मल्लपुराण
चर्चा
अध्याय

मल्लविद्या का दान

कृष्ण-बलराम के मोढेरा-प्रवेश के बाद वेदवेत्ता और युद्ध-कुशल ब्राह्मण सोमेश्वर का परिचय मिलता है। कलियुग के संकट को दृष्टि में रखकर कृष्ण उसे मल्लविद्या का दान देते हैं और इसे सर्वविद्याओं में प्रधान बताते हैं। कंस-चाणूर वध का दृष्टांत दिखाता है कि यह विद्या केवल बल नहीं, अपितु तकनीक, नियम और आत्मरक्षा का संपूर्ण शास्त्र है।

सोमेश्वर का परिचय व कृष्ण-संवाद

एवं प्रविष्टो नगरे परमातिथ्यपूर्वकम् । स्थितौ दिनानि कतिचित् क्रीडाभिरदितोत्सवैः ॥ १ ॥ तत्र सोमेश्वरो नाम ब्राह्मणो गर्गगोत्रजः । वेदवेदाङ्गविद् धीमान् कुशलो युद्धकर्मणि ॥ २ ॥ अतीव भक्तिमान् कृष्णे तत्त्वज्ञानपरो वरः । कृष्णश्चाराध्यते नित्यं बलभद्रेण संयुतः ॥ ३ ॥ तं दृष्ट्वा भक्तिसंयुक्तं सुशरीरं कृतादरम् । संतुष्टो भगवान् कृष्णः प्रोवाच प्रीतिपूर्वकम् ॥ ४ ॥
हिंदी अर्थ

इस प्रकार परम आतिथ्य के साथ नगर में प्रवेश करके वे (कृष्ण-बलराम) कुछ दिनों तक खेल-कूद और उत्सवों में वहां रहे। वहां गर्ग गोत्र में उत्पन्न 'सोमेश्वर' नाम का एक ब्राह्मण था। वह वेद-वेदांगों का ज्ञाता, बुद्धिमान और युद्ध-कर्म में कुशल था। वह कृष्ण का अत्यंत भक्त, तत्वज्ञानी और श्रेष्ठ था। वह नित्य बलराम सहित कृष्ण की आराधना करता था। उसे भक्तियुक्त, सुदृढ़ शरीर वाला (सुशरीरं) और आदर करने वाला देखकर भगवान कृष्ण संतुष्ट हुए और प्रेमपूर्वक बोले।

टीका

युद्ध-कुशल ब्राह्मण: सोमेश्वर का परिचय "युद्धकर्मणि कुशलः" (युद्ध कर्म में निपुण) के रूप में दिया गया है। यह प्राचीन भारत की उस परम्परा का प्रमाण है जहाँ ब्राह्मण केवल पुजारी नहीं, बल्कि योद्धा-ब्राह्मण भी होते थे, जैसे परशुराम, द्रोणाचार्य और कृपाचार्य। 'सुशरीरं' शब्द बताता है कि वह शारीरिक रूप से भी पुष्ट और सुदृढ़ था, जो एक योद्धा के लिए आवश्यक है।

गर्ग गोत्र: गर्ग ऋषि यदुवंश के कुलगुरु थे, अतः इस गोत्र का संबंध कृष्ण से गहरा है।

श्रीकृष्ण उवाच । कच्चित् सदाश्च सुखिनो नगरे सर्वदा नृणाम् । ब्राह्मणानां च सर्वेषां याज्ञिकानां च ऋत्विजाम् ॥ ५ ॥ तीर्थानि सन्ति पुण्यानि शुद्धोदकानि च सर्वशः । गावः कामदुघाश्चापि पत्रं पुष्पं समिधः कुशाः ॥ ६ ॥ सोमेश्वर उवाच । सर्वत्र कुशलं स्वामिन् प्रसादात् ते जनार्दन । भवत्प्रसादो येषां स्यात्तेषां कुतो नृणाम् अकुशलम् ॥ ७ ॥ रामेण स्थापिताः पूर्वं पालनीयास्त्वयाधुना । इति श्रुत्वा वचस्तस्य भगवान् देवकीसुतः ॥ ८ ॥ कार्यद्वयं चिकीर्षुस्तं सोमेश्वरं जगाद ह । श्रीकृष्ण उवाच । तुष्टोऽहं तव विप्रेन्द्र यतो भक्तोऽसि मे प्रियः ॥ ९ ॥
हिंदी अर्थ

