मल्लपुराण
चर्चा
अध्याय १६

पशु-आधारित युद्ध शैलियाँ और जोड़ियाँ

गज, वृष, सिंह और मृग — इन चार प्रकार के मल्लों की युद्ध-शैली का व्यावहारिक विवरण (पकड़, प्रहार, प्रवेश, स्थानक) दिया गया है। प्रत्येक प्रकार की विशेष शक्ति और प्रधान तकनीकें अलग-अलग बताई गई हैं। मिश्रित जोड़ियों में — जब भिन्न प्रकार के मल्ल भिड़ते हैं — किसे क्या रणनीति अपनानी चाहिए, यह इस अध्याय की विशेषता है।

गज व वृषभ मल्ल की शैली

गजेनैव यथा युध्येच्छृणु ते कथयाम्यहम् । बाह्वोः स्फालनमित्येव सुस्थानाच्चालनं ततः ॥ १ ॥ पादयोश्च समं स्थानं निष्ठं वाल्पताडनम् । कण्ठरोधो दण्डघातो हस्ताभ्यां स्कन्धधारणम् ॥ २ ॥ कराकर्षणमन्योन्यं शिरसोन्योन्यधारणम् । उरोधारणमुरसा ग्रहणोरस्येव कक्षाविदारणम् ॥ ३ ॥ यो येन यथा वापि प्रविश्य स्थानकेऽपि च । करबले वाथ शीर्षे ततो मुहडकेन वा ॥ ४ ॥ बाहूबलेन बलवान् बरहत्तेन वा पुनः । गजस्य युद्धे कथितं वृषभस्य तु कथ्यते ॥ ५ ॥
हिंदी अर्थ

गज (हाथी जैसा) मल्ल कैसे लड़े, यह सुनो —

१. बाहु-स्फालन: भुजाओं को ठोकना/भिड़ाना। २. सुस्थान-चालन: मजबूत पैंतरे से विपक्षी को हिलाना/धकेलना। ३. सम-स्थान: दोनों पैर समानान्तर रखना। ४. कंठ-रोध: गला पकड़ना/दबाना। ५. दण्ड-घात: बाहु का प्रहार। ६. स्कन्ध-धारण: दोनों हाथों से कंधे पकड़ना। ७. कर-आकर्षण: हाथ खींचना। ८. शिरसा धारण: सिर से सिर भिड़ाना/पकड़ना। ९. उरो-धारण: छाती से छाती भिड़ाना। १०. कक्षा-विदारण: काँख से विपक्षी को फाड़ना/उठाना।

गज मल्ल अपने भारी बाहुबल, सिर की टक्कर और 'मुहड़क' (एक विशेष दाँव) से युद्ध करता है।

टीका

समीपस्थ पकड़-युद्ध: गज मल्ल की शैली पूरी तरह से समीपस्थ पकड़-युद्ध और शक्ति पर आधारित है। वह दूर से नहीं लड़ता, बल्कि पकड़कर, दबाकर और भारी प्रहारों से हराता है।

वृषभस्य वृषभेण यथा युद्धं तथा शृणु । बाह्वोरास्फालनं चैव समं समागमेव च ॥ ६ ॥ सतलहस्तप्रमाणं हननं बाहुना तथा । चरणाधर्षणं चैव बलमन्योन्यमेव च ॥ ७ ॥ स्थानके च प्रवेशं च शीर्षेण देहलेपनम् । पृष्ठे वाप्युदरे वापि स्थानविज्ञानमेव च ॥ ८ ॥
हिंदी अर्थ

वृषभ (साँड) का वृषभ से युद्ध — बाहु-स्फालन, सम-समागम (सीधे भिड़ना), हथेली और बाहु से प्रहार करना। चरणाधर्षण: पैर अड़ाना/रगड़ना। एक-दूसरे पर बल लगाना, स्थानक (पैंतरे) में घुसना। देह-लेपन: सिर से विपक्षी के शरीर को रगड़ना/दबाना, पीठ या पेट पर पकड़ बनाना।

टीका

कुश्ती: वृषभ शैली आधुनिक कुश्ती के सबसे करीब है — सिर से दबाव बनाना, पैर अड़ाना, और पीठ/पेट पकड़ना।

