मल्लपुराण
चर्चा
अध्याय १७

जय-युद्ध, छडकी और विज्ञान

जय-युद्ध की व्यवस्था, जोड़ी बनाने की न्याय-विधि और राजा द्वारा पुरस्कार-वितरण का वर्णन। छडकी, बाहु-चलन, मुहड़, फणा व भङ्ग जैसे तकनीकी पदों की सूची देकर यह अध्याय मल्लभाषा का तकनीकी कोश प्रस्तुत करता है। कुछ खंड पांडुलिपि में अनुपलब्ध होने पर भी उपलब्ध श्लोकों से प्रशिक्षण, आयोजन और तकनीक का ढाँचा स्पष्ट होता है।

जय-युद्ध व जोड़ी की न्याय-विधि

त्रीण्येव जययुद्धानि भवन्ति मल्लसङ्गरे । अप्राणयतना चैव तथैव श्रमपातना ॥ १ ॥ ज्येष्ठी च ज्येष्ठिना चैव योधयेद् विचारयेत् । अन्तरज्येष्ठिना सार्धमन्तरज्येष्ठिनं न्यसेत् ॥ २ ॥ गोपकुलो योजनीयः समं गोपकुलेन च । भविष्यश्च भविष्येण बालको बालकेन च ॥ ३ ॥ वृद्धो वृद्धेन सार्धं च योजयेन्न्यायतो नृपः । यो येन संहतस्तस्य करोति धारणं यथा ॥ ४ ॥ स तथा तेन संयोज्यस्ततो युद्धं प्रवर्तते । ततश्च कौतुकं राजा राजभृत्यकुमारकाः ॥ ५ ॥ अमात्याः सर्वलोकाश्च पश्यन्ति युद्धकौतुकम् । जिते प्रसादे द्विगुणं हारिते च तदर्धकम् ॥ ६ ॥ उभयोः सदृशं युद्धं प्रसादं सदृशं ददेत् । संतोषसदृशं वापि दत्त्वा मल्लांश्च विस्तरान् ॥ ७ ॥ राजापि च ततो गच्छेत्स्वकीयं मन्दिरं वरम् । अनेन विधिना सर्वमेकादशाहयो घुयात् (युद्ध्यात्) ॥ ८ ॥
हिंदी अर्थ

मल्ल-संग्राम में तीन प्रकार के जय-युद्ध होते हैं —

१. अप्राण-यतन (तकनीकी जीत), २. श्रम-पातन (थकाकर हराना), और ३. (तीसरा पद पांडुलिपि में स्पष्ट नहीं)।

राजा को न्यायपूर्वक समान जोड़ी बनानी चाहिए —

  • ज्येष्ठी बनाम ज्येष्ठी
  • अन्तरज्येष्ठी बनाम अन्तरज्येष्ठी
  • गोपकुल बनाम गोपकुल
  • भविष्य बनाम भविष्य
  • बालक बनाम बालक
  • वृद्ध बनाम वृद्ध

जो जिसके बराबर (संहत) हो, उसे उसी के साथ लड़ाना चाहिए। राजा, मंत्री और समस्त जन युद्ध का कौतुक देखें। जीतने वाले को हारने वाले से दोगुना प्रसाद (धन/ईनाम) दिया जाए; यदि युद्ध बराबर रहे तो दोनों को समान ईनाम दिया जाए। इस विधि से ग्यारह दिन तक युद्ध कराना चाहिए।

टीका

निष्पक्ष खेल: भार, आयु और कौशल के अनुसार जोड़ी बनाना ही 'धर्म-युद्ध' है; असमान जोड़ी अन्याय है। ज्येष्ठी, अन्तरज्येष्ठी, गोपकुल, भविष्य, बालक और वृद्ध — ये मल्लों की श्रेणियाँ हैं, जिन्हें समान-से-समान भिड़ाने पर ही स्पर्धा में मर्यादा बनी रहती है। पुरस्कार-न्याय (जय पर द्विगुण, समता पर समान) आयोजन में सम्मान और सन्तोष दोनों को साधता है।

