पंचांग मल्ल लक्षण एवं देह-विवेक
मल्ल के अंग-विवेक को उत्तम, मध्यम और अधम लक्षणों के द्वारा व्यवस्थित रूप से समझाया गया है। बत्तीस 'विस्तार' को जयदायक आधार माना गया है, और धातु-भेद (अस्थि, मांस, मेद) के अनुसार पाँच प्रकार के मल्लों का निरूपण होता है। शरीर की रचना के अनुसार ही दांव और पैंतरे चुनने की शिक्षा देकर यह अध्याय देह-विज्ञान को मल्लविद्या की जड़ बताता है।
बत्तीस विस्तार — जयदायक अंग-लक्षण
श्रीकृष्ण बोले — अब मैं अंगों के विविध विवेक (भेद/ज्ञान) को कहता हूँ। उत्तम, अधम और मध्यम भेदों के द्वारा उसे एकाग्रचित्त होकर सुनो।
१. सुप्राण (उत्तम श्वास/ओज), २. सुसंस्थान (गठीला बदन), ३. सुशरीर, ४. मांसल (पुष्ट मांसपेशियों वाला), ५. स्वस्थ, ६. सुगात्र (सुंदर अंग), ७. श्रेष्ठ आसनों के अभ्यास से युक्त, ८. विस्तृत स्वर (गंभीर आवाज), ९. विस्तृत नेत्र (विशाल दृष्टि), १०. विस्तृत स्कंध (चौड़े कंधे), ११. विस्तृत ग्रीवा (मजबूत गर्दन), १२. विस्तृत भुजाएं, १३. विस्तृत बाहु (ऊर्ध्व बाहु), १४. विस्तृत प्रकोष्ठ (कलाई), १५. विस्तृत अंगु लियां, १६. विस्तृत कटि (कमर), १७. विस्तृत जंघा, १८. विस्तृत जानु (घुटने), १९. विस्तृत चित्त (विशाल हृदय/मन), २०. शौर्य का विस्तार, २१. गुणों का विस्तार... इस प्रकार ये बत्तीस 'विस्तार' जय प्रदान करने वाले कहे गए हैं।
देह-लक्षण विज्ञान: यहाँ एक आदर्श योद्धा की शारीरिक संरचना का वर्णन है। 'कुथु-वरिसाई' और 'आदि-वरिसाई' में प्रहार की शक्ति इन्हीं अंगों की पुष्टि पर निर्भर करती है।
प्रकोष्ठ और अंगुलियां: 'पूडी-वरिसाई' (पाश/बंध) में कलाई (प्रकोष्ठ) और अंगुलियों की मजबूती और विस्तार अत्यंत आवश्यक है, ताकि पकड़ छूट न सके।
चित्त-विस्तार: केवल शरीर नहीं, अपितु मन का विस्तार भी युद्ध में आवश्यक है ताकि योद्धा विषम परिस्थितियों में घबराए नहीं।
मध्यम व अधम मल्ल के लक्षण
अब उत्तम और मध्यम के लक्षण कहे जाते हैं। जो मध्य (पेट) में स्थूल (मोटा) हो और छाती (उर) में सूक्ष्म (पतला) हो। जिसके कंधे मोटे हों परंतु गर्दन अत्यंत संकीर्ण (पतली/कमजोर) हो, वह मल्ल प्रशंसनीय नहीं है। जिसकी बाहु (ऊर्ध्व बाहु) मोटी हो लेकिन भुज-शीर्ष (कंधे का जोड़) संकरा हो। जिसकी कलाई (प्रकोष्ठ) पतली हो और हाथ (हथेलियां) बहुत मोटे हों। जिसके नितंब (स्फिक) भारी हों और कमर बहुत पतली ह ो। जिसकी जांघें पतली (कृश) हों और घुटने मोटे हों। जो नीचे से विस्तृत और ऊपर से संकीर्ण हो, या इसके विपरीत हो। जो वाणी में शूरवीर हो परंतु चित्त से डरपोक हो। जो शरीर से भारी हो परंतु प्राण (दम/ओज) से हीन हो। ये बीस प्रकार के 'मध्यम' मल्ल जानने चाहिए।