सिंह व मृग मल्ल की शैली

अथ सिंहस्य सिंहेन युद्धं भवेद्यथा पुनः । उभयोश्चैव नान्योऽपि भ्रमणं भ्रमणं तथा ॥ ९ ॥ करचालनके दण्डो पञ्च बाछोनकं तथा । प्रशब्दाश्च तथैवान्ये तथा चोत्पतनं परम् ॥ १० ॥ भलावलं च विज्ञेयं चतुःस्थानप्रवेशनम् । नितम्बेन कर्षणं च विज्ञानं स्थानकेन च ॥ ११ ॥ शोषणं शोणितस्यापि तथा च छेदनं परम् । तेजोज्वलनतापेन वेगेन च प्रपदेन च ॥ १२ ॥ ताडनेन तपोप्राप्ते तत्र भीषणसागरे । द्रोणेन (सोमेन) पातितस्यैव कृष्णेन कथितं पुरा ॥ १३ ॥
हिंदी अर्थ

सिंह (शेर) का युद्ध — निरन्तर भ्रमण (घूमना), कर-चालन (हाथों की तेज गति)। उत्पतन: ऊपर उछलना। चतुःस्थान-प्रवेशन: चारों तरफ से घुसना। नितम्ब-कर्षण: कटि-प्रक्षेप (कमर से फेंकना) या कूल्हे से खींचना। रक्त-शोषण (क्रूर प्रहार जिससे रक्त निकले), छेदन (काटना)। तेजस्, जलन, ताप और प्रपद-वेग (पंजों पर तेज गति)। ताड़न (प्रहार) से भीषण सागर जैसा युद्ध।

टीका

प्रहार-प्रधान: सिंह मल्ल गति, उछाल और प्रहार का उपयोग करता है। वह एक जगह नहीं रुकता।

मृगस्य च मृगेणाथ युद्धं तथा शृणुष्व तत् । बालकास्तालनं प्रोक्तं समं च तलचेष्टितम् ॥ १४ ॥ समं च शौर्यमुभयोस्तथाङ्गवर्तनं द्वयोः । दूरागत्य समारम्भात्पार्श्वे च भ्रमणं तथा ॥ १५ ॥ शीघ्राघातः समुत्थानं लघुकरणमेव च । लघुकत्वस्थानकं चैव विविधं युद्धमेव च ॥ १६ ॥ अधोनिःसरणं चैव बहुदृश्यकरं तथा । उरुपादं च संधानं कक्षायाः स्थानघातनम् ॥ १७ ॥ तकणं रक्षणं केशान् मृगयुद्धं च गुल्मनि । एवंविधानि युद्धानि कथितानि मुरारिणा ॥ १८ ॥ ज्ञात्वा चैव बलज्ञानमात्मनश्च (मात्मनस्य) परस्य च । योद्धव्यं मुच्यते पापैः प्रतिकुर्वन् परस्परम् ॥ १९ ॥
हिंदी अर्थ

मृग (हिरण) का युद्ध — अंग-वर्तन: शरीर को मोड़ना/लचीलापन। पार्श्व-भ्रमण: दूर से आकर बगल में घूम जाना। शीघ्राघात: बहुत तेज प्रहार। समुत्थान: तुरन्त उठ जाना। लघुकरण: छोटे/हल्के दाँव। अधो-निःसरण: नीचे से निकल जाना (बच निकलना)। उरु-पाद-संधान (जाँघ और पैर के दाँव)। यह युद्ध बहुत दर्शनीय होता है।

टीका

फुर्तीला: मृग मल्ल अपनी गति और लचीलेपन से जीतता है। वह 'अधो-निःसरण' करके बड़े मल्लों के दाँव से बच निकलता है।

