मल्लपुराण
चर्चा
अध्याय

अखाड़े के स्वर और अंग-घात

अखाड़े के पास के स्वर व शकुन का विवेचन कर बताया गया है कि अभ्यास-काल में कौन-सी ध्वनियाँ अशुभ व विचलनकारी हैं। 'दशविध शब्द/क्रिया' से आक्रमण-बचाव का मूल सिद्धांत — प्रहार करो पर स्वयं असावधान न हो — रखकर आगे ३६ प्रकार के अंग-घातों का वर्णन मर्म-कला व प्रहार-विज्ञान की आधारशिला बनता है।

अखाड़े के स्वर व दशविध क्रिया

आषाढस्य समीपस्था ये कार्याः स्वराः किल । तत्सर्वं कथयिष्यामि योगक्षेमार्थसिद्धये ॥ १ ॥ छेदो मारस्तथा भङ्गः पात उत्पातकस्तथा । रजस्वलानामकृतं रुदितं मृतकस्वरः ॥ २ ॥ प्रेतराक्षसभूतादिस्मरणं वज्रनिस्वनः । तपस्विगृध्रसर्पाणां नामसंकीर्तनं परम् ॥ ३ ॥ ये चान्ये कुत्सिताः शब्दाः श्रमकाले न शोभनाः । सुदर्शनेन मन्त्रेण तेषां च रक्षणं शुभम् ॥ ४ ॥
हिंदी अर्थ

अखाड़े के पास जो स्वर (ध्वनियां) वर्जित या शुभ-अशुभ हैं, उन्हें मैं योगक्षेम (कल्याण) के लिए कहता हूँ। 'काटो' (छेद), 'मारो' (मार), 'तोड़ो' (भंग), 'गिराओ' (पात) — ऐसे हिंसक शब्द। उत्पात (उपद्रव) के शब्द। रजस्वला स्त्री का रोना, मृतक (शव) का स्वर। प्रेत, राक्षस, भूत का नाम लेना। वज्रपात (बिजली गिरने) की आवाज। तपस्वी (क्रोधित), गिद्ध और सांप का नाम लेना। ये और अन्य कुत्सित (बुरे) शब्द व्यायाम (श्रम) के समय शुभ नहीं होते। यदि ये सुनाई दें, तो 'सुदर्शन मंत्र' से अपनी रक्षा करनी चाहिए।

टीका

मनोवैज्ञानिक प्रभाव: व्यायाम या युद्ध के अभ्यास के समय नकारात्मक ध्वनियां अवचेतन मन को विचलित कर सकती हैं। 'सुदर्शन मंत्र' (सकारात्मक संकल्प) उस नकारात्मकता को काटने का उपाय है। (श्लोक १ में 'आषाढस्य' का पाठ 'आखाढस्य' रूप में भी मिलता है — पाठभेद संभावित।)

दशविधानां शब्दानां महान्तो विदिता गुणाः । कश्चित् परं घातयति परेणापि न घात्यते ॥ ५ ॥ स्थानकादाकर्षयति कोऽपि नाकृष्यते परैः । गृह्णात्यन्यस्य विज्ञानं नान्येन शब्दोऽपि गृह्यते ॥ ६ ॥ क्वचित् परं चालयति न परेणापि चाल्यते । क्वचित् परं त्रोटयति त्रोट्यते न परेण तु ॥ ७ ॥
हिंदी अर्थ

(युद्ध में) दस प्रकार के शब्दों/क्रियाओं के महान गुण हैं: १. जो दूसरे पर घात करता है, पर स्वयं आघात नहीं खाता। २. जो अपने स्थानक (पैंतरा) से दूसरे को खींच लेता है (आकर्षण), पर स्वयं नहीं खींचा जाता। ३. जो दूसरे के विज्ञान (तकनीक) को पकड़ लेता है (समझ लेता है), पर अपना भेद नहीं खुलने देता। ४. जो दूसरे को चालन (असंतुलित) करता है, पर स्वयं विचलित नहीं होता। ५. जो दूसरे को त्रोटन (तोड़ता/पाश) करता है, पर स्वयं नहीं टूटता।

टीका

युद्ध सिद्धांत: यह 'आक्रमण और बचाव' का सर्वश्रेष्ठ सिद्धांत है। "प्रहार करो पर प्रहार मत खाओ।" यह 'पूडी-वरिसाई' (पाश) और 'मल्ल-युद्धम्' का सार है।

