मल्लपुराण
चर्चा
अध्याय १८

विज्ञान के प्रकार और निम्बजा शक्ति

विज्ञान के छह प्रकार (ओज, वहणि, प्राण तथा इनके मिश्र) से मल्लविद्या की शक्ति-रचना का मूल सिद्धांत रखा जाता है। कृष्ण और सोमेश्वर के प्रदर्शन-युद्ध से ताल, स्थानक, घात व लाग आदि तकनीकों का समन्वित प्रयोग दिखता है। निम्बजा शक्ति की स्थापना और फलश्रुति से यह अध्याय साधना को परम्परा, भक्ति और अनुशासन से जोड़कर ग्रंथ का उपसंहार करता है।

विज्ञान के छह प्रकार

कथितान्याहस्थानानि पहुंबाडे भवन्ति हि । मुखग्रीवाकरो(र)युग्मं चरणाग्रे तथैव च ॥ १ ॥ षट्प्रकाराणि कथ्यन्ते विज्ञानानि यथा शृणु । विज्ञानैश्च प्रवर्धन्ते पौरुषं विभवो गुणाः ॥ २ ॥ क्वचिदोजो विज्ञानं क्वचिद् वहणिना भवेत् । क्वचित्प्राणेन विज्ञानं ओजो वहणिजा भवेत् ॥ ३ ॥ क्वचिदोजसा प्राणेन विज्ञानं जायते क्वचित् । षट्प्रकारेण विज्ञानं रक्षणीयं प्रयत्नतः ॥ ४ ॥ प्रवर्द्धते येन यशो लभ्यन्ते विपुलाः श्रियः । क्वचिदोजस्य विज्ञानं रक्षणीयं प्रयत्नतः ॥ ५ ॥ प्रवर्धते येन यशो जयो भवति सर्वदा । क्वचिद्वहणिना ज्ञानं क्वचित्प्राणेन संततम् ॥ ६ ॥ ओजो वहणिना वापि ओजो प्राणेन वा क्वचित् । ओजो प्राणवहणिना क्वचिज्ज्ञानं समादिशेत् ॥ ७ ॥
हिंदी अर्थ

पहुंबाडे (युद्ध-क्षेत्र) में प्रहार के स्थान — मुख, ग्रीवा, दोनों हाथ और पैरों के अग्रभाग (पंजे) — कहे गए हैं। अब छह प्रकार के 'विज्ञान' (तकनीक) सुनो, जिनसे पौरुष, वैभव और गुणों की वृद्धि होती है —

१. ओज-विज्ञान — शक्ति-प्रधान। २. वहणि-विज्ञान — वेग-प्रधान (गति/प्रवाह)। ३. प्राण-विज्ञान — दम/सहनशक्ति-प्रधान। ४. ओज + वहणि — शक्ति और वेग का मिश्रण। ५. ओज + प्राण — शक्ति और दम का मिश्रण। ६. ओज + प्राण + वहणि — तीनों का पूर्ण मिश्रण (संपूर्ण योद्धा)।

इन विज्ञानों की यत्नपूर्वक रक्षा करनी चाहिए, क्योंकि इन्हीं से यश बढ़ता है और सदा जय प्राप्त होती है।

टीका

युद्ध-दर्शन: यह वर्गीकरण योद्धा के तीन मूल गुणों — शक्ति (ओज), गति (वहणि) और दम (प्राण) — तथा उनके मिश्रणों का शास्त्रीय ढाँचा है। सबसे श्रेष्ठ वह मल्ल है जिसमें तीनों का संतुलन हो; यही 'संपूर्ण मल्ल' की पहचान है।

कृष्ण-सोमेश्वर का प्रदर्शन-युद्ध

सोमेश्वर यथाशक्त्या कुरु युद्धमनेकधा । सार्द्धं देवेन हरिणा मल्लाः पश्यन्ति पार्श्वगाः ॥ ८ ॥ ततो युद्धं समारब्धं ताभ्यां तु विधिपूर्वकम् । जटाबन्धनमादौ च ततो घातनकग्रहम् ॥ ९ ॥ कच्छाबन्धपरत्वं च ततो रङ्गनमस्त्रियाम् ॥ १० ॥ समं चास्फोटनं तत्र ततो वरप्रवर्धनम् । समोन्नतं च लीनं च चलस्थानं चतुर्विधम् ॥ ११ ॥ समस्थानं च विदितं येन युद्धे जयो भवेत् । घाताः षट्त्रिंशदुभयोस्तालाः पञ्च प्रकीर्तिताः ॥ १२ ॥ स्कन्धास्फोटनमन्योन्यं चरणयोः कर्षणं तथा । तथा विधातनं पश्चाद्भ्रामणं प्रेरणं तथा ॥ १३ ॥ घातनं चालनं चैव लागनं च परस्परम् । कक्षाघातस्य विद्याश्च प्राणघातस्तथैव च ॥ १४ ॥ द्वादशस्थानके चैव कथितं च प्रवेशकम् । अन्यैश्च विविधोपायैः संकल्पितविकल्पितैः ॥ १५ ॥ स्थानकं च शरीरोऽपि लागो भारस्तथैव च । अश्रुकस्य बुधैश्चैव धारणं रुन्धनं तथा ॥ १६ ॥
हिंदी अर्थ