विजातीय युद्ध — मिश्रित जोड़ियाँ

स्वजातियुद्धं कथितं विजातिं कथयाम्यहम् । गजसिंहकयोरेव संग्रामस्य प्रसूयते ॥ २० ॥ समपादमुन्नताङ्गं गजस्थानमितीष्यते । सिंहस्यैव परं स्थानं लीनाङ्गं (लागानं) भीमदर्शनम् ॥ २१ ॥ ओजसा चैव (चे) वेगेन प्राणेनैव परस्परम् । विज्ञानमायिग्रहणं रङ्गभूमौ विनिश्चितम् ॥ २२ ॥ सिंहस्यापि वशेन स्याद् द्वयोर्युद्धं भवेद्यदि । सिंहस्यापि भवेल्लीनं बाह्वास्फालनमिष्यते ॥ २३ ॥ पादौ चलौ च विषमे लीनाङ्गस्थानमेव च । वृषस्यापि करस्थानमङ्गुष्ठस्थानमेव च ॥ २४ ॥ सिंहेन सह वृषभो उद्यमेवं समाचरत् । तदा लाग ऊर्ध्वस्थोऽपि घातयत्यपि वा पुनः ॥ २५ ॥ पक्षद्वयेऽपि सिंहेन पात्यते वृषभस्तथा । ऊर्ध्वस्थोऽपि तथा चार्थं कथं च त्रोटिको भवेत् ॥ २६ ॥ तदा सिंहो वृषेणापि पात्यते नात्र संशयः ।
हिंदी अर्थ

(गज बनाम सिंह): गज का स्थान ऊँचा और समपाद है; सिंह का स्थान लीन (झुका हुआ) और भयानक है। गज को ओज (शक्ति) से और सिंह को वेग (गति) से लड़ना चाहिए।

(सिंह बनाम वृषभ): सिंह लीन होकर (झुककर) लड़ता है। यदि वृषभ (साँड) सिंह से लड़े, तो उसे सावधानी रखनी चाहिए। सिंह अपने वेग से वृषभ को गिरा सकता है, किन्तु यदि वृषभ ऊपर आ जाए या उसे तोड़ दे, तो सिंह भी साँड द्वारा गिराया जा सकता है — इसमें संशय नहीं।

टीका

इस स्थल पर मूल पाठ में कुछ मिश्रण/अस्पष्टता है — गज-सिंह के प्रकरण के बीच वृष का उल्लेख आ गया है (पाठभेद संभावित)।

रणनीति: सिंह (प्रहारक/फुर्तीला) को गज या वृषभ (पकड़ने वाला/भारी) से लड़ते समय गति का उपयोग करना चाहिए। यदि वह पकड़ में आ गया, तो भारी मल्ल उसे कुचल देगा।

यथा युद्धं भवत्येव कथं च मृगसिंहयोः ॥ २७ ॥ सिंहस्यापि तथा लीनं करास्फोटनमिष्यते । लीनाङ्गस्थानमपि च चलनं विषमं बलम् ॥ २८ ॥ मृगस्य बलिनश्चैव बाह्वास्फालनमिष्यते । अङ्गानामथ घटनं भ्रमणं पार्श्वतोऽपि च ॥ २९ ॥ दूरात्प्रसरणं प्रोक्तं करस्य स्पर्शने तथा । अतो वेगाग्रहणं च पातनापातनं तथा ॥ ३० ॥ एवंप्रकारेण मृगः समे सिंहेन युध्यति । गजसिंहे समुत्साहे बलैर्विविधचेष्टितैः ॥ ३१ ॥ कुर्वन् परे जयत्येव विपरीतं विनश्यति । बलेनाल्पबलेन (बलेनाबलेन) अपि योद्धव्यं विजयैषिणा ॥ ३२ ॥
हिंदी अर्थ

(मृग बनाम सिंह): दोनों तेज हैं; सिंह की शक्ति (बल) विषम (अचानक/विस्फोटक) है। मृग को चाहिए कि वह अंगों को सिकोड़कर रखे, बगल में घूमता रहे (पार्श्व-भ्रमण) और दूर रहे। केवल हाथ छूकर वेग से पकड़े या गिराने का प्रयास करे। कमजोर को भी बलवान से — विजय की इच्छा से, रणनीति के द्वारा — लड़ना चाहिए।

टीका

प्रहार और पलायन: मृग को सिंह के पास नहीं जाना चाहिए, उसे दूर से लड़ना चाहिए — यही उसके वेग व लघुता का सही उपयोग है।

