मल्लपुराण
चर्चा
अध्याय

मल्लविद्या का आरंभ और मल्लों के लक्षण

विद्यारम्भ के लिए शुभ मुहूर्त, मंडप-रचना, ध्वज-तोरण, वेदी और हवन की विधि का विधान प्रस्तुत होता है। उपदेश का आरंभ 'विधान' से होता है, जिससे अभ्यास अनुशासित, सुरक्षित और फलदायी बनता है। ज्येष्ठी, अन्तरज्येष्ठी, गोपकुल और भविष्य — इन चार श्रेणियों के गुणों से मल्लों का प्रारम्भिक वर्गीकरण स्पष्ट होता है।

विद्यारम्भ की विधि व मंडप-रचना

ब्रह्मोवाच । इति कृष्णवचः श्रुत्वा सोमेश्वरपुरःसराः । ज्योतिर्विदं समाहूय मुहूर्तं स्थापयन्ति ते ॥ १ ॥ अक्रूरैः सुखदैर्वारैः सुभगायां तिथावपि । विद्यारम्भस्य नक्षत्रैर्ग्रहैश्चापि शुभप्रदैः ॥ २ ॥ ततस्ते मण्डपं रम्यं रङ्गभूमौ प्रकल्पितम् । पताकाभिस्तोरणैश्च स्वस्तिकैश्च विचित्रितम् ॥ ३ ॥ चतुर्द्वारेषु द्वौ द्वौ च कलशौ राजवारकौ । होमकुण्डसमोपेतं विस्तीर्णकृतवेदिकम् ॥ ४ ॥
हिंदी अर्थ

ब्रह्मा जी बोले — कृष्ण के वचन सुनकर सोमेश्वर और अन्य प्रमुख लोगों ने ज्योतिषी को बुलाकर (विद्यारम्भ का) मुहूर्त निकलवाया। क्रूरता रहित सुखद वार (दिन), शुभ तिथि, विद्यारम्भ के लिए उपयुक्त नक्षत्र और शुभ ग्रहों के योग में उन्होंने रंगभूमि (अखाड़े) में एक रमणीय मंडप बनाया। वह पताकाओं, तोरणों और स्वस्तिक चिह्नों से सजाया गया था। उसके चारों द्वारों पर दो-दो राजसी कलश रखे गए और हवन कुंड के साथ एक विस्तृत वेदी बनाई गई।

टीका

अनुशासन और ज्योतिष: प्राचीन भारतीय परम्परा में कोई भी बड़ा कार्य (जैसे व्यायामशाला या अखाड़ा आरंभ करना) शुभ समय (मुहूर्त) देखकर ही किया जाता है। यह मानसिक सकारात्मकता और ब्रह्मांडीय ऊर्जा के साथ तालमेल बिठाने का प्रयास है।

पाठभेद: मूल में चौथे श्लोक का पाठ 'चतुर्द्विरेषु (चतुर्द्वारेषु)' के रूप में मिलता है; यहाँ अर्थ-संगत 'चतुर्द्वारेषु' (चारों द्वारों पर) पाठ लिया गया है (पाठभेद संभावित)।

तत्र ते ब्राह्मणाः सर्वे शुभे समागताः । कृष्णं च बलभद्रं च पुरस्कृत्य कृतोत्सवाः ॥ ५ ॥ शुभासने चोपविष्टौ तत्र तौ परमेश्वरौ । कारयन्तौ शुभं होमं द्विजेभ्यो दानमुत्तमम् ॥ ६ ॥ ऋग्यजुःसामवेदैश्च कृतस्वस्त्ययना ततः । कृताञ्जलिपुटो भूत्वा द्विजस्तत्र तयोः पुरः ॥ ७ ॥
हिंदी अर्थ

वहां सभी ब्राह्मण शुभ समय पर एकत्रित हुए और कृष्ण-बलराम को आगे करके उत्सव मनाया। वे दोनों परमेश्वर (कृष्ण-बलराम) शुभ आसनों पर बैठे और उन्होंने शुभ हवन करवाया तथा ब्राह्मणों को उत्तम दान दिया। ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के मंत्रों से स्वस्तिवाचन (कल्याण पाठ) किया गया। तब वह ब्राह्मण (सोमेश्वर) हाथ जोड़कर उनके सामने खड़ा हुआ।

