मल्लपुराण
चर्चा
अध्याय १४

विजय के प्रकार और मध्यम/अधम मल्ल लक्षण

विजय के बारह प्रकार क्रम से बताते हैं कि जीत मन, व्यायाम, अग्नि, आहार-परिणाम, बल, प्राण, पराक्रम, क्रम व लाघव से होकर 'सर्व-जय' तक पहुँचती है। ब्रह्मचर्य-संबंधी निषेध, बत्तीस 'गर्भशूर' तथा मध्यम व अधम मल्लों के दोषों का वर्णन चरित्र-निर्माण की दृष्टि से किया गया है — पतन का कारण केवल शारीरिक दुर्बलता नहीं, अपितु दोष, भय, असंयम व मिथ्या-गर्व भी है।

विजय के बारह प्रकार

चतुर्दशोऽध्यायः । जयश्च सर्वमल्लानां युद्धे द्वादशधा भवेत् । उद्यमे विजयः कोऽपि व्यायामे विजयस्तथा ॥ १ ॥ अग्निजयस्तथाहारपरिणामजयस्तथा । बलजयः प्राणजयः पराक्रमजयोऽपि च ॥ २ ॥ तथा जयश्च क्रमणे लाघवेऽपि जयस्तथा । जयोऽपि सर्वसामान्यः ख्यातः सर्वजयोऽपि च ॥ ३ ॥ उद्यमो मानसो जातो व्यायामोऽप्युन्मदाद्भवेत् । व्यायामादग्निसंपत्तिरग्निराहारसंभवः ॥ ४ ॥ आहारात्परिणामस्तु परिणामाद्बलं तथा । बलादपि भवेत्प्राणः प्राणादपि पराक्रमः ॥ ५ ॥ पराक्रमादर्थक्रमः क्रमाल्लाघववानपि । लाघवाज्जायते त्राणं त्राणात्सर्वजयो भवेत् ॥ ६ ॥
हिंदी अर्थ

युद्ध में मल्लों की विजय बारह प्रकार की होती है — और यह एक क्रमिक प्रक्रिया है:

१. उद्यम-जय: मानसिक संकल्प। २. व्यायाम-जय: अभ्यास में सफलता। ३. अग्नि-जय: अच्छी पाचन शक्ति। ४. आहार-परिणाम जय: भोजन का शरीर में लगना (अवशोषण)। ५. बल-जय: शक्ति प्राप्त करना। ६. प्राण-जय: दम/सहनशक्ति बढ़ाना। ७. पराक्रम-जय: साहस। ८. क्रमण-जय: सही तकनीक/क्रम। ९. लाघव-जय: शरीर में फुर्ती/हल्कापन। १०. त्राण-जय: बचाव/सहनशक्ति। ११. सर्व-सामान्य जय: सामान्य जीत। १२. सर्व-जय: पूर्ण विजय।

क्रम: मानसिक उद्यम से व्यायाम होता है → व्यायाम से जठराग्नि → अग्नि से आहार पचता है → आहार से बल → बल से प्राण → प्राण से पराक्रम → पराक्रम से अर्थ/क्रम → क्रम से लाघव → लाघव से त्राण → त्राण से सर्वजय।

टीका

सफलता का सूत्र: यह श्लोक बताता है कि जीत केवल अखाड़े में नहीं, बल्कि मन और पेट (पोषण) से आरम्भ होती है। संकल्प, अभ्यास, पाचन और पोषण की यह शृंखला ही अंततः पूर्ण विजय तक पहुँचाती है।