गजस्यैव मृगस्यैव यदि युद्धं परस्परम् । उन्नताङ्गं गजस्थानं समपादं तथैव च ॥ ३३ ॥ चलाङ्गं चलपादं च मृगस्यैव भवत्यपि । गजो गन्तुं प्रविष्टश्च मृगस्य कुशलं ततः ॥ ३४ ॥ अतो मृगेण योद्धव्यं चलपादं यदान्तरम् । पुण्याच्चैव (पुण्याच्चैत्य) जयो युध्येत्क्वापि कस्यापि जायते ॥ ३५ ॥ तस्मादोजो न प्रोक्तव्यो गजेनापि गजाह्वये । ऊर्ध्वस्यापि कथा वापि त्रोटितस्तु भवेद्यदि ॥ ३६ ॥ तदाङ्गं प्रविश्य मृगो गजं घातयति ध्रुवम् । स्थानं किंच प्रविश्याथ विज्ञानं गन्तुमिष्यति ॥ ३७ ॥ सदा परस्परं युद्धं कथितं कैटभारिणा । एवं कुर्वन् सदा मल्लो नियुद्धविजयी भवेत् ॥ ३८ ॥
हिंदी अर्थ

(गज बनाम मृग): गज भारी और स्थिर है, मृग चंचल है। यदि गज पकड़ने के लिए घुस जाए, तो मृग की कुशलता (बच निकलने) में ही भलाई है। इसलिए मृग को चलते हुए पैरों (गतिशीलता) से लड़ना चाहिए। गज को कभी भी अपनी पूरी ताकत (ओज) एक बार में नहीं झोंकनी चाहिए (क्योंकि मृग हट जाएगा और गज गिर सकता है)। यदि मृग, गज के अंगों के भीतर घुस जाए (अन्तरंग-युद्ध), तो वह विशाल गज को भी गिरा सकता है।

टीका

गति बनाम भार: मृग को गज से सीधे नहीं भिड़ना चाहिए। उसे गज की टाँगों पर आघात करना चाहिए या उसकी गति का उपयोग करके उसे थकाना चाहिए।

गज-वृषभ व वृषभ-मृग की जोड़ियाँ

गजस्य वृषभस्यापि युद्धं तत्कथितं पुरा । भ्रमणेनाङ्गसङ्गेन करमुत्पादयत्यपि ॥ ३९ ॥ उत्पाद्य शीघ्रं वृषभो गजं घातयति ध्रुवम् । प्रस्थानं चैव विज्ञानं सदृशं दृढमेव च ॥ ४० ॥ गृह्णात्येवं प्रकुर्वाणो मल्लस्तु विजयी भवेत् । वृषभस्य मृगस्यापि यदि युद्धं भवेत्तदा ॥ ४१ ॥ वृषभस्य समानं च करास्फोटनमेव च । विषमं पादस्थानं च समाङ्गः स्थानमुत्तमम् ॥ ४२ ॥ वृषभस्य भवेद्युद्धं कथितं कैटभारिणा । तालवितालघातश्च वेगघातस्तथैव च ॥ ४३ ॥ समतालेन तालश्च तथा च परिवर्तनम् । उभयोर्दण्डहननं स्कन्धाघातनमेव च ॥ ४४ ॥ बाहुघातः पांसुघातो दृष्टिघातस्तथैव च । यो येन पात्यते चैवं स तेन पातितो भवेत् ॥ ४५ ॥ भवत्येवंविधं युद्धं गजस्य वृषभस्य च ।
हिंदी अर्थ

(गज बनाम वृषभ): वृषभ (साँड) गज को घुमाकर और अंग-संग (पकड़) करके, हाथ उठाकर उसे तेजी से गिरा सकता है। वृषभ को दृढ़ और विज्ञान-युक्त होना चाहिए।

(वृषभ बनाम मृग): वृषभ को ताल-विताल (लय-भंग) और वेग-घात का प्रयोग करना चाहिए। दण्ड-हनन और स्कन्ध-आघात (कंधे से टक्कर) से मृग को रोकना चाहिए। धूल (पांसु) और दृष्टि का प्रयोग भी होता है।

टीका

लय-भंग की युक्ति: भारी वृषभ चंचल मृग को केवल तभी हरा सकता है जब वह उसकी लय तोड़े (ताल-विताल) और कंधे-दण्ड के आघात से उसे स्थिर होने पर विवश करे — अन्यथा मृग की गति उसे थका देती है।

इति श्रीमल्लपुराणे गजसिंहमृगवृषभयुद्धं नाम षोडशोऽध्यायः ।

अध्याय १६ पर चर्चा (0)

अभी कोई टिप्पणी नहीं — पहली जिज्ञासा आप रखिए।

All rights reserved © Karla Kutuhal Akhara by Vagambhrini 2021-2026
UDYAM ID: UDYAM-UK-07-0005613 | MSME Registered under 8541 - Sports Education