सर्ग

सीता का धर्म-प्रश्न — शस्त्र किसलिये?

देवी सीता स्नेह और युक्ति के साथ शस्त्र-धारण की मर्यादा पर प्रश्न उठाती हैं — धनुष का प्रयोजन रक्षा है, बिना वैर के संहार नहीं। हर धनुर्वेद-विद्यार्थी के लिये यह संवाद आधारशिला है।

अब आता है अरण्यकाण्ड के इन आरम्भिक सर्गों का हृदय। देवी सीता श्रीराम से शस्त्र-धारण की मर्यादा पर एक गम्भीर प्रश्न उठाती हैं — और यह पूरा संवाद प्रत्येक धनुर्वेद-अभ्यासी के लिये आधारशिला है। यह चर्चा कोई विवाद नहीं; यह प्रेम, विवेक और शास्त्र-दृष्टि से भरा एक अद्भुत संवाद है, जिसमें बात रखने की कला भी उतनी ही सिखाती है जितना बात का मर्म।

स्नेह से आरम्भ

सुतीक्ष्णेनाभ्यनुज्ञातं प्रस्थितं रघुनन्दनम् । हृद्यया स्निग्धया वाचा भर्तारमिदमब्रवीत् ॥ १ ॥
हिंदी अर्थ

सुतीक्ष्ण की आज्ञा लेकर वन की ओर बढ़े अपने स्वामी श्रीराम से सीता ने स्नेहभरी, मन को छू लेनेवाली मधुर वाणी में यह कहा —

टीका

संवाद कैसे आरम्भ किया जाये — यह पहला ही श्लोक सिखा देता है। सीता कोई कठोर आपत्ति नहीं जतातीं; वे हृद्यया स्निग्धया वाचा — हृदय को छूती स्नेहभरी वाणी से आरम्भ करती हैं। जब अपने प्रियजन के सामने कोई गम्भीर बात रखनी हो, तब उसका द्वार कोमलता से खुलता है, आक्षेप से नहीं। यह वाणी की कला है: सत्य कहना हो तो पहले स्नेह का धरातल बना लो।

तीन व्यसन — सदा स्मरणीय

त्रीण्येव व्यसनान्यत्र कामजानि भवन्त्युत । मिथ्यावाक्यं तु परमं तस्माद् गुरुतरावुभौ ॥ ३ ॥ परदाराभिगमनं विना वैरं च रौद्रता । मिथ्यावाक्यं न ते भूतं न भविष्यति राघव ॥ ४ ॥
हिंदी अर्थ

"इस संसार में काम (आसक्ति) से उत्पन्न तीन ही व्यसन होते हैं। इनमें मिथ्याभाषण सबसे बड़ा है; और उससे भी भारी दो हैं — परस्त्री-गमन और बिना किसी वैर के दूसरों पर क्रूरता। रघुनन्दन! मिथ्याभाषणरूप दोष न आप में कभी रहा है, न आगे कभी होगा।"

टीका

सीता एक सुगठित सिद्धान्त सामने रखती हैं — आसक्ति से जन्मे तीन व्यसन: मिथ्याभाषण, परस्त्री-गमन, और निर्वैर क्रूरता। हर योद्धा को ये तीनों सदा स्मरण रखने योग्य हैं, क्योंकि शक्ति के साथ इनका प्रलोभन भी बढ़ता है। बलवान् के लिये झूठ, भोग और अकारण हिंसा — तीनों सुलभ हो जाते हैं; इसीलिये बल के साथ इन तीनों से सतर्कता अनिवार्य है। ध्यान दीजिये कि सीता पहले दो दोषों से श्रीराम को सर्वथा मुक्त बताती हैं — बात को वहीं से आरम्भ करती हैं जहाँ सहमति है।

दो दोष आप में नहीं — पर तीसरा?

कुतोऽभिलषणं स्त्रीणां परेषां धर्मनाशनम् । तव नास्ति मनुष्येन्द्र न चाभूत् ते कदाचन ॥ ५ ॥ मनस्यपि तथा राम न चैतद् विद्यते क्वचित् । स्वदारनिरतश्चैव नित्यमेव नृपात्मज ॥ ६ ॥ धर्मिष्ठः सत्यसन्धश्च पितुर्निर्देशकारकः । त्वयि धर्मश्च सत्यं च त्वयि सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ ७ ॥
हिंदी अर्थ

