मल्लपुराण
चर्चा
अध्याय

श्रम (व्यायाम) के लक्षण और भेद

अल्प, अर्ध, पूर्ण और अति — चार प्रकार के श्रम (प्रशिक्षण-तीव्रता), उनके लक्षण व फल बताकर अभ्यास की मात्रा निर्धारित की गई है। किन रोगों व स्थितियों में श्रम वर्जित है यह स्पष्ट कर सुरक्षा-नियम और अनुशासन स्थापित किया गया है; और श्रम के बाद शरीर की पुनःप्राप्ति के उपाय देकर यह अध्याय क्रीड़ा-चिकित्सा का प्राचीन उदाहरण प्रस्तुत करता है।

चार मल्ल, चार श्रम

चत्वारोऽत्र भवन्त्येव मल्लाः श्रमगुणैर्युताः ॥ २१ ॥ ज्येष्ठी तथान्तरज्येष्ठी तथा गोपकुलोऽपि च । भविष्योऽपि भवत्यन्यश्चतुर्थो भावितैर्गुणैः ॥ २२ ॥ श्रमाश्चैव तु चत्वारो भवन्ति विनियोगतः । अल्पश्रमश्चार्धश्रमः पूर्णश्रम इति क्रमात् ॥ २३ ॥ ततोऽतिश्रम एव स्यात् कथिता मल्लकर्मणि ।
हिंदी अर्थ

यहाँ श्रम (व्यायाम) के गुणों से युक्त चार प्रकार के मल्ल होते हैं: १. ज्येष्ठी, २. अन्तरज्येष्ठी, ३. गोपकुल, ४. भविष्य।

विनियोग (प्रयोग) के आधार पर श्रम भी चार प्रकार का होता है:

  1. अल्प-श्रम: हल्का/लघु व्यायाम।
  2. अर्ध-श्रम: मध्यम व्यायाम (आधी क्षमता)।
  3. पूर्ण-श्रम: पूरा जोर लगाकर व्यायाम (पूर्ण क्षमता)।
  4. अति-श्रम: क्षमता से अधिक व्यायाम — जो मल्ल-कर्म में (प्रायः वर्जित रूप में) कहा गया है।

श्रम-निषेध व अल्प-श्रम

निषिद्धा कथयिष्यामि शृणु मल्लान् यथार्थतः ॥ २४ ॥ पीनसः शोफवान् कासश्वासवानपि क्षुधातुरः । भुक्तवानक्षमः क्षीणो व्यग्रश्चिन्तातुरस्तथा ॥ २५ ॥ अजीर्णवान् दुर्बलश्च क्षीणस्तथैव च । मदपीडितसर्वाङ्गः शिरोरोगार्त एव च ॥ २६ ॥ भ्रान्तश्चैव क्षुधाविष्टो वर्जितो मल्लकर्मणि । अल्पश्रमं करिष्यन्ति ये च तान्कथयाम्यहम् ॥ २७ ॥ बालो वृद्धो ज्वरी चैव चक्षुरोगी व्रणी तथा । रोगी च दुर्बलश्चैव ततो मन्दाग्निरेव च ॥ २८ ॥ वातातपादिपीडावान् तथा चायासवानपि । रक्तहीनो लघुनश्च ये चान्ये कुशरीरिणः ॥ २९ ॥ अल्पश्रमं करिष्यन्ति ते सर्वे स्थानरूपतः । अल्पश्रमस्य विस्तारो निःशेषः कथितो मया ॥ ३० ॥
हिंदी अर्थ

निषिद्ध (किसे व्यायाम नहीं करना चाहिए): पीनस (जुकाम), सूजन, खांसी, दमा, अत्यंत भूखा, भोजन के तुरंत बाद, अक्षम, कमजोर, व्यग्र (अशान्त), चिंता-तुर, अजीर्ण, नशे में चूर, शिरःशूल वाला, भ्रमित — ये मल्ल-कर्म के लिए वर्जित हैं।

अल्प-श्रम के अधिकारी: बालक, वृद्ध, बुखार वाला, आंखों का रोगी, घाव वाला, कमजोर, मंदाग्नि (कमजोर पाचन) वाला, धूप/हवा से पीड़ित, थका हुआ, खून की कमी (रक्तहीन) वाला। इन सभी को अपनी स्थिति के अनुसार केवल 'अल्प-श्रम' करना चाहिए।

टीका

सुरक्षा नियम: भोजन के बाद व्यायाम न करना और बीमारी में आराम करना — यह आयुर्वेद का मूल नियम है। यहाँ 'अति-श्रम' से बचने की सलाह दी गई है।

पाठभेद संभावित: श्लोक २५ का 'व्यग्रश्चिन्तातुर' तथा श्लोक २९ का 'लघुनश्च' पद स्रोत में अस्पष्ट हैं; यहाँ सर्वोत्तम सुलभ पाठ लिया गया है।

