सर्ग

शरभङ्ग — पूर्ण तपस्या का दिव्य समापन

विराध-वध के बाद श्रीराम शरभङ्ग मुनि के आश्रम पहुँचते हैं। वहाँ इन्द्र का दिव्य दर्शन, और शरभङ्ग का योगपूर्वक देह-त्याग।

विराध-वध के बाद श्रीराम शरभङ्ग मुनि के आश्रम की ओर बढ़ते हैं। यहाँ का प्रसंग युद्ध का नहीं, तप की पराकाष्ठा का है — और वह दृश्य जिसमें एक सिद्ध योगी अपनी पूर्ण हुई साधना के अन्त में सचेत होकर देह छोड़ता है।

आश्रम की ओर

हत्वा तु तं भीमबलं विराधं राक्षसं वने । ततः सीतां परिष्वज्य समाश्वास्य च वीर्यवान् ॥ १ ॥
हिंदी अर्थ

वन में उस भयंकर बलशाली राक्षस विराध का वध करके पराक्रमी श्रीराम ने सीता को अपने पास लेकर उन्हें आश्वस्त किया।

दिव्य दर्शन — आकाश का रथ, भूमि का स्पर्श नहीं

आश्रम पहुँचकर श्रीराम एक अद्भुत दृश्य देखते हैं — शरभङ्ग को अपने लोक में ले जाने स्वयं देवराज इन्द्र अपने तेजोमय रथ पर पधारे हैं।

विभ्राजमानं वपुषा सूर्यवैश्वानरप्रभम् । रथप्रवरमारूढमाकाशे विबुधानुगम् ॥ ५ ॥ असंस्पृशन्तं वसुधां ददर्श विबुधेश्वरम् । सम्प्रभाभरणं देवं विरजोऽम्बरधारिणम् ॥ ६ ॥
हिंदी अर्थ

श्रीराम ने आकाश में एक श्रेष्ठ रथ पर विराजमान देवताओं के स्वामी इन्द्र को देखा, जिनका रथ पृथ्वी का स्पर्श नहीं कर रहा था। उनकी अंगकान्ति सूर्य और अग्नि-सी दीप्त थी, वे अपने तेजस्वी शरीर से देदीप्यमान थे, उनके आभूषण जगमगा रहे थे, वस्त्र निर्मल थे, और पीछे बहुत-से देवता थे।

टीका

ऋषि वाल्मीकि यहाँ देव-दर्शन को अत्यन्त सूक्ष्मता से अंकित करते हैं — रथ की दीप्ति, आकाश में स्थिति, और वह विशेष बात कि रथ भूमि का स्पर्श नहीं करता। परम्परा में देव-लोक और मर्त्य-लोक का यह भेद इसी प्रकार संकेतों में कहा जाता है। हमारा काम इन वर्णनों को हल्के में लेना नहीं, बल्कि यह श्रद्धा से पढ़ना है कि ऋषि ने अपने दिव्य-दर्शन में जो देखा, उसे कितनी सावधानी से शब्दों में उतारा।

इहोपयात्यसौ रामो यावन्मां नाभिभाषते । निष्ठां नयत तावत् तु ततो मां द्रष्टुमर्हति ॥ २२ ॥
हिंदी अर्थ

(इन्द्र ने अपने अनुचरों से कहा —) "श्रीराम यहाँ आ रहे हैं। जब तक वे मुझसे कोई बात न करें, उससे पहले ही मुझे यहाँ से दूसरे स्थान पर ले चलो; इस समय मेरा उनसे मिलना उचित नहीं।"

शरभङ्ग का देह-त्याग

इन्द्र लौट जाते हैं। शरभङ्ग श्रीराम का दर्शन पाकर कृतार्थ हो जाते हैं, और अपनी साधना का फल उन्हें अर्पित कर अपना अन्तिम मार्ग चुनते हैं।

अहमेवाहरिष्यामि सर्वांल्लोकान् महामुने । आवासं त्वहमिच्छामि प्रदिष्टमिह कानने ॥ ३३ ॥
इमां मन्दाकिनीं राम प्रतिस्रोतामनुव्रज । नदीं पुष्पोडुपवहां ततस्तत्र गमिष्यसि ॥ ३७ ॥
हिंदी अर्थ

(श्रीराम ने शरभङ्ग से कहा —) "महामुने! उन सब लोकों को मैं स्वयं अर्जित कर लूँगा; इस समय तो मैं इस वन में आपके बताये स्थान पर निवास करना चाहता हूँ।" (शरभङ्ग बोले —) "श्रीराम! फूल-सी छोटी डोंगियों को बहानेवाली इस मन्दाकिनी नदी के किनारे-किनारे, स्रोत के विपरीत दिशा में चले जाइये; इससे आप वहाँ पहुँच जायेंगे।"

एष पन्था नरव्याघ्र मुहूर्तं पश्य तात माम् । यावज्जहामि गात्राणि जीर्णां त्वचमिवोरगः ॥ ३८ ॥ ततोऽग्निं स समाधाय हुत्वा चाज्येन मन्त्रवत् । शरभङ्गो महातेजाः प्रविवेश हुताशनम् ॥ ३९ ॥
हिंदी अर्थ

"नरश्रेष्ठ! यही वह मार्ग है। पर तात, दो घड़ी ठहरिये और मेरी ओर देखिये — जब तक साँप की भाँति मैं अपने इन जराजीर्ण अंगों को पुरानी केंचुल-सा त्याग न दूँ।" ऐसा कहकर महातेजस्वी शरभङ्ग ने विधिपूर्वक अग्नि स्थापित की, मन्त्रोच्चार के साथ घी की आहुति दी, और स्वयं उस अग्नि में प्रविष्ट हो गये।

टीका

शरभङ्ग की यह उपमा ध्यान देने योग्य है — जीर्णां त्वचमिवोरगः: जैसे साँप पुरानी केंचुल त्याग देता है। योगी के लिये देह वस्त्र-मात्र है; उसका त्याग विलाप नहीं, एक पूर्ण हुई साधना का सहज समापन है। यहाँ अग्नि-प्रवेश कोई विवशता या शोक नहीं — यह एक सिद्ध योगी का, अपनी इच्छा से, सचेत रहकर, मन्त्रपूर्वक देह छोड़ना है, तप के पूर्ण हो जाने पर।

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