नियुद्ध और मोक्ष — पराक्रम और करुणा साथ-साथ
श्रीराम और लक्ष्मण विराध की भुजाएँ तोड़कर मुष्टि-बाहु-पद से प्रहार करते हैं। कण्ठ पर पैर रखे राम — दया और पराक्रम एक साथ।
विराध ने फिर दोनों भाइयों को उठा लिया और वन की ओर दौड़ा। सीता की पुकार पर श्रीराम और लक्ष्मण उसका सामना करते हैं — और यहीं रामायण हमें नियुद्ध का, बिना शस्त्र के भुजा-युद्ध का, एक जीवन्त उदाहरण देती है।
सीता की पुकार
(सीता ने विराध से कहा —) "राक्षसश्रेष्ठ! तुम्हें नमस्कार है। इस वन में रीछ, व्याघ्र और चीते मुझे भले खा जाएँ — तुम मुझे ही ले चलो, पर इन दोनों ककुत्स्थवंशी वीरों को छोड़ दो।"
अपने प्राणों की चिन्ता छोड़कर देवी सीता पहले श्रीराम और लक्ष्मण की रक्षा चाहती हैं — यह उनका सहज त्या गमय स्नेह है। संकट के क्षण में भी जो पहले दूसरे की सुधि ले, वही सच्चा वीर-हृदय है; और यह गुण केवल शस्त्रधारी का नहीं, हर उस व्यक्ति का है जो दूसरों की रक्षा को अपने से ऊपर रखता है।
नियुद्ध — बिना शस्त्र का युद्ध
सुमित्रानन्दन लक्ष्मण ने उस भयंकर राक्षस की बायीं और श्रीराम ने उसकी दाहिनी बाँह वेग से तोड़ डाली। फिर दोनों उसे मुक्कों, भुजाओं और लातों से मारने लगे, और उठा-उठाकर भूमि पर पटकते तथा रगड़ते रहे।
यह श्लोक हमारी विद्या का प्रत्यक्ष उदाहरण है — मुष्टिभिर्बाहुभिः पद्भिः: मु क्के, भुजाएँ और पैर। जब धनुष और तलवार भी विराध को न मार सके, तब दोनों भाई निःशस्त्र होकर, केवल अपने अंगों से युद्ध करते हैं। यही नियुद्ध है — बाहुयुद्ध, मल्लयुद्ध की वह धारा जिसे परम्परा "बिना शस्त्र का शस्त्र" कहती है।
यही करंट आज भी बहता है — मल्लयुद्ध और कुश्ती में, और हमारे कुत्तु-वरिसै (Kuthu-Varisai) के अभ्यास में, जहाँ योद्धा हाथ, भुजा और पैर को ही अस्त्र बनाना सीखता है। जो सोचते हैं कि शस्त्र छिन जाने पर योद्धा निःसहाय हो जाता है, यह प्रसंग उन्हें उत्तर देता है: सधा हुआ शरीर स्वयं सबसे भरोसेमन्द अस्त्र है। इसीलिये अखाड़े में हम पहले खाली हाथ का अभ्यास करते हैं, शस्त्र बाद में।
अनेक बाणों से बिंधने, दोनों तलवारों से क्षत-विक्षत होने और बार-बार भूमि पर रगड़े जाने पर भी वह राक्षस मरा नहीं। तब पराक्रमी श्रीराम ने विराध पर चढ़कर अपना पैर उसके कण्ठ पर रख दिया।
जो लोग श्रीराम को केवल कोमल और दयालु के रूप में गढ़ते हैं, यह चित्र उनके सामने रखिये — विराध के कण्ठ पर पैर रखे खड़ा योद्धा। दया और पराक्रम श्रीराम में परस्पर विरोधी नहीं, सहवासी हैं। जो सचमुच करुणामय है, वह अन्याय के सामने दुर्बल नहीं होता; उसकी करुणा ही उसे रक्षा के लिये कठोर होने का बल देती है।
यह खण्डन आवश्यक है, क्योंकि करुणा को कायरता समझ लेना बड़ी भूल है। अखाड़े में हम यही सिखाते हैं: भीतर से सौम्य रहो, पर आवश्यकता पड़ने पर दृढ़ता में तनिक भी न डिगो। पराक्रम के बिना दया अधूरी है, और दया के बिना पराक्रम अन्धा।
विराध का उद्धार
अन्ततः विराध शान्त होता है — वह वस्तुतः शाप-ग्रस्त एक गन्धर्व था, जो श्रीराम के स्पर्श से मुक्त होकर अपना अन्तिम अनुरोध करता है।
"श्रीराम! मेरे शरीर को गड्ढे में रखकर आप कुशलपूर्वक आगे जाइये। प्राण-रहित राक्षसों के शरीर को गड्ढे में गाड़ देना — यही उनकी परम्परा-प्राप्त सनातन रीति है।"
मृत्यु के मुख पर भी विराध अपनी परम्परा की अन्त्येष्टि-रीति का स्मरण करता है, और श्रीराम उसका मान रखते हैं। शत्रु भ ी जब पराजित होकर शरण में आता है, तब उसके साथ मर्यादा का व्यवहार होता है — यह विजयी की सबसे बड़ी शोभा है। योद्धा का धर्म शत्रु का अन्त करना है, उसका अपमान करना नहीं।
सर्ग ४ पर चर्चा (0)
अभी कोई टिप्पणी नहीं — पहली जिज्ञासा आप रखिए।

