सीता का धर्म-प्रश्न — शस्त्र किसलिये?
देवी सीता स्नेह और युक्ति के साथ शस्त्र-धारण की मर्यादा पर प्रश्न उठाती हैं — धनुष का प्रयोजन रक्षा है, बिना वैर के संहार नहीं। हर धनुर्वेद-विद्यार्थी के लिये यह संवाद आधारशिला है।
अब आता है अरण्यकाण्ड के इन आरम्भिक सर्गों का हृदय। देवी सीता श्रीराम से शस्त्र-धारण की मर्यादा पर एक गम्भीर प्रश्न उठाती हैं — और यह पूरा संवाद प्रत्येक धनुर्वेद-अभ्यासी के लिये आधारशिला है। यह चर्चा कोई विवाद नहीं; यह प्रेम, विवेक और शास्त्र-दृष्टि से भरा एक अद्भुत संवाद है, जिसमें बात रखने की कला भी उतनी ही सिखाती है जितना बात का मर्म।
स्नेह से आरम्भ
सुतीक्ष्ण की आज्ञा लेकर वन की ओर बढ़े अपने स्वामी श्रीराम से सीता ने स्नेहभरी, मन को छू लेनेवाली मधुर वाणी में यह कहा —
संवाद कैसे आरम्भ किया जाये — यह पहला ही श्लोक सिखा देता है। सीता कोई कठोर आपत्ति नहीं जतातीं; वे हृद्यया स्निग्धया वाचा — हृदय को छूती स्नेहभरी वाणी से आर म्भ करती हैं। जब अपने प्रियजन के सामने कोई गम्भीर बात रखनी हो, तब उसका द्वार कोमलता से खुलता है, आक्षेप से नहीं। यह वाणी की कला है: सत्य कहना हो तो पहले स्नेह का धरातल बना लो।
तीन व्यसन — सदा स्मरणीय
"इस संसार में काम (आसक्ति) से उत्पन्न तीन ही व्यसन होते हैं। इनमें मिथ्याभाषण सबसे बड़ा है; और उससे भी भारी दो हैं — परस्त्री-गमन और बिना किसी वैर के दूसरों पर क्रूरता। रघुनन्दन! मिथ्याभाषणरूप दोष न आप में कभी रहा है, न आगे कभी होगा।"
सीता एक सुगठित सिद्धान्त सामने रखती हैं — आसक्ति से जन्मे तीन व्यसन: मिथ्याभाषण, परस्त्री-गमन, और निर्वैर क्रूरता। हर योद्धा को ये तीनों सदा स्मरण रखने योग्य हैं, क्योंकि शक्ति के साथ इनका प्रलोभन भी बढ़ता है। बलवान् के लिये झूठ, भोग और अकारण हिंसा — तीनों सुलभ हो जाते हैं; इसीलिये बल के साथ इन तीनों से सतर्कता अनिवार्य है। ध्यान दीजिये कि सीता पहले दो दोषों से श्रीराम को सर्वथा मुक्त बताती हैं — बात को वहीं से आरम्भ करती हैं जहाँ सहमति है।
दो दोष आप में नहीं — पर तीसरा?
