विदाई — सीता के हाथों शस्त्र-अर्पण
प्रातःकालीन उपासना के बाद श्रीराम सुतीक्ष्ण से विदा लेते हैं। सीता स्वयं दोनों भाइयों को तूणीर, धनुष और खड्ग प्रदान करती हैं।
एक आश्रम से विदा लेकर आगे बढ़ने का क्रम अरण्यकाण्ड में बार-बार आता है — पर यह विदाई विशेष है। यहीं सीता स्वयं दोनों भाइयों को शस्त्र सौंपती हैं, और यही दृश्य अगले सर्ग के गहन संवाद की भूमिका बन जाता है।
प्रातःकालीन उपासना और प्रस्थान
सीता सहित श्रीराम और लक्ष्मण ने ठीक समय पर उठकर कमल की सुगन्धवाले परम शीतल जल से आचमन-स्नान किया। तदनन्तर तीनों ने विधिपूर्वक अग्नि और देवताओं की प्रातःकालीन पूजा की; और उस तपस्वी-शरण वन में उदित होते सूर्य का दर्शन करके, निष्पाप हृदय से वे सुतीक्ष्ण मुनि के पास जाकर मधुर वचन बोले।
प्रस्थान से पहले उठना, स्नान, अग्नि और देव-पूजा, सूर्य-दर्शन — यह क्रम साधक की भोर का ढाँचा है। कोई भी बड़ा कर्म संयत आरम्भ से बल पाता है। अखाड़े में भी हर सत्र प्रणाम और तैयारी के क्रम से आरम्भ होता है; अनुशासन का यह ढाँचा दिन-भर के कर्म को दिशा देता है।
आगे का मार्ग
(सुतीक्ष्ण ने मार्ग का वर्णन किया —) "इस यात्रा में आप फल-मूल से भरे और फूलों से लदे अनेक वन देखेंगे; वहाँ उत्तम मृगों के झुंड विचरेंगे और पक्षी शान्त भाव से रहेंगे। खिले कमलों से सुशोभित, स्वच्छ जल से भरे और कारण्डव आदि जलपक्षियों से आच्छादित अनेक तालाब-सरोवर मिलेंगे; और नेत्रों को भाने वाले पहाड़ी झरने तथा मोरों की मीठी बोली से गूँजती रमणीय वन-स्थलियाँ भी आप देखेंगे।"
सीता के हाथों शस्त्र
मुनि के ऐसा कहने पर लक्ष्मण-सहित श्रीराम ने "बहुत अच्छा" कहकर उनकी परिक्रमा की और प्रस्थान की तैयारी की। तब विशाल-नयनी सीता ने दोनों भाइयों को दो परम सुन्दर तूणीर, धनुष और निर्मल चमकते खड्ग प्रदान किये।
यह छोटा-सा वाक्य बड़े महत्त्व का है — शस्त्र दोनों भाइयों को स्वयं सीता सौंपती हैं। शस्त्र यहाँ आक्रामकता का प्रतीक नहीं, रक्षा का उपकरण है, और उसे सौंपने का कार्य उस देवी के हाथों होता है जो अगले ही सर्ग में शस्त्र-धारण की मर्यादा पर प्रश्न उठायेंगी। जिसने शस्त्र दिया, वही उसके धर्म पर विचार करती है — यह क्रम आकस्मिक नहीं। शस्त्र और उसके उत्तरदायित्व को कभी अलग नहीं किया जा सकता; एक हाथ में धनुष आता है, तो दूसरे में उसका विवेक भी।
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