कृष्ण ने कहा — "हे सोमेश्वर! अपनी शक्ति के अनुसार मुझसे अनेक प्रकार से युद्ध करो; अन्य मल्ल पास खड़े होकर देखें।" तब दोनों ने विधिपूर्वक युद्ध आरंभ किया — पहले जटा-बंधन, फिर घात-ग्रह (आरम्भिक प्रहार), फिर कच्छ-बंधन (लंगोट कसना) और रंग-नमस्कार।

दोनों ने समान आस्फोटन (जांघ ठोकना) किया और चारों प्रकार के स्थान (सम, उन्नत, लीन, चल) का प्रयोग किया। छत्तीस प्रकार के घात, पाँच ताल (लय), स्कंध-आस्फोटन (कंधे भिड़ाना), चरण-कर्षण (पैर खींचना), भ्रमण (घूमना), प्रेरण (धकेलना), घातन, चालन, लागन (दांव लगाना), कक्षा-घात और प्राण-घात — तथा बारह स्थानकों में प्रवेश — इत्यादि विविध उपायों का प्रदर्शन किया।

टीका

प्रदर्शनी: यह वास्तविक युद्ध नहीं, बल्कि एक 'तकनीकी प्रदर्शन' है, जहाँ गुरु (कृष्ण) शिष्य (सोमेश्वर) के साथ खेलकर उसे तथा अन्य दर्शकों को सिखा रहे हैं। छत्तीस घात, पाँच ताल, चार स्थानक और बारह स्थानक-प्रवेश — यह पूरा प्रदर्शन मल्लविद्या का व्यवस्थित पाठ्यक्रम प्रस्तुत करता है।

बलराम का मान व कृष्ण की सान्त्वना

कार्येषु बलदा नित्यं मल्लानां च जयप्रदा । इत्युक्त्वा भगवान् कृष्णो योगमायामनुस्मरन् ॥ १७ ॥ ततो देवैः पुष्पवृष्टिर्निर्मुक्ता हर्षसंयुतैः । विप्रैर्जय जय शब्दैर्बलभद्रं च पातयत् ॥ १८ ॥ बलभद्रश्च कुपितो दुर्जयो बहु सङ्गरे । करिष्यामि तपो घोरं वने गत्वा विनिर्गतः ॥ १९ ॥ ततः सर्वेऽपि मल्लाश्च कृष्णश्च विनयान्वितः । बलभद्रमतिक्रुद्धं संबोधयितुमुद्यतः ॥ २० ॥ न त्वं जितो प्रलम्बेन मुष्टिकेन न सङ्गरे । ममैव मल्लविद्यायाः प्रभावः परमो हि सः ॥ २१ ॥ देवैर्दैत्यैर्मनुष्यैस्त्वमजेयो रिपुसङ्गरे । माहेश्वरी वैष्णवी च ब्राह्मी शक्तिर्विनिर्मिता ॥ २२ ॥ ततो मल्लैश्च कृष्णेन सामवाक्यैः सुसान्त्वितः । बलभद्रो रङ्गभूमौ समानीय प्रवेशितः ॥ २३ ॥ महानागपि सर्वेषां विप्राणां चैव शृण्वताम् । ततः कृष्णेन संतोषादुक्तं मधुरया गिरा ॥ २४ ॥ सोमेश्वर त्वया अद्य पातितो ह्यचिरादयम् । असाध्या श्रवणेनापि मल्लविद्या वशीकृता ॥ २५ ॥ फलमस्मात्त्वयावाप्तं समयं च विनिश्चितम् । ततश्चाहं प्रसन्नोऽस्मि वाञ्छितं च वरं शृणु ॥ २६ ॥
हिंदी अर्थ

(लीला के अन्तर्गत) कृष्ण ने योगमाया का स्मरण किया। देवताओं ने हर्षपूर्वक पुष्पवृष्टि की और ब्राह्मणों ने जय-जयकार की, और बलभद्र (बलराम) गिरा दिए गए। इस पर बलराम क्रोधित होकर वन में घोर तपस्या के लिए निकल पड़े। तब कृष्ण और सभी मल्लों ने विनयपूर्वक उस अत्यन्त क्रुद्ध बलराम को मनाया।

