मल्लपुराण
चर्चा
अध्याय

मल्लविद्या का दिव्य प्रादुर्भाव

कृष्ण-बलराम का मयूरवं बाल (मोढेरा) में प्रवेश मल्लविद्या के दिव्य उद्गम को दर्शाता है। रामायण और कृष्णावतार के बीच सेतु बनाकर ब्राह्मण-मल्ल वंश को यह विद्या कलियुगीन आत्मरक्षा के साधन के रूप में दी जाती है।

अनुबंध चतुष्टय

नारद उवाच । ब्रह्मोवाच । मल्लपुराणम् । प्रथमोऽध्यायः । एकस्मिन् कमला कटाक्षविवरे सानन्दमाधार्यते क्षीराब्धेरपरत्र दीर्घधवलैः कल्लोललोलोत्करैः । व्यग्रस्यापि समर्थितप्रमथनव्यापारलब्धोदया- श्चत्वारो वितरन्तु वाञ्छितफलं धन्या हरेर्बाहवः ॥ १ ॥
हिंदी अर्थ

भगवान हरि (विष्णु) की वे चारों धन्य भुजाएं हमें हमारा मनचाहा फल प्रदान करें — जो भुजाएं एक ओर माता लक्ष्मी (कमला) के प्रेमपूर्ण कटाक्ष (दृष्टि) और सान्निध्य में आनंदपूर्वक आश्रय ले रही हैं; जो दूसरी ओर क्षीरसागर की लंबी, उज्ज्वल और चंचल लहरों के बीच (शेषशय्या पर) स्थित हैं; और जो (इस परम शांति और आनंद में मग्न होने पर भी) समुद्र मंथन जैसे अत्यंत भयंकर व श्रमसाध्य कार्य को सफलतापूर्वक संपन्न करके महान यश, गौरव और अपनी असीम शक्ति का उत्कर्ष (उदय) स्थापित कर चुकी हैं।

टीका

व्याख्या: यह मंगलाचरण है। प्रायः शास्त्रकार किसी भी ग्रंथ का प्रारम्भ मंगलाचरण से करते हैं। इसके पीछे प्रयोजन यह है कि इष्टदेव की वंदना से ग्रंथ निर्विघ्न रूप से सम्पन्न हो, बीच में आने वाले विघ्नों का नाश हो, तथा ग्रंथकार, अध्येता एवं पाठक — तीनों का कल्याण हो और उन्हें अभीष्ट फल की प्राप्ति हो। साथ ही यह आस्तिक परम्परा का सूचक है, जिसमें प्रत्येक श्रेष्ठ कार्य का आरम्भ ईश्वर-स्मरण से किया जाता है। यहाँ भगवान विष्णु की चार भुजाओं की वंदना की गई है। युद्ध कला में बाहुबल (भुजाओं की शक्ति) का अत्यधिक महत्व है। मल्लविद्या (कुश्ती) और बाहुयुद्ध (कुथु-वरिसाई) में भुजाएं ही प्रमुख शस्त्र हैं। शस्त्र कलाओं में भी भुजाओं का महत्व है। एक श्रेष्ठ योद्धा का दिमाग क्षीरसागर की तरह शांत और एकाग्र होना चाहिए, लेकिन उसका शरीर समुद्र मंथन करने वाले जैसी उग्र ऊर्जा और शक्ति से भरा होना चाहिए।

कुश्ती के अखाड़े में जब दो मल्ल आपस में गुत्थम-गुत्था होते हैं, तो वह स्थिति किसी 'मंथन' से कम नहीं होती। जिस प्रकार समुद्र मंथन से चौदह अनमोल रत्न (और अंततः अमृत) निकले थे, उसी प्रकार कठोर शारीरिक अभ्यास रूपी मंथन से ही एक योद्धा को बल, कौशल और 'विजय रूपी अमृत' की प्राप्ति होती है।

श्री हरि के आशीर्वाद से ही यह दुर्लभ कार्य संभव हो सकता है। इस एक मंगलाचरण श्लोक के माध्यम से हमें भगवान नारायण के अनेक अवतारों में की गई अनेक लीलाओं का स्मरण करना चाहिए और भगवान से प्रार्थना करनी चाहिए कि हमें भी धर्म के हित के लिए वह सद्बुद्धि, बल व पराक्रम प्रदान करें।

नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् । देवीं सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत् ॥ २ ॥
हिंदी अर्थ

नारायण (भगवान विष्णु), नरों में श्रेष्ठ नर (अर्जुन या ऋषि नर), देवी सरस्वती और व्यास जी को नमस्कार करके 'जय' (अर्थात् महाभारत, पुराण या इतिहास) का उच्चारण (आरंभ) करना चाहिए।

टीका

व्याख्या: यह महाभारत ग्रंथ का मंगलाचरण है। महाभारत ग्रंथ 'जय' नाम से भी जाना जाता है। प्रस्तुत ग्रंथ में इस श्लोक का भाव इस प्रकार देखा जा सकता है — मैं योगेश्वर श्री वासुदेव कृष्ण भगवान को गुरु रूप में, धर्म में स्थिर महानतम योद्धा अर्जुन को अपना अनुसरणीय जानकर, सरस्वती माता को इस विद्या को देने वाली देवी जानकर, और भगवान श्री कृष्णद्वैपायन व्यास जी को इस ज्ञान के प्रवाहक ऋषि जानकर नमन करता हूँ।

धर्माधर्मविधिः प्रोक्तो ब्रह्मन् सम्यक् श्रुतो मया । विद्याश्च विविधाः स्वामिन् वर्णभेदास्त्वनेकधा ॥ ३ ॥ मल्लविद्या त्वया प्रोक्ता मम संक्षेपतः पुरा । विस्तरेण मम ब्रूहि तस्यां कौतूहलं हि मे ॥ ४ ॥
हिंदी अर्थ

