मल्लपुराण भारतवर्ष की मल्लविद्या — मल्ल-युद्धम्, व्यायाम, आहार, दिनचर्या और योद्धा-अनुशासन — का एक प्राचीन शास्त्र है। यह गुजरात की ज्येष्ठीमल्ल (जेठीमल्ल) परम्परा का ग्रंथ है — उन ब्राह्मण-मल्लों की परम्परा जिन्होंने शस्त्र और शास्त्र दोनों को एक साथ धारण किया, और जिन्होंने अपने मंदिरों, गोधन और धर्म की रक्षा अपनी भुजाओं के बल पर की। ग्रंथ का ढाँचा ब्रह्मा और नारद के संवाद के रूप में है — जहाँ पूज्य नारद मुनि कौतूहलपूर्वक मल्लविद्या का विस्तार से ज्ञान माँगते हैं, और ब्रह्मा जी उसे युग-युगान्तर की कथाओं, लक्षणों और अभ्यास-विधियों के साथ प्रकट करते हैं। इसकी अठारह अध्यायों में मल्लों के भेद, पंचांग-लक्षण, अखाड़े (रंगभूमि) का निर्माण, श्रम के प्रकार, आहार-विज्ञान, त्रिदोष-निवारण, स्तंभ-श्रम (मलखंब), प्रहार और पैंतरे, जोड़ी बनाने के नियम, तथा युद्ध के धर्म-सम्मत प्रकार — सब कुछ क्रमबद्ध रूप से आता है। यह केवल कुश्ती का ग्रंथ नहीं; यह उस समग्र योद्धा-जीवन का विज्ञान है जिसमें शरीर, मन, बुद्धि और आहार को धर्म के अनुशासन में गढ़ा जाता है। हमारे लिए यह ग्रंथ पराया नहीं है। कर्ला कुतूहल अखाड़ा उन्हीं समय-सिद्ध भारतीय पद्धतियों को जीवित रखता है — सिलंबम, कुथु-वरिसाई, कर्लाकट्टई और शास्त्रीय आयुधों की साधना — जिनकी जड़ें इसी मल्ल-परम्परा में हैं। इसीलिए हम मल्लपुराण को केवल एक पुराने पाठ की तरह नहीं, बल्कि अपने अखाड़े की जीवित वंश-धारा के एक स्रोत-ग्रंथ की तरह प्रकाशित कर रहे हैं। मूल श्लोकों का यह सानुवाद हिंदी भाष्य हमारे घर की ही साधना है — जहाँ टीका में प्राचीन शास्त्र को आज की अभ्यास-भूमि से जोड़ा गया है, बिना मूल की गरिमा को छुए। इसे कैसे पढ़ें। प्रत्येक अध्याय दो रूपों में पढ़ा जा सकता है। मूल-पाठ दृष्टि में केवल संस्कृत श्लोक और अध्याय के विभाग-शीर्षक दिखते हैं — उन साधकों के लिए जो सीधे मूल का पाठ और कंठस्थीकरण करना चाहते हैं। सभाष्य दृष्टि में हर श्लोक के साथ उसका हिंदी अर्थ और टीका (व्याख्या एवं युद्ध-कला संबंध) भी खुलती है — उन अध्येताओं के लिए जो भाव और प्रयोग दोनों समझना चाहते हैं। जहाँ-तहाँ अभ्यास संकेत के रूप में अखाड़े की व्यावहारिक टिप्पणियाँ भी दी गई हैं। आइए, इस विद्या को उसी भाव से ग्रहण करें जिस कौतूहल से नारद मुनि ने माँगा था — श्रद्धा, अनुशासन और अभ्यास के साथ। हर हर महादेव 🚩