वर्जित स्त्रियाँ व बत्तीस गर्भशूर

अतो मल्लैः प्रयत्नेन त्याज्या एव दश स्त्रियः । द्विजपत्नी परपत्नी गुरुपत्नी च सर्वदा ॥ ७ ॥ राजपत्नी कुमारी च गोत्रिणी च व्रते स्थिता । अर्धशूरस्तथोर्ध्वं च प्राणशूरस्तथाधिकः ॥ ८ ॥ अप्राणशूर एवान्याः शूराः सर्वे भवन्त्यपि । तथावासिकशूरा येर्वारो भग्नशूरकः ॥ ९ ॥ अभग्नशूरकोऽप्यन्यः श्रमशूरस्तथा परः । तथा चाश्रमशूरोऽपि युद्धशूरपरोऽपि च ॥ १० ॥ अयुद्धशूरः कोऽपि स्यात् शूरोऽपि सहजेन च । गर्भशूरा भवन्त्येते द्वात्रिंशत्संख्यया स्फुटम् ॥ ११ ॥
हिंदी अर्थ

मल्लों को दस प्रकार की स्त्रियों का त्याग (संसर्ग-निषेध) करना चाहिए — ब्राह्मण की पत्नी, पराई स्त्री, गुरु-पत्नी, राज-पत्नी, कुमारी, अपने गोत्र की स्त्री, और व्रत धारण करने वाली स्त्री (ब्रह्मचर्य खंडित होने और सामाजिक पतन के भय से)।

बत्तीस शूर (गर्भशूर): अर्ध-शूर, ऊर्ध्व-शूर, प्राण-शूर, अप्राण-शूर, आवासिक-शूर (घर का शेर), भग्न-शूर, अभग्न-शूर, श्रम-शूर (व्यायाम में वीर), अश्रम-शूर, युद्ध-शूर, अयुद्ध-शूर (बातों का वीर), सहज-शूर — इस प्रकार ये बत्तीस प्रकार के शूर (योद्धा) जन्मजात या स्वभाव से होते हैं।

टीका

मूल में दस वर्जित स्त्रियों की सूची में से अंतिम तीन के नाम लुप्त हैं (पाठभेद संभावित)। यह संसर्ग-निषेध ब्रह्मचर्य-भंग और सामाजिक पतन के भय से बताया गया है। तदुपरान्त बत्तीस 'गर्भशूर' — जन्मजात अथवा स्वभावगत योद्धाओं — के प्रकार का वर्णन आरम्भ होता है, जो आगे मध्यम व अधम मल्लों के लक्षणों की भूमिका बनाता है।

मध्यम व अधम मल्ल के लक्षण

उत्तमाः कथिताश्चैवं कथयामि च मध्यमाः । षत्रिंशन्मध्यमाश्च कथ्यन्ते क्रमशो गताः ॥ १२ ॥ श्वेतशूरो भवेत्कश्चिद् दृष्टिभीरुस्तथा परः । सभाशूरोऽपि भवति कोऽपि दैवात्स्वभावतः ॥ १३ ॥ अज्ञाने भीरुकः कश्चिद्भवेदपि यथा तथा । वाक्यशूरस्तथा हस्तमेलने भीरुरेव च ॥ १४ ॥ अङ्गशूरकः कश्चिद्बाह्वोः स्फालनभीरुकः । स्थानशूरो भवेदन्यो आस्थाने भीरुरेव च ॥ १५ ॥ अङ्गभीरुस्तथा कोऽपि तथा शूरस्तथैव च । स्थानके शूर एव स्याद्भीरुर्विज्ञानकेऽपि च ॥ १६ ॥ विज्ञानशूरो भीरुश्च कोऽप्यविज्ञानकर्मणि । प्राणशूरो रक्षाभीरुश्चलने भीरुरेव च ॥ १७ ॥
हिंदी अर्थ

उत्तम मल्ल कहे जा चुके हैं। अब मैं छत्तीस प्रकार के मध्यम मल्लों को क्रम से कहता हूँ —