(नारद जी कहते हैं) हे ब्रह्मन्! आपने धर्म और अधर्म की विधियां कही हैं, जिन्हें मैंने भली-भांति सुना है। हे स्वामी! आपने विविध विद्याओं और अनेक प्रकार के वर्ण-भेदों का भी वर्णन किया है। आपने मुझे पहले 'मल्लविद्या' (कुश्ती/युद्ध कला) के बारे में संक्षेप में बताया था। अब मेरे मन में उसे विस्तार से जानने का बहुत कौतूहल है, अतः कृपया विस्तार से बताएं।

टीका

व्याख्या: नारद जी ब्रह्मा जी से संवाद कर रहे हैं। उन्होंने धर्मशास्त्र और अन्य विद्याएं सीख ली हैं, लेकिन अब वे विशिष्ट रूप से मल्लविद्या जानना चाहते हैं। भारतीय पुराण व इतिहास प्रायः महापुरुषों की संवादीय प्रणाली से जन-मानस को अनेकानेक विद्याएं व संदेश देते हैं। शास्त्रीय प्रणाली में ग्रंथ प्रारम्भ करने से पूर्व अनुबंध चतुष्टय — अर्थात् अधिकारी, विषय, संबंध व फल — की ओर संकेत किया जाता है। प्रस्तुत श्लोक में प्रथम दो की ओर संकेत देखा जा सकता है। मल्लयुद्ध का अधिकारी वह है जो धर्म का प्रारूप समझता हो या जानने की इच्छा रखता हो।

नारद जी कहते हैं कि धर्म-व्याख्या में ब्रह्मा जी ने अनेक विद्याओं का वर्णन किया था। यहाँ जानना होगा कि नीतिशास्त्रों में मल्लविद्या का उल्लेख चार मुख्य विद्याओं — आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता एवं दण्डनीति — के संदर्भ में सबसे मूलभूत आधार के रूप में आता है। इन चारों विद्याओं के संबंध में कौटिल्य अपने अर्थशास्त्र के द्वितीय अध्याय में विभिन्न आचार्यों के मत उद्धृत करते हैं:

आन्वीक्षकीत्रयीवार्ता दण्डनीतिश्चेति विद्याः ॥ १ ॥ त्रयी वार्ता दण्डनीतिश्चेति मानवाः ॥ २ ॥ त्रयीविशेषो ह्यान्वीक्षकीति ॥ ३ ॥ वार्ता दण्डनीतिश्चेति वार्हस्पत्याः ॥ ४ ॥ संवरणमात्रं हि त्रयी लोकयात्राविद इति ॥ ५ ॥ दण्डनीतिरेका विद्या इत्यौशनसाः ॥ ६ ॥ तस्यां हि सर्वविद्यारम्भाः प्रतिबद्धा इति ॥ ७ ॥

कौटिल्य अर्थशास्त्र, द्वितीय अध्याय
टीका

अर्थात् — आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता और दण्डनीति — ये चार प्रकार की विद्याएं हैं। मनु के अनुयायी आन्वीक्षिकी को त्रयी का ही अंग मानते हैं। बृहस्पति के अनुयायी वार्ता और दण्डनीति — इन दो व्यावहारिक विद्याओं को ही प्रधान मानते हैं। उशनस् (शुक्राचार्य) के अनुयायी दण्डनीति को ही एकमात्र विद्या मानते हैं, क्योंकि समस्त विद्याओं का आरम्भ इसी पर आश्रित है — इसके बढ़ने पर अन्य विद्याएं बढ़ती हैं और घटने पर घटती हैं।

आगे नारद जी कहते हैं कि ब्रह्मा जी ने वर्णभेदों का ज्ञान भी दिया था। वर्णाश्रम ही सनातन धर्म, सनातन विद्या व कला का आधार है। सभी कलाएं व विधियां व्यक्ति-विशेष के गुण, कर्म व अवस्था के अनुसार करने पर ही कल्याणकारी होती हैं। इसी प्रकार आयु या अवस्था (आश्रम) के आधार पर हमारे जीवन के कर्तव्य-धर्म बतलाते रहते हैं। हमारे शरीर, मन, बुद्धि व जीवन — सभी को गुण, कर्म व आश्रम के आधार पर वर्णाश्रम में सुव्यवस्थित रूप से समझा जा सकता है, और इसी गुणधर्म के आधार पर आयुर्वेद में औषधि, तथा धनुर्वेद में शस्त्र व श्रम अभ्यास आदि निर्धारित होते हैं।

यह सब जानने के पश्चात पूज्य नारद मुनि मल्लविद्या — जो धर्म या नीतिशास्त्रों का अभिन्न अंग है — में विशेष रुचि के कारण कौतूहल के साथ गुरु से जानने की इच्छा दर्शाते हैं। आज भी मल्लविद्या के आचार्यों व शिष्यों को चाहिए कि वे केवल मल्लविद्या ही नहीं, अपितु धर्म का विस्तृत ज्ञान रखें व उसका प्रतिपादन भी करें। इस ग्रंथ का विषय मल्लविद्या है। मल्लविद्या का व्यापक अर्थ केवल मल्ल-युद्ध ही नहीं, अपितु वह कला व विज्ञान है जिसके अभ्यास से मनुष्य अपने मन, कर्म व बुद्धि से सुदृढ़ हो, मल्ल-योद्धाओं के समान निर्भय हो, और अपने स्वधर्म, कुलधर्म व मानवधर्म का निर्भय होकर पालन करने में सक्षम हो पाए। इस ग्रंथ में सभी आयु, शारीरिक अवस्था व प्रवृत्तियों के अनुसार अनेक प्रकार के श्रम-अभ्यास, दिनचर्या, ऋतुचर्या, व्यायाम व नियम आदि हैं।

