मल्लपुराण
चर्चा
अध्याय

मल्लों के आठ प्रकार और पशु-गुण

मल्लों के आठ प्रकार — युवा, प्राणवान, ज्येष्ठी, अन्तरज्येष्ठी, गोपकुल, भविष्य, बाल व वृद्ध — का परिचय देकर उन्हें चार पशु-रूपकों (गज, सिंह, वृष, मृग) के आधार पर स्वभाव व युद्ध-शैली में वर्गीकृत किया गया है। आयु, आहार, संयम व निरन्तर श्रम के अनुसार किस अवस्था तक मल्ल की योग्यता टिकती है, इसका व्यावहारिक निर्देश भी दिया गया है।

मल्लों के आठ प्रकार व चार पशु-भेद

भवन्त्यष्टविधा मल्लाः कथयामि यथा तथा । युवा च प्राणवांश्चैव ज्येष्ठी चैव तथा परः ॥ १ ॥ अपरश्चान्तरज्येष्ठी तथा गोपकुलोऽपि च । भविष्यश्चेति बालवृद्धौ च कथिताश्चाष्टधा इमे ॥ २ ॥ चतुर्भेदैश्च भिन्नास्ते शत्रोर्जये गुणोदयैः । गजः सिंहो वृषश्चैव मृगोऽपि च तथा परः ॥ ३ ॥ यस्य येन यथा युद्धं सोमेश्वर तथा शृणु । हितोपदेशं विविधं विचार्य कथयाम्यहम् ॥ ४ ॥
हिंदी अर्थ

मल्ल आठ प्रकार के होते हैं, मैं उन्हें विस्तार से बताता हूँ: १. युवा, २. प्राणवान, ३. ज्येष्ठी, ४. अन्तरज्येष्ठी, ५. गोपकुल, ६. भविष्य, ७. बाल, और ८. वृद्ध। शत्रु पर विजय प्राप्त करने के गुणों के आधार पर इनके चार और भेद हैं: १. गज (हाथी जैसा), २. सिंह, ३. वृषभ (सांड), ४. मृग (हिरण)। हे सोमेश्वर! किसका किसके साथ कैसा युद्ध होना चाहिए, यह मैं विचार करके हितकारी उपदेश देता हूँ।

आयु और मल्ल-योग्यता

श्रीकृष्ण उवाच । अथ मल्लाश्च चत्वारो भवन्ति निजकैर्गुणैः । गजो वृषो मृगः सिंहो भविष्यः पञ्चमो मतः ॥ ५ ॥ त्रिंशद्वर्षादिपर्यन्तं प्रवृत्तिः सङ्गमेन च । आहारो न प्रवर्तते सर्वेषां भविता गुणाः ॥ ६ ॥ त्रिचत्वारिंशद्वर्षाणि मल्लाश्चत्वार एव च । श्रमैरभ्यासैराहारैः संयमैर्न निरन्तरम् ॥ ७ ॥ धारयन्त्यात्मनो विद्यां गुणाश्चापि यथा तथा । अथोर्ध्वं यावत् पञ्चाशत् प्राणेनापि बलेन च ॥ ८ ॥ सर्वाभ्यासेन वीर्येण कालेनापि पुनः पुनः । वृषभश्च मृगश्चैव सिंहस्यापि तथा पुनः ॥ ९ ॥ अथैषामेव मल्लानां धार्यमाणा अपि ध्रुवम् । गुणाः प्रयान्ति व्यसनैः कालस्यापि क्रमादपि ॥ १० ॥
हिंदी अर्थ

अपने स्वाभाविक गुणों से मल्ल चार प्रकार के हैं — गज, वृष, मृग, सिंह। भविष्य (सीखने वाला) को पांचवां माना गया है। ३० वर्ष तक: इस आयु तक मल्ल-संग्राम में प्रवृत्ति रहती है। (परंतु यदि) आहार ठीक न हो, तो गुण विकसित नहीं होते। ४३ वर्ष तक: निरंतर श्रम (व्यायाम), अभ्यास, आहार और संयम (ब्रह्मचर्य) के द्वारा ये चारों प्रकार के मल्ल अपनी विद्या और गुणों को धारण किए रहते हैं। ५० वर्ष तक: पचास वर्ष तक प्राण और बल के द्वारा, तथा निरंतर वीर्यवान अभ्यास से वृषभ, मृग और सिंह अपनी क्षमता बनाए रखते हैं। इसके बाद, काल के प्रभाव से और व्यसनों (बुरी आदतों) के कारण, धारण किए गए गुण भी नष्ट हो जाते हैं।