प्रथम श्लोक में तीसरा जय-युद्ध-पद तथा अन्तिम पंक्ति का "घुयात् / युद्ध्यात्" पद पांडुलिपि में अस्पष्ट है (पाठभेद संभावित)।

(पांडुलिपि में श्लोक ९–३२ का पाठ अनुपलब्ध / अस्पष्ट है; अतः अगला उपलब्ध खंड श्लोक ३३ से आरम्भ होता है।)

छडकी व बाहु-चलन

राजा चैव छडकी तथा । (पाठ लुप्त) करडकी च विख्याता अधोमुखछडक्यपि ॥ ३३ ॥ करचरणछडकी विख्याता कथिता बुधैः । या छडकी विख्याता कृष्णेन परमेष्ठिना ॥ ३४ ॥ उत्तानकरयोश्चैव प्रथमं परिकीर्तितम् । षट्छडका एते कृष्णेन त्रयोदश प्रकीर्तिताः ॥ ३५ ॥
हिंदी अर्थ

(छडकी के भेद) — १. कर-डकी (हाथ से गिराना), २. अधोमुख-छडकी (नीचे की ओर गिराना), ३. कर-चरण छडकी (हाथ-पैर का संयुक्त दांव)। इस प्रकार कृष्ण द्वारा तेरह प्रकार की 'छडकी' कही गई हैं।

टीका

छडकी: यह संभवतः गुजराती शब्द 'छांट' या 'टांग' से संबंधित है, जिसका अर्थ है पैर अड़ाकर गिराना (ट्रिपिंग)। ये मल्लविद्या के पाद-प्रधान दांव हैं, जिनका उद्गम इस परम्परा में स्वयं कृष्ण से जोड़ा जाता है।

श्लोक ३३ के आरम्भ में एक पंक्ति पांडुलिपि में लुप्त है, तथा 'षट्छडका / त्रयोदश' की संख्या-गणना में पाठ-असंगति दिखती है (पाठभेद संभावित)।

तथा बाहुचलनं च प्रज्ञानं परमं मतम् । अर्द्धाङ्गबाहुचलनं कृष्णेन विनिवेशितम् ॥ ३६ ॥ जङ्घाबाहुचलनं च परं विज्ञानमुत्तमम् । उत्तरबाहुचलनं तथैव परमं मतम् ॥ ३७ ॥ उत्तरेङ्गे करे चैव बाहुचलनमुत्तमम् । उत्तरबाहुचलनं कृष्णेन रचितं पुरा ॥ ३८ ॥ उत्तानचालनं चैव विज्ञानं परमं मतम् । करपादढोकरेण बाहोश्चालनमिष्यते ॥ ३९ ॥ एवं बुधैर्द्वादशधा संख्यायाः परिकीर्तितम् । विज्ञानं बाहुचलनं मल्लानां हितकाम्यया ॥ ४० ॥
हिंदी अर्थ

बाहु-चलन (हाथों के पैंतरे) बारह प्रकार के हैं — १. अर्धांग-बाहुचलन, २. जंघा-बाहुचलन (जांघ पर हाथ चलाना), ३. उत्तर-बाहुचलन (ऊपरी हाथ का चलन), ४. उत्तान-चालन (उलटे हाथ का चलन), ५. कर-पाद ढोकर (हाथ-पैर का धक्का) — इत्यादि। बुधजनों ने मल्लों के हित के लिए इसे बारह प्रकार का बतलाया है।

टीका

हस्त-कौशल: यह 'हस्त-युद्ध' है, जो कुश्ती में पकड़ बनाने के लिए किया जाता है। बाहु-चलन के ये बारह भेद हाथों की गति, दिशा और धक्का-मरोड़ का शास्त्रीय वर्गीकरण हैं, जिनका आधार स्वयं कृष्ण की रचना बताई गई है।