अंग-स्थान व पशु-भेद पैंतरे

अङ्गस्थानानि कथ्यन्ते पञ्चैतानि यथा शृणु । स्कन्धस्थानं उरःस्थानं जङ्घास्थानं तथैव च ॥ ८ ॥ जानुस्थानं कटिस्थानं पञ्चैतानि विभागशः । चतुर्णामपि मल्लानामङ्गज्ञानं तदुच्यते ॥ ९ ॥ उन्नताङ्गं गजस्थानं समाङ्गं च वृषस्य च । सिंहस्थानं तु लीनाङ्गं चलाङ्गं तु मृगस्य च ॥ १० ॥ समपादं गजस्यैव विषमं वृषभस्य च । सिंहस्य चोन्नतपादं चलत्पादं मृगस्य च ॥ ११ ॥
हिंदी अर्थ

पांच अंग-स्थान (शक्ति केंद्र): १. स्कंध, २. उर (छाती), ३. जंघा, ४. जानु (घुटने), ५. कटि (कमर)। चारों प्रकार के मल्लों के लिए इनके प्रयोग का ज्ञान:

  • गज: उन्नताङ्ग (ऊंचा शरीर) और समपाद (समानांतर पैर)।
  • वृष: समाङ्ग (समतल शरीर) और विषम-पाद (एक पैर आगे, एक पीछे)।
  • सिंह: लीनाङ्ग (झुककर तैयार शरीर) और उन्नत-पाद (उछलने वाला पैंतरा)।
  • मृग: चलाङ्ग (गतिशील शरीर) और चलत्पाद (चंचल पैंतरा)।
टीका

पैंतरा (स्थानक): यह श्लोक आधुनिक 'पद-संचालन' की नींव है।

  • समपाद: कुश्ती की तरह।
  • विषम-पाद: मुष्टि-युद्ध की तरह।
  • चलत्पाद: 'पैटर्न' बदलने वाला।

छत्तीस अंग-घात

एवमाकारजं स्थानं भेदजातीश्चतुर्विधाः । षट्प्रकाराणि निश्चित्य घातोऽपि क्रियते सदा ॥ १२ ॥ अजाघातः प्राणघातो घातो वहनिपूर्वकः । ओजोवहनिघातश्च चतुर्थः परिकीर्तितः ॥ १३ ॥ ऊर्जः प्राणभवो घातः पञ्चमः कोऽपि कथ्यते । ओजोवहनिघातश्च षष्ठश्च परिकीर्तितः ॥ १४ ॥ षडेते कथिता घाताः षट्त्रिंशत् प्राणसंयुताः । येनाभ्यासेन सदा मल्लो रिपुयुद्धे जयी भवेत् ॥ १५ ॥
हिंदी अर्थ

स्थान और जाति-भेद जानकर ६ प्रकार के घात (प्रहार) किए जाते हैं: १. अजाघात: संभवतः सिर से टक्कर या अचानक प्रहार। २. प्राणघात: मर्म पर वार। ३. वहनिघात: वेग/गति के साथ प्रहार। ४. ओजो-वहनिघात: आंतरिक ऊर्जा और वेग का मिश्रण। ५. ऊर्ज-प्राणभव: शक्ति और श्वास (हुंकार) के साथ प्रहार। ६. ओजो-घात: शुद्ध शक्ति का प्रहार। ये ६ मुख्य घात हैं, जो कुल मिलाकर ३६ प्रकार (षट्त्रिंशत्) के प्राण-संयुत आघात बनते हैं।

टीका

आदि-वरिसाई: ये ६ श्रेणियां प्रहार की 'गुणवत्ता' (शक्ति स्रोत) बताती हैं — क्या यह केवल शारीरिक है, या श्वास/प्राण पर आधारित है? (श्लोक १५ में 'षडेते' का पाठ अन्यत्र 'षडिति' रूप में भी मिलता है — पाठभेद संभावित।)

केशाकर्षणघातस्तु प्रथमः परिकीर्तितः । स्कन्धस्फोटनघातोऽपि हस्तेनैकेन सादरः ॥ १६ ॥ द्विहस्ताभ्यां च घातोऽयं स्कन्धास्फोटनसंभवः । दण्डाघातस्तथैवान्यो ज्ञातव्यो दृढबुद्धिभिः ॥ १७ ॥ कर्णतालविघातोऽपि पार्श्वघातस्तथापरः । ग्रीवाबलवदाघातो घातो निजकरस्तथा ॥ १८ ॥ भुजघोटनघातोऽपि घातः करतलहस्तयोः । द्विभुजाघोटनं चास्ति कथिताश्चान्येऽपि सूरिभिः ॥ १९ ॥ घातोऽन्यो बाहुजानुना शिरसो घातकस्तथा । कक्षातलविघातस्तु मुष्टिघातस्तथा परः ॥ २० ॥
हिंदी अर्थ