टीका

योद्धा की आयु: यहाँ स्पष्ट है कि एक योद्धा का 'श्रेष्ठ काल' ३० से ४३ वर्ष तक माना गया है। ५० के बाद शरीर ढलने लगता है। 'संयम' और 'आहार' को लंबी आयु तक स्वस्थ रहने की कुंजी बताया गया है।

वर्जयित्वा गजं तस्य षष्टिवर्षाणि योग्यता । वृषसिंहमृगांश्चापि तेनैव व्यतिरिच्यते ॥ ११ ॥ अन्यानपि गुणान् सर्वान् कथयामि गजस्य च । षष्टिवर्षपर्यन्तं विद्या संधार्यते ध्रुवम् ॥ १२ ॥ उद्यमैश्चैव व्यायामैरग्निराहार एव च । आरोग्यवान् धर्मवांश्च श्रमवानर्थवानपि ॥ १३ ॥ सहायवान् बुद्धिमांश्च बलवान् प्राणवानिति । गजस्तु धारणैरेतैः षष्टिवर्षाणि दुर्जयः ॥ १४ ॥
हिंदी अर्थ

'गज' (हाथी) मल्ल अपवाद है। उसकी योग्यता ६० वर्ष तक रहती है। इस मामले में वह वृष, सिंह और मृग से श्रेष्ठ (व्यतिरिच्यते) है। गज मल्ल अपनी विद्या को ६० वर्ष तक निश्चित रूप से धारण कर सकता है, यदि वह उद्यम, व्यायाम, जठराग्नि (पाचन), आहार, आरोग्य, धर्म, श्रम और धन से युक्त हो। सहायकों (शिष्यों) वाला, बुद्धिमान, बलवान और प्राणवान 'गज' मल्ल इन गुणों के कारण ६० वर्ष तक दुर्जय रहता है।

टीका

गज मल्ल: यह भारी-भरकम, स्थिर और शक्तिशाली योद्धा है। जैसे हाथी की ताकत उम्र के साथ कम नहीं होती, वैसे ही 'गज' श्रेणी का मल्ल (संभवतः भारी वजन वाला मल्ल) लंबी उम्र तक अखाड़े में टिका रहता है। 'मल्ल-युद्धम्' में भार और स्थिरता का बड़ा महत्व है।

गज, सिंह, वृष व मृग के लक्षण

शृणु सोमेश्वरात्रैव एकाग्रहृदयोऽधुना । गजस्तु धारयेद्यास्तु गुणास्तान् कथयाम्यहम् ॥ १५ ॥ वपुषा धातुश्चैव बलवान् प्राणवांस्तथा । स्नेहसारस्तथा शूर एते शारीरका गुणाः ॥ १६ ॥ एतैर्गुणैः सदा मल्लो गजश्चैवोपलक्ष्यते । सिंहोऽपि सहजैस्तद्वदेतैर्द्वादशभिर्गुणैः ॥ १७ ॥
हिंदी अर्थ

हे सोमेश्वर! अब एकाग्र होकर सुनो। मैं गज मल्ल के गुणों को कहता हूँ। शरीर से भारी धातुओं वाला, बलवान, प्राणवान, स्नेहसार (जिसके शरीर में चिकनाई/तेल हो), और शूरवीर। ये उसके शारीरिक गुण हैं। इन गुणों से 'गज' मल्ल पहचाना जाता है। अब 'सिंह' (शेर) मल्ल के १२ सहज गुण सुनो।

टीका

स्नेहसार: मल्ल के शरीर में 'स्नेह' (वसा/चिकनाई) होना जरूरी है ताकि जोड़ों में घर्षण न हो और पकड़ में फिसलन रहे। कुश्ती में तेल (तैलाभ्यंग) का महत्व इसी से जुड़ा है। (श्लोक १६ में 'धातुश्चैव' का पाठ स्थान-स्थान पर 'धातुतुश्चैव' रूप में भी मिलता है — पाठभेद संभावित।)

