मल्लपुराण
चर्चा
अध्याय १३

अध्यात्म, संयम और युद्ध-नीति

राजा के लिए मल्ल-युद्ध के उपयोग (उत्साह, नीति व संग्राम-बुद्धि) के साथ 'त्राण' (सहनशक्ति) बढ़ाने की विधि और जोड़ी बनाने के नियम — समता तथा एक बनाम दो जैसे विशेष प्रसंग — दिए गए हैं। इक्कीस प्रकार के संयम और अध्यात्म के द्वारा शारीरिक बल को मानसिक व आध्यात्मिक बल से जोड़ा गया है।

राजा और मल्ल-युद्ध का उपयोग

त्रयोदशोऽध्यायः । मल्लयुद्धं सविज्ञानं विशेषं कथितं तव । इदानीमुपयोगः स्यात्तस्य विस्तारयाम्यहम् ॥ १ ॥ द्रष्टव्यं सततं राज्ञा शास्त्रेण च विवेकिना । संग्रामरसिकेनैव नित्यं विविधबुद्धिना ॥ २ ॥ युद्धमुत्साहजननं दुःखहन्तृ विनोदनम् । मल्लयुद्धसमं नास्ति तेन युद्धं समारभेत् ॥ ३ ॥ जित्वा च सकलान् रिपून् प्रायो निष्कण्टका मही । भाविनियाश्च (भावनीयाश्च) युद्धेन राजा नान्यद् विनोदनम् ॥ ४ ॥
हिंदी अर्थ

मैंने तुम्हें मल्ल-युद्ध का विज्ञान बताया; अब इसका उपयोग बताता हूँ। विवेकवान और संग्राम-प्रेमी राजा को नित्य मल्ल-युद्ध देखना चाहिए। युद्ध उत्साह पैदा करता है, दुख हरता है और मनोरंजन करता है — मल्ल-युद्ध जैसा कोई दूसरा युद्ध नहीं है। शत्रुओं को जीतकर निष्कंटक राज्य करने वाले राजा के लिए इससे बेहतर कोई मनोरंजन नहीं है।

टीका

मूल में 'भाविनियाश्च (भावनीयाश्च)' पाठ अनिश्चित है; उपलब्ध श्रेष्ठ पाठ का ही अनुसरण किया गया है। (पाठभेद संभावित)

त्राण-वृद्धि और जोड़ी-मेलापक

अतो रङ्गं समाहूय चतुरैर्नागरैः परैः । आहारारोग्यसंपन्नाः श्रमोत्साहसमन्विताः ॥ ५ ॥ आरोग्यस्य समर्थे च कथं त्राणसमुद्भवः । यावत्संख्या पालिता तु श्रमविघ्नः प्रजायते ॥ ८ ॥ ततो द्विगुणाभिरभ्यस्तं प्राप्यते त्राणमुत्तमम् । श्रमेण मध्यमं तद्वत् हीनाभिरधमं मतम् ॥ ९ ॥ एवं श्रमेण पुष्ट्या च पालिकाविमुखेन च । येन केन प्रकारेण त्राणमेवं विवर्द्धयेत् ॥ १० ॥
हिंदी अर्थ

(मल्लों को) आहार, आरोग्य और उत्साह से संपन्न होना चाहिए।

त्राण (सहनशक्ति) कैसे बढ़ता है? जितनी संख्या (आवृत्ति) का पालन करने से श्रम में विघ्न (थकान) आती है, उससे दोगुना अभ्यास करने से 'उत्तम त्राण' प्राप्त होता है। समान अभ्यास से मध्यम, और कम अभ्यास से अधम त्राण मिलता है। श्रम, पुष्टि और पालिका (नियम) के द्वारा, जिस किसी भी प्रकार से हो, अपने 'त्राण' (दम) को बढ़ाना चाहिए।

टीका

क्रमिक श्रम-वृद्धि: यह आधुनिक व्यायाम का एक प्रमुख सिद्धांत है — अपनी सीमा के निकट पहुँचकर (विफलता के समीप) अभ्यास बढ़ाने से सहनशक्ति बढ़ती है।

इस समूह में छठा-सातवाँ पद-क्रमांक लुप्त है; उपलब्ध पाठ का ही अनुसरण किया गया है। (पाठभेद संभावित)