शृणु पुत्र शुभां विद्यां कथ्यमानां मयानघ । यदभ्यासान्नरः सम्यक् शत्रून् जयति सत्वरः ॥ ५ ॥
हिंदी अर्थ

(ब्रह्मा जी कहते हैं) हे निष्पाप पुत्र! सुनो, मैं उस शुभ विद्या को कह रहा हूँ, जिसके सम्यक (ठीक प्रकार से) अभ्यास से मनुष्य शीघ्र ही शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर लेता है।

टीका

व्याख्या: यहाँ अनुबंध चतुष्टय में से बाद के दो — अर्थात् फल व संबंध — के विषय में बताया गया है। शत्रु पर शीघ्र विजय इस विद्या का आत्यन्तिक फल है। गुरु को ध्यान से सुनना व अभ्यास के द्वारा यह फल पाया जा सकता है, जो कि ग्रंथ के विषय व फल में संबंध स्थापित करता है।

आइए जानें शत्रु कौन है। धर्म का शत्रु अधर्म है। जो साधक धर्म का भली-भांति विवेक रखता हो व धर्म-पथ पर अग्रसर हो, उसके लिए अधर्म के आश्रयभूत गुण, कर्म व अधर्मी मनुष्य शत्रु होंगे। धर्म वही है जो सबके लिए कल्याणकारी हो व पूर्वजों के दिखाए मानव-मूल्यों के संगत हो। सत्य रूपी धर्म ही सभी पुरुषार्थों (अर्थ, काम व मोक्ष) का दायक है। दण्ड-नीति के द्वारा ही धर्म स्थापित होता है। यह सभी कथन भगवद्गीता, शुक्रनीति, मनुस्मृति, अर्थशास्त्र व अनेक धर्मशास्त्रों में बताए गए हैं, और इतिहास के अनेक उदाहरण इसकी पुष्टि करते हैं।

उपरोक्त श्लोक में आत्यन्तिक फल सूक्ष्मता से एक सूत्र रूप में ही कहा गया है; परन्तु यहाँ हम कुछ प्रसंग लेते हैं जहाँ और व्यक्त रूप में फलश्रुति है। पहले इसी ग्रंथ के अगले (द्वितीय) अध्याय से:

तेन तुभ्यं प्रदास्यामि विद्यां शुद्धां मम प्रियाम् । युगे समागते म्लेच्छप्रायाश्च भूभुजाः ॥ १० ॥ वृत्तिलोपं करिष्यन्ति पीडयिष्यन्ति गोद्विजान् । ततस्ते कां मल्लविद्यां ददामि ते द्विजोत्तम ॥ ११ ॥ प्रधानं सर्वविद्यानां यया वृत्तिर्न जायते । पच्यते सर्वधातुश्च मल्लविद्याविधारणात् ॥ १२ ॥

मल्लपुराण · द्वितीय अध्याय, श्लोक १०–१२
हिंदी अर्थ

इसलिए मैं तुम्हें अपनी प्रिय और शुद्ध विद्या प्रदान करूँगा। (कलियुग) आने पर राजा लोग प्रायः म्लेच्छ (अधर्मी — सनातन धर्म से विमुख) स्वभाव के हो जाएंगे। वे ब्राह्मणों की जीविका नष्ट करेंगे और गायों तथा ब्राह्मणों को पीड़ित करेंगे। इसलिए हे द्विजोत्तम! मैं तुम्हें 'मल्लविद्या' देता हूँ। यह सभी विद्याओं में प्रधान है। इससे न केवल जीविका चलेगी, बल्कि मल्लविद्या के अभ्यास से शरीर की सभी धातुएं (रस, रक्त, मांस, मज्जा, अस्थि, शुक्र आदि) भी परिपक्व (मजबूत) हो जाती हैं।

टीका

आत्मरक्षा का सिद्धांत: यह श्लोक मल्लपुराण और धनुर्वेद का सार है। कृष्ण स्पष्ट कहते हैं कि भविष्य में 'म्लेच्छ' स्वभाव के शासक धर्म (गो-द्विज) को पीड़ित करेंगे। ऐसे समय में केवल शास्त्र-ज्ञान नहीं, बल्कि शस्त्र-ज्ञान और शारीरिक बल (मल्लविद्या) ही रक्षा करेगा।

इतिहास से संबंध: यह भविष्यवाणी भारत के मध्यकालीन इतिहास (आक्रमण-काल) से मेल खाती है, जहाँ अनेक मंदिरों और गुरुकुलों को नष्ट किया गया। जेठी मल्ल ब्राह्मणों ने अपनी कुश्ती और युद्ध-कौशल का उपयोग करके कई बार अपनी और अपने मंदिरों की रक्षा की।

स्वास्थ्य लाभ: 'पच्यते सर्वधातुश्च' — आयुर्वेद के अनुसार व्यायाम से जठराग्नि बढ़ती है और सप्त धातुएं पुष्ट होती हैं।

सर्वकामप्रदा ह्येषा सर्वलोकाभिमोहिनी । अनया साध्यते धर्मः कामः सम्यगवाप्यते ॥ १५ ॥ मोक्षोऽपि प्राप्यतेऽभ्यासात् मदभ्यस्ता पुरा यतैः । ममाङ्गसंस्थितां विद्यां धारयिष्यन्ति भूतले ॥ १६ ॥

मल्लपुराण · द्वितीय अध्याय, श्लोक १५–१६
हिंदी अर्थ

मल्लविद्या सभी कामनाएं पूरी करती है और लोकों को मोहित करती है। इससे धर्म सधता है और काम की प्राप्ति होती है। इसके अभ्यास से मोक्ष भी प्राप्त होता है, क्योंकि पूर्वकाल में यतियों (योगियों) ने भी इसका अभ्यास किया है। मेरे अंगों में स्थित इस विद्या को लोग पृथ्वी पर धारण करेंगे।