(३६ घातों में से कुछ): १. केशाकर्षण (बाल खींचकर प्रहार — निषिद्ध लेकिन युद्ध में प्रभावी)। २. एक हाथ से स्कंध-स्फोटन (कंधे से टक्कर)। ३. दोनों हाथों से स्कंध-स्फोटन। ४. दण्डाघात (बाहु-पाश प्रहार)। ५. कर्ण-ताल विघात (कान पर थप्पड़)। ६. पार्श्व-घात (पसली पर वार)। ७. ग्रीवा-घात (गर्दन पर प्रहार/वेटा-वरिसाई)। ८. निज-कर घात (हस्त-धार प्रहार)। ९. भुज-घोटन (बाहु मरोड़ना)। १०. करतल-हस्त घात (हथेली से प्रहार)। ११. द्विभुज-घोटन (दोनों बांहों से जकड़ना)। १२. बाहु-जानु घात (कोहनी-घुटने का संयुक्त प्रहार)। १३. शिरसो-घात (सिर से टक्कर)। १४. कक्षातल-विघात (कांख में प्रहार)। १५. मुष्टि-घात (मुक्का)।

टीका

घातक तकनीकें: 'कर्ण-ताल' पर्दा फाड़ सकता है। 'ग्रीवा-घात' श्वास नली को तोड़ सकता है। ये सभी 'मर्म-कला' के अंतर्गत आते हैं।

कक्षाकर्षणघातश्च चरणघातक एव वा । आकृष्य चरणाघातश्चरणे परिकीर्तितः ॥ २१ ॥ जङ्घास्फोटनघातोऽपि घातश्चरणपीटनात् । अथातो वरपातश्च पाशघातस्तथैव च ॥ २२ ॥ दण्डापात उरोपातो घातोऽपि गजस्तनः । प्राणघातस्तथोत्क्षिप्तो घातश्च वधिनः परः ॥ २३ ॥ अङ्गन्यासविधातास्तु बुधैः संपरिकीर्तिताः । जानूपरि विघातेऽपि घातस्तु भवति क्वचित् ॥ २४ ॥ बाहुभुजविघातोऽपि नियुद्धज्ञैरुदीरितः । पृष्ठकक्षावधोऽपि गजघातस्तथा परे ॥ २५ ॥ षट्त्रिंशदिमे घाताः कथिताः संख्यया स्फुटम् । विज्ञेया यत्नतो मल्लैर्नियुद्धकुशलैस्तदा ॥ २६ ॥
हिंदी अर्थ

१६. कक्षाकर्षण (बाहु खींचना)। १७. चरण-घातक (पादाघात)। १८. आकृष्य-चरणाघात (खींचकर लात मारना)। १९. जंघा-स्फोटन (जांघ पर प्रहार)। २०. चरण-पातन (पैर पटकना)। २१. वर-पात (ऊंचाई से फेंकना)। २२. पाश-घात (फंदा/गला घोंटना)। २३. दण्ड-पात (लाठी जैसा प्रहार)। २४. उरो-पात (छाती से धक्का)। २५. गज-स्तन घात (हाथी जैसा सिर/दांत प्रहार)। २६. प्राण-घात (मर्म प्रहार)। २७. उत्क्षिप्त-घात (ऊपर की ओर प्रहार)। २८. जानु-परि विघात (घुटने का प्रहार — इडि-वरिसाई)। २९. बाहु-भुज विघात (द्विशिर पेशी पर प्रहार)। ३०. पृष्ठ-कक्षा वध (पीठ पीछे से आक्रमण)। ३१. गज-घात… इस प्रकार ३६ घात स्पष्ट रूप से कहे गए हैं। नियुद्ध (बाधा-रहित युद्ध) में कुशल मल्लों को प्रयत्नपूर्वक इन्हें जानना चाहिए।

टीका

सर्वांगीण युद्ध: यहाँ लात (चरणघात), घुटने (जानु), कोहनी (बाहु), और कुश्ती (पात/प्रक्षेप) का अद्भुत मिश्रण है। 'जंघा-स्फोटन' का आशय जंघा पर तीव्र प्रहार से है। 'पाश-घात' किसी कपड़े या अंग से गला घोंटने की तकनीक हो सकती है।

इति श्रीमल्लपुराणे अंगघातप्रकरणं नाम सप्तमोऽध्यायः ।

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