कृष्ण ने कहा — "आप प्रलम्ब और मुष्टिक जैसे दैत्यों से भी संग्राम में नहीं हारे; यह तो मेरी मल्लविद्या का ही परम प्रभाव है (कि तकनीक से कोई भी गिराया जा सकता है)। देव, दैत्य और मनुष्य — किसी से भी आप शत्रु-संग्राम में अजेय हैं।" इस प्रकार मधुर सामवाक्यों से शान्त होकर बलराम पुनः रंगभूमि में लौट आए।

तब कृष्ण ने संतुष्ट होकर मधुर वाणी में सोमेश्वर से कहा — "तुमने आज इसे शीघ्र ही गिरा दिया; श्रवण-मात्र से दुःसाध्य मल्लविद्या को तुमने वश में कर लिया है। इससे तुमने फल प्राप्त किया और समय (सिद्धि) निश्चित किया। मैं प्रसन्न हूँ — अपना इच्छित वर मांगो।"

टीका

खेल-भावना: बलराम का क्रोधित होना और फिर मान जाना यह दर्शाता है कि अखाड़े में हार-जीत को दिल पर नहीं लेना चाहिए। तकनीक (सोमेश्वर) कभी-कभी केवल बल (बलराम) पर भारी पड़ सकती है — यही मल्लविद्या का मर्म है।

निम्बजा शक्ति का प्रादुर्भाव व पूजा-विधान

सोमेश्वर उवाच । यदि संतुष्टोऽसि भगवन् वरं देहि यथेप्सितम् । श्रमं च भवता सार्द्धं कर्तुमिच्छामि सांप्रतम् ॥ २७ ॥ भवतः शरीरसंपर्कात्पवित्रोऽहं जगत्त्रये । एवमस्त्विति कृष्णेन समुद्दिष्टं सुदर्शनम् ॥ २८ ॥ श्रीकृष्ण उवाच । कार्येषु बलदा नित्यं मल्लानां च जयप्रदा । इत्युक्तो भगवान् कृष्णो योगमायामनुस्मरन् ॥ ३३ ॥ ऊर्ध्वदर्शक्षणा देवी लिम्बवृक्षे स्थिता दधौ । तेजोमण्डलमध्यस्था भ्राजमानाऽमितप्रभा ॥ ३४ ॥ चतुर्भुजायुधैः पूर्णा सिंहवाहनसंयुता । सोमेश्वर इमां पश्य निम्बवृक्षसमाश्रिताम् ॥ ३५ ॥ इयं मदीया शक्तिर्निम्बजा इति नामतः ।
हिंदी अर्थ

सोमेश्वर ने कहा — "हे भगवन्! यदि आप संतुष्ट हैं तो इच्छित वर दीजिए; मैं इस समय आपके साथ श्रम (अभ्यास) करना चाहता हूँ। आपके शरीर-सम्पर्क से मैं तीनों लोकों में पवित्र हो गया हूँ।" कृष्ण ने सुदर्शन-सहित "एवमस्तु" कहा।

फिर "कार्यों में सदा बल देने वाली और मल्लों को जय देने वाली" — ऐसा कहकर भगवान कृष्ण ने योगमाया का स्मरण किया। तब तेजपुंज के मध्य, ऊपर की ओर देखती हुई, नीम के वृक्ष (लिम्बवृक्ष) पर स्थित एक देवी प्रकट हुईं — चार भुजाओं में आयुध धारण किए, अमित प्रभा से देदीप्यमान और सिंह पर सवार। कृष्ण ने कहा — "हे सोमेश्वर! नीम के वृक्ष पर आश्रित इस देवी को देखो; यह मेरी शक्ति है और इसका नाम 'निम्बजा' (नीम से उत्पन्न) है।"

टीका

कुलदेवी: 'निम्बजा' जेठी मल्लों की कुलदेवी हैं। नीम का वृक्ष आरोग्य और शीतलता का प्रतीक है, जो कठोर श्रम करने वाले मल्लों के लिए आवश्यक है। चतुर्भुजा, सिंहवाहिनी शक्ति का यह रूप माहेश्वरी-वैष्णवी-ब्राह्मी शक्तियों की ही एक अभिव्यक्ति है, जिसका उल्लेख पूर्व श्लोक (२२) में हुआ।

पांडुलिपि इस खण्ड में श्लोक २८ से सीधे ३३ पर पहुँचती है; बीच के श्लोक २९–३२ नीचे पाठ-संगति हेतु दिए गए हैं (पाठभेद संभावित)।

(निम्नलिखित श्लोक २९–३२ पांडुलिपि से पाठ-संगति हेतु जोड़े गए हैं।)

