सुतीक्ष्ण-आश्रम — अर्जित करने का भाव
श्रीराम सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम पहुँचते हैं। मुनि अपने अर्जित लोक अर्पित करते हैं, पर राम स्वयं अर्जित करना चाहते हैं; मुनि-प्रिय मृगों पर बाण नहीं चलाते।
श्रीराम सुतीक्ष्ण मुनि के आश्रम पहुँचते हैं। यह प्रसंग एक सूक्ष्म गुण को उभारता है — जो सहज मिल रहा हो उसे भी लेने की जगह, स्वयं अपने पुरुषार्थ से अर्जित करने का भाव।
मुनि का दर्शन
वहाँ आन्तरिक शुद्धि की साधना में स्थित, ध्यानमग्न बैठे तपोधन सुतीक्ष्ण मुनि के पास श्रीराम ने विधिपूर्वक जाकर उनसे बातचीत आरम्भ की।
अर्जित लोक — स्वयं कमाने का संकल्प
(सुतीक्ष्ण ने कहा —) "मैंने तपस्या से जिन देवर्षि-सेवित लोकों पर अधिकार पाया है, उनमें आप सीता और लक्ष्मण के साथ विहार करें — मैं बड़ी प्रसन्नता से वे सब लोक आपको समर्पित करता हूँ।"
यहाँ एक रहस्य पर विचार करने योग्य है — देवराज इन्द्र बार-बार इन सिद्ध मुनियों के पास क्यों आते हैं, और उन्हें अपने लोक में क्यों ले जाना चाहते हैं? तप का फल है दिव्य लोकों की प्राप्ति; जो साधक अपनी तपस्या से इन लोकों को जीत लेता है, देवलोक उसका स्वागत करता है। सुतीक्ष्ण अपने कठिन तप से अर्जित वही लोक श्रीराम को अनायास सौंप देना चाहते हैं। पर देखिये — भगवान् उन्हें सहज स्वीकार नहीं करते; वे स्वयं अपने पुरुषार्थ से अर्जित करना चाहते हैं। यही मर्यादापुरुष का आदर्श है: जो मिल रहा हो उसे भी बिना अर्जित किये न लेना।
जैसे इन्द्र ब्रह्माजी से बात करते हैं, उसी प्रकार मनस्वी श्रीराम ने उन उग्र तपस्वी, तेजस्वी और सत्यवादी महर्षि को उत्तर दिया।
अरण्यकाण्ड में श्रीराम को बार-बार इन्द्र की उपमा दी जाती है — पहले लक्ष्मण उन्हें "वासवोपम" कहते हैं, अब ऋषि उन्हें ब्रह्मा से बात करते इन्द् र-सा बताते हैं। यह पुनरावृत्त उपमा आकस्मिक नहीं। इन्द्र देवताओं के अधिपति और रक्षक हैं; श्रीराम को बार-बार उनसे जोड़कर ऋषि यह स्थापित करते हैं कि यह वीर मर्त्यलोक का रक्षक-अधिपति है — जिसकी शरण में तापस-समुदाय निश्चिन्त हो सकता है।
मुनि-प्रिय मृगों पर बाण नहीं
(श्रीराम ने कहा —) "महाभाग! यहाँ आये इन मृग-समूहों को यदि मैं अपने तीखे बाणों से मार डालूँ, तो इससे आपको पीड़ा पहुँचेगी — और उससे बढ़कर कष्टकर मेरे लिये और क्या होगा?"
यह श्रीराम के धनुर्धर-विवेक का सुन्दर उदाहरण है। बाण उनके तूणीर में हैं, मृग सामने हैं — पर वे नहीं चलाते, क्योंकि ये प्राणी मुनि को प्रिय हैं। शस्त्रधारी की श्रेष्ठता प्रहार करने में नहीं, यह जानने में है कि कब न चलाना। जिस पर बाण नहीं चलाना, उसे पहचानना ही संयम है। अखाड़े में भी हम यही सिखाते हैं — शस्त्र चलाना सीखने से पहले उसे रोकना सीखो; रुका हुआ हाथ अक्सर चले हुए हाथ से बड़ा होता है।
सन्ध्या की उपासना के बाद वे उसी आश्रम में रात्रि-निवास करते हैं।
सन्ध्या बीतने और रात होने पर, महात्मा सुतीक्ष्ण ने स्वयं तपस्वियों के योग्य शुभ अन्न लाकर उन दोनों पुरुष-श्रेष्ठ बन्धुओं को बड़े सत्कार के साथ अर्पित किया।
ध्यान दीजिये — सिद्ध महर्षि स्वयं अन्न लाकर अतिथियों को परोसते हैं। तप की ऊँचाई सेवा से विमुख नहीं करती; वह सेवा को और सहज बना देती है। सच्चा बड़प्पन झुकने में संकोच नहीं करता। गुरु-सेवा और अतिथि-सत्कार का यह भाव हमारी परम्परा का प्राण है।
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