सर्ग १०

राम का उत्तर — शरणागत की रक्षा की प्रतिज्ञा

श्रीराम सीता की आपत्ति को सम्मान से सुनकर उत्तर देते हैं — मुनि शरण में आये हैं, प्रतिज्ञा दी जा चुकी है; प्राण भले चले जायें, पर शरणागत की रक्षा का व्रत नहीं टूटेगा।

अब श्रीराम उत्तर देते हैं। यह उत्तर पूरे संवाद को उसके शिखर पर ले जाता है — क्योंकि यहीं शस्त्र-धर्म की वह घोषणा होती है जो हर योद्धा के लिये प्रतिज्ञा-वाक्य बन जाती है: शरणागत की रक्षा प्राणों से भी बड़ी है।

आपत्ति को सम्मान से सुनना

हितमुक्तं त्वया देवि स्निग्धया सदृशं वचः । कुलं व्यपदिशन्त्या च धर्मज्ञे जनकात्मजे ॥ २ ॥
हिंदी अर्थ

"देवि! धर्म को जाननेवाली जनककिशोरी! तुम्हारा मुझ पर स्नेह है, इसलिये तुमने मेरे हित की बात कही है। क्षत्रियों के कुलधर्म का स्मरण कराती हुई तुमने जो कुछ कहा, वह तुम्हारे ही योग्य है।"

टीका

श्रीराम के उत्तर का आरम्भ ध्यान देने योग्य है — वे सीता की बात को झिड़कते नहीं, न ही उसे तुच्छ कहते हैं; पहले वे उसकी प्रशंसा करते हैं — हितमुक्तं, सदृशं वचः। अपने प्रियजन की आपत्ति को धैर्य और सम्मान के साथ सुनना, और फिर युक्तिपूर्वक अपना पक्ष रखना — यही परिपक्व व्यक्ति का लक्षण है। असहमति में भी आदर बना रहे, तभी संवाद फलता है। जिसने कहा उसका मान रखो, फिर अपनी बात कहो।

शस्त्र का प्रयोजन — तुमने ही तो कहा

किं नु वक्ष्याम्यहं देवि त्वयैवोक्तमिदं वचः । क्षत्रियैर्धार्यते चापो नार्तशब्दो भवेदिति ॥ ३ ॥
ते चार्ता दण्डकारण्ये मुनयः संशितव्रताः । मां सीते स्वयमागम्य शरण्यं शरणं गताः ॥ ४ ॥
हिंदी अर्थ

"देवि! मैं तुम्हें और क्या उत्तर दूँ — यह बात तो तुमने स्वयं ही कही है कि क्षत्रिय इसीलिये धनुष धारण करते हैं कि किसी को दुःख से आर्त होकर हाहाकार न करना पड़े। सीते! दण्डकारण्य में कठोर व्रत का पालन करनेवाले वे मुनि आर्त हैं, दुःखी हैं; इसीलिये मुझे शरणदाता जानकर वे स्वयं मेरे पास आये और शरण में आ गये हैं।"

टीका

श्रीराम सीता के ही तर्क को उठाकर उसका उत्तर बना देते हैं — "यह तो तुमने ही कहा है।" सीता ने कहा था: धनुष इसलिये कि कोई आर्त होकर हाहाकार न करे। श्रीराम उत्तर देते हैं: वे मुनि तो पहले से ही आर्त हैं, राक्षसों से पीड़ित, और वे स्वयं शरण में आये हैं। तब उसी सिद्धान्त से — धनुष का प्रयोजन आर्त की रक्षा है — रक्षा करना ही धर्म बनता है, न कि निष्क्रिय रहना। यही शस्त्र-धर्म का सन्तुलन है: बिना वैर के आक्रमण अधर्म है, पर शरणागत की रक्षा न करना उससे भी बड़ा अधर्म।

राक्षसों का आतंक

वसन्तः कालकालेषु वने मूलफलाशनाः । न लभन्ते सुखं भीरु राक्षसैः क्रूरकर्मभिः ॥ ५ ॥ भक्ष्यन्ते राक्षसैर्भीमैर्नरमांसोपजीविभिः ।
हिंदी अर्थ

"भीरु! सदा वन में रहकर फल-मूल का आहार करनेवाले वे मुनि, इन क्रूरकर्मा राक्षसों के कारण कभी सुख नहीं पाते; मनुष्यों के मांस पर जीनेवाले ये भयानक राक्षस उन्हें मारकर खा जाते हैं।"

होमकाले तु सम्प्राप्ते पर्वकालेषु चानघ ॥ ११ ॥ धर्षयन्ति सुदुर्धर्षा राक्षसाः पिशिताशनाः ।
हिंदी अर्थ

"निष्पाप देवि! अग्निहोत्र का समय आने पर और पर्व के अवसरों पर, ये अत्यन्त दुर्धर्ष मांसभोजी राक्षस उन मुनियों को घेरकर सताते हैं।"

टीका

राक्षस विशेष रूप से होम और पर्वकाल में आक्रमण करते हैं — अर्थात् ठीक उन्हीं क्षणों में जब मुनि अपनी पवित्रतम साधना में लीन होते हैं। अधर्म प्रायः वहीं प्रहार करता है जहाँ धर्म सबसे कोमल और निरीह होता है। इसीलिये रक्षक की आवश्यकता सबसे अधिक उन्हीं क्षणों में होती है जब साधक अपनी उपासना में निमग्न हो — और यही रक्षक का सबसे बड़ा कर्तव्य है। (पर्वकाल = पूर्णिमा, अमावस्या आदि विशेष तिथियाँ, जब उपासना विशेष रूप से की जाती है।)