(कृष्ण ने पूछा) क्या इस नगर में सभी मनुष्य, ब्राह्मण, याज्ञिक और ऋत्विज सदा सुखी हैं? क्या यहाँ पुण्यकारी तीर्थ, शुद्ध जल, कामना पूर्ण करने वाली गायें, और यज्ञ के लिए पत्र, पुष्प, समिधा, कुश आदि उपलब्ध हैं?

(सोमेश्वर ने कहा) हे जनार्दन! आपकी कृपा से सब कुशल है। जिन पर आपकी कृपा हो, उन्हें अकुशल कैसे हो सकता है? राम ने पूर्व में हमें बसाया था, अब आप हमारा पालन करें।

यह सुनकर देवकी नंदन भगवान कृष्ण, जो दो कार्य करना चाहते थे (भक्तों का रक्षण और दुष्टों का दमन), सोमेश्वर से बोले — हे विप्रेंद्र! मैं तुमसे संतुष्ट हूँ क्योंकि तुम मेरे प्रिय भक्त हो।

मल्लविद्या का वरदान व माहात्म्य

तेन तुभ्यं प्रदास्यामि विद्यां शुद्धां मम प्रियाम् । युगे समागते म्लेच्छप्रायाश्च भूभुजाः ॥ १० ॥ वृत्तिलोपं करिष्यन्ति पीडयिष्यन्ति गोद्विजान् । ततस्ते कां मल्लविद्यां ददामि ते द्विजोत्तम ॥ ११ ॥ प्रधानं सर्वविद्यानां यया वृत्तिर्न जायते । पच्यते सर्वधातुश्च मल्लविद्याविधारणात् ॥ १२ ॥
हिंदी अर्थ

इसलिए मैं तुम्हें अपनी प्रिय और शुद्ध विद्या प्रदान करूँगा। (कलियुग) आने पर राजा लोग प्रायः म्लेच्छ (विदेशी/अधर्मी) स्वभाव के हो जाएंगे। वे (ब्राह्मणों की) जीविका नष्ट करेंगे और गायों तथा ब्राह्मणों को पीड़ित करेंगे। इसलिए हे द्विजोत्तम! मैं तुम्हें 'मल्लविद्या' देता हूँ। यह सभी विद्याओं में प्रधान है। इससे न केवल जीविका चलेगी, बल्कि मल्लविद्या के अभ्यास से शरीर की सभी धातुएं (रस, रक्त, मांस आदि) भी परिपक्व (मजबूत) हो जाती हैं।

टीका

आत्मरक्षा का सिद्धांत: यह श्लोक मल्लपुराण और धनुर्वेद का सार है। कृष्ण स्पष्ट कहते हैं कि भविष्य में 'म्लेच्छ' स्वभाव के शासक धर्म (गो-द्विज) को पीड़ित करेंगे। ऐसे समय में केवल शास्त्र-ज्ञान नहीं, बल्कि शस्त्र-ज्ञान और शारीरिक बल (मल्लविद्या) ही रक्षा करेगा।

इतिहास से संबंध: यह भविष्यवाणी भारत के मध्यकालीन इतिहास (आक्रमण-काल) से मेल खाती है, जहाँ अनेक मंदिरों और गुरुकुलों को नष्ट किया गया। जेठी मल्ल ब्राह्मणों ने अपनी कुश्ती और युद्ध-कौशल का उपयोग करके कई बार अपनी और अपने मंदिरों की रक्षा की।

स्वास्थ्य लाभ: 'पच्यते सर्वधातुश्च' — आयुर्वेद के अनुसार व्यायाम से जठराग्नि बढ़ती है और सप्त धातुएं पुष्ट होती हैं।