नियुद्धविद्याबीजमत्राणादपरं वरम् । हस्तमेलापकः कार्यो यो येन सदृशो भवेत् ॥ ११ ॥ गजो गजेन संयोज्यो प्राणः प्राणवता सह । ज्येष्ठिना च समं ज्येष्ठी नियुद्धे विजयो भवेत् ॥ १२ ॥ अन्तरज्येष्ठिना सार्धमन्तरज्येष्ठिनं न्यसेत् । समं गोपकुलेनैव तथा गोपकुलोऽपि च ॥ १३ ॥ ... दातव्यो ज्येष्ठिना ज्येष्ठी प्रतियोद्धा न लभ्यते ॥ १५ ॥ अन्तरज्येष्ठिनौ द्वौ तु योधयेतां परस्परम् । कथमप्यन्तरज्येष्ठी प्रतियोद्धा च नो भवेत् ॥ १६ ॥ तदा गोपकुलौ द्वौ च ताभ्यां चैव नियुद्धयेत् । भविष्योऽपि श्रमे पूर्वं सहायो न भवेद्यदि ॥ १७ ॥ समं गोपकुलेनासौ योद्धयेदविलम्बयेत् । वृत्ते गोपकुले द्वन्द्वे भविष्यो बलसंयुतः ॥ १८ ॥ अन्तरज्येष्ठिना सार्धं तथा गोपकुलेन च । अन्तरज्येष्ठिनं जित्वा भविष्येण योजयेत्पुनः ॥ १९ ॥ तस्मिन् द्वये पातिते च भविष्येण समं ततः । अन्तरज्येष्ठिनौ द्वौ च योज्यो बलसमन्वितौ ॥ २० ॥ अधमज्येष्ठिना सार्धं भविष्यो युद्धमर्हति ।
हिंदी अर्थ

त्राण (दम) ही नियुद्ध-विद्या का बीज है। जोड़ी (हस्त-मेलापक) बराबरी की होनी चाहिए — गज बनाम गज, प्राणवान बनाम प्राणवान, ज्येष्ठी बनाम ज्येष्ठी।

विशेष नियम (असमान युद्ध): यदि अन्तरज्येष्ठी (मध्यम श्रेणी) को अपने बराबर का योद्धा न मिले, तो उसे दो गोपकुल (हल्की श्रेणी) मल्लों के साथ एक साथ लड़ाना चाहिए (एक विरुद्ध दो)। यदि भविष्य (नवसिखिया) को साथी न मिले, तो उसे गोपकुल से लड़ाएं। यदि दो अन्तरज्येष्ठी मिल जाएं तो उन्हें आपस में लड़ाएं। अधम-ज्येष्ठी के साथ भविष्य युद्ध कर सकता है।

टीका

असंतुलित युद्ध: यह प्रशिक्षण का एक उन्नत रूप है — एक कुशल योद्धा को दो कम कुशल योद्धाओं से लड़ने का अभ्यास कराया जाता है।

इक्कीस संयम और आहार-विवेक

मदेन युध्यते हस्ती मल्लस्त्राणेन युद्धयति ॥ २३ ॥ वर्द्धनीयं द्वयं चैव मल्ले त्राणं गजे मदम् । मल्लानामनुकथ्यन्ते त्रयोविंशतिसंयमाः ॥ २४ ॥ चेतसा संयमश्चादौ तस्मादौ वाक्यसंयमः । दृष्टिसंयम एतस्य तथा वस्तुनि संयमः ॥ २५ ॥ मुखस्य संयमोऽप्यत्र नीतिसंयम एव च । भवस्य संयमः कार्यो मायायाः संयमोऽपि च ॥ २६ ॥ कामस्य संयमः पश्चात्कर्मणोऽपि च संयमः । अपत्यसंयमो नायमाहारस्य च संयमः ॥ २७ ॥ आसने संयमोऽप्यस्ति श्रमे वान्योऽस्ति संयमः । श्वासस्य संयमो दृष्टः शयने संयमस्तथा ॥ २८ ॥ पानेऽपि संयमस्तद्वत्तथा वातस्य संयमः । निद्रायाः संयमो यद्वदन्योन्यं सत्यसंयमः ॥ २९ ॥ दानस्य संयमो जातो दुर्लभो धर्मसंयमः । एते मल्लैः सदा कार्याः संयमास्त्वेकविंशतिः ॥ ३० ॥
हिंदी अर्थ

हाथी मद से लड़ता है, मल्ल त्राण (श्वास/दम) से लड़ता है; इसलिए मल्ल को त्राण बढ़ाना चाहिए।

इक्कीस संयम: १. चित्त (मन), २. वाक्य (वाणी), ३. दृष्टि, ४. वस्तु (संग्रह), ५. मुख, ६. नीति, ७. भव (संसार), ८. माया (छल), ९. काम (इच्छा), १०. कर्म, ११. अपत्य (संतान), १२. आहार, १३. आसन, १४. श्रम (अति-व्यायाम से बचना), १५. श्वास, १६. शयन (नींद), १७. पान (पेय), १८. वात, १९. निद्रा, २०. सत्य, २१. दान/धर्म।

टीका

ब्रह्मचर्य और अनुशासन: 'काम' और 'आहार' का संयम सबसे महत्वपूर्ण है; 'श्वास संयम' युद्ध के दौरान थकान से बचाता है।

ध्यातव्य है कि श्लोक २४ में "त्रयोविंशति" (तेईस) और श्लोक ३० में "एकविंशति" (इक्कीस) संयम कहे गए हैं — दोनों पाठ मूल में यथावत् हैं; गणना इक्कीस के अनुसार दी गई है। (पाठभेद संभावित)

