मल्लपुराण
चर्चा
अध्याय

व्यायाम और रंगभूमि शुद्धि

मल्लों के ३७ सामान्य गुणों की सूची से मल्लभाषा की मूल शब्दावली दी गई है। रंगभूमि (अखाड़े) के निर्माण, शुद्धि व सम-भूमि के चयन की विधि, मल्ल की दिनचर्या तथा अभ्यास-पूर्व की पूजा-विधि (विशेषकर कृष्ण व वासुकि की) का वर्णन कर यह अध्याय अनुशासित जीवन की नींव रखता है।

मल्ल के सामान्य गुण व अंग-सार

श्रीकृष्ण उवाच । भवन्ति सर्वसामान्याः सप्तत्रिंशदिमे गुणाः । घातपातस्तथालातैः स्थानकं लाग एव च ॥ १ ॥ भारः श्रुतिश्चैव बहुदृष्टार्थसहनं तथा । धारणं रोधनं चैव तथा निर्जनतर्जनम् ॥ २ ॥ ताकणं सौष्ठवं च पालनं व्यवसायिकम् । प्राणश्चैव तथा शौर्यं क्वचिदुत्थापनं भवेत् ॥ ३ ॥ क्वचित् प्रवेशनं प्रौढिः पटुश्च सहजं क्वचित् । धारणेऽप्यधिका शक्तिस्तथा निस्सरणेऽपि च ॥ ४ ॥ ताकणे रक्षणे कोऽपि शक्तश्चालनकेऽपि च । फरकणे शक्तः कोऽपि स्याद् पटुः कोऽपि वर्जने ॥ ५ ॥ रुन्धने चोत्कटः कोऽपि लागेऽपि मतिमानपि । गोपने निपुणः कोऽपि युद्धेऽपि निपुणो भवेत् ॥ ६ ॥ कक्षालग्नः परः कोऽपि दण्डिकालग्न एव च । वहणे रुमः कोऽपि स्यादोजोलग्नस्तथैव च ॥ ७ ॥ चोडिलग्नो भवेत्कश्चित् सप्तत्रिंशदिमे गुणाः । कथिता लौकिकैः शब्दैस्तथोक्ता मल्लभाषया ॥ ८ ॥
हिंदी अर्थ

अब सभी मल्लों के लिए ३७ सामान्य गुण कहे जाते हैं (जो लौकिक और मल्ल-भाषा में हैं): १. घात (प्रहार), २. पात (फेंकना/पटकना), ३. लात (पादाघात), ४. स्थानक (पैंतरा/स्थिति), ५. लाग (बंध/पाश), ६. भार (वजन का प्रयोग), ७. श्रुति (सजगता), ८. सहन (सहनशक्ति), ९. धारण (पकड़ना), १०. रोधन (रोकना), ११. निर्जन-तर्जन (अकेले में भी उग्रता), १२. ताकण (लक्ष्य साधना), १३. सौष्ठव (सुडौलपन), १४. पालन (बचाव), १५. व्यवसाय (प्रयास), १६. प्राण, १७. शौर्य, १८. उत्थापन (उठाना), १९. प्रवेशन (भीतर घुसना), २०. प्रौढि (परिपक्वता/अनुभव), २१. पटुता (कौशल), २२. निःसरण (बच निकलना), २३. चालन (विपक्षी को चलाना/असंतुलित करना), २४. फरकण (चकमा देना), २५. वर्जन (टालना), २६. रुन्धन (अवरोध करना), २७. गोपन (इरादा छिपाना), २८. कक्षालग्न (कांख में पकड़), २९. दण्डिकालग्न (दंड/बाहु पाश), ३०. वहण (उठा ले जाना), ३१. ओजोलग्न (ऊर्जा का प्रयोग), ३२. चोडिलग्न (कमर/कूल्हे का प्रयोग)… ये ३७ गुण मल्ल-भाषा के शब्दों में कहे गए हैं।

टीका

तकनीकी शब्दकोश: ये शब्द सीधे 'सिलंबम' और 'मल्ल-युद्धम्' की तकनीकों से जुड़ते हैं:

  • घात/पात: प्रहार (आदि-वरिसाई) और पटकना (मल्ल-युद्धम्)।
  • लात: पाद-प्रहार (कुथु-वरिसाई)।
  • लाग/कक्षालग्न: कुश्ती के दांव (बंध/पाश)।
  • निःसरण/फरकण: बचाव की तकनीकें।

(श्लोक २–५ में कुछ पदों के 'बहुदृष्टार्थसहनं', 'सौष्ठवं च', 'शक्त' आदि पाठ अन्य प्रतियों में थोड़े भिन्न मिलते हैं — पाठभेद संभावित।)

पञ्चसारो भवेत्कश्चिज्जानुसारस्तथा परः । इत्यङ्गसारतां ज्ञात्वा तत्र कर्माणि कारयेत् ॥ ९ ॥ एतैर्युक्तास्तु ये मल्लास्तानहं कथयामि ते । उरःसारः स्कन्धसारो भुजसारस्तथैव च ॥ १० ॥ कटिसारो भवेत् कश्चिज् जानुसारस्तथा परः । पञ्च स्थानानि मल्लानां शस्यन्ते युद्धकर्मणि ॥ ११ ॥ पुनश्च कथयिष्यामि यथोपायं यथोगुणम् । स्कन्धस्थानं भुजस्थानं उरस्थानं तथैव च ॥ १२ ॥ कटिस्थानं तथैवान्यत् जानुस्थानमत्तः परम् । पञ्च स्थानानि विज्ञाय स्वशरीरे यथार्थतः । तनोर्बलानुसारेण मल्लः कर्म समाचरेत् ॥ १३ ॥
हिंदी अर्थ

मल्ल को अपने 'अंग-सार' (किस अंग में सबसे अधिक बल है) को जानकर उसी के अनुसार कर्म (दांव) करना चाहिए। पांच मुख्य सार हैं: १. उर (छाती), २. स्कंध (कंधे), ३. भुज (बाहु), ४. कटि (कमर), ५. जानु (घुटने)। ये पांच 'स्थान' युद्ध-कर्म में श्रेष्ठ माने गए हैं। मल्ल को अपने शरीर में इन पांचों स्थानों को यथार्थ रूप से जानकर अपने शरीर के बल (तनोर्बल) के अनुसार ही तकनीक (कर्म) का प्रयोग करना चाहिए।

टीका

विशेषज्ञता:

  • स्कन्धसार: कंधे से टक्कर या प्रक्षेप (कंधे से फेंकना)।
  • कटिसार: कटि प्रक्षेप (कमर से फेंकना) या 'कलाई' जंग।
  • जानुसार: घुटने के प्रहार (इडि-वरिसाई) या स्थिरता।

रंगभूमि (अखाड़े) के लक्षण

अथात्र कथ्यते तावद् रङ्गभूमेस्तु लक्षणम् । जातिवर्णप्रमाणादि बहुभेदसमन्वितम् ॥ १४ ॥ नित्याभ्यासहिता भूमी रङ्गभूमिः प्रकीर्तिता । सैवाषाढकनाम्नी च प्रसिद्धा परमा मता ॥ १५ ॥ तस्यास्तु लक्षणं वक्ष्ये जातिवर्णप्रभेदतः । सुलक्षणजयस्थानं हानिस्थानमलक्षणम् ॥ १६ ॥ निम्नोन्नतसमत्वेन त्रिविधा भूमिका भवेत् । निम्नोन्नता परित्यज्य तत्राङ्गीक्रियते समा ॥ १७ ॥ आषाढकप्रमाणं तु त्रिविधं परिकीर्तितम् । देवमानं दैत्यमानं मर्त्यमानं तथैव च ॥ १८ ॥ एकोत्तरं हस्तशतं देवमानं प्रकीर्तितम् । दैत्यानामेव पञ्चाशत् मर्त्यानामेकविंशतिः ॥ १९ ॥ चतुरस्रं त्रिकोणं च वर्तुलं च तथैव च । ब्राह्मणी शुक्लवर्णा च पीता क्षत्रियभूमिका ॥ २० ॥ श्यामवर्णा तथा शूद्रा बहुवर्णा तथाधमा । उत्तमाधममध्यास्तु भूमयो बहुभेदतः ॥ २१ ॥ कर्करैर्लाञ्छिता भूमिर्लोहकाष्ठविदूषिता । पाषाणैः कण्टकैर्वापि कुट्टेनापि पटेन च । वर्जनीया प्रयत्नेन दुःखदा सर्वदा नृणाम् ॥ २२ ॥
हिंदी अर्थ