धारयन्ति बलात् शत्रून् तेन मल्लाः प्रकीर्तिताः । तेषां विद्या परं गोप्या परदर्पप्रभञ्जनी ॥ १३ ॥ ज्येष्ठार्था सर्वविद्यानां सर्वकालशरीरगा । अचौरहार्या च सर्वत्र सर्वकालाविनाशिनी ॥ १४ ॥ सर्वकामप्रदा ह्येषा सर्वलोकाभिमोहिनी । अनया साध्यते धर्मः कामः सम्यगवाप्यते ॥ १५ ॥ मोक्षोऽपि प्राप्यतेऽभ्यासात् मदभ्यस्ता पुरा यतैः । ममाङ्गसंस्थितां विद्यां धारयिष्यन्ति भूतले ॥ १६ ॥
हिंदी अर्थ

वे बलपूर्वक शत्रुओं को धारण (नियंत्रित/परास्त) करते हैं, इसलिए 'मल्ल' कहलाते हैं। उनकी विद्या अत्यंत गोपनीय और शत्रुओं के घमंड को तोड़ने वाली (परदर्पप्रभञ्जनी) है। यह सभी विद्याओं में ज्येष्ठ (श्रेष्ठ) है और शरीर में सदा रहने वाली है। इसे चोर चुरा नहीं सकते और यह कभी नष्ट नहीं होती। यह सभी कामनाएं पूरी करती है और लोकों को मोहित करती है। इससे धर्म सधता है और काम की प्राप्ति होती है। इसके अभ्यास से मोक्ष भी प्राप्त होता है क्योंकि पूर्वकाल में यतियों (योगियों) ने भी इसका अभ्यास किया है। मेरे अंगों में स्थित इस विद्या को लोग पृथ्वी पर धारण करेंगे।

टीका

मल्ल की परिभाषा: 'मल्ल' शब्द 'मल्' धातु से बना है जिसका अर्थ है धारण करना या युद्ध करना।

अचौरहार्या: धन चुराया जा सकता है, लेकिन शरीर में बसा हुआ बल और कौशल कोई नहीं चुरा सकता। यह "ज्ञान ही शक्ति है" का शारीरिक रूप है।

धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष: मल्लविद्या को चारों पुरुषार्थों का साधन बताया गया है। स्वस्थ शरीर से धर्म, प्रदर्शन/नौकरी से अर्थ, यश से काम, और योग/संयम से मोक्ष मिलता है।

विद्याविभूषिता लोके मत्परा मां लभन्ति ते । इमां गुह्यतमां विप्र न दत्तां कस्यचिन्मया ॥ १७ ॥ तुभ्यं सम्यक् प्रदास्यामि यतो मद्भक्तिमान् भवान् । विद्येयं मम शक्तिश्च मद्भक्तेष्वेव स्थास्यति ॥ १८ ॥ मद्विद्यालंकृतो लोके मान्यो भवति सर्वतः । अङ्गशुद्धिः सत्त्वशुद्धिर्बलवृद्धिस्तथोत्तरा ॥ १९ ॥ मृगयाजयसंसिद्धिरनया शत्रुसंजयः । तस्मात् सोमेश्वरस्त्वं च तथान्येऽपि तव प्रियाः । धारयन्तूत्तमां विद्यां मयोक्तां सर्वलक्षणाम् ॥ २० ॥
हिंदी अर्थ

इस विद्या से विभूषित और मेरे परायण लोग मुझे प्राप्त करते हैं। हे विप्र! यह गुह्यतम (अत्यंत गुप्त) विद्या मैंने (अब तक) किसी को नहीं दी। तुम मेरे भक्त हो, इसलिए तुम्हें दे रहा हूँ। यह विद्या मेरी शक्ति है और मेरे भक्तों में ही स्थिर रहेगी। इस विद्या से अलंकृत व्यक्ति संसार में सर्वत्र सम्मान पाता है। इससे अंगों की शुद्धि, सत्वगुण की वृद्धि और उत्तरोत्तर बल बढ़ता है। इससे शिकार (मृगया) में सफलता और शत्रुओं पर विजय मिलती है। इसलिए हे सोमेश्वर! तुम और तुम्हारे अन्य प्रियजन मेरे द्वारा कही गई इस सर्वलक्षण-युक्त उत्तम विद्या को धारण करो।