ततः सोमेश्वरः कृष्णं प्रणम्य इदमब्रवीत् । सोमेश्वर उवाच । देव देव कृपालुस्त्वं सर्वविप्रगणाधिप ॥ ८ ॥ प्रथमं मल्लविद्यायां विधानमुपदिश्यताम् । प्रभोवाच । पश्चाद्विधाने विज्ञाते कर्तव्योऽभिनवः सुखम् ॥ ९ ॥ एवमस्त्विति कृष्णेन स च प्रत्यभिनन्दितः । प्रारब्धमुपदेशं तु संप्रदातुं मनो दधे ॥ १० ॥
हिंदी अर्थ

तब सोमेश्वर ने कृष्ण को प्रणाम करके कहा — "हे देवों के देव! हे कृपालु! आप सभी ब्राह्मणों के स्वामी हैं। कृपया मल्लविद्या का विधान (नियम/विधि) पहले उपदेश करें।" प्रभु (कृष्ण) बोले — "विधान जान लेने के बाद ही नया अभ्यास सुखपूर्वक किया जा सकता है।" "ऐसा ही हो" कहकर कृष्ण ने उसका अभिनंदन किया और उपदेश देना प्रारंभ करने का मन बनाया।

मल्लों के चार प्रकार व ज्येष्ठी के गुण

श्रीकृष्ण उवाच । ज्येष्ठी तथान्तरज्येष्ठी तथा गोकुलेऽपि च । भविष्यश्चेति चत्वारि प्रथममित्राणि तानि च ॥ ११ ॥
हिंदी अर्थ

श्रीकृष्ण बोले — मल्ल चार प्रकार के (मित्र/श्रेणी) होते हैं:

  1. ज्येष्ठी — सर्वश्रेष्ठ/वरिष्ठ मल्ल।
  2. अन्तरज्येष्ठी — मध्यम श्रेणी का मल्ल।
  3. गोपकुल — सामान्य मल्ल (ग्वाला श्रेणी)।
  4. भविष्य — नौसिखिया या भविष्य में बनने वाला मल्ल।
टीका

वर्गीकरण: आधुनिक खेलों में जैसे भार-श्रेणी या कौशल-स्तर होता है, वैसे ही यहाँ कौशल-आधारित वर्गीकरण है। 'जेठी' शब्द आज भी गुजरात में पहलवानों की एक जाति (जेठीमल्ल) के रूप में प्रसिद्ध है।

तत्रादौ तावदुच्यन्ते निःशेषा ज्येष्ठिनां गुणाः । संस्कृतप्राकृताभ्यां च ततो लौकिकभाषया ॥ १२ ॥ अपभ्रंशाच्च वक्ष्यामि ये यत्रोक्तास्तथैव तान् । कुलं च शीलं च नयो विनयश्च तथैव च ॥ १३ ॥
हिंदी अर्थ

उनमें से सबसे पहले मैं 'ज्येष्ठी' (सर्वश्रेष्ठ मल्ल) के संपूर्ण गुणों को बताता हूँ। मैं संस्कृत, प्राकृत, लौकिक भाषा और अपभ्रंश (स्थानीय बोली) के शब्दों का प्रयोग करूँगा, जो जहाँ जैसे कहे गए हैं। (गुण इस प्रकार हैं): कुल (अच्छे परिवार से), शील (चरित्र), नय (नीति), विनय (विनम्रता)...

टीका

भाषा: यह ग्रंथ स्वीकार करता है कि कुश्ती की तकनीकी शब्दावली में स्थानीय भाषाओं (प्राकृत/अपभ्रंश) के शब्द अधिक हैं। आज भी अखाड़ों में 'दांव', 'धोबी-पछाड़', 'कलाजंग' जैसे शब्द संस्कृत नहीं हैं।

आहारश्च तथारोग्यमुद्यमो बलमेव च । प्राणश्चैव तथायासस्तथैव सुशरीरता ॥ १४ ॥ सुश्रमश्च श्रमसहो विजितेन्द्रिय एव च । जितश्रमः कष्टसहो मानी कर्मजयस्तथा ॥ १५ ॥
हिंदी अर्थ

