मल्लपुराण
चर्चा
अध्याय ११

व्यायाम-क्रम और मर्दन (संवाहन)

पंचविध मल्ल-प्रकृति (अस्थिसार, मांससार, मेदसार आदि) के अनुसार भिन्न व्यायाम-क्रम (भ्रमणिका) का सिद्धांत यहाँ दिया गया है। 'ऊहापोह' के द्वारा प्रतिमल्ल के विरुद्ध रणनीति व मानसिक तैयारी को अभ्यास का अनिवार्य अंग माना गया है, और सत्रह प्रकार के गोनितक तथा तेरह प्रकार के मर्दन (संवाहन) से प्रशिक्षण एवं पुनःप्राप्ति दोनों का संतुलन स्थापित होता है।

पंचविध मल्ल और भ्रमणिका-क्रम

कथयाम्यन्यश्रवणं रमणाकमनुत्तमम् । तथाक्रमं प्रकुर्वीत मल्लाः पञ्चविधा अपि ॥ १ ॥ अस्थिसारो मांससारो मेदसारस्तथैव च । तथास्थिमांससारश्च चतुर्थकः प्रकीर्तितः ॥ २ ॥ पञ्चानां गुणभेदानां भिन्नभ्रमणिका स्मृता ॥ ३ ॥ तत्रास्थिसारमल्लेन पित्तसारेण तेन तु । प्रशस्तक्रमपूर्वं तु कर्तव्या भ्रमणिका सदा ॥ ६ ॥ मांससारेण वातेन संयुक्तेन यथा क्रमः । इति क्रमभ्रमणिका कर्तव्या सुखमिच्छता ॥ ७ ॥ तथैव मेदसारेण कफवातयुतेन ते । सदा गोणितककटिप्राणसंप्राणमेव च ॥ ८ ॥
हिंदी अर्थ

पांचों प्रकार के मल्लों (अस्थि, मांस, मेद, अस्थि-मांस, अस्थि-मेद) के लिए व्यायाम का क्रम अलग-अलग होता है। इसे 'भिन्न-भ्रमणिका' कहते हैं।

  • अस्थिसार (पित्त प्रकृति): इसे 'प्रशस्त-क्रम' (धीरे-धीरे और सावधानी से) भ्रमणिका करनी चाहिए।
  • मांससार (वात प्रकृति): इसे वात के अनुसार 'क्रम-भ्रमणिका' (लयबद्ध) करनी चाहिए।
  • मेदसार (कफ-वात): इसे 'गोनितक' (तकनीकी अभ्यास) और 'कटि-प्राण' (कमर का व्यायाम) पर जोर देना चाहिए ताकि मेद (चर्बी) घटे।
टीका

व्यक्तिगत प्रशिक्षण: यह आधुनिक "व्यक्तिगत प्रशिक्षण" का सिद्धांत है। हर शरीर के लिए एक ही व्यायाम-क्रम सही नहीं होता; प्रकृति (पित्त, वात, कफ-वात) के अनुसार भ्रमणिका का क्रम बदलता है।

इस श्लोक-समूह में मूल पाठ के कुछ पद-क्रमांक (४, ५) उपलब्ध नहीं हैं; उपलब्ध पाठ का ही अनुसरण किया गया है। (पाठभेद संभावित)

अष्टधा भवति प्राणं ... ॥ १० ॥ स्कन्धप्राणं भुजप्राणं तथैव च । ऊर्ध्वस्थायिकमेवैतत् प्राण एकादशात्मकः । अतः सर्वप्रकारेण श्रममेव सदाभ्यसेत् ॥ १२ ॥
हिंदी अर्थ

व्यायाम में प्राण (वायु/ऊर्जा) का संचार ८ या ११ प्रकार से होता है — स्कंध-प्राण, भुज-प्राण आदि। इसलिए सर्वदा श्रम का अभ्यास करना चाहिए।

टीका

मूल पाठ में इस समूह का दसवाँ पद अपूर्ण (लुप्तांश सहित) है; अर्थ उपलब्ध पाठ के आधार पर दिया गया है। (पाठभेद संभावित)

