ताल, दृष्टि, लाग और स्थानक
पाँच प्रकार के ताल (लय) और पाँच प्रकार की दृष्टि से युद्ध की समय-बुद्धि और समग्र भान सिखाया गया है। चौदह प्रकार के लाग (पकड़/पाश) और बारह प्रकार के स्थानक (पैंतरे) बताकर मल्ल-युद्ध की तकनीकी रूपरेखा दी गई है — जहाँ स्थान, समय और अवस्था के अनुसार ही पकड़ व पैंतरा चुनने का क्रम और लय सिखाया जाता है।
पञ्चविध ताल व दृष्टि
ताल (लय) पांच प्रकार के जानने चाहिए:
- आत्म-ताल: अपनी गति/लय।
- पर-ताल: विपक्षी की गति को पढ़ना।
- क्रिया-ताल: तकनीक करते समय की लय।
- सम-ताल: दोनों की समान गति।
- शून्य-ताल: गतिशून्य/शांति की अवस्थ ा।
इन पांचों को प्रयत्नपूर्वक जानने वाला मल्ल सदा युद्ध में विजयी होता है।
युद्ध की लय: 'शून्य-ताल' सबसे महत्वपूर्ण है। जब विपक्षी प्रहार करने ही वाला हो और रुक जाए, या जब वह सांस ले रहा हो — वह क्षण 'शून्य' है। इसी क्षण प्रहार करना प्राचीन प्रहार-परंपराओं का रहस्य है।
मल्लों की दृष्टि पांच प्रकार की होती है:
- चित्त-दृष्टि: मन की आंख (अंतर्ज्ञान) — विपक्षी के इरादे को भांपना।
- चक्षु-दृष्टि: शारीरिक आंखों से देखना।
- वाक्य-दृष्टि: विपक्षी की बातों/आवाज से स्थिति समझना।
- श्रुति-दृष्टि: सु नकर (पैरों की आहट/सांस) समझना।
- रंग-दृष्टि: पूरे अखाड़े (परिवेश) को देखना।
समग्र भान: एक योद्धा केवल आंखों से नहीं देखता। 'चित्त-दृष्टि' उसे वह दिखाती है जो अभी हुआ नहीं है (छल या जाल)। 'रंग-दृष्टि' उसे भीड़ और जगह का भान कराती है।
चतुर्दश लाग
अब १४ प्रकार के 'लाग' (पकड़/पाश) कहे जाते हैं, जिनसे महान फल (जीत) मिलता है:
- जूटक-लाग (जूड़ा/बाल पकड़ना)
- स्कंध-लाग (कंधा पकड़ना)
- एक-हस्त लाग
- द्वि-हस्त लाग
- कक्षा-तल लाग (कांख-पाश)
- बाहु-लाग
- पृष्ठ-लाग (पीठ पकड़ना)
- वंश-लाग (रीढ़ की पकड़)
- कटि-लाग (कमर पकड़ना)
- उदर-लाग (पेट पकड़ना)
- निर्मिति-लाग (रचित/जाल-पकड़)
- हस्त-धारण लाग (क लाई पकड़ना)
- चरण-धारण लाग (पैर पकड़ना)
- निराधार लाग (बिना सहारे का)
इन्हें स्थान और समय के अनुसार करना चाहिए।
कुश्ती के दांव: ये सीधे 'मल्ल-युद्धम्' और आधुनिक कुश्ती की तकनीकें हैं। 'कक्षा-तल' (अंडरहुक) और 'चरण-धारण' (पैर से गिराना) सबसे आम दांव हैं।
द्वादश स्थानक व अष्टादश आसन
मल्ल-कर्म में १२ स्थानक (नियंत्रण की स्थितियां) हैं।
जय-स्थानक (४): १. सिर पर (माउंट), २. करतल पर (हाथ-नियंत्रण), ३. उदर पर, ४. पृष्ठ पर (बैक माउंट)।
समा-स्थानक (४): १. चरण-धारण (पैर-नियंत्रण), २. शिर-धारण (हेडलॉक), ३. जंघा-धारण, ४. कर-पाद धारण।
उप-स्थानक (४): १. कर-धारण, २. कक्षा-धारण, ३. अर्धांग-धारण (साइड कंट्रोल), ४. जानु-द्वय धारण (दोनों घुटनों से दबाना)।
जमीनी युद्ध: यह वर्णन 'सबमिशन रेसलिंग' (आत्मसमर्पण कुश्ती) जैसा है। 'जय-स्थानक' (जीतने वाली स्थितियां) वे हैं जहाँ से मल्ल पूरी तरह नियंत्रण में होता है।
१८ प्रकार के आसन (लड़ने/बैठने की स्थितियां):
१. अग्रासन (आगे झुककर), २. पश्चादासन (पीछे झुककर), ३. मध्यासन, ४. सिंहासन (शेर की तरह), ५. कूर्मासन (कछुए की तरह — रक्षात्मक कवच), ६. दर्दुरासन (मेंढक की तरह), ७. गजासन, ८. अर्धासन, ९. शिरासन, १०. कक्षासन, ११. ग्रीवासन, १२. भुजासन, १३. द्विभुजासन, १४. कुक्कुटासन (मुर्गे की तरह), १५. फणगुप्तासन (सांप की तरह फन छिपाकर), १६. गरुडासन, १७. उदरासन।
रक्षात्मक शैलियां: 'कूर्मासन' आज भी कुश्ती में नीचे वाले पहलवान द्वारा बचाव के लिए उपयोग किया जाता है। 'फणगुप्तासन' अपने सिर और मर्म-स्थानों को छिपाने की तकनीक है।
पाठ-टिप्पणी (पाठभेद संभावित): अंतिम अर्ध-श्लोक में मूल पाठ 'दशसप्तधा' (सत्रह-प्रकार) कहता है जबकि प्रकरण अठारह आसनों का संकेत देता है; उपलब्ध पाठ में केवल सत्रह आसन ही स्पष्ट रूप से गिनाए गए हैं और अठारहवें का पाठ सुरक्षित नहीं है।
अध्याय समाप्ति:
इति श्रीमल्लपुराणे अष्टमोऽध्यायः ।
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