१. श्वेतशूर (दिखावटी वीर), २. दृष्टिभीरु (आँख न मिला सकने वाला), ३. सभाशूर (भीड़ में शेर, अकेले में डरपोक), ४. अज्ञान-भीरु (अनजान स्थिति से डरने वाला), ५. वाक्यशूर (बातों का शेर), ६. हस्त-मेलन भीरु (हाथ मिलाने/भिड़ने से डरने वाला), ७. अंगशूर (जिसका शरीर तो वीर जैसा हो), ८. बाहु-स्फालन भीरु (जाँघ ठोकने/चुनौती देने से डरने वाला), ९. स्थानशूर (अपने इलाके का शेर), १०. आस्थान-भीरु (अखाड़े में डरने वाला), ११. अंगभीरु (चोट लगने से डरने वाला), १२. स्थानक-शूर (पैंतरे में अच्छा) पर विज्ञान-भीरु (तकनीक में कच्चा), १३. विज्ञान-शूर (तकनीक जानने वाला) पर अविज्ञान-कर्म (अनजान दाँव) से डरने वाला, १४. प्राणशूर (दमदार) पर रक्षा-भीरु (बचाव में कमजोर), १५. चलन-भीरु (गति करने से डरने वाला)।

टीका

मनोवैज्ञानिक विश्लेषण: यहाँ 'दृष्टिभीरु' और 'हस्तमेलन-भीरु' जैसे शब्द बताते हैं कि युद्ध केवल शारीरिक नहीं, मानसिक भी होता है। जो विपक्षी की आँखों में नहीं देख सकता, वह पाश-युद्ध में पहले ही हार मान लेता है।

अधश्चासनभीरुश्च ऊर्ध्वभीरुस्तथैव च । अधोभीरुस्त्राणशूरोऽप्यप्राणे भीरुकस्तथा ॥ १८ ॥ अशीके शूर एव स्यादाशीके भीरुरेव च । अभग्नशूरकोऽपि स्याद्भग्नो भीरुस्तथैव च ॥ १९ ॥ रोपणे च भीरुर्युद्धे युद्धे च भीरुरेव च । युद्धे भीरुः सदेव स्यादयुद्धे शूर एव च ॥ २० ॥ सहजे च तथा भीरुः सभाभीरुस्तथैव च । स्थानभीरुस्तथान्यश्च वाक्यभीरुस्थानपरः ॥ २१ ॥ हस्तमेलापके भीरू रङ्गभीरुस्तथापरः । अरङ्गभीरुकः कश्चित्पतने कोऽपि भीरुकः ॥ २२ ॥ स्थानके भीरुरन्योऽपि कश्चाभीरुस्तथैव च । अर्थभीरुरधोभीरुज्ञाने च भीरुकस्तथा ॥ २३ ॥ बालत्वे भीरुकः कोऽपि लागभीरुस्तथापरः । अलेण भीरुकश्चान्यो भग्नभीरुस्तथापरः ॥ २४ ॥ अभग्नभीरुकः कोऽपि तथैवार्ष(र्ष)कभीरुकः । प्राणे भीरुः परप्राणे भीरुको युद्धभीरुकः ॥ २५ ॥ अयुद्धभीरुकः कश्चिदविज्ञानिनि भीरुकः । सहने च गर्भभीरुरगर्भे भीरुरेव च ॥ २६ ॥
हिंदी अर्थ

१६. अधःआसन भीरु (जमीन पर लड़ने से डरने वाला), १७. ऊर्ध्व-भीरु (खड़े होकर लड़ने से डरने वाला), १८. त्राण-शूर (बचाव में अच्छा) पर अप्राण-भीरु (थकने पर डरने वाला), १९. अभग्न-शूर (जब तक नहीं हारा तब तक वीर) पर भग्न-भीरु (एक बार हारते ही डर जाने वाला), २०. रोपण-भीरु (दाँव लगाने से डरने वाला), २१. युद्ध-भीरु (लड़ाई से डरने वाला), २२. अयुद्ध-शूर (शांति-काल में वीर), २३. सहज-भीरु (स्वभाव से डरपोक), २४. रंग-भीरु (मंच-भय), २५. पतन-भीरु (गिरने से डरने वाला), २६. लाग-भीरु (दाँव में फँसने से डरने वाला), २७. पर-प्राण भीरु (शत्रु के बल से डरने वाला), २८. सहन-भीरु (पीड़ा न सह सकने वाला)।

