मल्लपुराण
चर्चा
अध्याय १५

युद्ध के प्रकार और धर्म-युद्ध

नियुद्ध के चार मुख्य प्रकार — धरणीपात, आसुर, नार और युद्ध — तथा उनके लक्ष्य स्पष्ट किए गए हैं। आसुर युद्ध के बत्तीस भीषण उपाय और धर्म-युद्ध के बत्तीस नियम देकर नियमबद्ध व नियम-रहित संघर्ष का अंतर बताया गया है। यह अध्याय आत्मरक्षा और क्रीड़ा-कुश्ती के बीच की सीमा-रेखा — क्या वर्जित, क्या अनुमत — को स्पष्ट करता है।

चार प्रकार के नियुद्ध

चतुर्विधं नियुद्धं तु शृणु मतिमतां वर । आद्यं धरणिपातं च आसुरं च द्वितीयकम् ॥ १ ॥ तृतीयं नारमित्युक्तं युद्धं पुनश्चतुर्थकम् । तेषां धरणिपातस्य भेदः पञ्चविधो भवेत् ॥ २ ॥ तलप्रहारः प्रथमः करप्रहार एव च । निपत्य चात्मना भूमौ परं पातयति ध्रुवम् ॥ ३ ॥ पातितस्य स्फुटं हारो (हार) निरुद्धे विजयो भवेत् । ज्ञात्वेवं बलबुद्धिभ्यां युद्धमेतत्समाचरेत् ॥ ४ ॥
हिंदी अर्थ

हे बुद्धिमानों में श्रेष्ठ! चार प्रकार के नियुद्ध सुनो —

१. धरणीपात (पाश/कुश्ती): जिसका लक्ष्य केवल गिराना है। २. आसुर (बाधा-रहित): क्रूर और नियम-रहित युद्ध। ३. नार (मानवीय): सम्भवतः मुष्टि-युद्ध या खड़ा युद्ध। ४. युद्ध (संग्राम): शस्त्रों के साथ पूर्ण युद्ध।

धरणीपात के पाँच भेद: तल-प्रहार, कर-प्रहार आदि। इसमें स्वयं गिरकर (आत्म-प्रक्षेप) दूसरे को गिराना भी शामिल है। जो गिर गया (पातित), उसकी स्पष्ट हार है; और जो निरुद्ध (नियंत्रित/पिन) कर लिया गया, वह भी हारा हुआ माना जाता है।

टीका

धरणीपात: यह शुद्ध कुश्ती है, जहाँ 'पिन' या 'गिराना' ही जीत है। 'निपत्य चात्मना भूमौ' का अर्थ है — स्वयं गिरकर फेंकना, जहाँ मल्ल खुद गिरकर विपक्षी को पटकता है।

आसुर युद्ध — बत्तीस भीषण उपाय

अथैतद्भासुरं (दासुरं) युद्धं द्वात्रिंशद्भेदभीषणम् । केशाकर्षणपीडा च कर्णस्फोटनमेव च ॥ ५ ॥ नासिकास्फोटनं चैव तथा चर्वणमेव च । दन्तपातनमेव स्यान्मुखे पांसुनिपातनम् ॥ ६ ॥ अथ पांसौ परिक्षेपो नखैरेव विदारणम् । नाडिकापीडनं चैव ग्रीवाग्रहणकं तथा ॥ ७ ॥ एकाङ्गुलीमोडनं वा तथा व्यङ्गुलिमोडनम् । अङ्गुलीत्रितयस्यापि मोडनं कथितं क्वचित् ॥ ८ ॥ कराङ्गुष्ठमोडनं च पादाङ्गुष्ठस्य मोडनम् । समग्राङ्गुलिभङ्गो वा फणग्रहणमेव च ॥ ९ ॥ भारेण च प्रहारेण विज्ञानेन पुनस्तथा । बालकेन प्रकारेण मारयुद्धमथापि च ॥ १० ॥ प्राणेन चौजसा चैव तथा वह्निनापि च । येन केन प्रकारेण मारयुद्धं समागताः ॥ ११ ॥ स एव मल्लानां पातनं च महीतले । भारं च भारभग्नं च वितरं समरे त्यजेत् ॥ १२ ॥
हिंदी अर्थ

अब बत्तीस प्रकार के भीषण 'आसुर युद्ध' सुनो — १. बाल खींचना (केशाकर्षण), २. कान फाड़ना (कर्ण-स्फोटन), ३. नाक तोड़ना, ४. चबाना (काटना), ५. दाँत तोड़ना, ६. मुँह में धूल झोंकना, ७. धूल फेंकना, ८. नाखूनों से फाड़ना, ९. नाड़ी दबाना (मर्म-प्रहार), १०. गला घोंटना।

११–१५. अंगुली मोड़ना — एक, दो, तीन या सभी अंगुलियाँ, हाथ और पैर का अंगूठा मोड़ना। १६. फण-ग्रहण, १७. भारी वजन डालना, १८. घातक प्रहार। "जिस किसी भी प्रकार से मारना" — यही आसुर युद्ध है।

टीका

निषेध और वास्तविकता: ये तकनीकें आधुनिक खेलों में वर्जित हैं, किन्तु वास्तविक जीवन-रक्षा या रणभूमि में यही 'मर्म-कला' है। सिलम्बम और कुथु-वरिसाई के युद्ध-प्रयोग में इनका स्थान है — इनका ज्ञान केवल रक्षा-बुद्धि हेतु रखा जाता है।