आहार (सही खान-पान), आरोग्य (स्वास्थ्य), उद्यम (मेहनत), बल, प्राण (त्राण/सहनशक्ति), आयास (प्रयास), सुशरीरता (उत्तम काया), सुश्रम (सही व्यायाम), श्रमसह (थकान सहने वाला), विजितेन्द्रिय (इंद्रियों को जीतने वाला), जितश्रम (थकान को जीतने वाला), कष्टसह (पीड़ा सहने वाला), मानी (स्वाभिमानी) और कर्मजय (कर्म से जीतने वाला)।

टीका

आहार और संयम: एक पहलवान के लिए 'आहार' और 'विजितेन्द्रिय' (ब्रह्मचर्य) सबसे महत्वपूर्ण माने गए हैं। आधुनिक खेल विज्ञान भी पोषण और अनुशासन को एथलीट की नींव मानता है।

लज्जापरोऽभिमानी च तथा भक्तिपरः स्मृतः । स्थाने शक्तिः स्थापने च धातुशक्तिस्ततः परम् ॥ १६ ॥ आसने ग्रहणे शक्ति रक्षणे शक्तिरेव च । चारणे शक्तिरत्रैव शक्तिर्निःसरणेऽपि च ॥ १७ ॥ विज्ञानशक्तिः रचनाशक्तिः सौष्ठवेन तथा । भेदशक्तिः कर्षणशक्तिर्युद्धशक्तिस्तथैव च ॥ १८ ॥ अधः शक्तिश्च विज्ञेया उर्ध्वशक्तिः परा स्मृता । तथा कातरशक्तिश्च त्राणशक्तिस्तथोत्तमा ॥ १९ ॥ अत्राणके च या शक्तिरशक्ते शक्तिरेव च । अरङ्गरङ्गयोः शक्तिर्भोजने शक्तिरेव च ॥ २० ॥ पाने च शयने शक्तिर्मात्राशक्तिः प्रशस्यते । कामव्यायामयोश्चैव मात्रां यत्नेन पालयेत् ॥ २१ ॥
हिंदी अर्थ

(अन्य गुण): लज्जाशील (मर्यादा रखने वाला), अभिमानी (गर्व रखने वाला), भक्तिपरायण।

शक्तियाँ: स्थान-शक्ति (स्थिरता), स्थापन-शक्ति, धातु-शक्ति (ओज), आसन-शक्ति, ग्रहण-शक्ति (पकड़), रक्षण-शक्ति (बचाव), चारण-शक्ति (पैरों की गति), निःसरण-शक्ति (बच निकलना), विज्ञान-शक्ति (तकनीक का ज्ञान), रचना-शक्ति (रणनीति), सौष्ठव (सुडौलपन), भेद-शक्ति (रक्षा भेदना), कर्षण-शक्ति (खींचना), युद्ध-शक्ति, अधः शक्ति (जमीन पर लड़ने की क्षमता), ऊर्ध्व शक्ति (खड़े होकर लड़ने की क्षमता), कातर-शक्ति (भय का अभिनय), त्राण-शक्ति (ऊर्जा बचाना)...

भोजन, पान, शयन, काम और व्यायाम — इन सबमें 'मात्रा' (संतुलन/सीमा) का पालन करना ही 'मात्राशक्ति' है, जिसकी प्रशंसा की गई है।

टीका

तकनीकी शब्दावली: यहाँ 'ग्रहण' (पकड़), 'निःसरण' (बच निकलना), 'कर्षण' (खींचना) जैसे शब्द सीधे कुश्ती की तकनीकों (पूडी-वरिसाई) की ओर इशारा करते हैं। 'मात्राशक्ति' सबसे महत्वपूर्ण है — अति-श्रम से बचना और सही मात्रा में व्यायाम/भोजन करना।

कालमानं देशमानं राजमानमतः परम् । सभामानमर्थमानं यशोमानमिति क्रमात् ॥ २२ ॥ कथिताश्च चतुःषष्ठिरित्येते ज्येष्ठिनो गुणाः ॥ २३ ॥
हिंदी अर्थ