अब रंगभूमि (अखाड़े) के लक्षण कहे जाते हैं। नित्य अभ्यास के लिए हितकारी भूमि को 'रंगभूमि' कहते हैं। इसे 'आषाढक' नाम से भी जाना जाता है। भूमि समतल होनी चाहिए; नीची-ऊंची भूमि को त्याग देना चाहिए। माप:

  • देवमान (देवताओं के लिए): १०१ हाथ।
  • दैत्यमान: ५० हाथ।
  • मर्त्यमान (मनुष्यों के लिए): २१ हाथ (लगभग ३०–३५ फीट)।

आकार: चौकोर (चतुरस्र), त्रिकोण या गोल (वर्तुल)। मिट्टी का रंग: सफेद (ब्राह्मण), पीली (क्षत्रिय), श्यामल (शूद्र)। वर्जित भूमि: कंकड़-पत्थर, लोहा, लकड़ी, कांटों या कठोर चीजों से दूषित भूमि को प्रयत्नपूर्वक त्याग देना चाहिए क्योंकि यह सदा दुखदायी (चोट पहुँचाने वाली) होती है।

टीका

सुरक्षा: अखाड़े की मिट्टी को नरम और पत्थर-रहित रखना सबसे महत्वपूर्ण है। 'मल्ल-युद्धम्' में गिरने पर चोट न लगे, इसलिए मिट्टी को छानकर और तेल/छाछ मिलाकर तैयार किया जाता है। (श्लोक १७ में समभूमि हेतु 'समा' का पाठ 'सदा' रूप में भी मिलता है — पाठभेद संभावित।)

मल्ल की दिनचर्या व देव-पूजन

प्रथमं प्रातरुत्थाय मल्लैः कर्तव्यमादरात् । मलमूत्रविशुद्धिं च दन्तधावनमेव च ॥ २३ ॥ गण्डूषैर्मुखशुद्धिश्च मुखप्रक्षालनं तथा । संध्यादिकं च निर्वृत्य रङ्गं गच्छेत् समाहितः ॥ २४ ॥ गत्वा च प्रथमं ज्येष्ठी प्राणायामं च कारयेत् । भूमिवन्दनपूर्वं च कारयेच्च ततः श्रमम् ॥ २५ ॥ बालवृद्धान्धवधिर-छिन्नाङ्गक्रोधिरोगिणः । पिशुनानृतपाषण्डान् मत्तप्रलपिनस्तथा ॥ २६ ॥ धूर्तार्तकुष्टिकितवचौरचण्डालमायिकान् । वर्जयित्वा तथैवान्धान् श्रमकाले तथा स्त्रियः ॥ २७ ॥ उच्चैः प्रहसनं कासष्ठीवनं श्रुतमेव च । विवादं रुदितं चैव दूराध्धानं तथैव च । वर्जनीयं प्रयत्नेन मल्लेन जयमिच्छता ॥ २८ ॥ पश्चात् प्रदक्षिणं कृत्वा प्रणम्य विधिपूर्वकम् । वेदिकामुपविश्याथ कर्तव्यं जटबन्धनम् ॥ २९ ॥ तथैव प्रदक्षिणं कृत्वा प्रणम्य विधिपूर्वकम् । विविधं जटबन्धं च संक्षेपं च क्रियापरम् ॥ ३० ॥ शय्यासनोपानहादि त्यजेत् चैवासनादिकम् । शिरःप्रच्छादनं चैव रङ्गभूमौ विवर्जयेत् ॥ ३१ ॥
हिंदी अर्थ