टीका

युद्ध की कमियाँ: 'पतन-भीरु' (गिरने का डर) एक बड़ी बाधा है। मल्लविद्या और कलरीपायट्टु में 'भूमि-कौशल' (गिरने की तकनीक) सबसे पहले सिखाया जाता है, ताकि गिरने का डर निकल जाए और साधक निर्भय होकर अभ्यास कर सके।

रंगभूमि की रचना व मल्लयुद्ध का आयोजन

अधमाः कथिताश्चैते चतुस्त्रिंशदिमे गुणाः । आहूय सकलान् मल्लान् सर्वं च पालिकादिने ॥ २७ ॥ यस्य प्राणं च प्राणं च सामर्थ्यं च दृढं बलम् । यस्यास्ति सदृशं धैर्यं यस्य स्यात्सदृशं बलम् ॥ २८ ॥ यस्य प्राणं च संपूर्णं ज्ञायते न च शोधयेत् । कृते मल्ले समर्थे च यस्य स्याद्भीमदर्शनम् ॥ २९ ॥ प्रातर्योधनमित्येवमुक्त्वा सर्वान् विसर्जयेत् । प्रभाते युद्धमस्तीति रात्रौ दिव्याश्च (दद्याच्च) ततः ॥ ३० ॥ कर्पूरादिसुगन्धैश्च पुष्पधूपादिमङ्गलैः । नीराजनैश्च नैवेद्यैरर्ध्यदानैः प्रमाणभिः ॥ ३१ ॥ सन्तुष्टः स्याद्यथा कृष्णो मल्लानां च जयप्रदः । राजा च प्रातरुत्थाय मल्लानुत्थापयेत्पुनः ॥ ३२ ॥ तथा चन्दनकर्पूरकस्तूरी कुङ्कुमादिकम् । करेणुकं वाद्यानि बहून्युत्सवहेतवे ॥ ३३ ॥ राजा सर्वान् समाहर्तुं कर्माधिकृतपूरुषान् । आज्ञापयेन्मृत्तिकाया आनयनाय सत्वरः ॥ ३४ ॥ सामग्री कारयेत्पश्चाद्यथोक्तं विधिवत्ततः । मल्लयुद्धविधानाय रङ्गभूमिं तु विस्तराम् ॥ ३५ ॥
हिंदी अर्थ

ये चौंतीस अधम गुण कहे गए हैं। राजा को चाहिए कि पालिका-दिन (उत्सव के दिन) सभी मल्लों को बुलाए। जिनका प्राण (दम), सामर्थ्य और बल दृढ़ हो, जिनका धैर्य और बल समान हो (समान जोड़ी), और जो देखने में भीम जैसे (भीमदर्शन) हों, उनका चयन करे।

"कल प्रातः युद्ध होगा" — यह कहकर सबको विदा करे। रात्रि में कर्पूर, सुगन्ध, पुष्प, धूप, मंगल-नीराजन (आरती) और नैवेद्य आदि से भगवान की पूजा करे, जिससे कृष्ण संतुष्ट होकर मल्लों को विजय दें। राजा प्रातः उठकर मल्लों को जगाए। उत्सव के लिए चन्दन, कस्तूरी, कुमकुम और अनेक वाद्य (नगाड़े) तैयार करे। राजा कर्मचारियों को आज्ञा दे कि वे शीघ्र (पवित्र) मिट्टी लाएँ और मल्ल-युद्ध के विधान के लिए विस्तृत रंगभूमि (अखाड़ा) तैयार करें।

टीका

युद्ध की पूर्व-संध्या: यह श्लोक युद्ध-पूर्व "भार-परीक्षा" और "प्रतिद्वन्द्वी-दर्शन" के बाद की रात जैसा है। पूजा और उत्सव मानसिक तनाव कम करने और वातावरण बनाने के लिए आवश्यक हैं। (अध्याय १४ का अंत मूल में स्पष्ट नहीं है, किन्तु श्लोक ३५ तक विषय एकरूप है।)