ततः सोमेश्वरः कृष्णो दत्त्वा स्फालनकं ततः । प्रभावयुक्तं विज्ञाय आत्मानं समदर्शयत् ॥ २९ ॥
हिंदी अर्थ

तत्पश्चात् श्रीकृष्ण ने (सोमेश्वर के प्रति) 'स्फालनक' (एक प्रकार की क्रीड़ा/प्रयोग) का उपदेश दिया; उसके प्रभाव को जानकर उन्होंने अपना सामर्थ्य प्रकट किया। (पाठभेद संभावित)

बलं चाप्रमितं दत्त्वा शरीरस्य प्रभावतः । प्रकारं मल्लविद्याया दत्त्वा पुनर्जगाद ह ॥ ३० ॥
हिंदी अर्थ

अपने प्रभाव से शरीर को अपार बल देकर और मल्ल-विद्या के प्रकार भी समझाकर उन्होंने पुनः कहा।

श्रीकृष्ण उवाच । त्वया यद्यत् कृतं किंचित्सोमेश्वर तदुत्तमम् । सोमेश्वर भवेत्सत्यं समस्तैर्ब्राह्मणैः सह ॥ ३१ ॥
हिंदी अर्थ

श्रीकृष्ण बोले — हे सोमेश्वर! तुमने जो कुछ किया है वह उत्तम है; समस्त ब्राह्मणों सहित तुम्हारा 'सोमेश्वर' नाम/पद सत्य हो।

चातुर्वर्ण्यस्य मध्ये तु त्वं प्रधानो भविष्यसि । सोमेश्वर उवाच । स्वामिन् त्वयाहं स्वर्गमस्मान् कः पालयिष्यति ॥ ३२ ॥
हिंदी अर्थ

श्रीकृष्ण बोले — चातुर्वर्ण्य में तुम प्रधान होओगे। सोमेश्वर बोले — स्वामिन्! यदि आप मुझे स्वर्ग ले जाएंगे तो हमारी रक्षा कौन करेगा? (पाठभेद संभावित)

अस्याः स्थानं प्रकर्तव्यं रम्यं विचित्रधातुभिः ॥ ३६ ॥ मनोहरं च लोकानां प्रेक्षणीयं महाद्भुतम् । स्थापनीया प्रयत्नेन स्थानेऽस्मिन् निम्बजा सदा ॥ ३७ ॥ जयदा सर्वमल्लैस्तु पूजनीया त्वहर्निशम् । श्रमकाले च संग्रामे रङ्गभूमौ विशेषतः ॥ ३८ ॥ आषाढकेऽन्यसंयोगे शक्तिं तु निम्बजां स्मरन् । जयं लभेन्न संदेहो यथाशक्ति यथामति ॥ ३९ ॥ जयः प्रसादं दशांशेन शक्तिः सेव्या प्रयत्नतः । बलिपूजोपहारैश्च होमैर्धूपैः सपुष्पकैः ॥ ४० ॥ सेव्या च प्रत्यहं तस्याः कार्यं काले च दर्शनम् । नमस्कारस्तुतिश्चैव कार्या वादित्रसंयुता ॥ ४१ ॥ शक्तिरेषा सदा लोके जयदा बलदा भवेत् । रक्षणं सर्वविघ्नेभ्यः करिष्यति न संशयः ॥ ४२ ॥
हिंदी अर्थ

इस स्थान पर विचित्र धातुओं से बना, मनोहर और अद्भुत मंदिर बनाकर निम्बजा देवी की सदा स्थापना करो। सभी मल्लों को दिन-रात, और विशेषकर श्रम (व्यायाम) और संग्राम के समय रंगभूमि में इनकी पूजा करनी चाहिए। जो मल्ल अखाड़े (आषाढक) में निम्बजा शक्ति का स्मरण करेगा, उसे यथाशक्ति-यथामति निःसंदेह जय मिलेगी।

दशांश: अपनी जय/प्रसाद (कमाई) का दसवाँ हिस्सा देवी की सेवा में — बलि, पूजा, उपहार, हवन, धूप और पुष्प में — लगाना चाहिए। प्रतिदिन वाद्य-यंत्रों के साथ उनका दर्शन, नमस्कार और स्तुति करनी चाहिए। यह शक्ति सदा बल और जय देने वाली तथा समस्त विघ्नों से रक्षा करने वाली होगी — इसमें संशय नहीं।

टीका

दशांश: अपनी आय का एक हिस्सा अखाड़े और कुलदेवी के रखरखाव के लिए देना एक प्राचीन सामाजिक-सुरक्षा प्रणाली थी, जिससे अखाड़े निरन्तर चलते रहते थे। श्रम-काल और संग्राम-काल में इष्ट-शक्ति का स्मरण साधक को एकाग्रता, अभय और अनुशासन देता है।

