघ्न डालते हैं — मारीच और सुबाहु। वे दोनों बलवान् भी हैं और सुशिक्षित भी।
इस श्लोक का एक शब्द हर अभ्यासी को याद रखना चाहिये — सुशिक्षितौ। विश्वामित्र यह नहीं कहते कि विघ्न डालनेवाले केवल बलवान् हैं; वे कहते हैं कि वे प्रशिक्षित हैं। अधर्म भी अभ्यास करता है। इसीलिये धर्म के पक्ष को अभ्यास में शिथिल होने का अधिकार नहीं।
यह हमारे लिये अखाड़े का सबसे व्यावहारिक पाठ है: नियमित अभ्यास कोई विलास नहीं, दायित्व है। जो रक्षा करना चाहता है — अपने परिवार की, अपने समाज की, अपनी परम्परा की — उसे उतना ही सधा होना चाहिये जितना चुनौती देनेवाला है, और उससे अधिक।
दूसरी बात — विश्वामित्र स्वयं परम समर्थ हैं, पर व्रत-काल में शस्त्र नहीं उठाते; वे मर्यादा में बँधे हैं। इसीलिये वे योग्य रक्षक माँगते हैं। समर्थ होकर भी अपने नियम का पालन करना — यही व्रत की परिभाषा है। कक्षा में भी वरिष्ठ योद्धा जब नये साथियों के साथ जोड़ी-अभ्यास करता है, तो वह अपनी पूरी शक्ति नहीं, अपनी पूरी मर्यादा लेकर उतरता है।
गुरु शिष्य को माँगता है — पिता से
विश्वामित्र दशरथ से कहते हैं — मुझे अपनी चतुरंगिणी सेना नहीं चाहिये, मुझे केवल राम चाहिये। दस दिन का यज्ञ है, और उसकी रक्षा वही किशोर कर सकता है। दशरथ का हृदय डगमगाता है — राम अभी सोलह वर्ष के भी नहीं। तब कुलगुरु वसिष्ठ राजा को समझाते हैं: विश्वामित्र स्वयं समस्त अस्त्रों के ज्ञाता हैं; वे राम को लेकर जा नहीं रहे, राम को बनाने ले जा रहे हैं।
यह प्रसंग गुरु-शिष्य परम्परा की एक गहरी सच्चाई कहता है — कई बार गुरु शिष्य में वह देख लेता है जो माता-पिता का वात्सल्य नहीं देखने देता। दशरथ को राम बालक दिखते हैं; विश्वामित्र को उनमें लोक-रक्षक दिखता है।
अभिभावकों के लिये यहाँ एक कोमल संकेत है। जब बच्चा अखाड़े की चटाई पर उतरता है, तो कोच उसे थोड़ा तपाता है — अनुशासन, पुनरावृत्ति, कभी-कभी असफलता भी। वसिष्ठ की तरह भरोसा रखिये: योग्य गुरु के पास भेजा हुआ बच्चा घटता नहीं, बढ़कर लौटता है। और बच्चों के लिये: जब कोच तुम्हें कोई कठिन दायित्व दे — नयी चाल, मंच पर प्रदर्शन, छोटे साथियों की सहायता — तो समझो कि उसने तुममें कुछ देखा है।
सर्ग १९ पर चर्चा (0)
अभी कोई टिप्पणी नहीं — पहली जिज्ञासा आप रखिए।