आगे के श्लोक (३६–६६) पाठ-संगति हेतु transcript-आधारित पूरक भाग से जोड़े गए हैं; इनमें रंगभूमि (रड) के निर्माण, चौंसठ कलाओं की सूची, विजयोत्सव व राजसभा का वर्णन है।

प्रपूज्या सुदृशां चैव सुवर्तुलाममां नवाम् । एकविंशतिहस्तैश्च विस्तीर्णां च प्रमाणतः ॥ ३६ ॥
हिंदी अर्थ

सुन्दर, उत्तम, नवीन तथा सुवर्तुल (सम/गोलाकार) रड (अखाड़े) की भूमि का पूजन करना चाहिए; उसका विस्तार प्रमाणतः इक्कीस हाथ रखा जाए।

हस्तेनोच्चामनीरुक्षामतिन्द्रा (म) निन्द्रिंताम् । बीजपातक्षेत्रमिव कोमलां च मनोरमाम् ॥ ३७ ॥
हिंदी अर्थ

भूमि ऊँची-नीची/रूखी न हो; अत्यन्त कठोर न हो; बीज बोने के खेत की भाँति कोमल, सम और मनोहर हो। (पाठ आंशिक — पाठभेद संभावित)

रक्षा सन्तापयेन्मल्लान् शोपं च कुरुते परम् । कण्टकाः कर्कराश्चैव वर्जनीयाः प्रयत्नतः ॥ ३८ ॥
हिंदी अर्थ

कण्टक (काँटे) और कर्कर (खुरदरे/कठोर) पदार्थ मल्लों को सन्ताप और शोथ (सूजन) देते हैं; इसलिए उन्हें प्रयत्नपूर्वक वर्जित करना चाहिए।

छिद्राणि चैव रन्ध्राणि पूरयित्वा विशोधनैः । शोधयित्वा प्रपूज्या च बहुपुष्पाक्षतैः किल ॥ ३९ ॥
हिंदी अर्थ

छिद्र और रन्ध्र (गड्ढे/दरारें) शोधन-योग्य पदार्थों से भरकर, शुद्ध करके; पुष्प और अक्षत आदि से उसका पूजन करना चाहिए।

तत्र जयस्य प्राप्तर्थे हरिं संस्थापयेत्परम् । बीजपूरकमप्यत्र रडमध्ये निवेशयेत् ॥ ४० ॥
हिंदी अर्थ

विजय-प्राप्ति हेतु वहाँ हरि (गोविन्द) की स्थापना करनी चाहिए; तथा रड (अखाड़े) के मध्य में बीजपूरक (नींबू) भी स्थापित किया जाए (परम्परा/विधान)।

एतल्लक्षणासंयुक्तं कारयेद्रडमुत्तमम् । आयुरारोग्यदं सौख्यं श्रीकरं च यशस्करम् ॥ ४१ ॥
हिंदी अर्थ

इन लक्षणों से युक्त उत्तम रड (अखाड़ा) बनवाना चाहिए; यह आयु और आरोग्य देने वाला, सुखद, श्री-कर (समृद्धि-कारक) तथा यश-कर है।

सुखं ददाति परमं रडमेवंविधं परम् । अथ संपूज्य गोविन्दं सभामाक्रम्य पुष्कलाम् ॥ ४२ ॥
हिंदी अर्थ

ऐसा रड परम सुख देता है; फिर गोविन्द का सम्यक् पूजन करके (राजा/समाज) विशाल सभा में प्रवेश करे। (पाठ आंशिक — पाठभेद संभावित)

चतुरैः सहितो राजा पश्येद्युद्धं समाहितः । अथ व्यवस्थिते युद्धे सर्वसंपत्तिसंभवे ॥ ४३ ॥
हिंदी अर्थ

