मल्लपुराण
चर्चा
अध्याय १२

स्वास्थ्य और त्रिदोष निवारण

वात, पित्त और कफ — त्रिदोष के प्रकोप के कारण, लक्षण और निवारण मल्ल-स्वास्थ्य के संदर्भ में बताए गए हैं। श्रम, आहार, चेष्टा, जागरण और ऋतु-प्रभाव से दोष कैसे बढ़ते हैं यह व्यावहारिक रूप से समझाकर, स्नेहन, अभिषेक, औषधि व रक्त-मोक्षण जैसी उपचार-विधियों से आरोग्य को मल्लविद्या का आधार बताया गया है।

शरीर-पुष्टि और वात-प्रकोप

द्वादशोऽध्यायः । प्राणसाध्यो जयो युद्धे प्राणश्चाङ्गविमर्दनात् । श्रमः शरीरसाध्योऽयं शरीरं पुष्टिकारणम् ॥ १ ॥ अतः शरीरपुष्ट्यर्थमुपायं कथयाम्यहम् । उचिताहारचेष्टां तु यथा पुष्टिः प्रजायते ॥ २ ॥ वातपित्तकफानां तु प्रकोपो (ष्ठे) तेन लक्ष्यते । तत्र प्रकुप्यति वातः प्रकारैः षोडशात्मभिः ॥ ३ ॥ आम्लतिक्तकषायाणां कटुकानां च सेवनात् । मध्यमानां सर्वाङ्गानां वेगसंधारणादपि ॥ ४ ॥ व्यायाम(मात्) आसनाच्चैव तथा जलतरणादपि । बलवृद्धिकराच्चैव तथा जागरणादपि ॥ ५ ॥ सामान्यमन्नशाकादिभोजनैश्च विशेषतः । मेघोद्गमनकाले च जीर्णवस्त्रस्तथैव च ॥ ६ ॥ इति षोडशधा चैव जन्तोर्वातः प्रकुप्यति । इति क्षीयं (ज्ञेयं) प्रयत्नेन यथा सुखमवाप्नुयात् ॥ ७ ॥
हिंदी अर्थ

युद्ध में जय 'प्राण' (सहनशक्ति) से मिलती है, प्राण अंगों के संवाहन से बढ़ता है। श्रम शरीर से सधता है, और शरीर ही पुष्टि (विकास) का कारण है। इसलिए मैं शरीर की पुष्टि का उपाय और उचित आहार-चेष्टा कहता हूँ।

शरीर में वात, पित्त और कफ का प्रकोप होता है। वात सोलह कारणों से कुपित होता है —

  1. खट्टे, तीखे, कसैले और कड़वे पदार्थों के सेवन से।
  2. मल-मूत्र के वेग को रोकने से।
  3. अत्यधिक व्यायाम से, आसनों से, तैरने से।
  4. बल बढ़ाने वाले कार्यों से, रात्रि-जागरण से।
  5. रूखा-सूखा अन्न/शाक खाने से।
  6. बादलों के आने पर (बरसात में) और फटे-पुराने (ठंडे) वस्त्र पहनने से।

इन सोलह कारणों से वात बढ़ता है, जिससे शरीर में पीड़ा और जकड़न होती है। मल्ल को इनसे बचना चाहिए।

टीका

पुनःप्राप्ति: अत्यधिक व्यायाम और जागरण (नींद की कमी) से 'वात' बढ़ता है, जो तंत्रिका-तंत्र को कमजोर करता है।

मूल पाठ में 'प्रकोपो (ष्ठे)', 'व्यायाम(मात्)' तथा 'क्षीयं (ज्ञेयं)' जैसे स्थल अनिश्चित हैं; उपलब्ध श्रेष्ठ पाठ का ही अनुसरण किया गया है। (पाठभेद संभावित)

अथ वातप्रकोपस्य लक्षणं कथयाम्यहम् । शिरसश्च तथा वाते वातश्च श्रोत्रयोरपि ॥ ८ ॥ नेत्रयोर्हृदये चैव हनुदेशे तथैव च । स्कन्धयोरङ्गसंधौ च जायते च दिवानिशम् ॥ ९ ॥ भुजयोश्चैव जंघायां सङ्कोचमपि जायते । श्रमः (भ्रमः) कम्पस्तथा स्वेदः स्नेहः पृष्ठोदरेषु च ॥ ११ ॥ बृंहणं (तर्पणं?) कक्षयोश्चैव नाभिदेशे तथैव च । गुह्ये चैव तथापाने तथा पृष्ठे (क)क्षयोरपि ॥ १२ ॥ एतेष्वङ्गेषु मल्लानां विकारात् रुक् प्रजायते । गात्रं (अल्पं) भवति चापल्यं त्वक्पारुष्यं च जायते । अग्निविषमता चैव लक्ष्यन्ते वायुलक्षणम् ॥ १३ ॥
हिंदी अर्थ

वात प्रकोप के लक्षण — सिर, कान, नेत्र, हृदय और जबड़े (हनु) में पीड़ा; कंधे और जोड़ों में दिन-रात पीड़ा; भुजाओं और जांघों में संकोच (ऐंठन); भ्रम (चक्कर), कंपन, पसीना; पीठ, पेट, कांख, नाभि, गुदा और जननांगों में पीड़ा (रुक्); शरीर में चंचलता, त्वचा का रूखापन, और अग्नि-विषमता (पाचन की अनियमितता)।