उरसा चातिविस्तीर्णः कटिविस्तारवांस्तथा । मध्ये क्षामोदरः स्कन्धे प्रकोष्ठे स्थूल एव च ॥ १८ ॥ तेजोवान् स्फूर्तिमांश्चैव लघुवेगश्च सर्वदा । वपुषो विस्तरश्चैव तथैवोत्पतने गतिः ॥ १९ ॥ शीघ्रप्राणः शौर्यवांश्च सिंहस्य कथिता गुणाः । वृषोऽपि जायते यस्तु गुणास्तान् कथयाम्यहम् ॥ २० ॥
हिंदी अर्थ

(सिंह के गुण): छाती अत्यंत चौड़ी, कमर चौड़ी, लेकिन पेट (मध्य) पतला (क्षामोदर) — यह 'सिंहाकृति' शरीर का वर्णन है। कंधे और कलाई (प्रकोष्ठ) मोटे। तेजस्वी, स्फूर्तिमान (विस्फोटक ऊर्जा), लघुवेग (हल्का और तेज), शरीर का विस्तार, और उत्पतने गतिः (कूदने/छलांग लगाने में तेज)। शीघ्रप्राण (शीघ्र शक्ति प्राप्त करने वाला), और शौर्यवान। ये सिंह मल्ल के गुण हैं। अब 'वृष' (सांड) के गुण कहता हूँ।

टीका

सिंह शैली: यह 'आदि-वरिसाई' (प्रहार) और 'कुथु-वरिसाई' के लिए सबसे उपयुक्त शरीर है। 'उत्पतने गतिः' का अर्थ है कि वह हवा में कूदकर प्रहार कर सकता है, जो 'कलरीपायट्टु' और 'सिलंबम' की छलांगों जैसा है। (श्लोक १८ में 'स्कन्धे' का पाठ 'स्कन्धः' रूप में भी उपलब्ध — पाठभेद संभावित।)

सुशरीरः सुप्रमाणः पृथुलः कठिनोऽपि च । पादारोपी भारसहो युद्धशूरो जितश्रमः ॥ २१ ॥ अष्टौ गुणा भवन्त्येते ज्ञातव्याश्च स्वभावजाः । अथेदानीं मृगस्यापि गुणान् वक्ष्यामि तत्त्वतः ॥ २२ ॥
हिंदी अर्थ

(वृषभ के ८ गुण): सुंदर शरीर, सुडौल, पृथुल (चौड़ा/स्थूल), कठिन (कठोर)। पादारोपी (पैरों पर स्थिर रहने वाला), भार सहने वाला, युद्ध में शूर, और थकान को जीतने वाला। अब 'मृग' (हिरण) मल्ल के गुण सुनो।

टीका

वृषभ शैली: यह मल्ल 'पूडी-वरिसाई' (पाश/बंध) के लिए उत्तम है। 'कठिन' शरीर और 'भारसह' होना उसे विपक्षी का वजन उठाने और पटकने में मदद करता है। वह 'गज' से छोटा लेकिन 'सिंह' से अधिक भारी हो सकता है।

बली वशी भीरुकः सूक्ष्मपादकरोऽपि च । सुतनुश्च सुवेगश्च तथैव व्यवसायवान् । अल्पश्रमश्च सप्तैते मृगस्य सहजा गुणाः ॥ २३ ॥
हिंदी अर्थ

(मृग के ७ गुण): बलवान (अपनी श्रेणी में), वशी (संयमित), भीरुक (सतर्क — यहाँ 'डरपोक' का अर्थ नकारात्मक नहीं, बल्कि 'प्रहार करो और भागो' शैली से है)। हाथ-पैर पतले (सूक्ष्म), सुंदर पतला शरीर, सुवेग (अत्यंत तेज), व्यवसायी (निरंतर कर्मशील)। अल्पश्रम: जो कम समय के लिए ही तीव्र श्रम कर सके (धावक प्रकृति)। ये मृग के सहज गुण हैं।

टीका

मृग शैली: यह सबसे हल्का और तेज मल्ल है। उसकी शैली 'बचाव' और 'प्रति-प्रहार' की होती है। वह सीधे भिड़ने (पाश) के बजाय गति और 'मर्म-कला' का उपयोग करता है। 'भीरुक' का अर्थ है कि वह अनावश्यक जोखिम नहीं लेता और दूर से लड़ता है, जैसे 'पोडी-कुच्ची' (छोटी लाठी) या 'सुरुळ-वाल' (लचीली तलवार) चलाने वाला।

इति श्रीमल्लपुराणे गजसिंहमृगवृषभमल्लस्वरूपो नाम पञ्चमोऽध्यायः ।

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