मल्ल को प्रातः उठकर आदरपूर्वक मल-मूत्र त्याग, दंत-धावन और कुल्ला करके मुख शुद्धि करनी चाहिए। संध्या-वंदन आदि नित्यकर्म करके एकाग्रचित्त होकर रंगभूमि (अखाड़े) जाना चाहिए। वहां जाकर सबसे पहले प्राणायाम करना चाहिए और फिर भूमि-वंदन करके श्रम (व्यायाम) शुरू करना चाहिए। निषेध: श्रम के समय बच्चे, बूढ़े, रोगी, क्रोधी, पाखंडी, शराबी, चोर, जुआरी और स्त्रियों को अखाड़े से दूर रखना चाहिए। जोर से हंसना, खांसना, थूकना, विवाद करना, रोना और लंबी यात्रा — ये सब जीतने की इच्छा रखने वाले मल्ल के लिए वर्जित हैं। इसके बाद प्रदक्षिणा और प्रणाम करके वेदी पर बैठकर जटा-बंधन (बालों को बांधना) करना चाहिए। अखाड़े में जूते (उपानह), बिस्तर और सिर ढकना (टोपी/पगड़ी) वर्जित है।

टीका

अनुशासन: अखाड़ा एक मंदिर के समान है। वहां शोर-शराबा या बाहरी बातें वर्जित हैं। 'जटा-बंधन' प्राचीन काल में लंबे बालों को संभालने के लिए आवश्यक था।

आचम्य च शुचिर्भूत्वा ततो रङ्गं समाविशेत् । साधयेदेव मन्त्रेण स्थापयेच्च सुदर्शनम् ॥ ३२ ॥ सर्वकामप्रदः कृष्णः स च तत्र प्रतिष्ठताम् । आषाढक नमामि त्वां देहि मम जयश्रियम् ॥ ३३ ॥ उद्दामदर्पदैत्येन्द्रवधूवैधव्यदायिने । सुदर्शन नमस्तुभ्यं जयदं समरप्रियम् ॥ ३४ ॥ वामे पार्श्वे हरिर्यस्य दक्षिणे शशिशेखरः । नाभौ पद्मभवो ब्रह्मा सदा हस्तेषु मातरः ॥ ३५ ॥ कृष्णमूर्तिरियं ध्यात्वा तथा चावरणं शुभम् । आयुरारोग्यवीरश्रीविजयोत्साहबलप्रदम् । श्रीनिधेऽस्तु नमस्तुभ्यं दुरितं मे प्रणाशय ॥ ३६ ॥ [इति आवरणकमन्त्रः ।] हलधरो धराधरो रत्नभूषितपन्नगः । वासुकेऽस्तु नमस्तुभ्यं जयं लक्ष्मीं च देहि मे ॥ ३७ ॥
हिंदी अर्थ

आचमन करके पवित्र होकर रंगभूमि में प्रवेश करें। मंत्र द्वारा भगवान सुदर्शन (चक्रधारी कृष्ण) की स्थापना/ध्यान करें। प्रार्थना: "हे आषाढक (रंगभूमि)! मैं तुम्हें नमन करता हूँ, मुझे विजयश्री दो। हे सुदर्शन! उद्दंड दैत्यों की पत्नियों को विधवा बनाने वाले (शत्रु नाशक), युद्ध-प्रिय और जय देने वाले आपको नमस्कार है। जिसके वाम (बाएं) भाग में हरि, दक्षिण में शिव, नाभि में ब्रह्मा और हाथों में मातृकाएं (मातरः) हैं — ऐसी कृष्ण मूर्ति का ध्यान करके शुभ आवरण (रक्षा कवच) धारण करें। हे श्रीनिधि! आयु, आरोग्य, वीरश्री, विजय, उत्साह और बल देने वाले, आपको नमस्कार है। मेरे पापों/विघ्नों का नाश करें।" वासुकि मंत्र: "हलधर (बलराम के रूप में), पृथ्वी को धारण करने वाले, रत्नों से भूषित सर्पराज वासुकि! आपको नमस्कार है, मुझे जय और लक्ष्मी दें।"

टीका

आध्यात्मिक कवच: शारीरिक श्रम से पहले यह प्रार्थना योद्धा को मानसिक बल देती है। वासुकि (शेषनाग) बल और धैर्य के प्रतीक हैं, और कृष्ण-बलराम मल्लविद्या के इष्टदेव हैं।

