मुनियों की अभ्यर्थना — कर और रक्षा का धर्म
इक्कीस श्रेणियों के तपस्वी श्रीराम के पास रक्षा की पुकार लेकर आते हैं। जो राजा कर तो ले पर रक्षा न करे, वह अधर्म का भागी है।
दण्डकारण्य के तपस्वी श्रीराम के पास एक पुकार लेकर आते हैं — राक्षस उनका संहार कर रहे हैं, और वे रक्षा माँगते हैं। इससे पहले ऋषि वाल्मीकि उन तपस्वियों का एक अद्भुत परिचय देते हैं, जो साधना की इक्कीस भिन्न-भिन्न श्रेणियों में बँटे हैं।
इक्कीस श्रेणियों के तपस्वी
उस समुदाय में इक्कीस श्रेणियों के तपस्वी थे — वैखानस और वालखिल्य; सम्प्रक्षाल, जो भोजन के बाद कुछ शेष नहीं रखते; मरीचिप, जो सूर्य-चन्द्र की किरणों का ही आहार करते हैं; अश्मकुट्ट, जो अन्न को पत्थर से कूटकर खाते हैं; पत्राहार, जो पत्तों पर निर्वाह करते हैं; दन्तोलूखली, जो दाँतों को ही ऊखल बनाते हैं; उन्मज्जक, जो कण्ठ तक जल में डूबे तप करते हैं; गात्रशय्य, जो अपनी भुजा को ही तकिया बनाते हैं; अशय्य, जो किसी बिछौने का सहारा नहीं लेते; अनवकाशिक, जो सत्कर्म में इतने लीन कि विश्राम का अवकाश ही नहीं; सलिलाहार, जो केवल जल पीते हैं; वायुभक्ष, जो केवल वायु पर जीते हैं; आकाशनिलय, जो खुले आकाश के नीचे रहते हैं; स्थण्डिलशायी, जो वेदी पर ही सोते हैं; ऊर्ध्ववासी, जो पर्वत-शिखर आदि ऊँचे स्थानों पर रहते हैं; दान्त, जो मन-इन्द्रियों के पूर्ण स्वामी हैं; आर्द्रपटवासा, जो सदा भीगे वस्त्र पहनते हैं; सजप, जो निरन्तर जप में रत हैं; तपोनिष्ठ, जो परमात्म-चिन्तन में स्थित हैं; और पञ्चतप, जो ग्रीष्म में चारों ओर अग्नि और ऊपर सूर्य का ताप सहते हैं।
यह इक्कीस-भागों की सूची पढ़ते ही मन विस्मय से भर जाता है — मनुष्य ने साधना के कितने भिन्न-भिन्न, कठिन और सूक्ष्म मार्ग गढ़े हैं! ऋषि इसे इतने विस्तार से इसीलिये गिनाते हैं, ताकि हम उस तप-परम्परा की विशालता का अनुमान कर सकें, जिसकी रक्षा के लिये श्रीराम आगे संकल्प लेंगे।
कर और रक्षा — एक ही सिक्के के दो पहलू
"स्वामिन्! जो राजा प्रजा से उसकी आय का छठा भाग कर के रूप में तो ले ले, पर पुत्र की भाँति उसकी रक्षा न करे, वह महान् अधर्म का भागी होता है।"
इस श्लोक का मर्म कालातीत है: शास्त्र कर को रक्षा से बाँध देता है। राजा को प्रजा से भाग लेने का अधिकार इसीलिये है कि वह बदले में पुत्रवत् रक्षा दे। जहाँ यह सन्तुलन टूटा — कर तो लिया, पर रक्षा नहीं दी — वहीं अधर्म आरम्भ हो जाता है। किसी भी युग में, किसी भी व्यवस्था में, यह कसौटी स्मरण रखने योग्य है: जो सुरक्षा का उत्तरदायित्व वहन करे, वही भाग पाने का अधिकारी है। रक्षक और शासक का यही धर्म-सम्बन्ध हमारी परम्परा की नींव है।
"श्रीराम! यह वानप्रस्थ महात्माओं का महान् समुदाय, जिसमें ब्राह्मणों की संख्या सर्वाधिक है और जिसके रक्षक आप ही हैं, राक्षसों के हाथों अनाथ की तरह बुरी तरह मारा जा रहा है।"
ध्यान दीजिये — मुनि श्रीराम को पहले ही "त्वन्नाथ", अपना नाथ, कह चुके हैं; रक्षा का उत्तरदायित् व वे स्वयं वीर के कन्धों पर रख रहे हैं। और साथ ही यह भेद भी सूक्ष्मता से सूचित होता है कि इस समुदाय में ब्राह्मण अधिक हैं, पर हैं वे सब वानप्रस्थ महात्मा — अर्थात् पहचान जन्म से अधिक साधना और आचरण से बनती है। महात्मा वह है जो तप और संयम से महान् बना; यह उपाधि श्रेष्ठ आचरण की है।
श्रीराम का आगमन — प्रयोजन की सिद्धि
(श्रीराम ने कहा —) "राक्षसों के हाथों आपको जो यह कष्ट पहुँच रहा है, उसे दूर करने के लिये ही मैं पिता के आदेश का पालन करता हुआ इस वन में आया हूँ। आपके प्रयोजन की सिद्धि के लिये ही मैं दैववश यहाँ पहुँचा हूँ; आपकी सेवा का अवसर पाकर मेरा यह वनवास महान् फलदायी होगा।"
श्रीराम अपने व नवास को दुर्भाग्य नहीं, अवसर मानते हैं — "महाफलः", महान् फलदायी। जो कष्ट दूसरों की रक्षा में बीते, वह तपस्या बन जाता है। योद्धा का जीवन इसी दृष्टि से देखा जाता है: कठिनाई सेवा का अवसर है, और सेवा ही सबसे बड़ा फल।
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