दण्डकारण्य-प्रवेश — तापस-आश्रमों का दर्शन
श्रीराम दण्डकारण्य में प्रवेश कर तापस-मुनियों के आश्रम-समुदाय को देखते हैं। मुनि उन्हें राजा को गुरु के समान बताकर वन्दना करते हैं।
अरण्यकाण्ड का आरम्भ किसी युद्ध से नहीं, एक शान्त दर्शन से होता है। दण्डकारण्य में प्रवेश करते ही श्रीराम के सामने वह संसार खुलता है जिसकी रक्षा के लिये वे आगे शस्त्र उठायेंगे — तपस्वियों के आश्रम, जहाँ तेज है पर हिंसा नहीं, अनुशासन है पर भय नहीं।
आश्रम-मण्डल — तेज है, पर भय नहीं
मन को वश में रखनेवाले, शत्रुओं के लिये दुर्जय श्रीराम उस महान् दण्डकवन में प्रवेश करके तपस्वी मुनियों के आश्रम-समुदाय के पास पहुँचे। चारों ओर कुश और वल्कल-वस्त्र फैले हुए थे। ब्रह्मविद्या के अभ्यास से प्रकट हुई विलक्षण दीप्ति उस स्थान को इस प्रकार घेरे थी, मानो आकाश में जगमगाता सूर्य-मण्डल हो, जिसकी ओर आँख उठाना भी कठिन हो।
शरण सबको — यही आश्रम का धर्म
वह आश्रम-समुदाय सभी प्राणियों को शरण देता था; उसका आँगन सदा झाड़-बुहारकर स्वच्छ रहता था, और वहाँ बहुत-से वन्य पशु तथा पक्षियों के झुंड निर्भय बसे रहते थे। बलिवैश्वदेव और होम से पूजित वह पवित्र स्थान वेदमन्त्रों की ध्वनि से गूँजता था; कमलों से भरी पुष्करिणी और चारों ओर बिखरे फूल उसकी शोभा बढ़ाते थे। नियमित आहार करनेवाले पवित्र महर्षियों से सुशोभित वह आश्रम ब्रह्माजी के धाम-सा तेजस्वी और वेदघोष से निनादित था।
यहाँ "बलि" शब्द पर एक भ्रम मिटा लेना आवश्यक है। "बलि" से यहाँ किसी पशु का वध कदापि अभिप्रेत नहीं है — यह बलिवैश्वदेव है: भोजन से पहले अन्न का एक भाग समस्त प्राणियों, देव, पितर और जीव-जन्तुओं के निमित्त समर्पित कर देना। यह हिंसा नहीं, करुणा का संस्कार है।
और इसका प्रमाण स्वयं अगली ही पंक्ति में है। जिस आँगन का वर्णन इसके ठीक साथ आता है, वहाँ "मृगैर्बहुभिराकीर्णं" — बहुसंख्यक मृग और पक्षी निर्भय विचरते हैं। जिस स्थान पर पशु तक भय नहीं मानते, वहाँ की "बलि" पशु-हत्या हो ही नहीं सकती। शब्द का अर्थ उसके प्रसंग से खुलता है — और यह प्रसंग स्वयं अपना अर्थ स्पष्ट कर देता है।
राजा भी गुरु — वर्ण की कोई ऊँची-नीची दीवार नहीं
वन में रहनेवाले सब मुनि सीता, लक्ष्मण और श्रीराम को अपलक नेत्रों से देखने लगे — तीनों का स्वरूप उन्हें आश्चर्यमय लगा। फिर वे धर्मज्ञ मुनि हाथ जोड़कर बोले — "रघुनन्दन! दण्ड धारण करनेवाला राजा इस जन-समुदाय का धर्मपालक, शरणदाता और महायशस्वी है; वह पूजनीय, माननीय और सबका गुरु है। इन्द्र आदि लोकपालों का चौथा अंश होने के कारण वह प्रजा की रक्षा करता है।"
ध्यान दीजिये कि यह वचन कौन कह रहा है — तपस्वी ऋषि, जो जीवन-भर ब्रह्म-साधना में रत रहे हैं। और वे किसे "गुरु", "पूजनीय" और "मान्य" कह रहे हैं? एक क्षत्रिय राजा को। जो लोग आज ब्राह्मण और क्षत्रिय के बीच ऊँच-नीच की दीवार खड़ी देखते हैं, यह श्लोक उस भ्रम का निवारण कर देता है।
परम्परा में वर्ण कर्म का विभाजन है, ऊँचाई-नीचाई का दुर्ग नहीं। जो प्रजा की रक्षा करता है, वह ऋषियों के लिये भी वन्दनीय है — क्योंकि रक्षा स्वयं एक तप है। हमारे अखाड़े की चटाई पर भी यही भाव है: वहाँ जाति नहीं, केवल योद्धा और उसका अभ्यास होता है; और सबसे पहले सीखा जाने वाला पाठ है — दूसरों की रक्षा करने योग्य बनना।
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