एतैः सदा मल्लो जयमाप्नोति निश्चितः । अन्नैरुत्पद्यते कामः कामाद्वेगा भवन्ति हि ॥ ३१ ॥ अतो मध्यमं सेव्यं च मल्लैरेतच्चतुष्टयम् । वेगक्षुत्पिपासाश्च निद्रा चैव तथा पुनः ॥ ३२ ॥ असेवितास्ताडयन्ति प्रकुप्यन्ति हि सेविताः । अतो यथाक्षणं सेव्या कदर्थहर्षशान्तये ॥ ३३ ॥ बलहानिर्महान् रोगो नाहारात्कामसंक्षयः । तेनाहारः समाख्येयो योगक्षेमाय सर्वदा ॥ ३४ ॥ ... मलमूत्रमरुच्छुक्रवेगान् क्वापि न धारयेत् । भगन्दराश्मरी गुल्मगुदजानां (रोगान्) प्रबोधयेत् ॥ ३९ ॥ जितेऽजितेन्द्रियग्रामे जितं तेन चराचरम् । अतश्च कामकं ज्ञेयं येन स्याद्विजितेन्द्रियः ॥ ४० ॥
हिंदी अर्थ

अन्न से काम (ऊर्जा/इच्छा) उत्पन्न होता है। चार चीजों का मध्यम सेवन करना चाहिए — १. वेग (प्राकृतिक इच्छाएं), २. भूख, ३. प्यास, ४. नींद। न तो इन्हें पूरी तरह रोकना चाहिए (असेवित) और न ही अति-सेवन — दोनों हानिकारक हैं।

आहार न करने से बल-हानि और रोग होते हैं। मल, मूत्र, वायु (अपान) और शुक्र के वेगों को कभी नहीं रोकना चाहिए — इन्हें रोकने से भगंदर, पथरी और गुदा के रोग होते हैं। जिसने अपनी इंद्रियों को जीत लिया, उसने सब कुछ जीत लिया।

टीका

इस समूह में मध्यवर्ती पद-क्रमांक (३५–३८) लुप्तांश सहित हैं; उपलब्ध पाठ का ही अनुसरण किया गया है। (पाठभेद संभावित)

मल्ल का अध्यात्म

मल्लैः सह शरीराणि मनसा गन्तुं दूषणम् । न बाध्योऽयं च सर्वेषां तस्मादेतत्समभ्यसेत् ॥ ४१ ॥ अभ्यासः क्रियते यस्मात्तस्मादध्यात्ममुच्यते । शब्दस्पर्शरूपरसगन्धाः पञ्च तथैव च ॥ ४२ ॥ आत्मबुद्धीन्द्रियाण्यर्था बहिःकरणमुच्यते । ... आत्मा मनश्च बुद्धिश्च अन्तःकरणमुच्यते ॥ ४५ ॥ शब्दान्मृगो गजः स्पर्शात्पतङ्गो रूपतस्तथा । ... तस्माद्देशं च कालं च ज्ञात्वा विभवमात्मनः । अनासक्तैश्च सेव्यन्ते विषयान्भोगमात्मनः ॥ ४७ ॥ दोषसहस्रशरीरैर्मनसा च सहेन्द्रियैः । एवमध्यात्मशुद्धात्मा न मल्लः परिभूयते ॥ ४८ ॥ कामक्रोधस्तथा लोभो हर्षश्चैव तथा परः । मानस्तथा मदश्चैव शत्रवश्चातिसेविताः ॥ ५१ ॥
हिंदी अर्थ

'अभ्यास' (अनुशासन) ही अध्यात्म है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध — ये पाँच विषय हैं; मन और बुद्धि 'अंतःकरण' हैं।

हिरण शब्द (संगीत) से फँसता है, हाथी स्पर्श (हथिनी) से, पतंगा रूप (दीपक) से, मछली रस (कांटे) से, और भँवरा गंध से मारा जाता है। मनुष्य (मल्ल) को इन पांचों विषयों में आसक्त नहीं होना चाहिए। जो मल्ल देश, काल और अपनी शक्ति को जानकर, अनासक्त होकर विषयों का सेवन करता है, वह कभी पराजित नहीं होता।

काम, क्रोध, लोभ, हर्ष, मान और मद — ये छह आंतरिक शत्रु हैं; मल्ल को इन्हें जीतना चाहिए।

टीका

योद्धा का मन: एक सच्चा योद्धा (मल्ल) योगी की तरह होता है — वह अपने मन को वश में रखता है, तभी वह अपने शरीर और शत्रु को वश में कर सकता है।

इस समूह में मध्यवर्ती पद-क्रमांक (४३–४६, ४९–५०) लुप्तांश सहित हैं; उपलब्ध श्रेष्ठ पाठ का ही अनुसरण किया गया है। (पाठभेद संभावित)

इति श्रीमल्लपुराणे अध्यात्मप्रकरणं नाम त्रयोदशोऽध्यायः ।

अध्याय १३ पर चर्चा (0)

अभी कोई टिप्पणी नहीं — पहली जिज्ञासा आप रखिए।

All rights reserved © Karla Kutuhal Akhara by Vagambhrini 2021-2026
UDYAM ID: UDYAM-UK-07-0005613 | MSME Registered under 8541 - Sports Education