"परस्त्री की अभिलाषा, जो धर्म का नाश करती है, आप में कैसे हो सकती है? नरेन्द्र! यह कुत्सित इच्छा न आपके मन में कभी उठी, न है, न कभी होगी। राजकुमार! आप सदा अपनी धर्मपत्नी में ही अनुरक्त, धर्मनिष्ठ, सत्यप्रतिज्ञ और पिता की आज्ञा के पालक हैं। धर्म और सत्य — दोनों आप में प्रतिष्ठित हैं; आप में ही सब कुछ टिका है।"

तच्च सर्वं महाबाहो शक्यं वोढुं जितेन्द्रियैः । तव वश्येन्द्रियत्वं च जानामि शुभदर्शन ॥ ८ ॥
तृतीयं यदिदं रौद्रं परप्राणाभिहिंसनम् । निर्वैरं क्रियते मोहात् तच्च ते समुपस्थितम् ॥ ९ ॥
हिंदी अर्थ

"महाबाहो! सत्य और धर्म को पूर्णतः वही धारण कर सकते हैं जो जितेन्द्रिय हों — और आपकी जितेन्द्रियता को मैं भली-भाँति जानती हूँ। किन्तु तीसरा जो भयंकर दोष है — बिना वैर के, मोहवश दूसरों के प्राणों की हिंसा — वही आपके सामने उपस्थित है।"

टीका

यहाँ पति-पत्नी के बीच जिस विश्वास का दर्शन होता है, वह अनुकरणीय है। सीता श्रीराम के गुणों को पहले पूरी श्रद्धा से गिनाती हैं — जितेन्द्रिय, धर्मनिष्ठ, सत्यप्रतिज्ञ — और तब कहीं जाकर अपनी चिन्ता का बिन्दु रखती हैं। न आरोप, न सन्देह; केवल एक सचेत प्रियजन की सतर्कता। जहाँ ऐसा विश्वास हो, वहाँ कठिन-से-कठिन प्रश्न भी बिना कटुता के रखा जा सकता है। यही आदर्श सम्बन्ध है — जहाँ एक-दूसरे का हित कहने का अधिकार स्नेह से अर्जित होता है।

धनुष = तेज का उद्दीपक

ततस्त्वां प्रस्थितं दृष्ट्वा मम चिन्ताकुलं मनः । त्वद्वृत्तं चिन्तयन्त्या वै भवेन्निःश्रेयसं हितम् ॥ १२ ॥ नहि मे रोचते वीर गमनं दण्डकान् प्रति । कारणं तत्र वक्ष्यामि वदन्त्याः श्रूयतां मम ॥ १३ ॥
हिंदी अर्थ

"इस घोर कर्म के लिये प्रस्थान करते आपको देख मेरा मन चिन्ता से व्याकुल है; आपके व्रत का विचार करती हुई मैं यही सोचती रहती हूँ कि आपका कल्याण कैसे हो। वीर! इस समय आपका दण्डकारण्य की ओर जाना मुझे अच्छा नहीं लगता — इसका कारण बताती हूँ, मेरे मुख से सुनिये।"

टीका

देखिये देवी सीता की वाक्-कला — वे अपनी असहमति को स्पष्ट रखती हैं (नहि मे रोचते), पर साथ ही उसका कारण देने का वचन भी देती हैं। स्पष्टता और मधुरता एक साथ; आपत्ति भी, और उसे युक्ति से सिद्ध करने की तैयारी भी। यही परिपक्व संवाद है: भावना और तर्क, दोनों को साथ लेकर चलना।

क्षत्रियाणामिह धनुर्हुताशस्येन्धनानि च । समीपतः स्थितं तेजो बलमुच्छ्रयते भृशम् ॥ १५ ॥
हिंदी अर्थ

"जैसे पास रखा ईंधन अग्नि के तेज को अत्यन्त प्रज्वलित कर देता है, वैसे ही क्षत्रिय के पास जब धनुष हो, तो वह उसके बल और प्रताप को बहुत उद्दीप्त कर देता है।"

टीका

यह श्लोक अपने-आप में एक सम्पूर्ण सिद्धान्त है, और धनुर्वेद के प्रत्येक विद्यार्थी के लिये अत्यन्त स्मरणीय है। सीता एक अकाट्य उपमा देती हैं: अग्नि के पास रखा ईंधन उसकी ज्वाला को भड़का देता है — उसी प्रकार, हाथ में धनुष होना क्षत्रिय के तेज और युद्ध-प्रवृत्ति को स्वयं उभार देता है। अर्थात् शस्त्र निष्क्रिय वस्तु नहीं है; वह धारण करनेवाले के भीतर एक प्रवृत्ति जगाता है।