राजा चतुर (मंत्रियों/परिजनों) सहित, समाहित होकर मल्ल-युद्ध देखे; इस सुव्यवस्थित युद्ध से सर्व-सम्पत्ति/उत्सव का वातावरण बनता है। (अर्थ आंशिक — पाठभेद संभावित)

मल्लानां परीक्षणाय श्रावयेत्प्रतिमन्दिरम् । नियुद्धमद्य चास्तीति कर्तव्यं दधिमण्डलम् ॥ ४४ ॥
हिंदी अर्थ

मल्लों की परीक्षा/प्रतियोगिता के लिए प्रत्येक गृह/मन्दिर में उद्घोष कराए कि "आज नियुद्ध है"; तथा दधि-मण्डल (दही का मण्डल/संबंधित तैयारी) करना चाहिए। (विधान आंशिक — पाठभेद संभावित)

ततो व च (वचन) संस्कारवस्तूनि प्रतिपादयेत् । राजा भुक्त्वोत्तरं चैव विधिवत्कम्य तां सभाम् ॥ ४५ ॥
हिंदी अर्थ

तत्पश्चात् संस्कार/उत्सव की सामग्री प्रस्तुत की जाए; राजा भोजन करके विधिपूर्वक उस सभा में (शुभ) कर्म कर प्रवेश करे। (पाठ दूषित — पाठभेद संभावित)

आहूय तान् जनेनैव मल्लान् शीघ्रं समाहितः । महादेव्या देवकुमारी तथामात्यैः सकौतुकीम् ॥ ४६ ॥
हिंदी अर्थ

समाहित होकर लोगों द्वारा मल्लों को शीघ्र बुलवाए; महादेवी, देवकुमारी तथा अमात्य आदि भी कौतूहल (उत्सुकता) सहित उपस्थित हों। (पाठ आंशिक — पाठभेद संभावित)

विलासिनीभिः सहितो रडं गच्छेत्समाहितः । स्थित्वा स्वस्थः सभां कृत्वा मल्लानां ज्ञापयेत्परम् ॥ ४७ ॥
हिंदी अर्थ

कलावन्त-नर्तकियों सहित समाहित होकर रड (अखाड़े) में जाए; स्वस्थ होकर सभा का आयोजन करे और मल्लों को (नियम/आदेश) घोषित करे। (पाठ आंशिक — पाठभेद संभावित)

योद्धव्याः सर्वमल्लास्तु द्वन्द्वशोथ यथाबलम् । मल्लैस्तु सावधानैश्च कर्तव्यं युद्धमुत्तमम् ॥ ४८ ॥
हिंदी अर्थ

सब मल्लों को यथाबल द्वन्द्व (जोड़ी) बनाकर युद्ध करना चाहिए; मल्लों को सावधान होकर उत्तम युद्ध करना चाहिए।

चौंसठ कलाएँ, विजय-यात्रा व राजसभा

परचित्तज्ञानकला ॥ ४९ ॥ शत्रुकला ॥ ५० ॥ रथकला ॥ ५१ ॥ आयुधकला ॥ ५२ ॥ मृगकला ॥ ५३ ॥ दानकला ॥ ५४ ॥ ग्रहणकला ॥ ५५ ॥ दूतकला ॥ ५६ ॥ नाटककला ॥ ५७ ॥ पलायनकला ॥ ५८ ॥ क्रीडाकला ॥ ५९ ॥ शयनकला ॥ ६० ॥ आसनकला ॥ ६१ ॥ मानकला ॥ ६२ ॥ परीक्षाकला ॥ ६३ ॥ सैन्यकला ॥ ६४ ॥ इति चतुःषष्टिकलाः ।
हिंदी अर्थ

यहाँ चौंसठ कलाओं का संक्षिप्त निर्देश/सूची दी गई है — पर-चित्त-ज्ञान, शत्रु-विद्या, रथ व आयुध, दूत व नाटक, क्रीड़ा, शयन व आसन, परीक्षा, सैन्य आदि। (सूची में कला-संख्याएँ ४९–६४ के अंक विद्या-गणना के हैं; श्लोक-गणना आगे पुनः प्रारम्भ होती है।)