कालमान (समय का ज्ञान), देशमान (स्थान का ज्ञान), राजमान (नियमों का आदर), सभामान (दर्शक दीर्घा का भान), अर्थमान (पुरस्कार का मूल्य), यशोमान (कीर्ति का मूल्य)। इस प्रकार ये 'ज्येष्ठी' (सर्वश्रेष्ठ) मल्ल के ६४ गुण कहे गए हैं।

टीका

६४ कलाएं: प्राचीन भारत में ६४ कलाएं प्रसिद्ध थीं। यहाँ मल्ल के संदर्भ में ६४ विशिष्ट गुणों का उल्लेख करके इसे एक पूर्ण 'कला' का दर्जा दिया गया है। एक श्रेष्ठ खिलाड़ी को न केवल खेलना, बल्कि 'दर्शक', 'नियम', और 'समय' की समझ भी होनी चाहिए।

अन्तरज्येष्ठी, गोपकुल व अधमाधम मल्ल

एवं सोमेश्वरः श्रुत्वा पुनः पप्रच्छ केशवम् । सोमेश्वर उवाच । कथिताः कृष्ण सर्वे च भवता ज्येष्ठिनो गुणाः ॥ २४ ॥ भगवन् कथयेदानीमन्तरज्येष्ठिनो गुणान् । श्रूयतामिति तं कृष्णः प्रत्युवाच कृतादरः ॥ २५ ॥
हिंदी अर्थ

इस प्रकार सुनकर सोमेश्वर ने पुनः केशव (कृष्ण) से पूछा — "हे कृष्ण! आपने ज्येष्ठ मल्ल के सभी गुण कहे। अब भगवान, 'अन्तरज्येष्ठी' (मध्यम) मल्ल के गुण बताएं।" तब कृष्ण ने आदरपूर्वक उत्तर दिया — "सुनो।"

कुलीनो दक्षः सर्वेषु नीतिशीलश्च सर्वदा । प्रमाणसुशरीरश्च सुविस्तरस्तनुस्तथा ॥ २६ ॥ शौर्ययुक्तो निरालस्यो व्यवसायी तथैव च । अगवृत्तिर्भगवृत्तिरर्धप्राणसमन्वितः ॥ २७ ॥ अर्धश्रमगुणयुतः सत्यभाषी तथैव च । ज्येष्ठी गुणवृद्धिकरः शौर्यवृद्धिकरस्तथा ॥ २८ ॥ पुण्यगुणवृद्धिकरो यशोवृद्धिकरोऽपि च । लघुवृत्तिकरस्तद्वत् गुणेषु कुशलस्तथा ॥ २९ ॥ भयहरः स्थानपरः सदा हेतुपरः स्मृतः । जितश्रमो विश्वासवान् ज्येष्ठिनः श्रमपूरकः ॥ ३० ॥ प्राणवान् बलवांश्चैव सर्वकार्यविचारवित् । अन्तरज्येष्ठिनस्त्रिंशत् कथिता मध्यमा गुणाः ॥ ३१ ॥
हिंदी अर्थ

(अन्तरज्येष्ठी के गुण): कुलीन, दक्ष (निपुण), नीतिशील, प्रमाणसुशरीर (सुडौल), सुविस्तृत, पतला, शौर्ययुक्त, निरालस्य (आलस्य रहित), व्यवसायी (उद्यमी)। इसमें आधा प्राण (मध्यम सहनशक्ति), आधा श्रम गुण, सत्यभाषी, ज्येष्ठ के गुणों को बढ़ाने वाला, शौर्य बढ़ाने वाला, पुण्य और यश बढ़ाने वाला, लघु वृत्ति (छोटी आजीविका) वाला, गुणों में कुशल। भय हरने वाला, स्थान पर ध्यान देने वाला, उद्देश्य पूर्ण, थकान जीतने वाला, विश्वासपात्र और ज्येष्ठी का श्रम-पूरक (अभ्यास साथी)। यह प्राणवान, बलवान और कार्य विचारने वाला होता है। इस प्रकार मध्यम 'अन्तरज्येष्ठी' के ३० गुण कहे गए हैं।