उत्तम-अधम मल्ल-धर्म व द्वादश गोत्र

सोमेश्वर उवाच । लोके भवन्त्यधमाश्च मल्लान् ब्रूहि ममाग्रतः । श्रीकृष्ण उवाच । निम्बजां च गुरुं चैव मल्लान् वा उत्तमांस्तथा ॥ ४३ ॥ ते भवन्त्युत्तमा मल्ला नात्र कार्या विचारणा । न भजन्ति द्विषन्ति च न कुर्वन्ति द्विजास्तथा ॥ ४४ ॥ गुरवश्चैव ते मल्ला गुणदोषविवर्जिताः । निम्बजां नैव मन्यन्ते मल्लान्निन्दन्ति तत्पराः ॥ ४५ ॥ गुरोरभाषणं ये वै कुर्वन्ते तेऽधमा मताः । भेदं कृत्वा च युध्येत उपायैर्विविधैरपि ॥ ४६ ॥ निन्दां यः कुरुते नित्यं विघ्नं तस्य प्रजायते । अन्योऽपि मल्लविद्यायां यः करिष्यत्परं दरम् ॥ ४७ ॥
हिंदी अर्थ

सोमेश्वर ने पूछा — "लोक में अधम मल्ल कौन होते हैं, मुझे बताइए।" श्रीकृष्ण ने कहा —

उत्तम मल्ल: जो निम्बजा देवी, गुरु और श्रेष्ठ मल्लों का सम्मान करते हैं — वे उत्तम मल्ल हैं, इसमें कोई विचार नहीं करना।

अधम मल्ल: जो देवी को नहीं मानते, जो अन्य मल्लों की निंदा करते हैं, जो गुरु से बात नहीं करते (उपेक्षा करते हैं), और जो फूट (भेद) डालकर विविध उपायों से युद्ध करते हैं — वे अधम माने गए हैं। जो नित्य निंदा करता है, उसके जीवन में विघ्न उत्पन्न होते हैं।

मया ग्रामाद्य प्रदीयन्ते मल्लविप्रेभ्य एव च ॥ ४८ ॥ पञ्चोत्तरं पञ्चोत्तरं पञ्चशतं सर्वेभ्यो धर्मनिमित्तानि । दत्त्वा द्वादश गोत्राणि स्थिरीकृतानि सदा मया ॥ ४९ ॥ प्रथमं गर्गगोत्रं स्याद्वितीयं पिप्पलायनम् । तृतीयं भार्गवं चैव चतुर्थं तनौपेनम् ॥ ५० ॥ पञ्चमं गौतमं चैव तैत्तिरं च ततः परम् । वासिष्ठं च तथा शाण्डिल्यं इति क्रमेण कीर्तितम् ॥ ५१ ॥ धृताशि छायाशि तथा भारद्वाजं तथैव च । काश्यपं च ततो गोत्रं द्वादशैतानि कीर्तितम् ॥ ५२ ॥
हिंदी अर्थ

(कृष्ण कहते हैं) मैंने मल्ल-ब्राह्मणों को धर्म के निमित्त पाँच सौ पाँच (५०५) गाँव प्रदान किए हैं, और उनके बारह गोत्र सदा के लिए स्थिर किए हैं —

१. गर्ग, २. पिप्पलायन, ३. भार्गव, ४. तनौपेन, ५. गौतम, ६. तैत्तिर, ७. वासिष्ठ, ८. शाण्डिल्य, ९. धृताशि, १०. छायाशि, ११. भारद्वाज, १२. काश्यप।

टीका

जेठी मल्ल-वंश: यह वंशावली आज भी जेठी मल्ल समुदाय में पाई जाती है। यह सिद्ध करता है कि मल्लविद्या एक पारिवारिक व सामुदायिक विद्या थी, जो गोत्र-परम्परा से पीढ़ी-दर-पीढ़ी संरक्षित रही। श्लोक ५०–५२ में गोत्र-नामों की वर्तनी पांडुलिपि में कुछ स्थलों पर भिन्न है (पाठभेद संभावित)।

(निम्नलिखित श्लोक ५३–६१ पांडुलिपि से पाठ-संगति हेतु जोड़े गए हैं; इनमें गोत्र-नामों व कुछ पदों का पाठ स्थान-स्थान पर दूषित है।)

उदीचिज्ञातिसंभूतं गोत्रं काश्यपमेव च । बाडोतं गर्गगोत्रं स्याद्धूपा च पिपलायनम् ॥ ५३ ॥ आपस्तम्भं च केलातं भार्गवं वैहलं तथा । ठाकरियं गौतमं च वदेर तैतिरं तथा ॥ ५४ ॥ ब्राह्माणिय वासिष्ठं च मण्डेणा माडल्यं तथा । नवरडा शाण्डिल्यं च चमाल धृताशि तथा ॥ ५५ ॥
हिंदी अर्थ