शत्रुभटे भवेन्मल्लो जयश्रीः प्राप्यतेऽचिरात् । तेन बाणप्रहारस्तु मल्लडेषु प्रजायते ॥ ५० ॥
हिंदी अर्थ

शत्रु के सामने दृढ़ (निडर) होने से मल्ल शीघ्र जयश्री प्राप्त करता है; और (युद्ध में) बाण/प्रहार की युक्ति भी उसमें विकसित होती है। (पाठ दूषित — पाठभेद संभावित)

चरणेन प्रहारस्तु प्रहारो जानुभिस्तथा । कटिप्रहार उरसा पृष्ठेनाथ करेण च ॥ ५१ ॥
हिंदी अर्थ

चरण-प्रहार, जानु-प्रहार, कटि-प्रहार; उर (छाती), पृष्ठ (पीठ) से तथा हाथ से — इस प्रकार के विविध प्रहार बताए गए हैं।

मुष्टिप्रहार इतरः शिरसा च ललाटअये (के) । राजा च जयिनं मल्लं कुर्याच्छृङ्गारसंयुतम् ॥ ५२ ॥
हिंदी अर्थ

मुष्टि-प्रहार तथा शिर/ललाट से प्रहार आदि भी कहे गए हैं; और राजा विजयी मल्ल का सम्मान/शृंगार (विजय-समारोह) करे। (पाठ आंशिक — पाठभेद संभावित)

गजारोहणकं कृत्वा वादित्रैश्चैव संयुतम् । पुष्पवस्त्रसमायुक्तं कुङ्कुमारक्तचन्दनैः ॥ ५३ ॥
हिंदी अर्थ

विजयी मल्ल को गज-आरोहण कराकर वाद्य-ध्वनि सहित; पुष्प-वस्त्र, कुमकुम, रक्त-चन्दन आदि से अलंकृत कराया जाए।

अलंकृतं गजारूढं भ्रामयेत्प्रतिमन्दिरम् । लोकानां कौतुकार्थाय जयशब्दैश्च वाचयेत् ॥ ५४ ॥
हिंदी अर्थ

अलंकृत, गज पर आरूढ़ मल्ल को प्रत्येक गृह/मन्दिर के पास घुमाए — लोगों के कौतूहल हेतु; और "जय" शब्दों का उच्चारण कराया जाए।

पुरः प्रदक्षिणां कृत्वा प्रत्यागत्य सभां पुनः । ततोऽवतीर्य मल्लो वै गजाद्रडं प्रविश्यति ॥ ५५ ॥
हिंदी अर्थ

नगर/सभा की प्रदक्षिणा करके पुनः सभा में लौटे; फिर मल्ल गज से उतरकर रड (अखाड़े) में प्रवेश करे।

नारायणं नमस्कृत्य प्रणम्य च गुरूनपि । राजाग्रे च समागच्छेत् करास्फोटनपूर्वकम् ॥ ५६ ॥
हिंदी अर्थ

नारायण को नमस्कार करके, गुरुओं को प्रणाम कर; राजा के समक्ष कर-आस्फोट (ताली/कर-ध्वनि) करते हुए उपस्थित हो।

प्रणम्य राजानमितो महादेवीं प्रणम्य च । कृत्वा रडं नमस्कृत्य पुष्पप्रकरसंयुगे ॥ ५७ ॥
हिंदी अर्थ

राजा और महादेवी को प्रणाम करके; पुष्प-प्रकर (पुष्प-समूह) सहित रड (अखाड़े) को नमस्कार करे। (पाठ आंशिक — पाठभेद संभावित)

सूतकाधिकृतश्चैव अन्तःपुरनिवारणम् ॥ ५८ ॥
हिंदी अर्थ

सूचना/व्यवस्था-अधिकारी तथा अन्तःपुर (राज-परिवार) की व्यवस्था-संबंधी कर्म भी सभा-आयोजन में नियत हैं। (पाठ संक्षिप्त — पाठभेद संभावित)