मुनियों का संयम, राम की प्रतिज्ञा

कामं तपःप्रभावेण शक्ता हन्तुं निशाचरान् ॥ १३ ॥ चिरार्जितं न चेच्छामस्तपः खण्डयितुं वयम् । बहुविघ्नं तपो नित्यं दुश्चरं चैव राघव ॥ १४ ॥
हिंदी अर्थ

"(मुनियों ने कहा था —) रघुनन्दन! यद्यपि हम तपस्या के प्रभाव से इच्छानुसार इन राक्षसों का वध करने में समर्थ हैं, फिर भी चिरकाल से अर्जित तप को खण्डित नहीं करना चाहते; क्योंकि तप में सदा अनेक विघ्न आते हैं, और उसका सम्पादन बहुत कठिन है।"

टीका

यहाँ एक गहन बात है — मुनि स्वयं सक्षम हैं राक्षसों को भस्म कर देने में, पर वे ऐसा नहीं करते, क्योंकि क्रोध और दण्ड में तप का संचित बल व्यय हो जाता। इसीलिये वे रक्षा का भार क्षत्रिय पर छोड़ते हैं। यही वर्ण-धर्म का सुन्दर विभाजन है: तपस्वी का बल साधना में सुरक्षित रहे, और रक्षा का कार्य वह करे जिसका वही धर्म है। योद्धा इसीलिये है — ताकि साधक निर्भय होकर साधना कर सके।

मया चैतद्वचः श्रुत्वा कात्स्न्येन परिपालनम् ॥ १६ ॥ ऋषीणां दण्डकारण्ये संश्रुतं जनकात्मजे । संश्रुत्य च न शक्ष्यामि जीवमानः प्रतिश्रवम् ॥ १७ ॥ मुनीनामन्यथा कर्तुं सत्यमिष्टं हि मे सदा । अप्यहं जीवितं जह्यां त्वां वा सीते सलक्ष्मणाम् ॥ १८ ॥ न तु प्रतिज्ञां संश्रुत्य ब्राह्मणेभ्यो विशेषतः ।
हिंदी अर्थ

"जनकनन्दिनि! उनकी यह बात सुनकर मैंने दण्डकारण्य के ऋषियों की पूर्ण रक्षा की प्रतिज्ञा कर ली है। प्रतिज्ञा करके अब मैं जीते-जी उसे मिथ्या नहीं कर सकता; मुनियों को दिया वचन अन्यथा करना मेरे लिये असम्भव है, क्योंकि सत्य का पालन मुझे सदा ही प्रिय है। सीते! मैं अपने प्राण छोड़ सकता हूँ, तुम्हारा और लक्ष्मण का भी परित्याग कर सकता हूँ — पर प्रतिज्ञा करके, विशेषतः ब्राह्मणों को दी हुई प्रतिज्ञा को, मैं कदापि नहीं तोड़ सकता।"

टीका

यह श्रीराम की प्रतिज्ञा का चरम है — "प्राण छोड़ सकता हूँ, प्रिय-जनों को भी छोड़ सकता हूँ, पर दिया वचन नहीं तोड़ सकता।" शरणागत की रक्षा का व्रत उनके लिये प्राणों से भी बड़ा है। यही वह आदर्श है जिस पर धनुर्धर की समस्त साधना टिकी है: वचन और रक्षा-धर्म अटल हैं। जो शरण में आ गया, उसकी रक्षा अब जीवन-मरण का प्रश्न नहीं रही — वह सत्य का प्रश्न बन गयी। योद्धा का बल इसी अटलता से आता है; जो रक्षा का वचन देकर पीछे हट जाये, उसका शस्त्र निरर्थक है।

सीता का सम्मान

मम स्नेहाच्च सौहार्दादिदमुक्तं त्वया वचः ॥ २० ॥ परितुष्टोऽस्म्यहं सीते न ह्यनिष्टोऽनुशास्यते । सदृशं चानुरूपं च कुलस्य तव शोभने । सधर्मचारिणी मे त्वं प्राणेभ्योऽपि गरीयसी ॥ २१ ॥
हिंदी अर्थ

"सीते! तुमने स्नेह और सौहार्दवश ही मुझसे ये बातें कही हैं, इससे मैं बहुत सन्तुष्ट हूँ; क्योंकि जो अपना प्रिय न हो, उसे कोई हितकर उपदेश नहीं देता। शोभने! तुम्हारा यह कथन तुम्हारे योग्य और तुम्हारे कुल के अनुरूप है। तुम मेरी सहधर्मिणी हो, और मुझे प्राणों से भी बढ़कर प्रिय हो।"

टीका

संवाद जितने स्नेह से आरम्भ हुआ था, उतने ही स्नेह से समाप्त होता है। श्रीराम असहमति में भी सीता का सम्मान घटने नहीं देते — वे उन्हें सधर्मचारिणी और प्राणेभ्योऽपि गरीयसी कहते हैं। यही आदर्श संवाद का पूर्ण चक्र है: स्नेह से आरम्भ, युक्ति से मध्य, और सम्मान से समापन। दो व्यक्ति भिन्न मत रख सकते हैं और फिर भी एक-दूसरे के प्रति आदर पूर्ववत् रख सकते हैं — यही परिपक्वता है।

और इस पूरे संवाद का सार यही है, जिसे हम अपने प्रत्येक धनुर्वेद-अभ्यासी के सामने रखते हैं: शस्त्र रक्षा के लिये है, आक्रोश के लिये नहीं; और शरणागत की रक्षा का वचन प्राणों से भी बड़ा है। यही अरण्यकाण्ड के इन दस सर्गों की देन है — धनुर्वेद का पहला और सबसे गहरा पाठ।

धनुषा कार्यमेतावद् आर्तानामभिरक्षणम् ।

श्रीराम — अरण्यकाण्ड, सर्ग ९.२६ (सीता के शब्दों को दोहराते हुए)

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