टीका

धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष: मल्लविद्या को चारों पुरुषार्थों का साधन बताया गया है। स्वस्थ शरीर से धर्म व अर्थ, यश से काम, और योग/संयम से मोक्ष प्राप्त होता है। इसी फलश्रुति की पुष्टि वशिष्ठ धनुर्वेद, सिलंबम की तमिल अभिलेख-परम्परा और भगवद्गीता में भी मिलती है — जहाँ धर्म, गो, ब्राह्मण, स्त्री व बालक की रक्षा हेतु प्राण अर्पित करने वाले योद्धा को परम गति का अधिकारी कहा गया है।

मल्लविद्या का प्रादुर्भाव व मोढेरा-आगमन

पुरा कंसे हते दैत्ये चाणूरे च निपातिते । संप्राप्ते मथुराराज्ये भोगान् भुक्त्वा बहूंस्तथा ॥ ६ ॥ कृष्णश्च बलभद्रश्च परमात्मदयान्वितौ । स्वीकर्तुं द्वारकां रम्यां चलितौ हर्षसंयुतौ ॥ ७ ॥
हिंदी अर्थ

प्राचीन काल में जब दैत्य कंस का वध हो गया और (मल्ल) चाणूर भी मारा गया, तब मथुरा का राज्य प्राप्त होने पर बहुत से भोग भोगने के बाद, परम दयालु परमात्मा स्वरूप कृष्ण और बलराम हर्षपूर्वक रमणीय द्वारका नगरी को स्वीकार करने (बसाने) के लिए चल पड़े।

टीका

व्याख्या: यह मल्लपुराण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है। कंस और चाणूर का वध मल्ल-युद्ध (कुश्ती) द्वारा ही हुआ था। यह स्थापित करता है कि यह ज्ञान वैदिक है। रामायण काल में भी अनेक प्रसंग — जैसे विराध-वध आदि — मल्लयुद्ध के प्रयोग को दर्शाते हैं। महाभारत में अनेक अखाड़े थे, जिनमें से जरासंध का अखाड़ा आज भी देखा जा सकता है।

चाणूर एक प्रसिद्ध मल्ल था। कृष्ण और बलराम ने उसे अपनी मल्लविद्या से हराया। यह सिद्ध करता है कि कौशल आकार पर भारी पड़ता है। यह ऐतिहासिक कथन संबंध को उदाहरण के साथ दृढ़ता देता है। यहाँ प्रस्तुत भगवत्-लीला से, या हमारे पूर्वजों के अनेक महान कर्मों से, हम सरलता से शत्रु-बोध कर सकते हैं। जो कंस, हिरण्यकश्यप, रावण, नरकासुर जैसे कर्म करे — वही शत्रु है। इतिहास के हर काल में हमें अनेक वीर योद्धाओं के उदाहरण मिलते हैं — महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी महाराज, रानी वेल्लु नचियार, गुकाला जाट, सीताराम राजु, गुरु गोविंद सिंह — और अनेक वीरों ने कलिकाल में भी अधर्म के विरुद्ध विजय-पताका को थामे रखा।

सुखप्रयाणकैर्देशान् पश्यन्तौ विविधान् बहून् । प्राप्तौ मयूरवं बालं नाम्ना नगरमुत्तमम् ॥ ८ ॥
हिंदी अर्थ

सुखपूर्वक यात्रा करते हुए और अनेक विविध देशों को देखते हुए, वे (कृष्ण और बलराम) 'मयूरवं बाल' (मोढेरा का प्राचीन नाम) नामक उत्तम नगर में पहुँचे।

टीका

ऐतिहासिक संदर्भ: यह स्थान गुजरात का आधुनिक 'मोढेरा' माना जाता है, जो सूर्य मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। मल्लपुराण इसी क्षेत्र की 'जेठी मल्ल' परम्परा और उनकी कुश्ती-परम्परा का ग्रंथ है।

मोढेरा की स्थापना व इतिहास

त्रेतायां रामचन्द्रेण सीतामुत्सृज्य जानकीम् । पश्चाद् गुरुं समानीय प्रायश्चित्तं समाचरत् ॥ ९ ॥
हिंदी अर्थ

त्रेता युग में श्रीरामचंद्र जी ने जानकी (सीता) का परित्याग करने के बाद, गुरु (वशिष्ठ आदि) को बुलाकर प्रायश्चित किया था।

टीका

व्याख्या: यहाँ स्थान की महत्ता बताई जा रही है कि यह वही स्थान है जहाँ राम ने प्रायश्चित किया था।

अहो ब्रह्मन् त्वया प्राप्तो रावणो ब्रह्मराक्षसः । तस्य पापस्य शुद्ध्यर्थमुपायं मे द्विजोत्तम ॥ १० ॥
हिंदी अर्थ

(राम ने पूछा था) हे ब्रह्मन् (गुरु)! मैंने रावण का वध किया, जो एक ब्रह्मराक्षस (ब्राह्मण) था। हे द्विजोत्तम! उस (ब्रह्महत्या के) पाप की शुद्धि के लिए मुझे उपाय बताएं।

टीका

युद्ध कला संबंध: एक योद्धा के लिए युद्ध के बाद मानसिक शुद्धि आवश्यक है। युद्ध में हिंसा अनिवार्य हो सकती है, लेकिन उसका मानसिक भार योद्धा को वहन करना पड़ता है। प्राचीन भारत में युद्ध के बाद 'प्रायश्चित' कर्म योद्धाओं को सामान्य जीवन में लौटने में सहायता करते थे।

नारद उवाच । अश्वमेधस्य यज्ञस्य फलेन शुभमिच्छसि । हे राम सीतया सार्धं यज्ञश्च क्रियते त्वया ॥ ११ ॥
हिंदी अर्थ

(उस समय) नारद जी ने कहा — हे राम! यदि आप अश्वमेध यज्ञ के फल से शुभ चाहते हैं, तो आपको सीता के साथ यज्ञ करना चाहिए।