मुहड़, गण्ड व फणा

शिरसो मुहडाश्चैव हस्तयोर्मुहडस्तथा । तथैवोदरमुहडं बहिर्मुहडमुच्यते ॥ ४१ ॥ उदरलग्नमुहडं द्विविधं मुहडं तथा । शुद्धगण्डं तथैवादौ स्थितिविज्ञानमुत्तमम् ॥ ४२ ॥ क्षाले चैव हि विज्ञेयं गण्डरादित्यमेव च । उदरं गण्डशब्दं च तृतीयमिह लक्ष्यते ॥ ४३ ॥ कूष्माण्डे पुनरादित्ये चतुर्थमपरं मतम् । पृष्ठगण्डरादित्यं पञ्चमं परिकीर्तितम् ॥ ४४ ॥
हिंदी अर्थ

मुहड़ (एक विशिष्ट भिड़न्त-दांव) के भेद — १. शिर का मुहड़, २. हाथों का मुहड़, ३. उदर (पेट) का मुहड़, ४. बहिर्-मुहड़ (बाहर से हमला), ५. उदर-लग्न मुहड़।

गण्ड के भेद — १. शुद्ध गण्ड, २. गण्डरादित्य, ३. उदर-गण्ड, ४. कूष्माण्ड (कूष्माण्डादित्य), ५. पृष्ठ-गण्ड (पृष्ठगण्डरादित्य)।

टीका

शब्दावली: 'मुहड़' और 'गण्ड' संभवतः देशज (लोक) शब्द हैं, जो विशिष्ट कुश्ती-दांवों के लिए प्रयुक्त होते थे। शरीर के अंग-भेद (शिर, हस्त, उदर, पृष्ठ) के अनुसार इनका नामकरण किया गया है, जिससे मल्लभाषा का व्यावहारिक कोश बनता है (पाठभेद संभावित)।

विज्ञानमुत्तमं चैव कृष्णेन रचितं पुरा । प्रथमं चलपादं च बाहोश्चलनमिष्यते ॥ ४५ ॥ करतलयोश्चालनं च कृष्णेन कथितं शुभम् । कक्षाफणापि विदिता विज्ञानं परमार्थतः ॥ ४६ ॥ तथैव चलफणाच्च त्रिमुखला फणापि च । संधिफणा ग्रन्थिता च नवधा कथिता फणा ॥ ४७ ॥ कृष्णेन च ततो मल्लैर्योद्धव्या विजयार्थिभिः । लोभी पापी च विज्ञेयो तथा च जलपाच्यपि ॥ ४८ ॥
हिंदी अर्थ

कृष्ण ने नौ प्रकार की 'फणा' (जकड़/पाश) रची हैं — १. चल-पाद फणा, २. बाहु-चलन फणा, ३. करतल-चालन, ४. कक्षा-फणा (कांख की पकड़), ५. चल-फणा, ६. त्रिमुखला फणा, ७. संधि-फणा (जोड़ पर पाश), ८. ग्रन्थिता (गांठ लगाना) — इत्यादि। विजय के अभिलाषी मल्लों को इनसे युद्ध करना चाहिए।

टीका

फणा: जैसे सर्प फन फैलाकर शिकार को जकड़ता है, वैसे ही यह जकड़ने वाली तकनीक है। 'संधि-फणा' का आशय संधि-बंधन (जोड़ पर बंध) जैसी पकड़ से है, और 'ग्रन्थिता' का अर्थ गाँठ-सी कस देने वाला पाश। ये पकड़-प्रधान दांव प्रतिद्वंद्वी को स्थिर कर विजय का मार्ग खोलते हैं।