ऊहापोह और गोनितक-अभ्यास

ऊहापोहस्तु कर्तव्यः प्रतिमल्लसमागमे । यथा तथ्यं व्यक्तं शृणु अनुष्ठेयं च सर्वदा ॥ १३ ॥ ऊहापोहश्च कार्यस्तु प्राण अष्टविधस्तथा । कथं च धारयिष्यामि कथं स्थाप्यामि वा पुनः ॥ १४ ॥ कथं च धारयिष्यामि गमिष्यामि च वा कथम् । गृह्यते वा कथं ह्येष रक्ष्यते वा कथं परः ॥ १५ ॥ कथं प्रमाणं क्रियते कथं न क्रियतेऽपि वा ।
हिंदी अर्थ

प्रतिमल्ल (विपक्षी) के सामने आने पर (या उससे पहले) 'ऊहापोह' (तकनीकी विश्लेषण/रणनीति) करना चाहिए — "मैं इसे कैसे पकड़ूँगा? कैसे इसे स्थिर करूँगा? कैसे इसके पास जाऊँगा? यह मुझे कैसे पकड़ेगा और मैं कैसे बचूँगा? कैसे दाँव लगाऊँगा?"

टीका

मानसिक चित्रण: यह 'छाया-युद्ध' या मानसिक तैयारी है — युद्ध से पहले दिमाग में युद्ध लड़ना।

गुरुगोणितकाभेदाः श्रेष्ठाः सप्तदशापि वा ॥ १६ ॥ तानहं कथयिष्यामि यथायोग्यं तथाबलम् । प्रथमं च नमस्कृत्य कक्षायां जानुसंभवम् ॥ १७ ॥ क्रियते वामपार्श्वे तु दक्षिणेन पुनस्तथा । तथैव कुक्षिजानुभ्यां तले कृत्वा विधारणम् ॥ १८ ॥ धृतेनापि वशं तिष्ठेद्यतो याति तथा पुनः । उरसा धारणं तस्मात्ततो दण्डविधारणम् ॥ १९ ॥ पुनश्चैव तु जानुभ्यां तले हस्तविधारणम् । पुनरुच्चिष्ठविंशति (उत्थाय?) यथाशक्त्या समभ्यसेत् ॥ २० ॥ शिरसा धारणं चैव शिरसो हननं ततः । बाहुचालनमेवोक्तं चरणग्रहणमेव च ॥ २३ ॥ सर्वाङ्गे चालनं चैव भेदाः सप्तदश स्मृताः । गुरुगोणिताभ्यां चैव वर्धते प्राण उत्तमः ॥ २४ ॥
हिंदी अर्थ

सत्रह श्रेष्ठ 'गोनितक' (अभ्यास) —

  1. नमस्कार करके कांख (कक्षा) में घुटना लगाना।
  2. बाएं और दाएं करवट लेना (पार्श्व गति)।
  3. कुक्षि (पेट) और घुटने को जमीन पर टिकाना।
  4. छाती से दबाना (पिन करना)।
  5. दंड (बाहु) को पकड़ना।
  6. घुटनों के बल बैठकर हाथों को जमीन पर रखना (आधार बनाना)।
  7. बार-बार उठना और बैठना (दंड-बैठक जैसा)।
  8. सिर से दबाना (सिर नियंत्रण)।
  9. सिर से मारना (सिर-प्रहार अभ्यास)।
  10. बाहु-चालन (बाहु खींचना)।
  11. चरण-ग्रहण (पैर पकड़ना)।

...इस प्रकार पूरे शरीर को चलाने वाले सत्रह भेद हैं। गुरु (भारी) गोनितक से उत्तम प्राण बढ़ता है।

टीका

अभ्यास: ये 'कुश्ती के अभ्यास' हैं जो आज भी अखाड़ों में 'जोर' करने से पहले किए जाते हैं। बार-बार उठना-गिरना सहनशक्ति बढ़ाने के लिए है।