सुवर्णमूर्तिं कृत्वा हि यज्ञः प्रारभ्यते त्वया । जाते यज्ञे च संपूर्णे ब्राह्मणांश्च प्रदापयेत् ॥ १२ ॥
हिंदी अर्थ

(सीता की अनुपस्थिति में) आप उनकी स्वर्ण-मूर्ति बनाकर यज्ञ प्रारंभ करें, और यज्ञ पूर्ण होने पर ब्राह्मणों को दान दें।

टीका

सांस्कृतिक संदर्भ: यह श्लोक रामायण के उत्तरकांड की कथा से मेल खाता है।

ज्येष्ठांश्च कुण्डले दत्त्वा चातुर्वेदे च मुद्रिकाम् । द्विवेदिने स्त्री दातव्या चतुर्थे निष्क्रयस्तथा ॥ १३ ॥
हिंदी अर्थ

(दान में) ज्येष्ठ ब्राह्मणों को कुंडल, चतुर्वेदी ब्राह्मणों को मुद्रिका, द्विवेदी ब्राह्मणों को स्त्रियां और चौथे प्रकार के लोगों को धन (निष्क्रय) देना चाहिए।

आसनान्यङ्गवस्त्राणि तण्डुलाः पङ्कमेव च । एवं च रामचन्द्रेण मोहेरे स्थापिता पुरा ॥ १४ ॥
हिंदी अर्थ

आसन, अंगवस्त्र, चावल और अनुलेपन (चंदनादि) — इस प्रकार प्राचीन काल में रामचंद्र जी ने 'मोहेर' (मोढेरा) की स्थापना की।

टीका

ऐतिहासिक महत्व: यह श्लोक स्पष्ट रूप से 'मोहेर' (मोढेरा) नगर की स्थापना का श्रेय भगवान राम को देता है।

सर्वेषां चैव विप्राणां वृत्तिं दत्त्वा विसर्जयेत् । कति वर्षाणि जातानि अन्योन्यं युद्धमेव च ॥ १५ ॥
हिंदी अर्थ

सभी ब्राह्मणों को आजीविका (वृत्ति) देकर विदा किया गया। (परंतु बाद में) कई वर्ष बीतने पर उन ब्राह्मणों में आपस में युद्ध/कलह होने लगा।

टीका

युद्ध कला संबंध: यह पंक्ति महत्वपूर्ण है। ब्राह्मणों के बीच 'युद्ध' का उल्लेख संकेत देता है कि यह समुदाय केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं था, बल्कि शास्त्र और शस्त्र दोनों में निपुण था। यही ब्राह्मण आगे चलकर 'मल्ल' (योद्धा/पहलवान) बने, जो मल्लपुराण का मुख्य विषय है।

ततः कुण्डलमुत्पाते यत्रस्थे तत्र जायते । किञ्चित्कालं तु निवृत्य पश्चाद्राममयाचत ॥ १६ ॥
हिंदी अर्थ

तब (कलह के दौरान) कुंडल उछलकर जहाँ गिरा, वहीं वे (ब्राह्मण) स्थित हो गए। कुछ समय तक वहां रहकर उन्होंने फिर से राम की प्रार्थना/याचना की।

वयं सर्वेऽपि दुष्प्राप्या अग्रेमे किञ्च करिष्यसे । वरं कृष्णावतारे च द्वापरान्ते प्रदीयते ॥ १७ ॥
हिंदी अर्थ

(उन्होंने कहा) हम सभी के लिए जीविका दुर्लभ है, आगे हम क्या करेंगे? (तब कहा गया कि) द्वापर युग के अंत में कृष्णावतार के समय तुम्हें वरदान (जीविका/विद्या) दिया जाएगा।

टीका

भविष्यवाणी: यह श्लोक रामायण काल (त्रेता) को महाभारत काल (द्वापर) से जोड़ता है, और बताता है कि मल्लविद्या का ज्ञान कृष्ण द्वारा इन ब्राह्मणों को क्यों दिया जाएगा।

प्रदत्तं ब्राह्मणान् पूर्वं रामेण स्थितिहेतवे । जपयज्ञाग्निहोत्रादिक्रियासंवादचेतसाम् ॥ १८ ॥
हिंदी अर्थ

राम ने पूर्व में ब्राह्मणों की स्थिति (बसावट) के लिए दान दिया था, जिनका चित्त जप, यज्ञ, अग्निहोत्र आदि क्रियाओं और संवाद (शास्त्रार्थ) में लगा रहता था।

नगर-माहात्म्य व वृद्धसर तीर्थ

किं तन् मयूरवं बालं नाम्ना नगरमुत्तमम् । कस्मिन् देशेऽभवद्विद्वन् किं पुण्यं तद् वद प्रभो ॥ १९ ॥
हिंदी अर्थ

(नारद पूछते हैं) हे विद्वन्! वह 'मयूरवं बाल' नामक उत्तम नगर क्या है? हे प्रभो! वह किस देश में स्थित था और उसका क्या पुण्य (महत्व) है?