असंतुलन: यहाँ शारीरिक असंतुलन को मध्यम श्रेणी में रखा गया है। 'मल्ल-युद्धम्' में संतुलन और गुरुत्वाकर्षण केंद्र महत्वपूर्ण है। भारी शरीर लेकिन कमजोर प्राण (प्राणहीन) युद्ध में शीघ्र थक जाता है।
अब अधम अंगों वाले और विचलित लक्षणों वाले निंदित मल्लों का वर्णन सुनिए। अत्यंत लंबा (अतिदीर्घ), विकृत अंगों वाला, बहुत छोटे मुख वाला, अत्यंत दुबला (कृश), नपुंसक, कुष्ठ रोगी, दोषयुक्त अंगों वाला। जिसके कंधे वायु-दोष से ग्रस्त हों (वातुल)। अत्यंत डरपोक, आलसी, महामूर्ख, प्राणहीन (दम रहित) और मंदाग्नि (कमजोर पाचन) वाला। ये सोलह प्रकार के मल्ल 'अधम' माने गए हैं और अंग-संगर (शारीर िक युद्ध) में निंदित हैं।
पंचसार — देह-धातु के पाँच भेद
श्रीकृष्ण बोले — अब मैं पांच अंगों (प्रकृति) वाले मल्लों का वर्णन करता हूँ:
- अस्थिसार: हड्डियों की प्रधानता वाला।
- मांससार: मांस की प्रधानता वाला।
- मेदसार: मेद (वसा) की प्रधानता वाला।
- अस्थि-मांससार: हड्डी और मांस दोनो ं की प्रधानता वाला।
- मेद-अस्थिसार: मेद और हड्डी की प्रधानता वाला।
इनके भेद यथार्थ रूप से निरूपित किए जा रहे हैं।
शारीरिक प्रकृति: यह वर्गीकरण आयुर्वेद और धनुर्वेद पर आधारित है। योद्धा की प्रकृति जानकर ही उसे उपयुक्त शस्त्र-विद्या (जैसे 'कंबु', 'वेल' या 'गदा') सिखाई जानी चाहिए।
(अस्थिसार के लक्षण): मोटी हड्डियों वाला, मोटे जोड़ों (संधि) वाला, कम मांस वाला, कम प्राण (दम) वाला। श्रम करने वाला, घूमने वाला (चंचल), थोड़ा श्रम करने पर थकने वाला, शौर्य से युक्त, और दिखने में अप्रिय (रूखा)। ये ८ भेद अस्थिसार के कहे गए हैं।
युद्ध शैली: अस्थिसार मल्ल की हड्डियाँ मजबूत होती हैं, अतः वह 'इडि-वरिसाई' (कोहनी/घुटने के प्रहार) और 'वेटा-वरिसाई' (कठोर प्रहार) में कुशल हो सकता है, लेकिन उसमें सहनशक्ति की कमी हो सकती है।
अब मांससार मल्ल के गुणों का विस्तार कहा जाता है। वह सुडौल होता है, न बहुत पतली हड्डी वाला, न बहुत मोटी हड्डी वाला। उसकी हड्डियाँ मध्यम होती हैं। वह न तो बहुत अधिक मांस वाला (मोटा) होता है और न ही कम मांस वाला (सूखा)। 'सममांस' (संतुलित मांस) वाला ही बलवान और उदय को प्राप्त होने वाला होता है। उसका शरीर बलवर्धक और लीन (सुगठित) होता है। शरीर गठा हुआ और दृढ़ (कठोर) होता है। वह गंभीर शौर्य से युक्त और सभी में श्रेष्ठ होता है। वह प्राणवान, श्रमसह और थकान को जीतने वाला होता है। ये १४ गुण मांससार के कहे गए हैं।
आदर्श योद्धा: मांससार मल्ल 'मल्ल-युद्धम्' और 'सिलंबम' दोनों के लिए आदर्श है। उसका शरीर न तो भारी होता है कि गति कम हो जाए, और न ही इतना हल्का कि प्रहार न सह सके।