इस समूह में कुछ पद-क्रमांक (२१, २२) मूल में लुप्त हैं तथा 'पुनरुच्चिष्ठविंशति (उत्थाय?)' जैसे पाठ अनिश्चित हैं; उपलब्ध श्रेष्ठ पाठ का ही अनुसरण किया गया है। (पाठभेद संभावित)

त्रयः पीडनका भेदाः कथिता मल्लकर्मणि ॥ २७ ॥ तलहस्तविधारणं कक्षाधारणमेव च । भुजसंधिधारणं च त्रयः पीडनकेऽधमाः ॥ २८ ॥ प्राणं चतुर्धा भवति व्यक्तं पीडनकश्रमात् । कक्षाप्राणं च भवति प्राणं च करसंधिजम् ॥ २९ ॥ तलहस्तभवं प्राणं पादप्राणं भवत्यपि ॥ ३० ॥
हिंदी अर्थ

मल्ल-कर्म में तीन प्रकार के 'पीडन' (दबाव/पीड़ा के द्वारा वश में करना) कहे गए हैं —

  1. तलहस्त-विधारण (हथेली/कलाई मरोड़ना — कलाई पाश)।
  2. कक्षा-धारण (कांख दबाना)।
  3. भुज-संधि धारण (कोहनी/कंधे का जोड़ दबाना — संधि पाश)।

इनसे चार प्रकार का प्राण (पीड़ा/प्रतिक्रिया) व्यक्त होता है।

टीका

आत्मसमर्पण: ये तकनीकें विपक्षी को पीड़ा (सन्धि पर दबाव) देकर वश में करने के लिए हैं।

चतुर्विधं भवेत्प्राणं कुण्डकावर्तनश्रमात् ॥ ३४ ॥ जङ्घाप्राणं च प्रथमं कटिप्राणस्तथैव च । ... कुण्डकनर्तनाभ्यासात् सदा तेन समाचरेत् ॥ ३६ ॥ कर्करश्रमकायोगात्प्राणं चैव चतुर्विधम् ॥ ३६ ॥ तेन सर्वश्रमाणां तु ज्येष्ठी रङ्गश्रमोऽधिकः ॥ ४२ ॥
हिंदी अर्थ

कुंडकावर्तन: कुंडी/घेरे में घूमना (चक्कर लगाना)। इससे जंघा और कटि (कमर) का बल बढ़ता है।

कर्कर-श्रम: कंकड़/पत्थर पर चलना (पैर मजबूत करना) या भारी पत्थर उठाना (नाल/गर-नाल)।

सभी श्रमों में 'रंग-श्रम' (अखाड़े में अभ्यास-युद्ध) सबसे श्रेष्ठ है।

टीका

इस समूह में मध्यवर्ती पद लुप्तांश सहित हैं तथा क्रमांक ३६ दो बार आया है; उपलब्ध पाठ का ही अनुसरण किया गया है। (पाठभेद संभावित)

मर्दन (संवाहन) की तेरह विधियाँ

मर्दना भीमसेनी च दातव्या शत्रुमर्दिनी । अष्टौ गुणा भवन्त्येते शृणु वा कथयाम्यहम् ॥ ४३ ॥ श्वासहरा वृद्धिकरा तथा श्रमहाऽपि च । मेदोहरा प्राणकरा सुशरीरकराऽपि च ॥ ४४ ॥ तथोत्करकरी चैव तथाप्यायनकराऽपि (च) । देयास्थिमांससारस्य भीमसेनी च मर्दनी ॥ ४५ ॥ भीमसेनी च दातव्या मांससारस्य मर्दना ॥ ४८ ॥ तथा मांसास्थिसारस्य लघ्वी देया च मर्दना ॥ ५२ ॥ त्वग्रुधिरपुष्टिकरा प्रजाहादप्रदायिनी । बलकरा दीप्तिकरा चक्षुरारोग्यकारिणी ॥ ५३ ॥ कायाशोधकरा चैव कायामार्दवकारिका । मर्दनाय परा नास्ति कार्या सौष्ठवकारका ॥ ५४ ॥
हिंदी अर्थ

शत्रुओं को मसलने वाली 'भीमसेनी' संवाहन-विधि अस्थि-मांससार और मांससार मल्लों को देनी चाहिए।