ब्रह्मोवाच । धर्मारण्यस्य मध्येऽभूत् शृणु नारद सादरम् । लोहासुरस्य पूर्वे च मोहेरस्य समीपतः ॥ २० ॥
हिंदी अर्थ

(ब्रह्मा जी कहते हैं) हे नारद! आदरपूर्वक सुनो। वह नगर धर्मारण्य के मध्य में, लोहासुर (स्थान) के पूर्व में और मोहेर (मोढेरा) के समीप स्थित था।

टीका

भौगोलिक स्थिति: धर्मारण्य क्षेत्र उत्तर गुजरात में स्थित है।

मयेदं स्थापितं पूर्वं विद्यास्थाने महाद्भुतम् । युतं द्विजगणैः शुद्धं सर्वरत्नसमन्वितम् ॥ २१ ॥
हिंदी अर्थ

मैंने (ब्रह्मा ने) पूर्वकाल में इसे एक महाद्भुत 'विद्यास्थान' (शिक्षा का केंद्र) के रूप में स्थापित किया था। यह शुद्ध ब्राह्मण समूहों से युक्त और सभी प्रकार के रत्नों से सुशोभित था।

टीका

युद्ध कला संबंध: 'विद्यास्थान' शब्द बताता है कि यहाँ केवल मल्लविद्या ही नहीं, बल्कि अन्य विद्याएं भी सिखाई जाती थीं। प्राचीन अखाड़े केवल व्यायामशाला नहीं, बल्कि समग्र शिक्षा के केंद्र होते थे, जहाँ भाषा, आयुर्वेद और दर्शन भी पढ़ाया जाता था।

स्वच्छोदकैः सुविस्तीर्णैः सरोभिरुपशोभितम् । आरामै रमणीयं च नानावृक्षसमाकुलैः ॥ २२ ॥
हिंदी अर्थ

वह नगर स्वच्छ जल वाले विशाल सरोवरों से सुशोभित था। अनेक प्रकार के वृक्षों से भरे बगीचों (आराम) से वह अत्यंत रमणीय लगता था।

टीका

व्यायाम और पर्यावरण: मल्लविद्या के अभ्यास के लिए शुद्ध वातावरण, स्वच्छ जल (स्नान और पीने के लिए) और वृक्षों की छाया (अखाड़े की मिट्टी को नम रखने और शीतलता के लिए) अनिवार्य मानी जाती है।

अनुलिप्तं सुधाभिश्च संगतं सुरमन्दिरैः । संकीर्णं पुण्यलभ्यं च रम्यं स्वर्गमिवापरम् ॥ २३ ॥
हिंदी अर्थ

वह नगर चूने (सुधा) से पुते हुए भवनों और देव-मंदिरों से युक्त था। वह पुण्य से प्राप्त होने वाला, घना बसा हुआ (संकीर्ण) और दूसरे स्वर्ग के समान सुंदर था।

वातेरितपताकाभिः सेवितं च दिवानिशम् । युक्तमक्षय्यमानार्थैर्ब्रह्मणैरुपशोभितम् ॥ २४ ॥
हिंदी अर्थ

वह दिन-रात हवा में लहराती हुई पताकाओं (झंडों) से सेवित था। वह कभी न क्षय होने वाले धन-धान्य से युक्त और ब्राह्मणों से सुशोभित था।

टीका

ध्वज/पताका: अखाड़ों में हनुमान जी या इष्टदेव की ध्वजा का विशेष महत्व होता है। यह उस अखाड़े या दल के सम्मान का प्रतीक है। सिलंबम और कलरीपायट्टु में भी ध्वज-वंदना एक परंपरा है।

यज्ञाग्निधूमपटलैर्यन्त्रान्तरितमण्डलम् । न पीडयति तीक्ष्णांशुर्ग्रीष्मेऽपि च तपस्विनः ॥ २५ ॥
हिंदी अर्थ

यज्ञ की अग्नि से उठने वाले धुएं के बादलों से वहां का आकाश-मंडल ढक जाता था, जिससे भीषण गर्मी में भी सूर्य की तीक्ष्ण किरणें वहां के तपस्वियों को पीड़ित नहीं करती थीं।

टीका

वैज्ञानिक पक्ष: यज्ञ का धुआं वातावरण को शुद्ध करता है और तापमान संतुलित रखता है। एक पहलवान के लिए अत्यधिक गर्मी हानिकारक हो सकती है, इसलिए अखाड़ों का वातावरण नियंत्रित रखा जाता था।

सुन्दरीगणसंपूर्णं वेदध्वनिसमाकुलम् । पवित्रं तीर्थभूतं च धर्मारण्यप्रदेशजम् ॥ २६ ॥
हिंदी अर्थ

वह नगर सुंदर स्त्रियों के समूहों से परिपूर्ण और वेद-ध्वनि से गूंजता रहता था। धर्मारण्य प्रदेश में स्थित वह स्थान अत्यंत पवित्र और तीर्थ रूप था।

कृते तु नाम्ना चेशानं त्रेतायां च श्रीमालकम् । द्वापरे मयूरवं बालं कलौ देवालयं स्मृतम् ॥ २७ ॥
हिंदी अर्थ

सत्ययुग (कृतयुग) में इसका नाम 'ईशान' था, त्रेतायुग में 'श्रीमालक', द्वापरयुग में 'मयूरवं बाल', और कलियुग में इसे 'देवालय' कहा जाता है।

टीका

नामकरण: यह श्लोक उस स्थान की ऐतिहासिक निरंतरता को दर्शाता है।

अधिश्रितं सुरैः पालितं पुण्यसंपदा । विद्याधरैः सिद्धगणैरप्सरोभिः समन्वितम् ॥ २८ ॥
हिंदी अर्थ

वह देवताओं द्वारा आश्रित और पुण्य-संपत्ति से पालित था। वहां विद्याधर, सिद्धगण और अप्सराएं निवास करती थीं।

टीका

युद्ध कला संबंध: 'सिद्धगण' का उल्लेख महत्वपूर्ण है। सिद्ध परम्परा में हठयोग और मर्म-विद्या (मर्म-स्थान) का गहरा ज्ञान होता है। मल्लविद्या के कई दांव-पेच सिद्धों की शारीरिक साधना से प्रभावित माने जाते हैं।

वापीकूपतडागैश्च पुण्यैर्जलयुतैर्युतम् । अनेकगुणपूर्णं च पुण्यं जननिषेवितम् ॥ २९ ॥
हिंदी अर्थ