टीका

अभ्यास साथी: 'ज्येष्ठिनः श्रमपूरकः' — यह बहुत महत्वपूर्ण पद है। एक श्रेष्ठ मल्ल (ज्येष्ठी) को अभ्यास के लिए ऐसे साथी की आवश्यकता होती है जो उसे चुनौती दे सके, पर उसे अनावश्यक चोट न पहुँचाए। अन्तरज्येष्ठी वही भूमिका निभाता है।

पाठभेद: श्लोक २६ का पाठ मूल में 'कुलीनो र(द)क्ष(:) सर्वेषु' के रूप में मिलता है; यहाँ अर्थ-संगत 'कुलीनो दक्षः सर्वेषु' पाठ लिया गया है (पाठभेद संभावित)।

इत्युत्तममध्यमांश्च श्रुत्वा सोमेश्वरो गुणान् । अधमानपि पप्रच्छ प्रणम्य शिरसा हरिम् । सोमेश्वर उवाच । भगवन् कथयेदानीमधमानपि तान् गुणान् ॥ ३२ ॥ श्रीकृष्ण उवाच । शृणु गोपकुलादीनामधमांश्च गुणान् बहून् । विचार्य तत्त्वात् सर्वज्ञ अशेषं गदतो मम ॥ ३३ ॥ मतिमान् मार्गगश्चैव कृतद्विगुणवानपि । शीलवानविनीतश्च सुविस्तरभयं हृदि ॥ ३४ ॥ श्रमासहोऽप्यसज्जडो न युद्धकुशलस्तथा । वाचाशक्तिरसद्वाक्यो विचार्यायासकार्यकृत् ॥ ३५ ॥ बलवान् शक्तिहीनश्च प्राणवान् मूर्ख एव च । वाचा त्राणकरः कोऽपि वाचा लाभकरः परः ॥ ३६ ॥ वाचा हानिकरः कश्चित् न किंचित् परमार्थवित् । तथा कष्टसहः कोऽपि कर्माशक्यस्तथैव च ॥ ३७ ॥ सेवापरोऽपि कोऽप्यत्र कुरङ्गो भवति ध्रुवम् । कार्यतत्पर एव स्यादहितोऽपि क्वचिन्नरः ॥ ३८ ॥ हिंसावांश्च ह्यविश्वासी भवेत् क्वचित् तथा परः । भक्तिनघरे एव स्यात् विकारी च तथा परः ॥ ३९ ॥ परान् दोषान् वादयति पश्चाद्वादयति केवलम् । अधमाः कथिताः सर्वे सप्तत्रिंशदिमे गुणाः ॥ ४० ॥
हिंदी अर्थ

(अधम/गोपकुल के गुण): मतिमान (थोड़ी बुद्धि वाला), मार्ग पर चलने वाला, शीलवान किंतु अविनीत (उद्दंड), जिसके हृदय में बहुत डर हो।

दोष: जो श्रम (व्यायाम) नहीं सह सकता, जड़ (बुद्धिहीन), युद्ध में अकुशल, केवल बातों में शक्ति दिखाने वाला, असत्य बोलने वाला। बलवान होते हुए भी शक्तिहीन (तकनीक की कमी), प्राणवान होते हुए भी मूर्ख। केवल बातों से बचाव या लाभ करने वाला। परमार्थ न जानने वाला। कोई कष्ट सहने वाला तो कोई काम न कर पाने वाला। कोई सेवा करने वाला तो कोई कुरंग (चंचल/डरपोक)। हिंसक, अविश्वासी, भक्तिहीन, विकारी (दोषपूर्ण)। जो दूसरों के दोष गिनाता है और बाद में केवल विवाद करता है। ये ३७ अधम गुण हैं।

टीका

मनोविज्ञान: यहाँ एक अनुशासनहीन और मिथ्या-गर्वी मल्ल का चित्रण है। जो केवल वाणी में शूर है, जिसमें अनुशासन नहीं है, और जो दूसरों को दोष देता है, वह कभी श्रेष्ठ मल्ल नहीं बन सकता।