धर्म-युद्ध — बत्तीस नियम

इदानीं धर्मयुद्धस्य द्वात्रिंशत्कथिता गुणाः ॥ १३ ॥ तानहं कथयिष्यामि यथा विक्रमणागताः । केशानाकर्षयति च कर्णौ च त्रोटयत्यपि ॥ १४ ॥ अक्षिणी न स्फोटयत्यपि मुखं च स्फोटयत्यपि । नासिका च त्रोटयति (न त्रोटयति) नन्दाति (न ददाति) सर्वयत्यति ॥ १५ ॥ न दन्तान् पातयति च पांसुक्षेपो न मुखे । नाक्ष्णोः पांसुपातनं च विदारयति नो नखैः ॥ १६ ॥ न नालिका पीडयति ग्रीवा चैव न पीडयेत् । न कच्छचोटनं कुर्याद्दण्डं गृह्णाति नैव हि ॥ १७ ॥ शिरसो घातनं नैव मर्मभङ्गं च वर्जयेत् । प्रकाशयन् धर्मयुद्धं यशोहर्षविवर्धनम् ॥ १८ ॥
हिंदी अर्थ

अब धर्म-युद्ध के बत्तीस गुण (नियम) कहता हूँ। बाल नहीं खींचना, कान नहीं नोचना, आँखें नहीं फोड़ना, मुँह नहीं तोड़ना, नाक नहीं तोड़ना। दाँत नहीं गिराना, धूल नहीं झोंकना, नाखूनों से नहीं खरोंचना। नाड़ी (साँस-नली) नहीं दबाना, गला नहीं घोंटना, लँगोट (कच्छ) नहीं खींचना/फाड़ना। सिर पर घातक प्रहार नहीं करना और मर्म-स्थानों को तोड़ना वर्जित है। यह 'धर्म-युद्ध' यश और हर्ष को बढ़ाने वाला है।

टीका

इन श्लोकों में कहीं-कहीं निषेधवाचक 'न' मूल में लुप्त है; सन्दर्भ से स्पष्ट है कि ये सब कार्य नहीं करने हैं (पाठभेद संभावित)।

खेल-भावना: यह श्लोक आधुनिक कुश्ती और जूडो के नियमों का आधार है। 'कच्छचोटनं' (जननांग-प्रहार) आज भी वर्जित है।

राजा का कर्तव्य व न्याय

धरणीपातितस्याथ मत्सरं परिवर्जयेत् । यः कश्चिद्दर्पसंयोगादासुरं युद्धमारभेत् ॥ १९ ॥ भग्ने वापि मृते तस्मिन् राजा च दोषभाग्भवेत् । इत्यङ्गसङ्गरे मल्ले ज्ञात्वा यत्नेन युध्यति (भूषति) ॥ २० ॥ निवारयति यो भूयः संप्राप्नोति परं यशः । पक्षपातो न सर्वत्र समता यस्य (यत्र) भूपतेः ॥ २१ ॥ समेन पालयेद्राजा यशः प्राप्नोति निश्चितम् । धर्मयुद्धे कृते मल्लो मल्लं मारयते यदि ॥ २२ ॥ राजा चोपेक्षते चैव तदा दोषो महान् भवेत् । प्रमादात् (प्रमदा) क्रियते चापि न दोषो राजमल्लयोः ॥ २३ ॥ घाताश्चैवोपघाताश्च विज्ञाताश्चैव विक्रमाः । इत्येते धर्मयुद्धस्य द्वात्रिंशत्कथिता गुणाः ॥ २४ ॥
हिंदी अर्थ

गिराए हुए (पराजित) शत्रु पर ईर्ष्या/क्रोध (मत्सर) नहीं करना चाहिए — गिरे हुए को न मारें। यदि कोई मल्ल घमंड के कारण 'आसुर युद्ध' (नियम तोड़कर मारना) आरम्भ कर दे, और उसमें कोई अंग-भंग हो जाए या मृत्यु हो जाए, तो राजा (निर्णायक) भी दोष का भागी होता है।

राजा को चाहिए कि वह ऐसे आसुर युद्ध को यत्नपूर्वक रोके। जो राजा पक्षपात-रहित होकर समता से पालन करता है, वह यश पाता है। यदि धर्म-युद्ध में (नियमों का पालन करते हुए भी) मल्ल दूसरे को मार दे (दुर्घटनावश), या प्रमाद (अनजाने) में ऐसा हो जाए, तो राजा और मल्ल को दोष नहीं लगता। घात, उपघात (प्रति-प्रहार) और विक्रम (कौशल) — ये धर्म-युद्ध के अंग हैं।

टीका

निर्णायक की भूमिका: राजा यहाँ रेफरी की भूमिका में है। उसे 'आसुर' तकनीकों को तुरन्त रोकना चाहिए। यह खेल की सुरक्षा और न्याय के लिए अनिवार्य है — निष्पक्षता ही निर्णायक का सबसे बड़ा यश है।

इति श्रीमल्लपुराणे युद्धप्रकरणं नाम पञ्चदशोऽध्यायः ।

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