टीका

ऐंठन: वात बढ़ने से मांसपेशियों में ऐंठन और कंपकंपी होती है, जो एक यौद्धिक अभ्यासी के लिए घातक है।

इस समूह में दसवाँ पद-क्रमांक लुप्त है तथा 'श्रमः (भ्रमः)', 'बृंहणं (तर्पणं?)' आदि पाठ अनिश्चित हैं; उपलब्ध श्रेष्ठ पाठ का ही अनुसरण किया गया है। (पाठभेद संभावित)

वात व पित्त की चिकित्सा

वातप्रशमनोपायं संप्राप्तं कथयाम्यहम् । स्नेहनेनाभिषेकश्च नित्यं चोपक्रमादपि ॥ १४ ॥ मन्थादिमं मांसमयं ध्रुवं वातप्रशान्तये । दातव्यं भेषजं पश्चादुपवासादनन्तरम् ॥ १५ ॥ रक्षा च त्रिफलाभिश्च रेचना च अपि स्मृतम् ॥ १६ ॥ रुधिरस्रावमपि च घृतं दुग्धं च शर्करा । पित्तप्रशमनं चैव मल्ले कर्तव्यमुत्तमम् ॥ १७ ॥ एलया सितया मिश्रं पयःखण्डेन योजितम् । सप्तरात्रप्रयोगेण पित्तं नाशयति ध्रुवम् ॥ १८ ॥
हिंदी अर्थ

वात चिकित्सा: नित्य स्नेहन (तैल-संवाहन) और अभिषेक (धारा गिराना); मांस-रस और मंथ (सत्तू) का सेवन; उपवास के बाद औषधि (त्रिफला/रेचन) देना।

पित्त चिकित्सा: रक्त-मोक्षण, घी, दूध और शक्कर का सेवन। इलायची, मिश्री और दूध का मिश्रण सात दिन तक पीने से पित्त निश्चित ही शांत होता है।

टीका

शीतलता: पित्त (गर्मी/सूजन) को शांत करने के लिए ठंडी चीजें (दूध, घी, शक्कर) बताई गई हैं।

कफ-प्रकोप और निवारण

बहुमण्डजलाहारैर्मधुरैश्चातिशीतलैः । दधिदुग्धनवान्नैश्च तथैव च नदोदकैः ॥ २० ॥ ... लवणेन दिवास्वापात्तथैव विषमासनात् । एतैः प्रकारैश्चान्यैश्च कफः कुप्यति न संशयः ॥ २२ ॥ कथ्यन्ते लक्षणान्यत्र कफकोपभवानि च । अङ्गस्य गौरवं चैव तथाग्नेरपि मन्दता ॥ २३ ॥ हृदयस्य सदा क्लेशो सुखं चैव प्रशुप्यति (प्रलिप्यति) । मुखे मधुरता चैव तथालस्यमपि ध्रुवम् ॥ २४ ॥ अतिकासप्रभावेऽपि तथैव चक्षुःपाण्डुता । ... कण्ठोष्ठरसनास्वेदो दन्तमूलेषु तत्क्षणम् ॥ २७ ॥ विज्ञाय लक्षणैरेतैः श्रमं कुर्वन्ति तत्क्षणम् ॥ २८ ॥ नाशश्चैव प्रकर्तव्यः शुद्धोष्णोदकवारिणा । आर्द्रकं च निकटु कर्म (कटुकं?) दयित्वा (खादित्वा) प्रयत्नतः ॥ २९ ॥ हिंगु सौवर्चलं शुण्ठी दाडिमं मुस्तसंयुतम् । उष्णेन वारिणा पीतं हृद्रोगश्वासकासनुत् ॥ ३२ ॥
हिंदी अर्थ

कफ के कारण: बहुत पानी पीना, मीठा, ठंडा, दही, दूध, नया चावल, नदी का पानी, नमक, और दिन में सोना

लक्षण: शरीर का भारीपन, मंदाग्नि (धीमा चयापचय), हृदय में भारीपन, मुंह का स्वाद मीठा होना, आलस्य, बहुत खांसी, आंखों में पीलापन/सफेदी, नींद और सुस्ती।

चिकित्सा: कफ के लक्षणों को जानकर तुरंत श्रम (व्यायाम) करना चाहिए और शुद्ध गर्म पानी पीना चाहिए। अदरक, सोंठ (निकटु/त्रिकटु), हींग, काला नमक (सौवर्चल), अनार (दाडिम) और नागरमोथा (मुस्त) को गर्म पानी के साथ पीने से हृदय-रोग, दमा और खांसी दूर होती है।

टीका

वजन घटाना: कफ (वसा) को घटाने के लिए 'गर्म पानी' और 'व्यायाम' सबसे अचूक उपाय हैं।

इस दीर्घ समूह में कई मध्यवर्ती पद-क्रमांक (२१, २५–२६, ३०–३१, ३३) मूल में क्रमविच्छिन्न हैं तथा लुप्तांश व अनिश्चित पाठ हैं; उपलब्ध श्रेष्ठ पाठ का ही अनुसरण किया गया है। (पाठभेद संभावित)

इति श्रीमल्लपुराणे वातपित्तकफनाशकप्रकरणं नाम द्वादशोऽध्यायः ।

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