(गोत्र व शाखा-नामों की एक और सूची) — उदीच्य-ज्ञाति से उत्पन्न काश्यप-गोत्र; तथा बाडोत–गर्ग, धूपा–पिप्पलायन, आपस्तम्भ, केलात, भार्गव–वैहल, ठाकरिय–गौतम, वदेर–तैत्तिर, ब्राह्माणिय–वासिष्ठ, मण्डेणा–माडल्य, नवरडा–शाण्डिल्य, चमाल–धृताशि — इस प्रकार (कुल-शाखाओं के) नाम कहे गए हैं। (नाम/पाठ-रूप दूषित — पाठभेद संभावित)

स्थापिता पुरा देवेन मल्लानां गुरवः स्मृताः । यावन्मही सागराश्च यावच्चन्द्रादिवाकरौ ॥ ५६ ॥ तावत्तिष्ठन्ति मेदिन्यां पालनीया महात्मभिः । मया च दत्तवान्मौनान्मायादेवालयं स्मृतम् ॥ ५७ ॥
हिंदी अर्थ

देवता द्वारा प्राचीन काल में मल्लों के गुरु स्थापित किए गए; जब तक पृथ्वी, समुद्र और चन्द्र-सूर्य विद्यमान हैं, तब तक वे परम्परा पृथ्वी पर स्थिर रहें — महात्माओं द्वारा उनका पालन होना चाहिए; तथा (पाठ संदिग्ध) 'मायादेवालय' के विषय में भी स्मरण/दान का उल्लेख है। (पाठभेद संभावित)

तस्य चैते भविष्यन्ति दोषा नामविचारणात् । शौर्यवीर्ये सत्यशौचे बलविक्रमैश्च युतम् ॥ ५८ ॥ यशस्वी लभते विद्यां साध्यते निरन्तरम् । राज्ञश्च पात्रतामेति माननीयश्च गजभिः ॥ ५९ ॥ अडसडस्य कर्ता च निरन्तरात्मकार्यवान् । यथा च यो भवत्येव लिपिबलसमन्वितः ॥ ६० ॥ कलभिश्चन्द्रवन्मल्लो वर्धते च दिनं प्रति । बलेन वर्धते कायः संग्रामे विजयी भवेत् ॥ ६१ ॥
हिंदी अर्थ

इन नामों/परम्पराओं के विचार से शौर्य, वीर्य, सत्य-शौच, बल और विक्रम से युक्त गुण प्रकट होते हैं। यशस्वी पुरुष विद्या प्राप्त करता है, निरन्तर साधना में रत रहता है, राजा का पात्र बनता है और माननीय होता है; वह निरन्तर आत्म-कार्य (स्वधर्म) करने वाला और लिपि-बल (लेखन-सामर्थ्य) से भी युक्त होता है। मल्ल प्रतिदिन कलभ (गजशावक) और चन्द्रमा के समान बढ़ता है; बल से उसका शरीर पुष्ट होता है और वह संग्राम में विजयी होता है। (कुछ पद पाठ-दूषित — पाठभेद संभावित)

फल-श्रुति व ग्रंथ-उपसंहार

मल्लाः सर्वे पतिष्यन्ति पातिताः स्मरशासने ॥ ६२ ॥ आत्मत्राणमविज्ञाय विक्रमं कुरुते तु यः । स पराभवमाप्नोति मल्लो रंभासमो हि सः ॥ ६३ ॥ मल्लविद्या विनश्यन्ति दुर्मदेन यथा श्रियः । तस्मान्मल्लैः प्रमादेन न स्थातव्यं कदाचन ॥ ६६ ॥ अभ्यासात्सिद्धिमाप्नोति तेन सम्यक् समभ्यसेत् । यः शृणोति त्विदं गुह्यं मया च प्रतिपादितम् ॥ ७० ॥ तस्य शाखाः प्रवर्द्धन्ते प्रयागवासको यथा । इत्येवं मल्लशास्त्रं च पठ्यते रङ्गभूमिषु ॥ ७१ ॥ निर्विघ्नाः सर्वमल्लाश्च ज्येष्ठी च विजयी भवेत् । तस्माद्विघ्नविनाशाय श्रोतव्यं च सदा बुधैः ॥ ७२ ॥ इदं ददाति गुरवे परिलिख्य च पुस्तकम् ॥ ७३ ॥ तस्य कुले महामल्ला जययुक्ता भवन्ति हि । किं वर्ण्यते मयाद्भुता पुस्तकस्य फलश्रुतिः । मल्लवंशोद्भवेनेदं श्रोतव्यं च पुनः पुनः ॥ ८५ ॥ मातेव रक्षति ह्याशु पितेव हितकारकम् । तस्मान्मल्लैर्नहि त्याज्यं पुराणं मल्लसंज्ञितम् ॥ ८६ ॥
हिंदी अर्थ