वह बावड़ियों, कुओं और तालाबों से युक्त था, जिनमें पवित्र जल भरा रहता था। वह अनेक गुणों से पूर्ण, पवित्र और सज्जनों द्वारा सेवित था।

तत्पूर्वेऽस्ति वृद्धसरः पूर्णं पुण्यजलैः सदा । मयैव निर्मितं पूर्वं लोकपापापनुत्तये ॥ ३० ॥
हिंदी अर्थ

उसके पूर्व दिशा में 'वृद्धसर' (एक प्राचीन सरोवर) है, जो सदा पवित्र जल से भरा रहता है। लोगों के पापों को दूर करने के लिए पूर्वकाल में मैंने (ब्रह्मा ने) ही इसका निर्माण किया था।

टीका

जल-चिकित्सा: मल्लविद्या में कड़े अभ्यास के बाद जल-क्रीड़ा या स्नान मांसपेशियों की पुनःप्राप्ति के लिए अनिवार्य है। पुराने अखाड़े हमेशा किसी तालाब या नदी के किनारे होते थे। 'पाप-नाश' का अर्थ शारीरिक मल और मानसिक तनाव की शुद्धि से भी है।

संचितं सारसैर्हंसैर्नानापक्षिगणैस्तथा । देवासुरमनुष्यैश्च तापसैर्योगसाधकैः ॥ ३१ ॥
हिंदी अर्थ

वह (वृद्धसर सरोवर) सारस, हंस और अनेक प्रकार के पक्षियों के समूहों से भरा हुआ था। वहां देवता, असुर, मनुष्य और योग-साधना करने वाले तपस्वी भी एकत्रित थे।

टीका

योग और मल्लविद्या: अखाड़े अक्सर शांत और पवित्र स्थानों पर बनाए जाते हैं, जहाँ 'योगसाधक' भी साधना कर सकें। मल्लविद्या में शारीरिक बल के साथ-साथ मानसिक एकाग्रता (योग) का गहरा संबंध है। प्राणायाम और ध्यान कुश्ती के अभ्यास का अभिन्न अंग हैं।

याज्ञिकैर्द्विजवर्यैश्च यक्षगन्धर्वसिद्धकैः । तत्प्रतीच्यां महादेवी पालिनीति च नामतः ॥ ३२ ॥ स्थापिता लोकरक्षार्थं तत्पूर्वे मातरः स्मृताः । तदन्तराले तीर्थानि सन्ति पुण्यान्यनेकशः ॥ ३३ ॥
हिंदी अर्थ

वहां याज्ञिक (यज्ञ करने वाले) श्रेष्ठ ब्राह्मण, यक्ष, गंधर्व और सिद्धगण भी थे। उस सरोवर के पश्चिम में 'पालिनी' नाम की महादेवी (माता) लोकरक्षा के लिए स्थापित थीं, और पूर्व में मातृकाएं (मातरः) स्थित थीं। उनके बीच में अनेक पुण्यकारी तीर्थ थे।

टीका

शक्ति उपासना: अखाड़ों में देवी (शक्ति) की उपासना अनिवार्य है। 'पालिनी' देवी संभवतः स्थानीय कुलदेवी या शक्ति का रूप हैं। दक्षिण भारत में कलरीपायट्टु अभ्यासी 'भगवती' की पूजा करते हैं, जो यहाँ 'पालिनी' के समान रक्षक देवी हैं।

अस्मिन् सरोजले स्नात्वा देही पश्यति पालिनीम् । सर्वपापविनिर्मुक्तो लभते भोगमव्ययम् ॥ ३४ ॥ दृढाङ्गो रोगमुक्तश्च सर्वविद्याविचक्षणः । धनधान्यसमायुक्तो रिपुजेता महाबली ॥ ३५ ॥
हिंदी अर्थ

जो प्राणी इस सरोवर के जल में स्नान करके पालिनी देवी के दर्शन करता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर अक्षय भोग प्राप्त करता है। उसका शरीर दृढ (मजबूत) हो जाता है; वह रोगमुक्त, सभी विद्याओं में निपुण, धन-धान्य से युक्त और शत्रुओं को जीतने वाला महाबली बन जाता है।

टीका

व्यावहारिक लाभ: यहाँ स्पष्ट रूप से 'दृढाङ्गो' (मजबूत शरीर) और 'रिपुजेता' (शत्रु-विजयी) जैसे भौतिक लाभों का उल्लेख है। यह दर्शाता है कि तीर्थ केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि शारीरिक संवर्धन के केंद्र भी थे।

त्रेतायां रामचन्द्रेण कृतं स्नानं फलाप्तये । कृता यज्ञाश्च दानानि लोकसंग्रहणाय वै ॥ ३६ ॥ किं वर्ण्यतेऽस्य श्रेष्ठस्य तडागस्य फलश्रुतिः । संक्षेपात् कथितं तात वृद्धस्य सरसः फलम् ॥ ३७ ॥
हिंदी अर्थ

त्रेतायुग में रामचंद्र जी ने फल-प्राप्ति के लिए यहाँ स्नान किया था और लोक-संग्रह (जन-कल्याण) के लिए यज्ञ और दान किए थे। इस श्रेष्ठ तालाब (वृद्धसर) की फलश्रुति का क्या वर्णन करूँ? हे तात (नारद)! मैंने संक्षेप में इसका फल कहा है।

एतन्नगरपार्श्वे तु परितश्च प्रदक्षिणे । बहुदेवालयाः सन्ति तेन देवालयं स्मृतम् ॥ ३८ ॥ ख्यातं चतुर्षु लोकेषु विद्यास्थानं परं सदा । सप्तपुरीसमं ह्येतन्नराणां कामदायकम् ॥ ३९ ॥
हिंदी अर्थ

