आहार विज्ञान और स्तंभ-श्रम (मलखंब)
ज्येष्ठ मल्ल के श्रम-जनित गुणों के साथ विस्तृत आहार-विज्ञान (पोषण) इस अध्याय का मुख्य विषय है। पाचन-वृद्धि के लिए आयुर्वेदिक द्रव्य, मिष्टान्न, मधु और दुग्ध-वर्ग आदि के गुण बताए गए हैं, और 'स्तंभ-श्रम' (मलखंब) के माध्यम से उपकरण-आधारित शक्ति, पकड़ व समन्वय का संकेत मिलता है।
ज्येष्ठ मल्ल के श्रम-गुण
अब ज्येष्ठ मल्ल के श्रम से उत्पन्न गुणों को कहता हूँ, जिनसे लोक में उदय और अनुपम कीर्ति मिलती है। मित-व्यायाम (संतुलित व्यायाम) और आहार से बल और प्राण का संचय होता है; शरीर में कठोरता, उद्यम, उत्साह और लघुता (फुर्ती) आती है।
यह शौर्य, सुख, बुद्धि, मान, हर्ष और सौभाग्य देने वाला है। यह भय, कफ, मेद (मोटापा), क्लेश, जड़ता, आलस्य, शत्रु, वात, पित्त और झुर्रियों (वलि) को हरने वाला है। राजा को प्रसन्न करने वाला, धन (अर्थ) देने वाला, यश बढ़ाने वाला, स्वजनों को आनंद देने वाला, और दुर्जनों को जलाने वाला है।
ये सभी गुण केवल 'श्रम' (अभ्यास) से ही उत्पन्न होते हैं, बिना श्रम के नष्ट हो जाते हैं। इसलिए सदा श्रम करना चाहिए।
आहार-विज्ञान: पाचक द्रव्य, मिष्टान्न व दुग्ध वर्ग
हरीतकी (हरड़), सेंधा नमक, हींग, पिप्पली और सोंठ (नागर) की गोली बनाकर खाने से जठराग्नि (भूख/पाचन) बढ़ती है।
- हरीतकी: आयु और नेत्र-ज्योति बढ़ाने वाली, मधुर-लवण रस वाली, दोष-नाशक, कुष्ठ और व्रण (घाव) को हरने वाली।
- पिप्पली: मधुर, रूखी, कड़वी, दीपन (भूख बढ़ाने वाली), कफ-वात-श्वास-कास नाशक।
- हींग: हल्की, पाचक, कफ-वात नाशक, शूल (पीड़ा) और विबंध नाशक।
- सेंधा नमक: स्वादिष्ट, नेत्र-हितकारी, दस्तावर (रेचक), वीर्यवर्धक, पाचक।
पूरक आहार: ये आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियां मल्ल के लिए 'पाचक पूरक' हैं, ताकि वह भारी आहार पचा सके। (श्लोक ४५–४८ में पिप्पली, हींग व सैन्धव के गुण-विस्तार मूल प्रतिलेख में सुरक्षित हैं; ऊपर अर्थ में सम्मिलित हैं।)
मल्लों की पुष्टि (शरीर-निर्माण) के लिए सात्विक मांस-मछली, दही, दूध, घी, शाक, मूल, फल और अनेक पेय-पदार्थ कहे गए हैं।
- खंड (कच्ची चीनी): वात-पित्त नाशक, शीतल, नेत्र-हितकारी, बृंहण (शरीर बढ़ाने वाला), बलवर्धक और वीर्यवर्धक।
- शर्करा: बुखार, पित्त, जलन, उल्टी, प्यास और मूर्छा नाशक।
- मधु (शहद): कसैला, रूखा, मधुर, दीपन, लेखन (वसा घटाने वाला), और घाव भरने वाला।
पुष्टि और लेखन: 'खंड' (चीनी) पुष्टि/वजन-वृद्धि के लिए है, जबकि 'मधु' (शहद) मेद-क्षय (लेखन) के लिए है।
- गाय का दूध: रसायन (कायाकल्प करने वाला), बलवर्धक, हृदय और बुद्धि (मेधा) के लिए हितकर, आयु बढ़ाने वाला, पुष्टिदायक।
- बकरी (अजा) का दूध: हल्का, रक्तवर्धक, पित्त और अतिसार (दस्त) नाशक, दमा-बुखार में हितकारी।
- भैंस (माहिष) का दूध: मधुर, अग्नि-नाशक (पचने में भ ारी), नींद लाने वाला, जडत्व-कर (सुस्ती लाने वाला), मेदःकर (मोटापा बढ़ाने वाला), कफ-कर।
भैंस का दूध: इसे मल्लों के लिए सावधानी से प्रयोग करने को कहा गया है, क्योंकि यह 'मोटापा' और 'सुस्ती' लाता है — जो कुश्ती के लिए बुरा है, पर वजन बढ़ाने (मांसपेशी-वृद्धि) के लिए उपयोगी है।
दधि, घृत, अन्न व मांस वर्ग
- गाय का घी: मधुर, वात-पित्त नाशक, विष-हर, अग्निकर (भूख बढ़ाने वाला), आंखों के लिए उत्तम।
- भैंस का घी: मधुर, भारी (गुरु), कफ-वर्धक, ठंडा।