अल्पश्रमेण मल्लानां ये भवन्ति गुणा अपि । तानहं कथयिष्यामि द्विजाः शृण्वन्तु तत्त्वतः ॥ ३१ ॥ बलवृद्धिस्तथाग्निश्च लघुता पित्तनाशनम् । तृणं न जरास्तम्भो गात्रास्थैर्यं विशेषतः ॥ ३२ ॥ उत्साहवृद्धिरप्यस्य जायतेऽल्पश्रमेण तु । तस्मादल्पश्रमो नित्यं कर्तव्यः सुखमिच्छता ॥ ३३ ॥ अथाल्पश्रमसंभूतं लक्षणं कथयाम्यहम् । अल्पश्रमे कृते प्रातः श्वासः स्वेदो न जायते ॥ ३४ ॥
हिंदी अर्थ

अल्प-श्रम के लाभ: बल-वृद्धि, जठराग्नि-वृद्धि, शरीर में हल्कापन (लघुता), पित्त का नाश, बुढ़ापा और जकड़न का नाश, अंगों में स्थिरता, और उत्साह की वृद्धि। सुख चाहने वाले को नित्य अल्प-श्रम (वार्म-अप/लघु व्यायाम) करना चाहिए।

लक्षण: अल्प-श्रम करने पर सांस नहीं फूलती और पसीना नहीं आता (या बहुत कम आता है)।

टीका

पूर्व-तैयारी श्रम: अल्प-श्रम को आज 'प्रारंभिक तैयारी' या 'सक्रिय विश्राम' के रूप में समझा जा सकता है।

पाठभेद संभावित: श्लोक ३२ का प्रथम चरण स्रोत में अस्पष्ट है; यहाँ 'तृणं न जरास्तम्भः' सर्वोत्तम पाठ-रूप में लिया गया है।

अर्ध-श्रम व पूर्ण-श्रम

अर्धश्रमेण जायन्ते नित्याभ्यासेन ये गुणाः । तानहं कथयिष्यामि मल्लानां सुखहेतवे ॥ ३५ ॥ सौमनस्यं बलं चैव पुष्टिरुत्साह एव च । हर्षश्चैव सुखं प्राणबलवृद्धिस्तथैव च ॥ ३६ ॥ अग्निमूर्छाविनाशश्च मेदोनाशस्तथैव च । पित्तस्यापि विनाशः स्यात् द्वादशैते वरा गुणाः ॥ ३७ ॥ अर्धश्रमः कृतो यैस्तु लक्ष्यते शृणु तान्गुणान् । अर्धश्रमेण मल्लानां प्रस्वेदो जायते पुनः ॥ ३८ ॥ कक्षाकण्ठकपोलेषु ललाटे करसन्धिषु । पादसन्धिषु प्रस्वेदो हृदि श्वासश्च जायते ॥ ३९ ॥
हिंदी अर्थ

नित्य 'अर्ध-श्रम' (मध्यम तीव्रता) के लाभ: मन की प्रसन्नता (सौमनस्य), बल, पुष्टि, उत्साह, हर्ष, सुख, प्राण-बल की वृद्धि, मंदाग्नि और मूर्छा का नाश, मेद (वसा) का नाश, पित्त का नाश — ये १२ श्रेष्ठ गुण हैं।

लक्षण: अर्ध-श्रम से कांख, कंठ, गाल, माथा और हाथ-पैर के जोड़ों में पसीना आता है और हल्की सांस चढ़ती है।

टीका

हृदय-श्वास व्यायाम: यह वह स्तर है जहाँ पसीना आता है और हृदय-गति बढ़ती है। यह स्वास्थ्य, दम और सहनशक्ति के लिए श्रेष्ठ माना गया है।

अथ पूर्णः श्रमो यैस्तु कर्तव्यः सुसमाहितैः । तानहं कथयिष्यामि यथाशास्त्रं यथाबलम् ॥ ४० ॥ ज्येष्ठी तथान्तरज्येष्ठी तथा गोपकुलोऽपि च । पूर्णश्रमः कार्यः संयुक्तैर्भावितैर्गुणैः ॥ ४१ ॥ आरोग्यबलवान् शूरः प्राणवान् सुश्रमस्तथा । श्रमसहः क्लेशसहः पुष्टकार्यग्निमानपि ॥ ४२ ॥ पूर्णश्रमेऽपि मल्लानां जायन्ते ये गुणा अपि । तानहं कथयिष्यामि यथाशास्त्रं यथाबलम् ॥ ४३ ॥ तथा हृद्रोगनाशश्च पित्तनाशोऽपि जायते । कृमिनाशः कुष्ठनाशः स्वाङ्गसामर्थ्यमेव च ॥ ४४ ॥ क्लेशे सहिष्णुता शौर्यं रोगाणां क्षय एव च । अग्निवृद्धिः क्रमादेते भवन्त्यत्र गुणा दश ॥ ४५ ॥ परिपूर्णश्रमस्तस्माद् कर्तव्यस्तु समाहितैः ।
हिंदी अर्थ