इस नगर के पास और चारों ओर प्रदक्षिणा-पथ में बहुत से देवालय (मंदिर) हैं, इसलिए इसे 'देवालय' कहा जाता है। यह चारों लोकों में श्रेष्ठ 'विद्यास्थान' के रूप में प्रसिद्ध है और सात पवित्र पुरियों (अयोध्या, मथुरा आदि) के समान मनुष्यों की कामना पूर्ण करने वाला है।

टीका

विद्यास्थान: इसे 'विद्यास्थान' कहा गया है, जो पुष्टि करता है कि यह क्षेत्र प्राचीन काल में शिक्षा और विशेषकर युद्ध-कलाओं (धनुर्वेद/मल्लविद्या) का बड़ा केंद्र था।

कृष्ण का स्वागत

एवं मयूरवं बालं शोभां स्मृत्वा यदूत्तमः । प्रविष्टो बलभद्रेण सहितः कार्यचिकीर्षया ॥ ४० ॥ प्रविशन्तौ पुरे तस्मिन् ब्राह्मणैरभिनन्दितौ । कृष्णोऽयमागतः पुण्यैर्विद्वद्भिरिति सादरम् ॥ ४१ ॥
हिंदी अर्थ

इस प्रकार 'मयूरवं बाल' (मोढेरा) की शोभा को याद करके यदुश्रेष्ठ (कृष्ण), बलभद्र (बलराम) के साथ किसी विशेष कार्य की इच्छा से वहां प्रविष्ट हुए। नगर में प्रवेश करते हुए विद्वान ब्राह्मणों ने आदरपूर्वक उनका अभिनंदन किया कि "पुण्य के प्रभाव से ये साक्षात् कृष्ण पधारे हैं।"

अहो पुण्यं महद्भाग्यमस्माकं जन्म सार्थकम् । यो दुर्निरीक्ष्यो योगीन्द्रैः सोऽयं कृष्णः समागतः ॥ ४२ ॥ रम्यवृक्षदलैः पुष्पैस्तोरणैः प्रतिमन्दिरम् । गीतवाद्यप्रकाराद्यैरन्यैश्च विविधोत्सवैः ॥ ४३ ॥
हिंदी अर्थ

(ब्राह्मण बोले) अहो! हमारा महान पुण्य और भाग्य है, हमारा जन्म सार्थक हो गया। जो बड़े-बड़े योगियों के लिए भी दुर्लभ हैं, वे कृष्ण स्वयं यहाँ आए हैं। (उनके स्वागत में) प्रत्येक मंदिर को सुंदर वृक्ष-पत्तों, फूलों और तोरणों से सजाया गया और गीत-वाद्य आदि विविध उत्सव किए गए।

ऋग्यजुःसाममन्त्रोक्तैराशीर्वादैरनेकशः । वर्धापितौ द्विजश्रेष्ठैः सानन्दमतिसेवितौ ॥ ४४ ॥ स्त्रीभिः संमानितौ तत्र दूराञ्चलनिबन्धनैः । लाजाविकिरणैश्चैव दूर्वाकुशसमन्वितैः ॥ ४५ ॥ देवासुरमनुष्यैश्च दुर्लभोऽयं श्रियः प्रियः । सौभाग्यसाधनः कृष्णो युवतीभिर्निरीक्षितः ॥ ४६ ॥
हिंदी अर्थ

श्रेष्ठ ब्राह्मणों ने ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के मंत्रों से अनेक आशीर्वाद देकर आनंदपूर्वक उनकी स्तुति की। स्त्रियों ने दूर से ही आँचल बांधकर (सम्मान-सूचक मुद्रा) और दूर्वा-कुश मिश्रित लाजा (खील) बिखेरकर उनका सम्मान किया। देवता, असुर और मनुष्यों के लिए दुर्लभ, लक्ष्मी के प्रिय और सौभाग्य के साधन भगवान कृष्ण को युवतियों ने निहारा।

ध्यानगम्यः प्रियः साक्षाद् बहुगुण्यैकसंचयात् । अतीव दृष्टो वृद्धाभिः प्रहृष्टाभिः कृतादरम् ॥ ४७ ॥ बाला अप्यद्भुतानेककौतूहलविलोभिताः । धाविताः संभ्रमात् कृष्णमवलोकितुमुत्सुकाः ॥ ४८ ॥ मार्गावसरमप्राप्य कृष्णदर्शनलालसाः । आरोहन्ति गृहाट्टालताराममभितः स्त्रियः ॥ ४९ ॥ अहमहमतिगच्छन्नुपर्युपरि संपतन् । इतस्ततो भ्रमन् लोकः स्वं परं नावगच्छति ॥ ५० ॥
हिंदी अर्थ

अनेक गुणों के भंडार और ध्यान द्वारा जानने योग्य प्रिय कृष्ण को वृद्ध स्त्रियों ने भी अत्यंत हर्ष और आदर के साथ देखा। बच्चे भी अद्भुत कौतूहल से लोभित होकर कृष्ण को देखने के लिए उत्सुकता से दौड़ पड़े। मार्ग में जगह न मिलने पर, कृष्ण-दर्शन की लालसा में स्त्रियां घरों की छतों, अटारियों और ऊंचे स्थानों पर चढ़ गईं। "मैं पहले, मैं पहले" करती हुई भीड़ एक-दूसरे के ऊपर गिरने लगी, और इधर-उधर भागते हुए लोग अपने-पराए का भान भूल गए।

टीका

भक्ति और उत्साह: यह वर्णन श्रीमद्भागवत में कृष्ण के मथुरा-प्रवेश जैसा ही है। यह जन-सामान्य में नायक के प्रति प्रेम को दर्शाता है। एक मल्ल या योद्धा के लिए भी समाज में ऐसा सम्मान प्रेरणा का स्रोत होता है।

इति श्रीमल्लपुराणे धर्मारण्यमाहात्म्ये ब्रह्मनारदसंवादे कृष्णपुरप्रवेशो नाम प्रथमोऽध्यायः ।

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