- भैंस का दही: बलवर्धक, भारी, मादक (नशा लाने वाला), मेद (वसा) बढ़ाने वाला।
पाठभेद संभावित: इस खण्ड में गाय-बकरी-भैंस के दधि व घृत के गुणों वाले श्लोक (६३–७४) मूल प्रतिलेख में क्रम-भंग व OCR-अशुद्धियों सहित मिलते हैं; यहाँ स्पष्ट पाठ वाले श्लोक (६३ का चरण, ६८–६९) उद्धृत हैं और शेष के गुण अर्थ में समाहित हैं।
- लाल चावल (रक्तशालि): बलवर्धक, मूत्रल, प्यास बुझाने वाला।
- जौ (यव): भारी, शीतल, मल और कफ नाशक, गले के लिए हितकर।
- गेहूं (गोधूम): भारी, चिकना, जीवन देने वाला, हड्डी जोड़ने वाला (संधानक), वात-पित्त नाशक।
- मूंग (मुद्ग): कफ-पित्त नाशक।
- उड़द (माष): अत्यंत भारी (गुरु), वीर्यवर्धक, मेद और मांस बढ़ाने वाला, बलदायक।
- मांस: ताजा मांस (आर्द्र मांस) चिकना, शरीर बढ़ाने वाला (बृंहण), और बलवर्धक होता है।
उड़द (काली दाल): पहलवानों के लिए उड़द की दाल सबसे महत्वपूर्ण 'सुपरफूड' मानी गई है, क्योंकि यह 'मांस' (मांसपेशी) बढ़ाती है। (श्लोक ७५–९० के अन्न व मांस-वर्ग के विस्तृत गुण मूल प्रतिलेख में सुरक्षित हैं; ऊपर अर्थ में संक्षेपतः सम्मिलित हैं।)
अधिक भोजन से रोग होते हैं, और कम भोजन से बल नहीं बढ़ता। (इसलिए मल्ल को संतुलित 'मात्रा' में ही भोजन करना चाहिए।)
पाठभेद संभावित: यह श्लोक मूल प्रतिलेख में खंडित रूप में मिलता है; उपलब्ध पाठ से भाव स्पष्ट है — आहार सदा 'मात्रा' में हो।
स्तंभ-श्रम (मलखंब)
१५ प्रकार के 'स्तंभ-श्रम' (मलखंब/स्तंभ व्यायाम):
- ऊर्ध्व-लाग (स्तंभ के ऊपर पकड़), 2. मध्य-लाग, 3. अधो-लाग।
- निराधार लाग: हवा में लटकना (केवल लॉक के सहारे, बिना हाथ-पैर के स्पर्श के)। 5–6. वाम-दक्षिण लाग ( बाएं/दाएं तरफ पकड़)।
- उपविश्य लाग (स्तंभ पर बैठना)।
- चरण-अपसर्पण (पैरों से नीचे सरकना)।
- कक्षा-धारण (कांख से पकड़), 10. पाद-संधि धारण (पंजों का लॉक)।
- उदर-स्कंध धारण (पेट/कंधे से पकड़)।
- उरु-संधि धारण (जांघ का लॉक)।
- स्तंभाधिरोहण: खंभे पर चढ़ना (तीन प्रकार से)।
- दंडाघात (स्तंभ पर प्रहार)।
- अंग-वर्तन (स्तंभ के चारों ओर घूमना)।
ये १५ प्रकार के प्राण-स्तंभ श्रम हैं। इनके अभ्यास से मल्ल 'नियुद्ध' (कुश्ती) में विजयी होता है।
मलखंब: यह उन विरल ग्रंथों में है जो 'मलखंब' का इतना प्राचीन और तकनीकी विवरण देता है। यह कुश्ती की 'पकड़' और 'लचीलापन' बढ़ाने का सर्वोत्तम साधन है।
पाठभेद संभावित: श्लोक १२ के 'लागैर्यत्र' का पाठ स्रोत में अस्पष्ट है (सर्वोत्तम पाठ लिया गया है); तथा श्लोक १८–२० — जिनमें विभिन्न 'प्राणों' (स्कन्ध, कर, दण्ड, बाहु, कटि, पाद-संधि आदि) का गणन है — मूल प्रतिलेख में OCR-जनित अशुद्धियों सहित सुरक्षित हैं और यहाँ छोड़े गए हैं।
पूरक पाठ-टिप्पणी
इस अध्याय के मूल प्रतिलेख (canonical transcript) में आहार-वर्ग (श्लोक लगभग ४५–९० — हरीतकी, पिप्पली, हींग, सैन्धव, खण्ड, शर्करा, मधु; गाय-बकरी-भैंस के दूध, दही व घृत; रक्तशालि, यव, गोधूम, मुद्ग, चणक, आढकी, माष एवं मांस-वर्ग) तथा स्तंभ-श्रम से जुड़े अनेक अतिरिक्त श्लोक सुरक्षित हैं, जिनका पाठ OCR-जनित अशुद्धियों के कारण अनिश्चित है और जिनकी विस्तृत टीका अभी प्रतीक्षित है। ऊपर के अर्थ-खण्डों में इन द्रव्यों के गुण संक्षेप में समाहित कर दिए गए हैं।
अध्याय समाप्ति:
इति श्रीमल्लपुराणे स्तम्भश्रमलक्षणं नाम दशमोऽध्यायः ।
अध्याय १० पर चर्चा (0)
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