"परस्त्री की अभिलाषा, जो धर्म का नाश करती है, आप में कैसे हो सकती है? नरेन्द्र! यह कुत्सित इच्छा न आपके मन में कभी उठी, न है, न कभी होगी। राजकुमार! आप सदा अपनी धर्मपत्नी में ही अनुरक्त, धर्मनिष्ठ, सत्यप्रतिज्ञ और पिता की आज्ञा के पालक हैं। धर्म और सत्य — दोनों आप में प्रतिष्ठित हैं; आप में ही सब कुछ टिका है।"
"महाबाहो! सत्य और धर्म को पूर्णतः वही धारण कर सकते हैं जो जितेन्द्रिय हों — और आपकी जितेन्द्रियता को मैं भली-भाँति जानती हूँ। किन्तु तीसरा जो भयंकर दोष है — बिना वैर के, मोहवश दूसरों के प्राणों की हिंसा — वही आपके सामने उपस्थित है।"
यहाँ पति-पत्नी के बीच जिस विश्वास का दर्श न होता है, वह अनुकरणीय है। सीता श्रीराम के गुणों को पहले पूरी श्रद्धा से गिनाती हैं — जितेन्द्रिय, धर्मनिष्ठ, सत्यप्रतिज्ञ — और तब कहीं जाकर अपनी चिन्ता का बिन्दु रखती हैं। न आरोप, न सन्देह; केवल एक सचेत प्रियजन की सतर्कता। जहाँ ऐसा विश्वास हो, वहाँ कठिन-से-कठिन प्रश्न भी बिना कटुता के रखा जा सकता है। यही आदर्श सम्बन्ध है — जहाँ एक-दूसरे का हित कहने का अधिकार स्नेह से अर्जित होता है।
धनुष = तेज का उद्दीपक
"इस घोर कर्म के लिये प्रस्थान करते आपको देख मेरा मन चिन्ता से व्याकुल है; आपके व्रत का विचार करती हुई मैं यही सोचती रहती हूँ कि आपका कल्याण कैसे हो। वीर! इस समय आपका दण्डकारण्य की ओर जाना मुझे अच्छा नहीं लगता — इसका कारण बताती हूँ, मेरे मुख से सुनिये।"
देखिये देवी सीता की वाक्-कला — वे अपनी असहमति को स्पष्ट रखती हैं (नहि मे रोचते), पर साथ ही उसका कारण देने का वचन भी देती हैं। स्पष्टता और मधुरता एक साथ; आपत्ति भी, और उसे युक्ति से सिद्ध करने की तैयारी भी। यही परिपक्व संवाद है: भावना और तर्क, दोनों को साथ लेकर चलना।
"जैसे पास रखा ईंधन अग्नि के तेज को अत्यन्त प्रज्वलित कर देता है, वैसे ही क्षत्रिय के पास जब धनुष हो, तो वह उसके बल और प्रताप को बहुत उद्दीप्त कर देता है।"
यह श्लोक अपने-आप में एक सम्पूर्ण सिद्धान्त है, और धनुर्वेद के प्रत्येक विद्यार्थी के लिये अत् यन्त स्मरणीय है। सीता एक अकाट्य उपमा देती हैं: अग्नि के पास रखा ईंधन उसकी ज्वाला को भड़का देता है — उसी प्रकार, हाथ में धनुष होना क्षत्रिय के तेज और युद्ध-प्रवृत्ति को स्वयं उभार देता है। अर्थात् शस्त्र निष्क्रिय वस्तु नहीं है; वह धारण करनेवाले के भीतर एक प्रवृत्ति जगाता है।
यही कारण है कि शस्त्र-शिक्षा केवल कौशल की शिक्षा नहीं हो सकती — उसे संयम की शिक्षा भी होना ही चाहिये। जिसके हाथ में धनुष है, उसके भीतर एक ताप उठता है; उस ताप को दिशा देना ही सच्चा प्रशिक्षण है। हमारे अखाड़े में जब कोई यौद्धा पहली बार शस्त्र उठाता है, हम यही सिद्धान्त उसके सामने रखते हैं: शस्त्र तुम्हारे भीतर की ऊर्जा को बढ़ाएगा; अब यह तुम पर है कि वह ऊर्जा रक्षा बने या आक्रोश।
प्राचीन कथा — शस्त्र-संयोग का हेतु
"महाबाहो! पूर्वकाल की बात है — किसी पवित्र वन में, जहाँ मृग और पक्षी आनन्द से रहते थे, एक सत्यवादी और पवित्र तपस्वी निवास करते थे।"
सीता वह कथा सुनाती हैं जिसमें एक निर्दोष तपस्वी को केवल इसलिये तप-भ्रष्ट होना पड़ा कि इन्द्र ने उन्हें एक शस्त्र थमा दिया — और शस्त्र के संग-मात्र से उनकी वृत्ति बदल गयी।
"इस प्रकार पूर्वकाल में शस्त्र के संयोग से ही वह घटना घटी। जैसे अग्नि का संयोग ईंधन को जलाने का कारण बनता है, वैसे ही शस्त्र का संयोग धारण करनेवाले के हृदय में विकार का हेतु कहा गया है।"
सीता अपनी बात को केवल भावना पर नहीं छोड़तीं — वे एक श्रुति-रूप प्राचीन उदाहरण से उसे बल देती हैं, और फिर उसी अग्नि-ईंधन की उपमा को दोहराकर सिद्धान्त को गाँठ की तरह बाँध देती हैं। किसी पक्ष को दृढ़ करने की यही विधि है: सिद्धान्त कहो, फिर उदाहरण दो, फिर सिद्धान्त को उदाहरण से जोड़कर स्थिर कर दो। तर्क की यह बुनावट अपने-आप में एक शिक्षा है।