भीमसेनी के आठ गुण: श्वास (थकान) हरना, वृद्धि करना, श्रम हरना, मेद (वसा) हरना, प्राण बढ़ाना, शरीर सुंदर करना, उत्कर (उभार) लाना और आप्यायन (तृप्ति) करना।

मांस-अस्थि सार वाले को 'लघ्वी' (हल्की) संवाहन-विधि देनी चाहिए। संवाहन से त्वचा, रक्त, बल, दीप्ति (चमक), नेत्र-ज्योति और कोमलता (लचीलापन) बढ़ती है। शरीर की शुद्धि और सौष्ठव के लिए संवाहन से बढ़कर कुछ नहीं है।

टीका

क्रीड़ा-संवाहन: संवाहन (अभ्यंग) पुनःप्राप्ति के लिए अनिवार्य है। यह शरीर के विषैले तत्वों को हटाता है और मांसपेशियों को लचीला बनाता है।

अस्थिगता मांसगता तथा मलगताऽपि वा । प्रथमा भीमसेनी च तथा नारायणी परा ॥ ५६ ॥ तृतीया चित्रिणी प्रोक्ता मसृणी च तथा परा । चेतःप्रकरा चैवेयं कथिता कैटभारिणा ॥ ५७ ॥ प्रथमा चरणे देया द्वितीया जानुनि न्यसेत् । तृतीया च करे देया मसृणी पट्टके तथा ॥ ५८ ॥ इत्यास्थिता त्रिदशधा कथिता मर्दना मया । कष्टं हरन्ति निःशेषजडत्वं यात्यसंशयम् ॥ ६१ ॥ श्रमवानसि वातीति मांसस्य मर्दको भवेत् । भीमसेना च मल्लानां देया (या) नारायणी शृणु ॥ ६२ ॥ चित्रिणी बालवृद्धानां तैलाभ्यङ्गेषु मर्दनी । धातुपञ्चकपर्यन्तं जानुपादविमर्दनम् । सा ज्ञेया नारायणी चासौ मर्दना सुखहेतवे ॥ ६४ ॥ करस्तु केवलं यत्र दद्यात्त्वङ्मांसमर्दना । सा मर्दना प्रयत्नेन चित्रिणी कथिता बुधैः ॥ ६५ ॥ तैलाभ्यङ्गे पटे नैव मसृणी त्वस्थिमर्दना । व्यायामः कफनाशाय वातनाशाय मर्दनी । स्नानं च पित्तनाशाय तेन मल्ला महाबलाः ॥ ६८ ॥
हिंदी अर्थ

चार प्रमुख संवाहन — १. भीमसेनी, २. नारायणी, ३. चित्रिणी, ४. मसृणी।

  • भीमसेनी: यह मल्लों के लिए है (गहरा संवाहन); चरणों (पैरों) में की जाती है।
  • नारायणी: घुटनों और पाँच धातुओं तक (गहरी) की जाती है; सुख देने वाली है।
  • चित्रिणी: केवल हाथों से त्वचा और मांस का संवाहन; यह बच्चों और वृद्धों के लिए है (कोमल)।
  • मसृणी: तेल लगाकर कपड़े (पट्ट) से रगड़ना (घर्षण-संवाहन); यह हड्डियों तक प्रभाव करती है।

कुल तेरह प्रकार का संवाहन कहा गया है, जो जकड़न को हरता है।

सूत्र: व्यायाम से कफ नाश होता है, संवाहन से वात नाश होता है, और स्नान से पित्त नाश होता है। इससे मल्ल महाबली बनते हैं।

टीका

इस दीर्घ समूह में कई मध्यवर्ती पद-क्रमांक (५५, ५९–६०, ६३, ६६–६७) मूल में क्रमविच्छिन्न हैं तथा 'देया (या)' जैसे स्थल अनिश्चित हैं; उपलब्ध श्रेष्ठ पाठ का ही अनुसरण किया गया है। (पाठभेद संभावित)

इति श्रीमल्लपुराणे सामान्यमर्दनं नाम एकादशोऽध्यायः ।

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