विराध का आक्रमण — शोक और संयम
भयंकर राक्षस विराध सीता को उठा ले जाता है। श्रीराम शोक में डूबते हैं, पर लक्ष्मण उन्हें बल की याद दिलाते हैं।
आश्रमों की शान्ति के बीच वन का दूसरा चेहरा सामने आता है — विराध। लोहे के शूल में गुँथे हुए वन्य पशुओं के शरीर, जोर-जोर की दहाड़, और फिर वह सीता की ओर बढ़ता है। यहीं धनुर्धर की पहली परीक्षा है: संकट में भी संयम कैसे बना रहे।
भयंकर रूप
उसने एक लोहे के शूल में तीन सिंह, चार बाघ, दो भेड़िये, दस चितकबरे हरिण, और दाँतों-सहित एक विशाल हाथी का मस्तक — जिस पर चर्बी लिपटी थी — गूँथ रखा था; और उसे लिये वह भयंकर स्वर में गरज रहा था।
यह वर्णन जानबूझकर विकराल है — शास्त्र अनिष्ट को छिपाता नहीं, ठीक-ठीक दिखाता है, ताकि उसका सामना करने का साहस भी सच्चा हो। (शूल पर मस्तक गूँथने का पाठ यहाँ "अवसज्य/आसज्य" रूप में मिलता है; अर्थ में कोई अन्तर नहीं — पाठभेद संभावित।) अखाड़े में भी हम शत्रु या संकट को छोटा करके नहीं आँकते; उसका यथार्थ नाप लेकर ही निर्भय बना जाता है।
धमकी और उसका उत्तर
(सीता को पकड़कर वह बोला —) "यह सुन्दरी स्त्री मेरी भार्या बनेगी, और तुम दोनों पापियों का रक्त मैं युद्धभूमि में पीऊँगा।"
ध्यान दीजिये — जो स्वयं अधर्म पर खड़ा है, वह दूसरों को "पापी" कहकर पुकार रहा है। दुष्ट की यही पहचान है: वह अपने ही दोष को दूसरों पर मढ़ता है, और अपने अन्याय को न्याय का जामा पहनाता है। शत्रु के मुख से निकली गाली उसके अपने भीतर के अन्धकार का ही परिचय होती है — उससे विचलित नहीं, सावधान होना चाहिये।
श्रीराम का शोक, लक्ष्मण का संयम
एक क्षण के लिये स्वयं श्रीराम भी मानवीय पीड़ा से भर उठते हैं — सीता का किसी दूसरे के स्पर्श में जाना उन्हें राज्य-हरण और पिता के वियोग से भी अधिक व्यथित करता है।
"सुमित्रानन्दन! सीता को किसी और का स्पर्श छू ले — इससे बढ़कर दुःख मेरे लिये और कोई नहीं। पिता की मृत्यु और अपने राज्य के अपहरण से भी इतनी पीड़ा मुझे नहीं हुई थी।" श्रीराम के ऐसा कहते ही, शोक के आँसुओं में डूबे लक्ष्मण मन्त्र से रुके हुए सर्प की भाँति फुफकारते हुए क्रोध में बोल उठे —
लक्ष्मण को यहाँ "रुद्धो नाग इव" — रुके हुए नाग-सा — कहा गया है; यह उपमा शेषनाग के उस अंश की ओर संकेत करती है जिसका अवतार लक्ष्मण माने जाते हैं। पर इससे बड़ी सीख भाइयों के इस युग्म में है: जब बड़ा भाई क्षण-भर शोक में झुकता है, तब छोटा भाई संयत क्रोध और कर्तव्य की याद बनकर उसे सँभालता है। जोड़ी में यही सन्तुलन होता है — एक का अवसाद दूसरे के धैर्य से थमता है।
"ककुत्स्थकुल-भूषण! आप तो इन्द्र के समान समस्त प्राणियों के स्वामी और रक्षक हैं। मुझ सेवक के रहते हुए आप अनाथ की भाँति क्यों संतप्त हो रहे हैं?"
लक्ष्मण का यह वाक्य भक्ति का सुन्दर रहस्य खोल देता है। भगवान् को किसी रक्षा की आवश्यकता नहीं — फिर भी भक्त सेवा में तत्पर रहता है, मानो वही स्वामी की रक्षा कर रहा हो। यह उलटी दिखनेवाली बात ही प्रेम का स्वरूप है: सामर्थ्य पूरा भगवान् का है, पर सेवा का सौभाग्य भक्त अपने हाथ में लेता है। अखाड़े में गुरु-सेवा का भाव भी यही है — गुरु को हमारी आवश्यकता नहीं, पर सेवा से शिष्य स्वयं गढ़ा जाता है।
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