यही कारण है कि शस्त्र-शिक्षा केवल कौशल की शिक्षा नहीं हो सकती — उसे संयम की शिक्षा भी होना ही चाहिये। जिसके हाथ में धनुष है, उसके भीतर एक ताप उठता है; उस ताप को दिशा देना ही सच्चा प्रशिक्षण है। हमारे अखाड़े में जब कोई यौद्धा पहली बार शस्त्र उठाता है, हम यही सिद्धान्त उसके सामने रखते हैं: शस्त्र तुम्हारे भीतर की ऊर्जा को बढ़ाएगा; अब यह तुम पर है कि वह ऊर्जा रक्षा बने या आक्रोश।

प्राचीन कथा — शस्त्र-संयोग का हेतु

पुरा किल महाबाहो तपस्वी सत्यवान् शुचिः । कस्मिंश्चिदभवत् पुण्ये वने रतमृगद्विजे ॥ १६ ॥
हिंदी अर्थ

"महाबाहो! पूर्वकाल की बात है — किसी पवित्र वन में, जहाँ मृग और पक्षी आनन्द से रहते थे, एक सत्यवादी और पवित्र तपस्वी निवास करते थे।"

सीता वह कथा सुनाती हैं जिसमें एक निर्दोष तपस्वी को केवल इसलिये तप-भ्रष्ट होना पड़ा कि इन्द्र ने उन्हें एक शस्त्र थमा दिया — और शस्त्र के संग-मात्र से उनकी वृत्ति बदल गयी।

एवमेतत् पुरावृत्तं शस्त्रसंयोगकारणम् । अग्निसंयोगवद्धेतुः शस्त्रसंयोग उच्यते ॥ २३ ॥
हिंदी अर्थ

"इस प्रकार पूर्वकाल में शस्त्र के संयोग से ही वह घटना घटी। जैसे अग्नि का संयोग ईंधन को जलाने का कारण बनता है, वैसे ही शस्त्र का संयोग धारण करनेवाले के हृदय में विकार का हेतु कहा गया है।"

टीका

सीता अपनी बात को केवल भावना पर नहीं छोड़तीं — वे एक श्रुति-रूप प्राचीन उदाहरण से उसे बल देती हैं, और फिर उसी अग्नि-ईंधन की उपमा को दोहराकर सिद्धान्त को गाँठ की तरह बाँध देती हैं। किसी पक्ष को दृढ़ करने की यही विधि है: सिद्धान्त कहो, फिर उदाहरण दो, फिर सिद्धान्त को उदाहरण से जोड़कर स्थिर कर दो। तर्क की यह बुनावट अपने-आप में एक शिक्षा है।

धनुष का एकमात्र प्रयोजन — रक्षा

स्नेहाच्च बहुमानाच्च स्मारये त्वां तु शिक्षये । न कथंचन सा कार्या गृहीतधनुषा त्वया ॥ २४ ॥ बुद्धिर्वैरं विना हन्तुं राक्षसान् दण्डकाश्रितान् । अपराधं विना हन्तुं लोको वीर न मंस्यते ॥ २५ ॥
क्षत्रियाणां तु वीराणां वनेषु नियतात्मनाम् । धनुषा कार्यमेतावदार्तानामभिरक्षणम् ॥ २६ ॥
हिंदी अर्थ

"स्नेह और विशेष आदर के कारण मैं आपको उस प्राचीन घटना की याद दिलाती और यह शिक्षा भी देती हूँ — धनुष हाथ में लेकर आप किसी भी प्रकार बिना वैर के दण्डकवासी राक्षसों के वध का विचार न करें। वीर! बिना अपराध के किसी को मारना संसार अच्छा नहीं समझेगा। मन-इन्द्रियों को वश में रखनेवाले क्षत्रिय वीरों के लिये वन में धनुष धारण करने का इतना ही प्रयोजन है — कि वे संकट में पड़े प्राणियों की रक्षा करें।"

टीका

यह श्लोक — धनुषा कार्यमेतावद् आर्तानामभिरक्षणम् — इस पूरे संवाद का, और सम्पूर्ण धनुर्वेद का, सारवाक्य है। धनुष धारण करने का प्रयोजन केवल एक है: आर्त, अर्थात् संकटग्रस्त, प्राणियों की रक्षा। न आक्रोश, न विजय-लालसा, न बिना अपराध के दण्ड — केवल रक्षा।

यह वाक्य हमारे प्रत्येक धनुर्वेद-विद्यार्थी के लिये चार्टर है, और हम इसे स्पष्ट कहते हैं। जो शस्त्र सीखता है, वह मारने के लिये नहीं, बचाने के लिये सीखता है। जिस दिन शस्त्र आक्रोश या दर्प का साधन बन जाये, उसी दिन वह धर्म से गिर जाता है। इसीलिये अखाड़े में शक्ति के साथ-साथ यह पाठ भी अनिवार्य है — तुम्हारा बल दुर्बल की ढाल है, प्रबल का हथियार नहीं।