वासुकेर्वरमूर्तिं च ध्यात्वाचम्य विधानतः । गृहीत्वा स्वशिखां बन्धेत् सुदृढं ग्रन्थिभिस्त्रिभिः । इति कृत्वा मन्त्रविधिं कथितं भृगुणा पुरा ॥ ३८ ॥ प्रशस्तः कच्छबन्धश्च कच्छामन्त्रविधानतः । करास्फोटनं त्रिविधं समलीनोन्नतं बलात् ॥ ३९ ॥ उन्नतस्वरसंलापः सिंहस्य प्रकीर्तितम् । समं वृषस्य निर्दिष्टं स्वभावात् मधुवैरिणा ॥ ४० ॥ करास्फोटप्रमाणं तु कृत्वा रङ्गासने पुनः । पद्मासनेनोपविशेद् गजो ज्येष्ठी कृतोत्सवः ॥ ४१ ॥ आन्तरज्येष्ठिना सार्धं तथा गोपकुलैः सह । बालवृद्धभविष्यैश्च ततो वन्देत् वसुन्धराम् ॥ ४२ ॥ समुद्धृतासि हरिणा वसुधे बलदायिके । देहस्य भूषणं देहि पवित्रे शुभलक्षणे ॥ ४३ ॥ इत्युक्त्वा च प्रणम्यैनां गृहीत्वा चैव मृत्तिकाम् । ततः सार्धं समायुक्ताः सर्वाङ्गं विनिलेपयेत् ॥ ४४ ॥
हिंदी अर्थ

वासुकि का ध्यान करके शिखा (चोटी) को तीन गांठें लगाकर कसकर बांधें। फिर मंत्रपूर्वक कच्छ-बंधन (लंगोट कसना) करें। इसके बाद तीन प्रकार का करास्फोटन (जांघ ठोकना) करें — सम, लीन और उन्नत। सिंह मल्ल ऊंचे स्वर में, और वृष मल्ल सम (मध्यम) स्वर में आस्फोटन करे। फिर पद्मासन में बैठकर अन्य मल्लों के साथ वसुंधरा (पृथ्वी) की वंदना करें: "हे वसुधे! हरि (वराह) ने तुम्हारा उद्धार किया था। तुम बल देने वाली हो। हे पवित्रे! मेरे देह को भूषण (बल/मिट्टी) प्रदान करो।" ऐसा कहकर अखाड़े की पवित्र मिट्टी लेकर अपने पूरे शरीर पर लेप (अभ्यंग/लेपन) करें।

टीका

करास्फोटन: जांघ ठोकना एक चुनौती और आत्म-विश्वास की मुद्रा है।

मृत्तिका लेपन: मिट्टी का लेप शरीर को ठंडा रखता है, पसीना सोखता है, और 'पूडी-वरिसाई' (बंध) में अच्छी पकड़ देता है। यह रोगाणुरोधक (कीटाणु-नाशक) भी होती है।