यानीयरक्षकाः स्कन्धधराश्चेटकवेदिनः । वणिका व्यवहारज्ञा ज्ञेया रत्नपरीक्षकाः ॥ ५९ ॥
हिंदी अर्थ

यानीयरक्षक (दल/वाहन-रक्षक), स्कन्धधर (भार-वाहक), सेवक/परिचारक; व्यापारी, व्यवहार-ज्ञ तथा रत्न-परीक्षक — ये सभा में रहने योग्य माने गए हैं। (पाठ आंशिक — पाठभेद संभावित)

वेश्याश्चैव विलासिन्यो लेखका दूतकारकाः । दासाश्चैव तु भृत्याश्च गजवैद्यास्तथापरे ॥ ६० ॥
हिंदी अर्थ

कलावन्त-विलासिनी, लेखक, दूत-कार्य करने वाले; दास-भृत्य तथा गज-वैद्य (हाथी-चिकित्सक) आदि भी सभा-व्यवस्था में बताए गए हैं।

कौतूहलकराः प्रोक्ता रसवाक्यविदस्तथा । इति युक्तिविदश्चैव गन्धयुक्तिविदस्तथा ॥ ६१ ॥
हिंदी अर्थ

कौतूहल/मनोरंजन करने वाले, रस-वाक्य-विद (हास्य/कथन-कुशल); तथा युक्ति-विद और गन्ध-युक्ति-विद (सुगन्ध/इत्र आदि की समझ वाले) भी बताए गए हैं।

हास्यकाराः कथाकारा युद्धेषु कुशलास्तथा । देशमायाविदश्चैव काव्यादिकुशलास्तथा ॥ ६२ ॥
हिंदी अर्थ

हास्यकार, कथाकार, युद्ध में कुशल; देश-प्रथा/माया-विद तथा काव्यादि में कुशल जन भी सभा में होते हैं।

अनेकमापाकुशलाः कवितायां तथैव च । क्रीडायां कुशलाश्चैव धूर्तकर्मविदस्तथा ॥ ६३ ॥
हिंदी अर्थ

अनेक विधि के पाक-कुशल, कविता-कुशल; क्रीड़ा में निपुण तथा धूर्त/कौशल-कार्य जानने वाले भी सभा में रहते हैं। (पाठ आंशिक — पाठभेद संभावित)

धातुवादविदः केचित्रौकाकर्मविदस्तथा । अग्निस्तम्भो जलस्तम्भो मन्त्रवादस्तथापरः ॥ ६४ ॥
हिंदी अर्थ

कुछ धातु-वाद (रस/धातु-विद्या) जानने वाले, तथा (कला-प्रयोग) जानने वाले; अग्नि-स्तम्भ, जल-स्तम्भ और मन्त्र-वाद आदि में कुशल जन भी वर्णित हैं। (पाठ दूषित — पाठभेद संभावित)

नापिताश्च वन्दिनश्च सङ्केतज्ञास्तथैव च । विनोदकराश्च विज्ञेयाः सभासंपत्तिहेतवे ॥ ६५ ॥
हिंदी अर्थ

नापित (नाई), वन्दिन (स्तुति-गायक), सङ्केत-ज्ञ; तथा विनोद करने वाले — ये सभा की शोभा/सम्पत्ति के हेतु माने गए हैं। (पाठ संदिग्ध — पाठभेद संभावित)

एतैः पात्रै राजसभा नियुद्धालोकनोन्मुखैः । शोभिता शुद्धधर्मज्ञै रत्नसंपत्तिमण्डितैः ॥ ६६ ॥
हिंदी अर्थ

ऐसे पात्रों से — नियुद्ध-दर्शन के लिए उत्सुक, शुद्ध धर्म-ज्ञ और रत्न-सम्पदा से मण्डित — राजसभा सुशोभित होती है।

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