धर्म ही सार — संयम क्यों आवश्यक

अक्षया तु भवेत् प्रीतिः श्वश्रूश्वशुरयोर्मम । यदि राज्यं हि संन्यस्य भवेस्त्वं निरतो मुनिः ॥ २९ ॥
हिंदी अर्थ

"राज्य त्यागकर वन में आ जाने पर यदि आप मुनि-वृत्ति से रहें, तो इससे मेरी सास और श्वशुर को अक्षय प्रसन्नता होगी।"

टीका

अपने कर्म के वांछित फल में सीता कुल का यश और वृद्धजनों की प्रसन्नता को भी सम्मिलित करती हैं। हमारा आचरण केवल हमारा नहीं होता; वह हमारे कुल की, हमारे बड़ों की प्रतिष्ठा से भी जुड़ा होता है। योद्धा जब संयम रखता है, तो वह अपने गुरु, अपने परिवार और अपनी परम्परा — सबका मान बढ़ाता है।

धर्मादर्थः प्रभवति धर्मात् प्रभवते सुखम् । धर्मेण लभते सर्वं धर्मसारमिदं जगत् ॥ ३० ॥
आत्मानं नियमैस्तैस्तैः कर्षयित्वा प्रयत्नतः । प्राप्यते निपुणैर्धर्मो न सुखाल्लभ्यते सुखम् ॥ ३१ ॥
हिंदी अर्थ

"धर्म से अर्थ उत्पन्न होता है, धर्म से सुख का उदय होता है, और धर्म से ही मनुष्य सब कुछ पा लेता है — इस जगत् में धर्म ही सार है। चतुर साधक भिन्न-भिन्न नियमों से अपने शरीर को कष्ट देकर, यत्नपूर्वक धर्म का सम्पादन करते हैं; क्योंकि सुखदायी साधन से सुख का हेतुभूत धर्म प्राप्त नहीं होता।"

टीका

इस श्लोक का अन्तिम पद विशेष महत्त्व का है — न सुखाल्लभ्यते सुखम्: सुख से सुख नहीं मिलता। जो धर्म सच्चे सुख का हेतु है, वह आराम और भोग से नहीं, नियम और तप से अर्जित होता है। साधक अपने शरीर को स्वेच्छया कष्ट देता है, इसीलिये कि सुगमता के मार्ग से वह ऊँचा फल नहीं मिलता। यही व्रत, संयम और अनुशासन की आवश्यकता का अद्भुत सिद्धान्त है।

अखाड़े का पूरा अनुशासन इसी सूत्र पर टिका है। मेइ-पडम् (MeiPadam) की थकान, प्रातःकाल का जागरण, अभ्यास की कठोरता — ये कष्ट नहीं, धर्म-सम्पादन के साधन हैं। जो सहज सुख को छोड़कर परिश्रम चुनता है, वही अन्ततः स्थायी सुख पाता है।

पक्ष का सुन्दर उपसंहार

स्त्रीचापलादेतदुदाहृतं मे धर्मं च वक्तुं तव कः समर्थः । विचार्य बुद्ध्या तु सहानुजेन यद् रोचते तत् कुरु माचिरेण ॥ ३३ ॥
हिंदी अर्थ

"नारी-सुलभ चपलता के कारण ही मैंने आपसे ये बातें कह दीं। वास्तव में आपको धर्म का उपदेश देने में कौन समर्थ है? आप अपने छोटे भाई के साथ बुद्धिपूर्वक विचार कर लें, और फिर जो उचित लगे, उसे शीघ्र ही करें।"

टीका

देखिये देवी सीता अपने पक्ष का उपसंहार कैसे करती हैं — पूरी युक्ति, श्रुति और फल के साथ अपनी बात रखने के बाद, वे विनम्रता से उसे श्रीराम के विवेक पर छोड़ देती हैं। "आपको धर्म कौन सिखा सकता है" कहकर वे श्रीराम का मान रखती हैं, और निर्णय का अधिकार उन्हीं को सौंपती हैं। स्त्री की सूक्ष्म बुद्धि की यह विशेषता है कि वह अपना पक्ष पूरी दृढ़ता से रखे, और फिर विचार-विमर्श का द्वार खुला छोड़ दे। अपनी बात को सुन्दरता से समेटना — बलपूर्वक थोपे बिना — यही परिपक्व संवाद का शिखर है।

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