जो आत्मरक्षा को जाने बिना केवल पराक्रम दिखाता है, वह पराभव को प्राप्त होता है — ऐसा मल्ल केले के वृक्ष (रंभा) के समान भीतर से खोखला है। घमंड (दुर्मद) से मल्लविद्या वैसे ही नष्ट हो जाती है जैसे लक्ष्मी; इसलिए मल्लों को कभी प्रमाद (आलस्य) में नहीं रहना चाहिए। अभ्यास से ही सिद्धि मिलती है, अतः भली-भांति अभ्यास करना चाहिए।

जो इस गुह्य मल्लशास्त्र को सुनता है, उसकी शाखाएँ प्रयागवासी के समान बढ़ती हैं। यह मल्लशास्त्र रंगभूमि में पढ़ा जाता है; इसके श्रवण से सभी मल्ल निर्विघ्न और ज्येष्ठी विजयी होते हैं, इसलिए बुधजनों को इसे सदा सुनना चाहिए। जो इसे लिखकर गुरु को देता है, उसके कुल में जय-युक्त महामल्ल उत्पन्न होते हैं। यह मल्लपुराण माता के समान शीघ्र रक्षा करता है और पिता के समान हित करता है — इसलिए मल्लों को इस 'मल्ल' नामक पुराण का कभी त्याग नहीं करना चाहिए।

टीका

उपसंहार का मर्म: ग्रंथ अपने अन्त में मल्ल के लिए तीन सूत्र दृढ़ करता है — आत्मरक्षा का बोध (आत्मत्राण), निरहंकार (दुर्मद-त्याग), और नित्य अभ्यास (अप्रमाद)। जो इन्हें साधता है, उसी की मल्लविद्या स्थिर रहती है। शास्त्र का रंगभूमि में पाठ, गुरु को प्रति (पुस्तक) समर्पण, और वंश-परम्परा में श्रवण — यही इस विद्या के संरक्षण की विधि बताई गई है।

(निम्नलिखित श्लोक ६४–८४ पांडुलिपि से पाठ-संगति हेतु जोड़े गए हैं; ये फल-श्रुति व ग्रंथ-पूजन का विस्तार करते हैं।)

सर्वकार्याणि संत्यज्य मल्लविद्यारतो भवेत् । न पराभूयते विघ्नैः संग्रामे विजयी भवेत् ॥ ६४ ॥
हिंदी अर्थ

अन्य सभी कार्य छोड़कर मल्ल-विद्या में रत रहे; तब वह विघ्नों से पराभूत नहीं होता और संग्राम में विजयी होता है। (पाठभेद संभावित)

वनान्तरे च संचारात् विलासरसंयुतम् । आत्मानं ये न पश्यन्ति ते मलास्तु बहिष्कृताः ॥ ६५ ॥
हिंदी अर्थ

जो केवल संचार व विलास-रस में रत होकर आत्म-निरीक्षण नहीं करते, वे 'मल' (अशुद्ध) के समान बहिष्कृत माने जाते हैं। (पाठभेद संभावित)

कृष्णोक्तादानरता ये मल्ला भुवनभूषणाः । क्रोधलोभभयालस्यरहिता मानवाः शुभाः ॥ ६७ ॥
हिंदी अर्थ

श्रीकृष्ण के कथनानुसार दान में रत मल्ल — जो भुवन के भूषण हैं — क्रोध, लोभ, भय और आलस्य से रहित शुभ मानव होते हैं।

नित्यं बह्वादयो लोका मल्लैर्मधुरया गिरा । तदा सुभाग्यवान् सेव्यो जगतोऽपि प्रियो भवेत् ॥ ६८ ॥
हिंदी अर्थ

मल्ल मधुर वाणी से नित्य व्यवहार करें; तब वह सुभाग्यवान, सेवनीय और जगत् का प्रिय बनता है। (पाठभेद संभावित)

प्रियमेव विधातव्यं रिपौ मित्रे च सर्वदा । अतिश्रमाद्विनश्यन्ति श्रमत्यागे तथा पुनः ॥ ६९ ॥
हिंदी अर्थ

शत्रु और मित्र — दोनों के प्रति सदा प्रिय व उचित आचरण करना चाहिए। अति-श्रम से (शक्ति) नष्ट होती है और श्रम-त्याग (आलस्य) से भी — अतः मध्यम मार्ग उचित है। (पाठभेद संभावित)

