श्रम (व्यायाम) के लक्षण और भेद
अल्प, अर्ध, पूर्ण और अति — चार प्रकार के श्रम (प्रशिक्षण-तीव्रता), उनके लक्षण व फल बताकर अभ्यास की मात्रा निर्धारित की गई है। किन रोगों व स्थितियों में श्रम वर्जित है यह स्पष्ट कर सुरक्षा-नियम और अनुशासन स्थापित किया गया है; और श्रम के बाद शरीर की पुनःप्राप्ति के उपाय देकर यह अध्याय क्रीड़ा-चिकित्सा का प्राचीन उदाहरण प्रस्तुत करता है।
चार मल्ल, चार श्रम
यहाँ श्रम (व्यायाम) के गुणों से युक्त चार प्रकार के मल्ल होते हैं: १. ज्येष्ठी, २. अन्तरज्येष्ठी, ३. गोपकुल, ४. भविष्य।
विनियोग (प्रयोग) के आधार पर श्रम भी चार प्रकार का होता है:
- अल्प-श्रम: हल्का/लघु व्यायाम।
- अर्ध-श्रम: मध्यम व्यायाम (आधी क्षमता)।
- पूर्ण-श्रम: पूरा जोर लगाकर व्यायाम (पूर्ण क्षमता)।
- अति-श्रम: क्षमता से अधिक व्यायाम — जो मल्ल-कर्म में (प्रायः वर्जित रूप में) कहा गया है।
श्रम-निषेध व अल्प-श्रम
निषिद्ध (किसे व्यायाम नहीं करना चाहिए): पीनस (जुकाम), सूजन, खांसी, दमा, अत्यंत भूखा, भोजन के तुरंत बाद, अक्षम, कमजोर, व्यग्र (अशान्त), चिंता-तुर, अजीर्ण, नशे में चूर, शिरःशूल वाला, भ्रमित — ये मल्ल-कर्म के लिए वर्जित हैं।
अल्प-श्रम के अधिकारी: बालक, वृद्ध, बुखार वाला, आंखों का रोगी, घाव वाला, कमजोर, मंद ाग्नि (कमजोर पाचन) वाला, धूप/हवा से पीड़ित, थका हुआ, खून की कमी (रक्तहीन) वाला। इन सभी को अपनी स्थिति के अनुसार केवल 'अल्प-श्रम' करना चाहिए।
सुरक्षा नियम: भोजन के बाद व्यायाम न करना और बीमारी में आराम करना — यह आयुर्वेद का मूल नियम है। यहाँ 'अति-श्रम' से बचने की सलाह दी गई है।
पाठभेद संभावित: श्लोक २५ का 'व्यग्रश्चिन्तातुर' तथा श्लोक २९ का 'लघुनश्च' पद स्रोत में अस्पष्ट हैं; यहाँ सर्वोत्तम सुलभ पाठ लिया गया है।
अल्प-श्रम के लाभ: बल-वृद्धि, जठराग्नि-वृद्धि, शरीर में हल्कापन (लघुता), पित्त का नाश, बुढ़ापा और जकड़न का नाश, अंगों में स्थिरता, और उत्साह की वृद्धि। सुख चाहने वाले को नित्य अल्प-श्रम (वार्म-अप/लघु व्यायाम) करना चाहिए।
लक्षण: अल्प-श्रम करने पर सांस नहीं फूलती और पसीना नहीं आता (या बहुत कम आता है)।
पूर्व-तैयारी श्रम: अल्प-श्रम को आज 'प्रारंभिक तैयारी' या 'सक्रिय विश्राम' के रूप में समझा जा सकता है।
पाठभेद संभावित: श्लोक ३२ का प्रथम चरण स्रोत में अस्पष्ट है; यहाँ 'तृणं न जरास्तम्भः' सर्वोत्तम पाठ-रूप में लिया गया है।
अर्ध-श्रम व पूर्ण-श्रम
नित्य 'अर्ध-श्रम' (मध्यम तीव्रता) के लाभ: मन की प्रसन्नता (सौमनस्य), बल, पुष्टि, उत्साह, हर्ष, सुख, प्राण-बल की वृद्धि, मंदाग्नि और मूर्छा का नाश, मेद (वसा) का नाश, पित्त का नाश — ये १२ श्रेष्ठ गुण हैं।
लक्षण: अर्ध-श्रम से कांख, कंठ, गाल, माथा और हाथ-पैर के जोड़ों में पसीना आता है और हल्की सांस चढ़ती है।
हृदय-श्वास व्यायाम: यह वह स्तर है जहाँ पसीना आता है और हृदय-गति बढ़ती है। यह स्वास्थ्य, दम और सहनशक्ति के लिए श्रेष्ठ माना गया है।
पूर्ण-श्रम (उच्च तीव्रता) केवल समर्थ मल्लों (ज्येष्ठी, अन्तरज्येष्ठी, गोपकुल) को करना चाहिए, जो आरोग्य, बल, शूरता और प्राण (दम) से युक्त हों।
लाभ: हृदय-रोग का नाश, पित्त-नाश, पेट के कीड़े (कृमि) और कुष्ठ का नाश, अपने अंगों का पूर्ण सामर्थ्य (चरम प्रदर्शन), कष्ट सहने की क्षमता, शौर्य, रोगों का क्षय, और तीव्र जठराग्नि — ये १० गुण है ं।
चरम प्रदर्शन: यह साधक का मुख्य श्रम-क्रम है।
अति-श्रम के लक्षण व उपचार
पूर्ण-श्रम के लक्षण: सारे शरीर में पसीना, आंखों में लाली, तथा बुढ़ापा-कफ-मेद का नाश।
(चेतावनी — अति-श्रम के लक्षण): पसीना सूख जाना, मुंह से सांस चलना (हांफना), हृदय-कंठ-मुंह-तालु का सूखना, अत्यंत चक्कर आना (भ्रम), बेहोशी (मूर्छा), प्यास, और बल-हानि; उल्टी (छर्दि), दमा, खांसी, रक्तपित्त, हृदय में जलन और ब ुखार। ये लक्षण बताते हैं कि श्रम सीमा पार कर चुका है।
खतरे की घंटी: 'पसीना सूख जाना' और 'आंखों में लाली' लू लगने (उष्णाघात) या अत्यधिक थकान के लक्षण हैं। मल्ल को यहाँ रुक जाना चाहिए।
(अति-श्रम होने पर) हितकारी उपचार:
- सबसे पहले शीतल जल से स्नान करें (शीत-स्नान / जल-चिकित्सा)।
- मिश्री (सीता) मिला हुआ दूध पिएं (पुनःप्राप्ति-पेय)।
- द्राक्षा (अंगूर/किशमिश) खाएं।
- सफेद (ठंडे) वस्त्र पहनें।
- चंदन और कपूर का लेप करें (शीतल लेप)।
- कड़वे, तीखे और खट्टे भोजन का त्याग करें।
- रसदार भोजन, गुड़ और गे हूं का सेवन करें।
ऐसा करने से शरीर में पुष्टि आती है और थकान (श्रम) दूर हो जाती है।
पुनःप्राप्ति विधि: शीतल स्नान (हिम-जल स्नान) और मधुर पेय (द्राक्षा-रस / गुड़-जल) आज भी पुनःप्राप्ति के लिए श्रेष्ठ माने जाते हैं।
अध्याय समाप्ति:
इति श्रीमल्लपुराणे चतुर्मल्लश्रमलक्षणं नाम नवमोऽध्यायः ।
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