अब मेदसार (मोटापे से युक्त) मल्ल के २१ गुण। वह मध्य (पेट) से मोटा होता है, हाथ-पैर पतले होते हैं। हड्डियाँ पतली, मांस कम और चर्बी (मेद) बहुत अधिक होती है। वह श्रम (व्यायाम) से पीड़ित होता है। सांस फूलती है (श्वासाधिक), बल कम होता है, व्यायाम में असमर्थ होता है। नींद और बिस्तर का प्रेमी, बहुत खाने-पीने वाला। सेवा करवाने वाला, ठंड सहने वाला लेकिन गर्मी (घर्म) से हमेशा पीड़ित रहने वाला। थोड़े श्रम में ही बहुत थकान मानने वाला, छोटे मुंह वाला, दबी हुई आवाज, डरपोक, बहुत पसीना बहाने वाला।
अयोग्यता: मेदसार व्यक्ति युद्ध कला के लिए अनुपयुक्त है। 'नाल' और 'करलाकट्टै' (मुद्गर) के अभ्यास से मेद को घटाकर उसे मांससार में बदला जा सकता है।
अस्थि-मेदसार के १७ गुण। हड्डियाँ चौड़ी/मोटी, मांसल लेकिन मेद (चर्बी) से युक्त। मोटा पेट, छाती छोटी, स्तन लटके हुए। कंधे और बाहु विशाल, लेकिन विजय कम पाने वाला। सत्व (हिम्मत) कम, भारी शरीर, गर्मी सहने वाला। बहुत खाने वाला, सांस वाला, लेकिन प्राणवान (दमदार) और स्थिर युद्ध करने वाला। स्वभाव से निडर और अंग-युद्ध (पाश युद्ध) में स्थिर (अचल) रहने वाला।
स्थिर योद्धा: यह मल्ल भारी-भरकम होता है। वह 'पूडी-वरिसाई' (पाश/बंध) में अपनी स्थिरता और भार का उपयोग कर सकता है, लेकिन गति में कम होता है।
अब अस्थि-मांससार के १६ गुण। सुंदर हड्डियों वाला, युवावस्था, वश में रहने वाला शरीर। सम-मांस और सम-अस्थि वाला, शरीर में थोड़ी चर्बी भी (जो चिकनाई के लिए आवश्यक है)। पित्त प्रकृति वाला, पुष्ट शरीर और वाणी वाला। अंगों में छोटा नहीं, सर्वदा प्रमाणयुक्त (सुडौल)। सम प्राण, सम शौर्य और सम वेग वाला।
युद्ध कौशल: ऊर्ध्व-भद्र योद्धा (ख ड़े होकर लड़ने में निपुण), अर्ध-भद्र योद्धा (झुककर लड़ने वाला), अधोर्ध्व-भद्र (जमीन और ऊपर दोनों में दक्ष), सर्व-युद्धकर (सभी प्रकार के युद्ध में निपुण), अष्टांग-भद्र योद्धा (आठों अंगों से लड़ने वाला)। इस प्रकार मैंने पांच अंगों (प्रकृतियों) के गुण विस्तार से कहे।
सर्वश्रेष्ठ श्रेणी: अस्थि-मांससार मल्ल को 'सर्वयुद्धकर' कहा गया है। यह 'सिलंबम' के सभी अंगों — 'कंबु' (लाठी), 'वेल' (भाला), 'कुथु-वरिसाई' (निहत्था) और 'उरुमि' — में निपुण हो सकता है। 'अष्टांग-भद्र' का अर्थ है जो हाथ, पैर, कोहनी, घुटने, सिर आदि सभी आठ अंगों का प्रयोग प्रहार (आदि-वरिसाई) और बचाव में कर सके।
इति श्रीमल्लपुराणे पञ्चाङ्गमल्ललक्षणं नाम चतुर्थोऽध्यायः ।
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