आसन व मतिकार की कलाएं

मल्लाः पञ्च भवन्त्येते गजः सिंहो वृषो मृगः । भविष्यः पञ्चमो ज्ञेयः पञ्चैषामासनानि च ॥ ४५ ॥ विद्याभ्यासेन पञ्चते भवन्ति ज्येष्ठिनः क्रमात् । आसनैरुपविशन्ति स्वैः स्वैः सर्वेऽपि सादरम् ॥ ४६ ॥ गजः पद्मासनं कुर्यात् सिंहोऽपि गरुडासनम् । फणासनं मृगः कुर्यात् वृषोऽपि कुक्कुटासनम् ॥ ४७ ॥ भविष्योऽपि तथा कुर्यादासनं जघनोपरि । कारयेच्च श्रमं पश्चात् प्रकुर्यात् स्वयमेव च ॥ ४८ ॥ मतिकारस्येदानीं कथ्यन्ते बहवो गुणाः । मल्लान् न विकारयति मतिकारस्तदुच्यते ॥ ४९ ॥ चत्वारिंशत् सदैकेन गुणास्तस्य प्रकीर्तिताः । मानसैः सर्वदा मल्लैर्धारणीयाः समीपतः ॥ ५० ॥ विना तेन प्रणश्यन्ति गजा इव निरङ्कुशाः । मतिकारः प्रयत्नेन रक्षणीयश्च सर्वदा ॥ ५१ ॥ आत्मकला ॥ १ ॥ परकला ॥ २ ॥ स्थानकला ॥ ३ ॥ घातकला ॥ ४ ॥ पञ्चतालकला ॥ ५ ॥ गोकला ॥ ६ ॥ बाहोर्निकला ॥ ७ ॥ पञ्च तथैव स्थानककलाः ॥ ८ ॥ आसनकला ॥ ९ ॥ ज्येष्ठिधारणे कला ॥ १० ॥ स्कन्धकला ॥ ११ ॥ ताकणे कला ॥ १२ ॥ विज्ञानकला ॥ १३ ॥ सौष्ठवे कला ॥ १४ ॥ बेसुकला ॥ १५ ॥ रक्षणे कला ॥ १६ ॥ निस्सरणे कला ॥ १७ ॥ चालने कला ॥ १८ ॥ स्वकीये कला ॥ १९ ॥ शत्रुकला ॥ २० ॥ मित्रकला ॥ २१ ॥ दारुणकला ॥ २२ ॥ आत्ममल्लकला ॥ २३ ॥ परमल्लकला ॥ २४ ॥ स्वरस्यकला ॥ २५ ॥ कातरकला ॥ २६ ॥ त्राणकला ॥ २७ ॥ बुद्धिकला ॥ २८ ॥ श्रमकला ॥ २९ ॥ युद्धकला ॥ ३० ॥ आहारकला ॥ ३१ ॥ आलस्यकला ॥ ३२ ॥ … रङ्गकला ॥ ३७ ॥ आवेशकला ॥ ३८ ॥ कालकला ॥ ३९ ॥ राजकला ॥ ४० ॥ सभाकला ॥ ४१ ॥ इत्येकचत्वारिंशत्कलाभिरुपशोभितः । मतिकारः स विज्ञेयः तस्य कर्म समाचरेत् ॥ ५२ ॥
हिंदी अर्थ

पांचों प्रकार के मल्ल अपने-अपने आसनों में बैठें:

  • गज: पद्मासन
  • सिंह: गरुडासन
  • मृग: फणासन (सर्प की तरह)
  • वृष: कुक्कुटासन
  • भविष्य: जंघों पर (वज्रासन)

इसके बाद वे श्रम (व्यायाम) शुरू करें। मतिकार (गुरु/प्रशिक्षक): अब 'मतिकार' के गुण कहते हैं। जो मल्लों को बिगड़ने (विकार) नहीं देता, वह मतिकार है। बिना मतिकार के मल्ल वैसे ही नष्ट हो जाते हैं जैसे बिना अंकुश के हाथी। मतिकार की ४१ कलाएं (कौशल) हैं: १. आत्मकला (आत्मज्ञान), २. परकला (विपक्षी का ज्ञान), ३. स्थानकला (स्थान का ज्ञान), ४. घातकला (प्रहार), … २९. श्रमकला (प्रशिक्षण विज्ञान), ३०. युद्धकला (रणनीति), ३१. आहारकला (पोषण विज्ञान), … ४१. सभाकला (जन-समूह प्रबंधन)।

टीका

मतिकार का महत्व: 'मतिकार' का अर्थ है बुद्धि देने वाला गुरु। उसे ४१ कलाओं में निपुण होना चाहिए, जिसमें आहार, मनोविज्ञान, और युद्ध-नीति शामिल हैं। यह सिद्ध करता है कि प्राचीन भारतीय प्रशिक्षण पद्धति अत्यंत विकसित थी। (श्लोक ५२ की कला-सूची में क्रम ३३–३६ मूल प्रति में उपलब्ध नहीं — पाठभेद संभावित।)

इति कलाप्रकरणम् ।

अध्याय ६ पर चर्चा (0)

अभी कोई टिप्पणी नहीं — पहली जिज्ञासा आप रखिए।

All rights reserved © Karla Kutuhal Akhara by Vagambhrini 2021-2026
UDYAM ID: UDYAM-UK-07-0005613 | MSME Registered under 8541 - Sports Education