एवं गुणसमायुक्तो नाम्ना गोपकुलो भवेत् । तथाधमाधमगुणान् शृणु चान्यानशेषतः ॥ ४१ ॥ अकुलीनो भवेत् कश्चिदतिमध्यम एव च । कोऽप्यतो द्यूतकारः स्यादतिकामी तथा परः ॥ ४२ ॥ आलस्यवान् परः कश्चिदतिभीरुश्च निन्दितः । अतिमूर्खोऽतिलुब्धश्च स्थूलरोमविवर्जितः ॥ ४३ ॥ दुर्बलो नीचसङ्गी च निषिद्धो मल्लकर्मणि । विक्षभेदकोऽप्यन्यो गुणप्रच्छादकैस्तथा ॥ ४४ ॥ संवाहनकलो न स्यात् शोकदुःखप्रकाशकः । अहितोऽपि परः कश्चित् कार्याशक्य इति क्रमात् । एकविंशतिसंख्याताः कथिताश्चाधमाधमाः ॥ ४५ ॥
हिंदी अर्थ

(अधमाधम के गुण): अकुलीन, जुआरी, अतिकामी, आलसी, अत्यंत डरपोक, निंदित। अतिमूर्ख, अत्यंत लालची, स्थूल (मोटा), कमजोर, नीच संगत वाला, मल्लकर्म के लिए निषिद्ध। भेद उत्पन्न करने वाला, गुणों को छिपाने वाला, संवाहन-कला न जानने वाला, सदा दुख-रोदन करने वाला। ये २१ अधमाधम गुण हैं।

टीका

निषेध: जुआ और अत्यधिक कामवासना को मल्ल के लिए विनाशकारी माना गया है। संवाहन-कला न जानना भी एक अवगुण है, क्योंकि एक पहलवान को अपनी पुनःप्राप्ति के लिए संवाहन (मालिश) का ज्ञान होना आवश्यक है।

भविष्य मल्ल — होनहार नवसाधक

सोमेश्वर उवाच । पुनः सोमेश्वरः कृष्णं सादरं पृच्छति तानिति । देव देव भविष्यस्य गुणान् ब्रूहि विशेषतः ॥ ४६ ॥ श्रीकृष्ण उवाच । कुलीनोऽथ विनीतश्च लज्जायां शीलसंगतः । दयावान् श्रद्धया युक्तो व्यायामी चाग्निमांस्तथा ॥ ४७ ॥ आधानी सुवपुश्चैव सुश्रमश्च तथा परः । श्रुतिग्राही श्रमसहो दृष्टिग्राही तथैव च ॥ ४८ ॥ चित्तग्राही सत्यवांश्च शौर्यवान् बुद्धिमांस्तथा । जनप्रियश्च गुणवान् पितृभक्तः प्रियंवदः ॥ ४९ ॥ मातृभक्तो भ्रातृभक्तो भक्तो गुरुजनेऽपि च । देवद्विजयोर्भक्तो चतुर्विंश इमे गुणाः ॥ ५० ॥ मया तव समाख्याताः सर्वे विजयहेतवे । एवं गुणैश्च संयुक्तो ज्येष्ठी भवति सत्वरः ॥ ५१ ॥
हिंदी अर्थ

(भविष्य के गुण — होनहार नवसिखिया): कुलीन, विनीत, लज्जाशील, दयावान, श्रद्धालु, व्यायामी, अच्छी जठराग्नि वाला (पाचन शक्ति)। आधानी (बात को ग्रहण करने वाला), सुंदर शरीर, अच्छा श्रम करने वाला।

सीखने की क्षमता: श्रुतिग्राही (सुनकर सीखने वाला), श्रमसह, दृष्टिग्राही (देखकर सीखने वाला), चित्तग्राही (मन को जीतने वाला)। सत्यवान, शौर्यवान, बुद्धिमान, जनप्रिय, माता-पिता-भाई-गुरु और देव-द्विज का भक्त। ये २४ गुण हैं। जो (युवा) इन गुणों से युक्त होता है, वह शीघ्र ही 'ज्येष्ठी' (चैंपियन) बन जाता है।

टीका

प्रतिभा की पहचान: ये गुण एक गुरु (कोच) को नए छात्र में तलाशने चाहिए। 'दृष्टिग्राही' और 'श्रुतिग्राही' होना सीखने की गति को तेज करता है। 'पितृभक्त' आदि गुण अनुशासन और समर्पण को दर्शाते हैं।

इति श्रीमल्लपुराणे चतुष्पात्रवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः ।

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