सर्ग

परिचय और युद्ध — वीर का उचित व्यवहार

श्रीराम पहले संक्षिप्त परिचय देकर विराध से प्रश्न करते हैं, फिर युद्ध आरम्भ होता है। शूल कटता है, दोनों भाई तलवारें उठाते हैं।

विराध ने सीता को छोड़ा और युद्ध की ठानी। पर ध्यान देने योग्य है कि श्रीराम तुरन्त प्रहार नहीं करते — पहले वे अपना परिचय देते हैं और शत्रु से उसका परिचय पूछते हैं। यही वीर की मर्यादा है।

पहले परिचय, फिर प्रश्न

तमुवाच ततो रामो राक्षसं ज्वलिताननम् । पृच्छन्तं सुमहातेजा इक्ष्वाकुकुलमात्मनः ॥ २ ॥
क्षत्रियौ वृत्तसम्पन्नौ विद्धि नौ वनगोचरौ । त्वां तु वेदितुमिच्छावः कस्त्वं चरसि दण्डकान् ॥ ३ ॥
तमुवाच विराधस्तु रामं सत्यपराक्रमम् । हन्त वक्ष्यामि ते राजन् निबोध मम राघव ॥ ४ ॥
हिंदी अर्थ

जब उस प्रज्वलित मुखवाले राक्षस ने उनका कुल पूछा, तब महातेजस्वी श्रीराम ने उससे कहा — "जान ले, हम दोनों भाई इक्ष्वाकुकुल के सदाचारी क्षत्रिय हैं, और कारणवश इस समय वन में विचरते हैं। अब हम तेरा परिचय जानना चाहते हैं — तू कौन है, जो दण्डकवन में स्वच्छन्द घूम रहा है?" यह सुनकर सत्यपराक्रमी श्रीराम से विराध बोला — "रघुवंशी नरेश! सुनो, मैं अपना परिचय देता हूँ।"

टीका

यह छोटा-सा क्षण योद्धा के आचरण का बड़ा पाठ है। शत्रु सामने खड़ा है, सीता का हरण अभी-अभी हुआ है, क्रोध का पूरा कारण है — फिर भी श्रीराम पहले संक्षिप्त परिचय देते हैं और शत्रु से भी परिचय पूछते हैं। यही वीरों का उचित व्यवहार है। जो अपने को धर्म पर मानता है, वह अन्धाधुन्ध प्रहार नहीं करता; वह पहले सामने वाले को जानने का अवसर देता है।

एक सूक्ष्म बात और — रघुवंश का पूरा विवरण विराध को पहले से ज्ञात था, फिर भी श्रीराम ने शिष्टता नहीं छोड़ी। शक्ति के साथ शिष्टाचार — यही अखाड़े की जोड़ी में भी सिखाया जाता है: सामने कोई भी हो, अभ्यास प्रणाम से आरम्भ होता है।

युद्ध का आरम्भ

विराध ने अपना परिचय देकर बल का घमण्ड दिखाया, तब श्रीराम ने उसे उसका अन्त स्पष्ट कह दिया।

क्षुद्र धिक् त्वां तु हीनार्थं मृत्युमन्वेषसे ध्रुवम् । रणे प्राप्स्यसि संतिष्ठ न मे जीवन् विमोक्ष्यसे ॥ ९ ॥
हिंदी अर्थ

"क्षुद्र! तुझे धिक्कार है। तेरा अभिप्राय ही खोटा है; निश्चय ही तू अपनी मृत्यु ढूँढ़ रहा है, और वह तुझे युद्ध में मिलेगी। ठहर — अब मेरे हाथ से जीवित नहीं बचेगा।"

तद् रामविशिखैश्छिन्नं शूलं तस्यापतद् भुवि । पपाताशनिना छिन्नं मेरोरिव शिलातलम् ॥ १९ ॥
तौ खड्गौ क्षिप्रमुद्यम्य कृष्णसर्पाविवोद्यतौ । तूर्णमापेततुस्तस्य तदा प्रहरतां बलात् ॥ २० ॥
हिंदी अर्थ

श्रीराम के बाणों से कटा हुआ विराध का वह शूल, वज्र से टूटे मेरु-शिलाखण्ड की भाँति, पृथ्वी पर जा गिरा। फिर दोनों भाई काले सर्पों-सी दो तलवारें तत्काल उठाकर वेग से उस पर टूट पड़े और बलपूर्वक प्रहार करने लगे।

टीका

पहले धनुष-बाण से शूल का निवारण, फिर निकट आकर खड्ग से प्रहार — यह क्रम दूर और पास, दोनों दूरियों के अभ्यास का उदाहरण है। योद्धा एक ही अस्त्र का बन्दी नहीं होता; परिस्थिति के अनुसार वह दूर की मार से निकट के युद्ध में उतरता है। सिलम्बम् कम्बु (Silambam Kambu) से लेकर निकट के हाथ-युद्ध तक — हमारी विद्या का प्रवाह भी यही है: दूरी बदले तो शस्त्र और चाल भी बदले, पर सन्तुलन कभी न टूटे।

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