टीका

पाठभेद: इस अध्याय के श्लोक २१–४३ उपलब्ध पाण्डुलिपि में अनुपलब्ध अथवा त्रुटिपूर्ण हैं, अतः यहाँ नहीं दिए गए हैं। कथा-सूत्र सीधे कंस-चाणूर वध के दृष्टांत (श्लोक ४४ से) पर आगे बढ़ता है।

कंस-चाणूर वध का दृष्टांत

हस्तेन प्रपदे गृह्य भ्रमितो लुण्ठितो भुवि । घातितो मुष्टिघातैश्च मारितो मल्लविद्यया ॥ ४४ ॥ संनिपिष्टसर्वाङ्गो भग्नो भग्नमानसः । गलत्केशोऽपतत् भूमौ चाणूरो गतचेतनः ॥ ४५ ॥ बलेनैवं मुष्टिकोऽपि पातितो मल्लविद्यया । अन्येऽपि मल्लमुख्याश्च पातिताः सर्वतो भुवि ॥ ४६ ॥ कंसोऽपि निहतः संख्ये पातितो ह्यवनीतले । हाहाकारोऽभवत् शब्दस्तदा कंसे निपातिते ॥ ४७ ॥ अन्ये च दुद्रुवुर्भीताः प्राणरक्षणतत्पराः । एके विदिततत्त्वार्था मामेव शरणं गताः ॥ ४८ ॥ तस्माद् गृह्णात्वेनां त्वं मल्लविद्यां द्विजोत्तम । यया च भ्रमिताः सर्वे शत्रवो निधनं गताः ॥ ४९ ॥
हिंदी अर्थ

(मैंने चाणूर को) हाथ से पैर पकड़कर घुमाया और जमीन पर पटक दिया। फिर मुक्कों (मुष्टिघात) से प्रहार करके मल्लविद्या के द्वारा उसे मार डाला। उसके सारे अंग कुचल गए, उसका मन टूट गया, बाल बिखर गए और वह चाणूर अचेत होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। इसी प्रकार बल (बलराम) ने भी मुष्टिक को मल्लविद्या से गिरा दिया। अन्य मुख्य मल्ल भी सब ओर जमीन पर गिरा दिए गए। कंस भी युद्ध में मारा गया और पृथ्वी पर गिरा दिया गया। तब कंस के मारे जाने पर हाहाकार मच गया। अन्य लोग डरकर प्राण बचाने के लिए भाग गए, और कुछ तत्व को जानने वाले मेरी शरण में आए। इसलिए हे द्विजोत्तम! तुम इस मल्लविद्या को ग्रहण करो, जिसके द्वारा घुमाए गए सभी शत्रु मृत्यु को प्राप्त हुए।

टीका

तकनीक (कौशल): 'हस्तेन प्रपदे गृह्य भ्रमितो' — यह स्पष्ट रूप से एक कुश्ती का दांव (बंध) है जिसे आज 'धोबी पछाड़' या 'महा-भ्रमण' कहा जा सकता है। पैर पकड़कर घुमाना एक प्राचीन और प्रभावी तकनीक है।

इति ते कथिता ब्रह्मन् मल्लविद्या मयानघ । किं पृच्छसि पुनः स्वामिन् कथयामि तव प्रियाम् ॥ ५० ॥ यः शृणोति नरो भक्त्या मल्लकंसादिघातनम् । क्रीडितं मम विप्रेन्द्र स याति परमं पदम् ॥ ५१ ॥
हिंदी अर्थ

हे निष्पाप ब्रह्मन्! मैंने तुम्हें यह मल्लविद्या (की पृष्ठभूमि) बता दी। हे स्वामी! अब तुम और क्या पूछना चाहते हो? मैं तुम्हें वह प्रिय बात बताऊँगा। जो मनुष्य मल्ल (चाणूर) और कंस आदि के वध की मेरी इस लीला को भक्तिपूर्वक सुनता है, वह परम पद को प्राप्त होता है।

इति श्रीमल्लपुराणे सोमेश्वरकृष्णप्रश्नोत्तरं नाम प्रकरणं द्वितीयम् ।

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