भङ्ग व चतुःषष्ट्यधिक-शत विज्ञान

करचरणतृतीयो मल्लानां च जयप्रदः । दृग्भङ्गो मध्यभङ्गश्च पृष्ठभङ्गस्तृतीयकः ॥ ४९ ॥ बहिर्भङ्गश्चतुर्थोऽपि चतुर्धा भङ्गलक्षणम् । उरोदेशमुष्टिरियं नानाथ सुभगा पुरा ॥ ५० ॥ पृष्टिधनुरपि द्वन्द्वैय कथिता च मयाऽधुना । गलकर्तरी प्रथमा द्वितीया हस्तकर्तरी ॥ ५१ ॥ रागकर्तरी तृतीया चतुर्थी बहिःकर्तरी । कट्योः पीडनं प्रोक्तं प्रकोष्ठपीडनं तथा ॥ ५२ ॥ ग्रीवायाः पीडनं चैव विज्ञानं भुजमुत्तमम् । उरोभागबहिर्भारमङ्गभारस्तथा परः ॥ ५३ ॥ गजार्गलमिति ख्यातो वेगः करतलस्य च । उरोगण्डगुला चैव ऊर्ध्वगण्डगुला परा ॥ ५४ ॥ चाणूरकः परमो भारष्टकश्च परः स्मृतः । मुष्टिकाख्यो सुरस्तेहगगनानापरस्तथा ॥ ५५ ॥ नदीबिन्दुपसे गुप्तः कथितः पुंगवोऽपि च । कृष्णश्च सर्वमल्लाश्च पश्यन्ति विधिपूर्वकम् । विज्ञानानि दर्शनानि चतुःषष्ट्यधिकं शतम् ॥ ५६ ॥
हिंदी अर्थ

भङ्ग (अंग-भंग / तोड़): १. दृग्-भंग (ग्रीवा-भंग), २. मध्य-भंग (कमर तोड़ना), ३. पृष्ठ-भंग, ४. बहिर्-भंग — इस प्रकार भङ्ग चार प्रकार का है।

अन्य दांव: उरोदेश-मुष्टि, पृष्टि-धनु (पीठ का धनुष), गल-कर्तरी (गले पर कैंची), हस्त-कर्तरी (हाथ की कैंची), राग-कर्तरी, बहिः-कर्तरी।

पीडन (मरोड़): कटि-पीडन, प्रकोष्ठ-पीडन (कलाई मरोड़ना), ग्रीवा-पीडन (गर्दन मरोड़ना)।

गजार्गल (हाथी जैसी सांकल/अवरोध), करतल-वेग, उरो-गण्ड-गुला, ऊर्ध्व-गण्ड-गुला, चाणूरक, भारष्टक, मुष्टिक आदि भी कहे गए हैं। इस प्रकार कृष्ण व सभी मल्लों के समक्ष विधिपूर्वक एक सौ चौंसठ (चतुःषष्ट्यधिक-शत) विज्ञान (तकनीकें) प्रदर्शित की गईं।

टीका

घातक विज्ञान: 'कर्तरी' (कैंची) का अर्थ है पैरों या हाथों से कैंची लगाकर दबाना; 'भंग' का अर्थ अंग या अस्थि को तोड़ना; और 'गजार्गल' एक शक्तिशाली अवरोध या लॉक है। ये युद्ध-भूमि की तकनीकें हैं, जिनका अभ्यास कठोर संयम और गुरु-निर्देश के अन्तर्गत ही किया जाता है।

श्लोक ५१–५६ के अनेक तकनीकी नाम (जैसे 'सुरस्तेहगगनाना', 'नदीबिन्दुपसे') पांडुलिपि में दूषित हैं और यहाँ यथासंभव शुद्ध पाठ के साथ दिए गए हैं (पाठभेद संभावित)। कुल संख्या 'चतुःषष्ट्यधिकं शतम्' अर्थात् एक सौ चौंसठ विज्ञान इस अध्याय का सार-कथन है।

इति श्रीमल्लपुराणे विज्ञानप्रकरणं नाम सप्तदशोऽध्यायः ।

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