तस्य कुले महामल्ला जययुक्ता भवन्ति हि । मल्लशास्त्रं परिश्रुत्य वक्तारं न प्रपूजयेत् ॥ ७४ ॥ वंशच्छेदो महाहानिस्तस्य नित्यं प्रजायते । न युद्धकुशलः कापि न लक्ष्मीर्न यशः सुखम् ॥ ७५ ॥
हिंदी अर्थ

उसके कुल में जय-युक्त महामल्ल उत्पन्न होते हैं; परन्तु जो मल्ल-शास्त्र सुनकर भी उसके वक्ता (आचार्य) का पूजन नहीं करता, उसका वंशच्छेद और महान हानि नित्य होती है — न उसमें युद्ध-कौशल रहता है, न लक्ष्मी, न यश, न सुख।

तस्मात्सर्वप्रकारेण मल्लैः पूज्यं तु पुस्तकम् । मल्लशास्त्रधरं विप्रं काश्यपगोत्रसमुद्भवम् ॥ ७६ ॥ पूजयन्ति च ये मल्लास्तेषां लक्ष्मीर्जयः सुखम् । ये शृण्वन्ति त्विदं सम्यक् श्लोकं श्लोकार्धमेव च ॥ ७७ ॥
हिंदी अर्थ

इसलिए मल्लों को हर प्रकार से इस पुस्तक का, तथा मल्ल-शास्त्र धारण करने वाले काश्यप-गोत्रोत्पन्न विप्र का पूजन करना चाहिए। जो मल्ल इसका पूजन करते हैं, उन्हें लक्ष्मी, जय और सुख मिलता है; और जो इसे सम्यक् सुनते हैं — पूरा श्लोक या आधा श्लोक भी — उन्हें भी फल मिलता है।

मल्लाः पापविनिर्मुक्ता भोगान् भुक्त्वा हरेः पदम् । प्रयान्ति सन्ततिस्तेषां वर्धते पुत्रपौत्रिकी ॥ ७८ ॥ अतो मल्लैः सदा ह्येतच्छ्रोतव्यं सर्वकामकम् । पूजयेत्प्रसादाद्भक्त्या श्रद्धया च फलाशये ॥ ७९ ॥
हिंदी अर्थ

मल्ल पाप से मुक्त होकर भोग भोगते हैं और अन्ततः हरि के पद को प्राप्त होते हैं; उनकी सन्तति (पुत्र-पौत्र) वृद्धि को प्राप्त होती है। इसलिए मल्लों को इस सर्वकामद पुराण को सदा सुनना चाहिए, और प्रसन्न-भक्ति व श्रद्धा के साथ फल-आशा रखते हुए इसका पूजन करना चाहिए।

वस्त्रैराभरणैश्च द्रविणेन च पुस्तकम् । ऋतुभवैश्च पुष्पाद्यैर्द्रव्यै रत्नैरनेकशः ॥ ८० ॥ सुवर्णै रजतैर्वापि मुकुन्दप्रीतिहेतवे । वेदनीराजिते सम्यक् पूरणस्य फलं भवेत् ॥ ८१ ॥
हिंदी अर्थ

वस्त्र, आभूषण, धन, ऋतु-सम्भव पुष्पादि, द्रव्य, अनेक रत्नों तथा सुवर्ण-रजत से — मुकुन्द की प्रसन्नता हेतु — इस पुस्तक का पूजन करें; और सम्यक् नीराजन (आरती) करने से (पुराण-)पूरण का फल प्राप्त होता है। (पाठभेद संभावित)

सोमेश्वर मया प्रोक्तं पुराणं धारयेत्सदा । मद्भक्त्या च युतो विप्रः पूज्यो भवति नित्यशः ॥ ८२ ॥ ज्येष्ठी तथान्तरज्येष्ठी चान्ये मल्लास्तु नित्यशः । पुराणं मल्लसंज्ञं हि शृणुयात् पूजयेच्च तत् ॥ ८३ ॥ श्रुतं भवति येनेदं श्रुतं तेन चराचरम् । अष्टादश पुराणानि श्रुतानि नात्र संशयः ॥ ८४ ॥
हिंदी अर्थ

हे सोमेश्वर! मेरे द्वारा कहा गया यह पुराण सदा धारण करो; मेरी भक्ति से युक्त विप्र नित्य पूजनीय होता है। ज्येष्ठी, अन्तर-ज्येष्ठी तथा अन्य मल्लों को भी 'मल्ल' नामक इस पुराण को नित्य सुनना और उसका पूजन करना चाहिए। जिसने इसे सुन लिया, उसने मानो चराचर जगत् को सुन लिया, और मानो अठारहों पुराण सुन लिए — इसमें कोई संशय नहीं।

इति श्रीमल्लपुराणे श्रीकृष्णसोमेश्वरसंवादे पुराणफलप्रशंसा अष्टादशोऽध्यायः ।

इति मल्लपुराणम् ।

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