पूर्ण-श्रम (उच्च तीव्रता) केवल समर्थ मल्लों (ज्येष्ठी, अन्तरज्येष्ठी, गोपकुल) को करना चाहिए, जो आरोग्य, बल, शूरता और प्राण (दम) से युक्त हों।

लाभ: हृदय-रोग का नाश, पित्त-नाश, पेट के कीड़े (कृमि) और कुष्ठ का नाश, अपने अंगों का पूर्ण सामर्थ्य (चरम प्रदर्शन), कष्ट सहने की क्षमता, शौर्य, रोगों का क्षय, और तीव्र जठराग्नि — ये १० गुण हैं।

टीका

चरम प्रदर्शन: यह साधक का मुख्य श्रम-क्रम है।

अति-श्रम के लक्षण व उपचार

पूर्णश्रमे कृते मल्लैर्जायन्ते लक्षणानि वै ॥ ४६ ॥ तान्यहं कथयिष्यामि श्रूयतां च प्रयत्नतः । स्वेदः सर्वेषु चाङ्गेषु नेत्रयोश्चैव रक्तिमा ॥ ४७ ॥ जरानाशः कफनाशो मेदोनाशस्तथा परः । प्रस्वेदं शोषयत्येव मुखे श्वासः प्रवर्तते ॥ ४८ ॥ हृदयं शोषयत्याशु कण्ठे शोषश्च तत्क्षणात् । तथा मुखं च शोषयति तालुं शोषयति क्रमात् ॥ ४९ ॥ भ्रमोऽत्यन्तमेव स्यात् मूर्छा प्रकुरुते परम् । पिपासा जायते सद्यो बलहानिर्विशेषतः ॥ ५० ॥ छर्दिभ्रमश्वासकासरक्तपित्तभयानि च । तथा हृदयदाहं च ज्वरमुत्पादयेदलम् ॥ ५१ ॥
हिंदी अर्थ

पूर्ण-श्रम के लक्षण: सारे शरीर में पसीना, आंखों में लाली, तथा बुढ़ापा-कफ-मेद का नाश।

(चेतावनी — अति-श्रम के लक्षण): पसीना सूख जाना, मुंह से सांस चलना (हांफना), हृदय-कंठ-मुंह-तालु का सूखना, अत्यंत चक्कर आना (भ्रम), बेहोशी (मूर्छा), प्यास, और बल-हानि; उल्टी (छर्दि), दमा, खांसी, रक्तपित्त, हृदय में जलन और बुखार। ये लक्षण बताते हैं कि श्रम सीमा पार कर चुका है।

टीका

खतरे की घंटी: 'पसीना सूख जाना' और 'आंखों में लाली' लू लगने (उष्णाघात) या अत्यधिक थकान के लक्षण हैं। मल्ल को यहाँ रुक जाना चाहिए।

इति ज्ञात्वा च सकलं कर्तव्यं हितमात्मनः । येन कृतेन मल्लानां जायते सुखमाशु वै ॥ ५२ ॥ तदहं कथयिष्यामि शृण्वन्तु विधिपूर्वकम् । स्नानं शीतोदकेनैव कारयेत् प्रथमं सदा ॥ ५३ ॥ कर्तव्यं च पयःपानं सीतया च समन्वितम् । द्राक्षाणां भक्षणं चैव श्वेतवस्त्रनिषेवणम् ॥ ५४ ॥ विलेपनं चन्दनेन कर्पूरेण च शोभनम् । अर्धवस्त्राच्छादनं च कटुतिक्ताम्लवर्जनम् ॥ ५५ ॥ भोजनं सरसं चैव गुडसारैश्च गोधुमैः । एवं कृते ततः पुष्टिः शरीरे गच्छति श्रमः । मल्लैः कर्तव्यमित्येवमुपचारः सुखावहः ॥ ५६ ॥
हिंदी अर्थ

(अति-श्रम होने पर) हितकारी उपचार:

  1. सबसे पहले शीतल जल से स्नान करें (शीत-स्नान / जल-चिकित्सा)।
  2. मिश्री (सीता) मिला हुआ दूध पिएं (पुनःप्राप्ति-पेय)।
  3. द्राक्षा (अंगूर/किशमिश) खाएं।
  4. सफेद (ठंडे) वस्त्र पहनें।
  5. चंदन और कपूर का लेप करें (शीतल लेप)।
  6. कड़वे, तीखे और खट्टे भोजन का त्याग करें।
  7. रसदार भोजन, गुड़ और गेहूं का सेवन करें।

ऐसा करने से शरीर में पुष्टि आती है और थकान (श्रम) दूर हो जाती है।

टीका

पुनःप्राप्ति विधि: शीतल स्नान (हिम-जल स्नान) और मधुर पेय (द्राक्षा-रस / गुड़-जल) आज भी पुनःप्राप्ति के लिए श्रेष्ठ माने जाते हैं।

अध्याय समाप्ति:

इति श्रीमल्लपुराणे चतुर्मल्लश्रमलक्षणं नाम नवमोऽध्यायः ।

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